बहुरेंगे बरौनी रिफाइनरी के दिन

refineryबिहार की पहचान माने जाने वाले बरौनी रिफाइनरी के दिन बहुरने वाले हैं. मोदी सरकार बनने के बाद ही इसकी कवायद शुरू हो गई थी, लेकिन अब इसे लेकर कुछ सकारात्मक कदम धरातल पर उतरने वाले हैं. बैठकों के लंबे दौर के बाद बरौनी रिफाइनरी की शोधन क्षमता में विस्तार के आसार बढ़ गए हैं. बरौनी रिफाइनरी की शोधन क्षमता में विस्तार से यहां पेट्रोकेमिकल उद्योग समूह की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होगा. इससे हजारों स्थानीय परिवारों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलेगा. इससे बिहार सरकार के राजस्व में वृद्धि भी होगी. यदि सबकुछ ठीक-ठाक रहा, तो जनवरी 1965 से मात्र एक एमएमटीपीए की शोधन क्षमता से अस्तित्व में आई बरौनी रिफाइनरी 54 वर्षों बाद जनवरी 2019 में 9 एमएमटीपीए (मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष) की क्षमता प्राप्त कर सकेगी.

दरअसल, भारत सरकार के उपक्रम आईओसीएल ने 2030 तक अपनी शोधन क्षमता दोगुनी कर सालाना 15 करोड़ टन करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर आईओसीएल के निदेशक मंडल ने गत सितम्बर माह के अन्तिम सप्ताह की बैठक में बरौनी रिफाइनरी की शोधन क्षमता का विस्तार 6 से बढ़ाकर 9 एमएमटीपीए करने का फैसला किया. इसके लिए 8287 करोड़ रुपया निवेश करने की सैद्धान्तिक मंजूरी भी मिल गई है. सरकारी क्षेत्र में देश की दूसरी रिफाइनरी को 9 एमएमटीपीए की शोधन क्षमता प्राप्त करने में 54 वर्ष लगेंगे. गौरतलब है कि बरौनी रिफाइनरी के बाद आईओसीएल ने देश में जितनी भी रिफाइनरी स्थापित की, उन सभी की शोधन क्षमता इससे काफी अधिक थी. बरौनी रिफाइनरी की शोधन क्षमता का विस्तार दो चरणों में किया जाना है. प्रथम चरण में इसकी शोधन क्षमता को 6 से बढ़ाकर 7 एमएमटीपीए किया जाएगा एवं दूसरे चरण में 7 से बढ़ाकर 9 एमएमटीपीए किया जाएगा. इसके लिए बरौनी रिफाइनरी को अपनी कार्यक्षमता और उत्पादन दोनों में वृद्धि करना होगा. बीएस-6 परियोजना के तहत एनएसयू, पीजी+ का आधुनिकीकरण, ऑटो ब्लैंडर आदि पर 1807 करोड़ रुपए से कार्य जारी है, जो इसके विस्तारीकरण का मार्ग प्रशस्त करेगा.

द्वितीय चरण का कार्य आगामी वित्तीय वर्ष से प्रारम्भ होकर दिसम्बर 2018 तक पूरा होने की संभावना है. लोकसभा के चुनावी वर्ष 2019 में किसी समय इसका उद्घाटन किया जा सकता है. बरौनी रिफाइनरी की शोधन क्षमता में विस्तार एवं पेट्रोकेमिकल इद्योग समूह की स्थापना से बेगूसराय जिले के निवासियों के लिए नौकरी, रोजगार एवं व्यवसाय के अवसर पैदा होंगे और इससे जुड़े परिवारों को लाभ होगा तथा क्रूड ऑयल एन्ट्री टैक्स, सेल टैक्स, इनकम टैक्स आदि से बिहार सरकार को अच्छी खासी राजस्व की प्राप्ति होगी. राष्ट्रीय उच्च पथ 30 एवं 31 तथा रेलवे के बरौनी जंक्शन एवं मोकामा जंक्शन से जुड़ा बरौनी रिफाइनरी बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह की हठधर्मिता की उपज है. सोवियत यूनियन के सहयोग से भारत सरकार ने मात्र 49.4 करोड़ रुपए की लागत से बरौनी रिफाइनरी कारखाना का निर्माण कराया. जुलाई 1964 में एवीयू-1 का कमिशन हुआ. भारत सरकार के तत्कालीन पेट्रोलियम एवं रसायन मंत्री प्रो हुमायूं कबीर ने 15 जनवरी 1965 को बरौनी रिफाइनरी को राष्ट्र को समर्पित किया. प्रारम्भ में इसकी शोधन क्षमता मात्र एक एमएमटीपीए थी, जिसे 1969 में बढ़ाकर 3.3 एमएमटीपीए, 2000 में 4.2 एवं 2002 में बढ़ाकर 6 एमएमटीपीए किया गया.

1990 के दशक में ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि कच्चे तेल की कमी का कारण बताकर इसे बंद करने की बातें भी चर्चा में रही. कहा जा रहा था कि इसे तेल डिपो के रूप में दल दिया जाएगा. लेकिन बरौनी रिफाइनरी के कर्मठ कामगारों के संघर्ष एवं राजनेताओं की पहल पर इसे विफल किया गया. वर्त्तमान में बरौनी रिफाइनरी प्राकृतिक कच्चे तेल का शोधन कर एलपीजी, नेफ्था, पेट्रोल, केरोसीन, डीजल, कार्बन, ब्लैक फीड स्टोक, एफओ, विटूमेन, सल्फर एवं कच्चा पेट्रोलियम कोक तैयार करता है. तैयार उत्पाद को सड़क, रेल एवं बरौनी-कानपुर पाइप लाइन द्वारा देश के आंध्रप्रदेश, आसाम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, नागालैंड, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तरप्रदेश एवं बंगाल सहित पड़ोसी देश नेपाल को आपूर्ति किया जाता है.

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