स्वास्थ्य सेवा निजी हाथों में सौंपने की साजिश को पहचानिए

जब से हेल्थ इंडस्ट्री का रूपांतरण मेडिकल टूरिज्म के रूप में हुआ है, तब से सरकार ने जन स्वास्थ्य के क्षेत्र से पल्ला झाड़ लिया है. जन स्वास्थ्य का क्षेत्र मुनाफे का धंधा बनता गया और सरकार बेफिक्र बनी रही. लेकिन अब सरकार की छिपी मंशा स्पष्ट नजर आने लगी है. कर्नाटक ने आरोग्य बंधु योजना के तहत स्वास्थ्य केंद्रों को पीपीपी मॉडल के हवाले करने की शुरुआत की थी. लेकिन जल्द ही सरकार को यह एहसास हो गया कि जन स्वास्थ्य को निजी अस्पतालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है. कर्नाटक सरकार समय रहते इस योजना से पीछे हट गई, लेकिन तभी राजस्थान सरकार को यह योजना भा गई. राजस्थान सरकार ने 2015 में ही पीएचसी को प्राइवेट सेक्टर के हाथों सौंपने का फैसला कर लिया था. अब राजस्थान सरकार ने 299 प्राथमिक हेल्थ सेंटर्स, पीएचसी को निजी हाथों के हवाले करने का फैसला किया है. अब ये केंद्र निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल पर चलाए जाएंगे. ग्रामीण इलाकों में, जहां सरकारी चिकित्सा सुविधाएं नदारद हैं, वहां पीएचसी ही गरीब-गुरबों के लिए बीमारी के एकमात्र निदान केंद्र हैं. अगर पीएचसी प्राइवेट हाथों में चले गए, तो ग्रामीण फिर झोलाछाप डॉक्टरों के चंगुल में फंस जाएंगे. सवाल यह है कि कोई भी निजी संस्था सिर्फ चैरिटी के लिए पीएचसी में इन्वेस्ट क्यों करेगी? ऐसे में अगर पीएचसी भी पैसे कमाने का जरिया बन गए, तो फिर शिक्षा की तरह ही स्वास्थ्य सेवाएं भी गरीबों की पहुंच से दूर हो जाएंगी. फिलहाल राजस्थान में 2082 प्राथमिक हेल्थ सेंटर्स हैं, जिन्हें धीरे-धीरे निजी सेक्टर के हवाले किया जाएगा.

राज्य सरकार का कहना है कि ये पीएचसी दूरस्थ क्षेत्रों और आदिवासी बहुल इलाकों में हैं. इन पीएचसी को प्राइवेट हाथों में दिए जाने से लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी. लेकिन सरकारी दावों से इतर, इनमें से अधिकतर पीएचसी शहरी क्षेत्रों या उसके नजदीक स्थित हैं. सवाल ये है कि दूरस्थ इलाकों में ग्रामीणों की बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कोई प्राइवेट सेक्टर भला क्यों आगे आएगा? जब सरकार, जो सबको शिक्षा, सबको स्वास्थ्य का दावा करती हो, खुद कदम पीछे खींच रही हो. ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति तो इतनी भयावह है कि यहां सरकार के तमाम लोक-लुभावन वादों के बावजूद कोई डॉक्टर जाना नहीं चाहता है. फिर अचानक इस सेवाभाव उत्पन्न होने के पीछे निजी सेक्टर का मकसद सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना ही है. तभी तो जब सरकार ने 299 पीएचसी के लिए निविदा मांगे, तो आनन-फानन में 43 पीएचसी के लिए प्राइवेट सेक्टर के साथ करार हो गया. करार के तहत, राज्य सरकार ऐसे सभी पीएचसी चलाने के लिए प्राइवेट सेक्टर को प्रति पीएचसी एकमुश्त तीस लाख रुपए देगी. इसके अलावा पीएचसी की बिल्डिंग, फर्नीचर और चिकित्सकीय उपकरणों के इस्तेमाल की भी पूरी छूट होगी.

सवाल यह है कि जब केंद्र सरकार ने इस योजना पर आपत्ति जताई थी, इसके बावजूद राज्य सरकार पीएचसी प्राइवेट सेक्टर को देने के लिए इतनी हड़बड़ी में क्यों है? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस योजना को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर छोटे से इलाके में चलाने की सलाह दी थी, लेकिन केंद्र की इस आपत्ति को दरकिनार कर राज्य सरकार ने यह फैसला लिया है. कुछ लोग यह आपत्ति जता रहे हैं कि शहरों में बड़े-बड़े अस्पताल चलाने वाले ये मुनाफाखोर यहां से मरीजों को अपने अस्पताल में रेफर कर गरीबों से भी जमकर कमाई करेंगे. यह हालत तब है, जब राजस्थान उन राज्यों में शामिल है, जहां सरकारी स्तर पर प्रति व्यक्ति खर्च बहुत कम किया जाता है.

पीएचसी का पीपीपी मॉडल

कर्नाटक में 1997 में पीपीपी मॉडल पर राजीव गांधी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शुरू किया गया था. लेकिन देखा गया कि हर साल यहां इलाज कराने वालों में गरीब मरीजों की संख्या घटती चली गई है. उत्तराखंड सरकार ने भी कई सामुदायिक अस्पतालों को पीपीपी मॉडल के हवाले कर दिया था. अब वहां कई जगह पीएचसी को पीपीपी मॉडल से हटाने के लिए आंदोलन हो रहे हैं. नीति आयोग जिला अस्पतालों की जमीन और बिल्डिंग भी निजी अस्पतालों को लीज पर देने के लिए विचार कर रही है. इतना ही नहीं, सरकारी अस्पतालों की ब्लड बैंक और ऐंबुलेंस सेवा का भी निजी अस्पताल इस्तेमाल कर सकेंगे. वर्ल्ड बैंक की सलाह पर ही जिला अस्पतालों की जमीन पर निजी अस्पताल खोले जा रहे हैं, जबकि स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्‌डा बताते हैं कि जिन क्षेत्रों तक सरकारी सुविधाएं नहीं पहुंची हैं, वहां तक स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुंचाने के लिए निजी क्षेत्र की मदद ली जा रही है. क्या निजी सेक्टर बिना अपना फायदा देखे इन क्षेत्रों में निवेश करेंगे? जब सरकार प्राथमिक चिकित्सा को बोझ समझ रही है, तो फिर प्राइवेट सेक्टर चैरिटी के लिए क्यों आगे आएंगे? इससे पहले भी प्राइवेट अस्पतालों पर एक रुपए लीज पर शहरों की महंगी जमीन उपलब्ध कराई गई थी, लेकिन वहां आलम यह है कि गरीबों को इलाज के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

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