राहुल गांधी के सामने सवाल

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अब जब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हो गए हैं, तो वो अपनी बहन प्रियंका गांधी का राजनीति में कैसा, कैसे और कितना इस्तेमाल करते हैं, ये सवाल लोगों के सामने खड़ा है. प्रियंका गांधी गुजरात भी जाने वाली थीं, लेकिन उनका कार्यक्रम रद्द हो गया. लोग इसके पीछे राहुल गांधी के सलाहकारों के डर को देखते हैं. इस चुनाव में प्रियंका गांधी का इस्तेमाल करने के बारे में राहुल गांधी और उनके सलाहकारों ने सोचा ही नहीं. शायद मां की बीमारी, भाई को लेकर भाजपा के ताबड़तोड़ हमले और राहुल गांधी की नकारात्मक छवि ने प्रियंका गांधी को भी कहीं तोड़ कर रख दिया है. इसीलिए, प्रियंका गांधी की ताजा तस्वीरें बताती हैं कि वो किसी बड़ी मानसिक उलझन में हैं. उनका चेहरा, उनकी आंखें, जो कभी देश की जनता को आकर्षित करती थीं और इंदिरा गांधी की याद दिलाती थीं, अब उसमें बहुत परिवर्तन आ गया है.

rahulराहुल गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हो गए. शायद कोई दूसरा अध्यक्ष बन ही नहीं सकता था. ये उनके भाग्य में था. राहुल गांधी के अध्यक्ष बनते ही उन्हें कई सारी सीखें सीखने का अवसर मिल गया. उनके सामने सवाल भी हैं और उनके सिर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को देश के राजनीतिक क्षितिज पर दोबारा स्थापित करने का अवसर भी है, लेकिन क्या स्वयं राहुल गांधी को ये पता है कि उनके सामने किस तरह की और कितनी चुनौतियां हैं. सीधे-सीधे तो ये दिखाई देता है कि उन्हें अवश्य पता होगा, उनके सामने क्या चुनौतियां हैं और उन्हें उन चुनौतियां का सामना कैसे करना होगा? लेकिन जब हम पिछले दस से पंद्रह वर्षों का आकलन करते हैं, तब ऐसा लगता है यह सोचना कि उन्हें सारी समस्याओं का ज्ञान है, सही नहीं है.

राहुल गांधी के सिर पर उनके नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू, उनकी दादी इंदिरा गांधी, उनके पिता राजीव गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी द्वारा किए गए कामों का, उनके द्वारा दिखाई गई संगठन क्षमता का और उन्हें जनता के मिले विश्वास का बोझ तो है ही, लेकिन उनके सामने ये भी चुनौती है कि वो इन सबके सामने आई समस्याओं और उनके निवारण करने के तरीकों का अध्ययन करेंगे और अपने लिए नया रास्ता खोजने का कौशल विकसित करेंगे.

कार्यकर्ताओं से दूर हैं राहुल

राहुल गांधी को लेकर देश में एक सामान्य धारणा है कि उन्हें देश की समस्याओं का ज्ञान नहीं है और वो उन समस्याओं से रूबरू होना भी नहीं चाहते हैं. देश की समस्याएं जैसे गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, इनके सही कारण, देश में व्याप्त समाज, जाति, धर्म और वर्ग के अंतर्विरोध, भारतीय समाज के आगे बढ़ने के लिखित और अलिखित कारण और साथ ही समाज को बांटने वाले बिंदु, इन सब के बारे में राहुल गांधी कितने जानकार हैं, ये भी सामने आना बाकी है. ये इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि राहुल गांधी का उनके कार्यकर्ताओं से कोई संपर्क नहीं है. इतने दिनों में राहुल गांधी कार्यकर्ताओं से कम मिले, अपने पसंद के लोगों से ज्यादा मिले. उन समाजशास्त्रियों से मिले, जो सतही किस्म के समाजशास्त्री रहे हैं, जिन्हें स्वयं इस देश के छुपे हुए शक्तिशाली स्रोतों का पता नहीं है. पिछले छह से आठ साल का जो अनुभव या जानकारी हमलोगों के पास है.

जब भी उनका कार्यकर्ता उनसे मिलने के लिए समय मांगता है, उसे समय नहीं मिलता और जिसे समय मिलता है, उसकी बातों से समस्या की जड़ तलाशने में उनकी रुचि नहीं है. दो-तीन-चार मिनट बात सुनने के बाद उनका कहना होता है कि इस बात को लिखकर दे दीजिए या कभी कहते हैं कि ये कनिष्क (राहुल टीम के महत्वपूर्ण सदस्य) को बता दीजिए. जो कार्यकर्ता उनसे बात करने जाता था, वो मायूस होकर लौट आता था. राहुल गांधी ने कभी इस बात का महत्व नहीं जाना कि अपने प्रमुख कार्यकर्ताओं को वे उनके नाम से जानें. वेे आज के जमाने के राजनेता हैं. उनके अध्यक्ष बनने से पहले जब भी कोई उनसे मिलने जाता था, तो उसकी तरफ उनका ध्यान कम अपने मोबाइल और आईपैड पर ज्यादा होता था.

कांग्रेस के वो सभी वरिष्ठ नेता, जिन्होंने अपने जीवन के तीस-चालीस साल कांग्रेस को दिए और जिन्होंने कांग्रेस का उत्थान और पतन भी देखा, उन सबसे राहुल गांधी का कोई सम्पर्क, सम्बन्ध नहीं रहा. कांग्रेस पार्टी में ये धारणा बनी हुई है कि राहुल गांधी का मानना है कि कांग्रेस पार्टी में सब कुछ नौजवानों के हाथ में होना चाहिए, नई उम्र के लोगों के हाथ में होना चाहिए, नई पीढ़ी के हाथ में होना चाहिए. पुराने लोग अब इतने बूढ़े हो चुके हैं कि उनके पास समाज को देने के लिए कुछ नहीं है. उनका अनुभव आज की बदलती तकनीकी दुनिया में व्यर्थ की चीज है. इस धारणा ने कांग्रेस के सारे बुजुर्ग नेताओं को, जिन्होंने कांग्रेस का उत्थान और पतन भी देखा, जिन्होंने कांग्रेस को बनाया, वो सारे लोग अपने को एकाकी और व्यर्थ का समझने लगे. खासकर वो टीम, जिसने उनकी मां सोनिया गांधी के साथ रहकर बीस साल तक कांग्रेस को स्थापित करने का काम किया.

भाजपा को वाक ओवर

ये चुनौतियां शायद इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि अभी-अभी गुजरात के फैसले आए हैं. फैसले तो इसके पहले भी कई राज्यों और लोकसभा के आए और उनसे राहुल गांधी को सीख लेनी चाहिए, पर राहुल गांधी ने उनसे कोई सीख नहीं ली. पिछले दस साल की सबसे बड़ी सीख ये थी कि कांग्रेस पार्टी का संगठन कैसे निर्जीव से सजीव हो, इसका पूरा जिम्मा राहुल गांधी के कंधों पर था. राहुल गांधी ने संगठन को लेकर कभी अपनी समझदारी नहीं दिखाई. चाहे राज्य हो या चाहे केंद्र हो, कांग्रेस के पास जितने भी लोग थे, चाहे किसी भी उम्र के थे, पर जो काम करना चाहते थे, उन्हें काम में लगाने की राहुल गांधी के पास कोई योजना नहीं थी.

कांग्रेस के पास हर राज्य में अब भी विधायकों की बड़ी संख्या है. सांसद और भूतपूर्व सांसदों की एक लंबी फौज है. इन सबको संगठन के काम में या पिछले दस साल में राज्यों में हुए चुनाव में  लगाने का काम राहुल गांधी ने नहीं किया. हर प्रदेश में संगठन निर्जीव है. संगठन में चंद नेताओं के बाद जो आते हैं, जो सबसे महत्वपूर्ण होते हैं, उनसे राहुल गांधी का कोई संवाद नहीं है और इसीलिए चाहे बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बंगाल या ओड़ीशा हो, पिछले दस से पंद्रह साल में इन सब राज्यों में संगठन बनाने की कोई कोशिश ही नहीं हुई है.

इसके पीछे राहुल गांधी की क्या सोच थी, ये किसी को नहीं पता. लेकिन राहुल गांधी ये भी नहीं समझ पाए कि अगर एक चुनाव हार जाते हैं, तो उस राज्य में पांच साल तक उनके पास सत्ता में आने का कोई रास्ता नहीं बचता है. बीच के सालों में सारे कार्यकर्ताओं, सारे वर्तमान या भूतपूर्व विधायकों या सांसदों को उस राज्य में जिस तरह लगाना चाहिए, उसे लगाने के बारे में राहुल गांधी ने कभी सोचा ही नहीं. इसीलिए 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ये समझ ही नहीं पाए कि उन्हें भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी का मुकाबला कैसे करना है और देश के सामने उन्होंने ये छाप छोड़ दी कि उन्होंने नरेंद्र मोदी का सामना करने की जगह वाक ओवर देना ज्यादा ठीक समझा.

पूनावाला के पीछे रॉबर्ट वाड्रा!

राहुल गांधी के सामने दूसरी चुनौती खुद उनके परिवार को लेकर है. जैसे, कांग्रेस प्रवक्ता बने शहजाद पूनावाला पहला नाम है और सटीक उदाहरण भी है. पूनावाला ने कई सालों तक टीवी पर कांग्रेस का पक्ष सटीक ढंग से रखा. वो राहुल गांधी से मिलने का समय मांगते रहे. राहुल गांधी ने समय नहीं दिया. अंतत:, पूनावाला राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के फैसले की आलोचना करते हुए कांग्रेस से दूर हो गए. राहुल गांधी का रिश्ता अपनी बहन प्रियंका गांधी से है, लेकिन मेरी जानकारी के हिसाब से, पिछले सात महीनों से प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा से राहुल गांधी ने मुलाकात नहीं की है. वो रॉबर्ट वाड्रा को पसंद नहीं करते, लेकिन आप जब किसी को बहुत कोने की तरफ फेंकते हैं, तो वो पलट कर कुछ ऐसा करता है कि परेशानियां खड़ी हो जाती हैं.

एक जानकारी के हिसाब से शहजाद पूनावाला के बयान के पीछे रॉबर्ट वाड्रा का ही हाथ था. इस बयान से था़ेडे समय के लिए राहुल गांधी असहज हो गए थे. अब जब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हो गए हैं, तो वो अपनी बहन प्रियंका गांधी का राजनीति में कैसा, कैसे और कितना इस्तेमाल करते हैं, ये सवाल लोगों के सामने खड़ा है. कांग्रेस के जेहन में शुरू से ये द्वंद्व चल रहा था कि अगर प्रियंका गांधी चुनाव में प्रचार करने उतरती हैं, तो कांग्रेस को ज्यादा फायदा हो सकता है. प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में भी चुनाव प्रचार करने जाने वाली थीं. आखिरी वक्त पर उनका कार्यक्रम रद्द हो गया.

वो गुजरात भी जाने वाली थीं, लेकिन उनका कार्यक्रम रद्द हो गया. लोग इसके पीछे राहुल गांधी के सलाहकारों के डर को देखते हैं. वो डर ये है कि अगर प्रियंका गांधी की सभाओं में भीड़ ज्यादा हुई या उनके प्रचार करने की शैली कांग्रेस के लोगों को पसंद आई तो इसका नुकसान राहुल गांधी के भविष्य पर पड़ सकता है. ये सत्य है या नहीं, ये हम नहीं कह सकते, पर राहुल गांधी के घर से जो खबरें छन कर आती हैं, उनके नजदीक के सलाहकारों से, वे इस बात को पुष्ट करते हैं. उत्तर प्रदेश चुनाव में प्रियंका गांधी ने बैक ऑफिस को बखूबी संभाला था.

उनके सलाहकारों में प्रशांत किशोर सहित 40 लोगों की टीम थी, जिसने सफलतापूर्वक उत्तर प्रदेश का काम संभाला, लेकिन संपूर्ण संयोजन न होने और रणनीति के अभाव ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे कम सीट पर समेट दिया. इस चुनाव में प्रियंका गांधी का इस्तेमाल करने के बारे में राहुल गांधी और उनके सलाहकारों ने सोचा ही नहीं. शायद मां की बीमारी, भाई को लेकर भाजपा के ताबड़तोड़ हमले और राहुल गांधी की नकारात्मक छवि ने प्रियंका गांधी को भी कहीं तोड़ कर रख दिया है. इसीलिए, प्रियंका गांधी की ताजा तस्वीरें बताती हैं कि वो किसी बड़ी मानसिक उलझन में हैं. उनका चेहरा, उनकी आंखें, जो कभी देश की जनता को आकर्षित करती थीं और इंदिरा गांधी की याद दिलाती थीं, अब उसमें बहुत परिवर्तन आ गया है.

राहुल टीम ईमानदार, पर जानकार नहीं

राहुल गांधी के पास बहुत अच्छे गुण भी हैं. राहुल गांधी जहां पुराने लोगों पर विश्वास नहीं करते, वहां अपने मित्रों के ऊपर, जो राहुल टीम कहलाती है, पर बहुत विश्वास करते हैं. यद्यपि उस टीम में हिंदुस्तान को जानने वाले कम लोग हैं, लेकिन जो हैं, वे ईमानदार हैं. लेकिन ईमानदार होना काफी नहीं, जानकार होना भी आवश्यक है. राहुल गांधी सूचना और ज्ञान का फर्कनहीं समझ पाए. वो सूचना के आधार पर फैसले लेते हैं. जिसे विषयों का बुनियादी ज्ञान नहीं हो, वो सूचनाओं को कसौटी पर नहीं कस सकता. वो सूचनाओं के जाल में फंस जाता है और गलत फैसले भी ले लेता है. राहुल गांधी को नॉलेज और इन्फॉर्मेशन का फर्कसमझना चाहिए.

राहुल गांधी ईमानदार हैं. अभी तक कोई ऐसी जानकारी नहीं है कि उन्होंने किसी भ्रष्ट व्यक्ति को बचाया हो या अपनी सरकार से किसी बड़े बिजनेस हाउस के लिए काम करने के लिए कहा हो. शायद इसीलिए, उनका और रॉबर्ट वाड्रा का कोई रिश्ता जनता के सामने नहीं है. कांग्रेस के लोग अच्छी तरह से इस बात को समझते हैं कि राहुल गांधी किन्हीं कारणों से रॉबर्ट वाड्रा को पसंद नहीं करते क्योंकि रॉबर्ट वाड्रा भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत आसान लक्ष्य हैं और वो उन्हें या उनके किए गए कामों को इसीलिए बड़ा बना रहे ताकि वक्त आने पर वाड्रा को राहुल गांधी के सामने इस्तेमाल कर सकें. जो भी लोग राहुल गांधी से पिछले एक साल में मिले हैं, उनका ये आकलन है कि उनमें बहुत बदलाव आया है. ये बदलाव क्या है, इसी की परीक्षा बाकी है.

आस-पास के घेरे को थोड़ा ढीला करें

अब तक राहुल गांधी औसतन 8 महीने बाहर और 4 महीने देश में रहे हैं. इस मामले में उन्हें मूडी माना जाता है और उनका जब मन होता है वे छुट्टी मनाने या अपने मित्रों से मिलने विदेश चले जाते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के खुद के लिए पहली बड़ी चुनौती ये है कि वे देश में कितने दिन रहते हैं या वो विदेश जाने की अपनी आदत को बिना बदले पुन: विदेश चले जाते हैं. भारत जैसे देश में राजनीतिक पार्टी का संचालन थोड़ा मुश्किल है. इसके लिए 25 घंटे का राजनीतिज्ञ होना पड़ता है. सारे प्रमुख कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्करखना पड़ता है, सारे पुराने लोगों को सम्मान देना पड़ता है और अपनी पार्टी जैसे विचारधारा वाले दलों के लोगों से भी संपर्करखना पड़ता है.

एक अच्छे राजनेता और अध्यक्ष के लिए आवश्यक है कि वो अपने अहंकार को या अपने आस-पास के घेरे को थोड़ा ढीला करे. अगर वो ऐसा नहीं करता तो लोग उससे नहीं जुड़ते और जब लोग नहीं जुड़ते तो पार्टी को जीत नहीं मिलती. ये नियम अपने दल के लिए भी आवश्यक है और ये नियम सहयोगी पार्टियों के साथ संबंधों के लिए भी आवश्यक है. देश के सामने आने वाली समस्याओं को लेकर उनका विश्लेषण करना, पार्टी अध्यक्ष के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन वो विश्लेषण कभी अकेला नहीं कर सकता. उसे सब को सुन कर, सब की राय लेकर फैसला लेना चाहिए. जो एकाकी फैसला लेता है वो कभी अच्छा अध्यक्ष नहीं माना जा सकता.

ये परिवर्तन राहुल गांधी में अतिआवश्यक हैं. लोग इस बात पर नजर गड़ाए बैठे हैं कि क्या राहुल गांधी में ये परिवर्तन होगा या जिस तरह वे पहले अपने चंद साथियों के साथ बैठ कर फैसला करते थे, उसी रास्ते पर वो आगे बढ़ने में यकीन रखते हैं. उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी के बारे में कहा जाता है कि वो देश भर के अपने कार्यकर्ताओं से इतना ज्यादा मिलती थीं, उनकी बातें ध्यान से सुन कर अंदाजा लगा लेती थीं कि उस क्षेत्र में कांग्रेस की क्या समस्या है और फिर उसका समाधान निकालने के लिए अपने विश्वस्त लोगों को निर्देश देती थीं.

उनके पिता श्री राजीव गांधी क्लीन स्लेट की तरह आए थे और देश को उनसे बहुत उम्मीदें थीं. लेकिन वो चुनाव के साल भर के भीतर बहुत थोड़े लोगों की सलाह के आदी हो गए. इसने उन्हें दिल के स्तर पर कार्यकर्ताओं से जोड़े रखा, लेकिन दिमाग और फैसलों के स्तर पर वे कार्यकर्ताओं से दूर हो गए. इसलिए तीसरा साल बीतते-बीतते ऐसी समस्याएं आईं कि उनकी प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर साख कम होती चली गई.

ये सारे बिन्दु राहुल गांधी के लिए अध्ययन के विषय हैं. अगर राहुल गांधी इनका अध्ययन नहीं करते और अपने पार्टी के सभी लोगों को अपने साथ नहीं रखते तो कैसे कामयाब अध्यक्ष बनेंगे, ये समझ में नहीं आता. किसी भी नेता या पार्टी अध्यक्ष के लिए आवश्यक है कि पार्टी के भीतर जितने समूह हैं, सबसे संपर्करखे और सबके लिए काम तलाशे. अगर ऐसा नहीं होगा तो सब कमजोर हो जाएंगे और बिखर जाएंगे. भाजपा इसलिए आगे बढ़ रही है, क्योंकि वो इन नियमों का पालन कर रही है. कांग्रेस इन नियमों का पालन नहीं कर रही है.

राहुल गांधी को समझना चाहिए कि साइंस का एक नियम है कि एक निश्चित ताप सीमा पर ही पानी में उबाल आता है. उससे ज्यादा ताप हो तो पानी भाप बन कर उड़ जाता है और अगर ताप उससे कम हो तो पानी ठंडा का ठंडा यानि गुनगुना होकर रह जाता है. ये सिद्धांत राहुल गांधी को समझना चाहिए कि बिल्कुल सटीक समय पर सटीक फैसला लें. उससे पहले पूर्ण विमर्श और पूर्ण विश्लेषण और इस फैसले के क्या परिणाम होंगे और उन परिणामों का कैसे सामना करना है, ये पहले से पता होना चाहिए.

लोेकतंत्र बचाने में राहुल की भूमिका

राहुल गांधी के ऊपर एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी है. कांग्रेस देश पर बहुत समय तक शासन कर चुकी है और इस वक्त प्रमुख विपक्षी दल है. लोकतंत्र में विपक्ष की बड़ी भूमिका होती है. अगर विपक्षी दल लोगों की समस्याएं न जाने, उन समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को अपने साथ न जोड़े और उसे सही फोरम पर न उठाए तो विपक्षी दल की कोई भूमिका बचती नहीं. कांग्रेस ने पिछले तीन सालों में यही किया. पिछले दस साल के शासन के बाद कांग्रेस विपक्ष में आई, लेकिन कांग्रेस ये स्वीकार करने को ही तैयार नहीं है कि वो विपक्ष में है. भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दे रही है.

इसका मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के सभी नेताओं को सिर जोड़ कर बैठने की जरूरत है, लेकिन इस प्रक्रिया को प्रारंभ करने और तार्किक परिणति तक पहुंचाने की जिम्मेदारी राहुल गांधी की है. दरअसल, देश में लोकतंत्र को बचाए रखने में विपक्ष का और खास कर राहुल गांधी की बहुत बड़ी भूमिका है. चूंकि, राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, इसलिए राहुल गांधी को ये भूमिका निभानी ही चाहिए. देश के लिए राहुल गांधी के पास क्या सोच है, उनकी योजना क्या है, लोगों के हृदय पर वो कैसे अपनी छाप छोड़ेंगे, ये सारे सवाल अनुत्तरित हैं. अपनी आदत के मुताबिक अगर वे इन सवालों का जवाब देने में वक्त लगाएंगे तो वक्त उनके हाथ से निकल जाएगा. राहुल गांधी को वक्त हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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