कितने समझदार हैं राहुल गांधी

rahul gandhiराहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं. इस घटना से उनकी मां श्रीमती सोनिया गांधी सबसे ज्यादा खुश हैं. सोनिया गांधी की शुरू से ही ये कोशिश थी कि उनके परिवार की राजनीतिक विरासत उनके पुत्र राहुल गांधी को मिले. यद्यपि राहुल गांधी राजनीति को लेकर उतने ज्यादा आश्वस्त नहीं थे और वे काफी साल तक जिम्मेदारी उठाने के भी इच्छुक नहीं थे, लेकिन उन्हें चुनाव लड़ाना पड़ा और वे संसद में आए. संसद में आकर भी उन्होंने कोई बड़ा कमाल नहीं किया, लेकिन श्रीमती सोनिया गांधी उन्हें राजनीति की शिक्षा देने की कोशिश करती रहीं. उन्हें पहले विभिन्न प्रकोष्ठों का प्रभारी बनाया, खासकर युवक कांग्रेस का, जिसमें उन्होंने ये प्रयोग किया कि युवक कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव नीचे से चुने हुए प्रतिनिधि करेंगे.

वे कांग्रेस के महामंत्री रहे. इसके बाद उन्हें कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया. कांग्रेस उपाध्यक्ष के नाते उन्होंने पूरी पार्टी को संगठित करने और चलाने की कोशिश की, पर उनका दृष्टिकोण ऐसा था जिससे पार्टी संगठित नहीं हो पाई. उनके उपाध्यक्ष रहते हुए जिन राज्यों में भी कांग्रेस ने चुनाव लड़ा, वहां कांग्रेस को बुरी तरह से हार का मुंह देखना पड़ा. इसके पीछे सिर्फ एक कारण रहा कि राहुल गांधी चुनाव में तो नजर आए, लेकिन वे संगठन बनाते हुए कभी नजर नहीं आए.

बिहार, जहां कांग्रेस मजबूती के साथ खड़ी हो सकती थी, उसे राहुल गांधी ने पूरी तरह से अनदेखा किया. उत्तर प्रदेश, जहां कांग्रेस खड़ी हो सकती थी वहां भी राहुल गांधी ने उन लोगों को नजरअंदाज किया जिन्होंने कांग्रेस को खड़ा करने की कोशिश की. कमोबेश यही हाल मध्यप्रदेश और राजस्थान का भी रहा. कांग्रेस इस समय अपने जीवन के सबसे निम्नतम धरातल पर है. ऐसे में जब राहुल गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया है, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्यों के चुनाव या 2019 के लोकसभा चुनाव से ज्यादा कांग्रेस को सारे देश में खड़ा करने की है, चाहे वे हिन्दी प्रदेश हों या गैर हिन्दी प्रदेश.

कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ताओं के मन में क्या है

क्या राहुल गांधी आशा पूरी कर पाएंगे? क्या राहुल गांधी कांग्रेस को खड़ा कर पाएंगे? क्या राहुल गांधी भारतीय जनता पार्टी के सामने चुनौतियां रख पाएंगे? क्या वे देश की जनता को ये विश्वास दिला पाएंगे कि वे प्रधानमंत्री पद के सबसे योग्य उम्मीदवार हैं? इन सवालों के उत्तर समय के गर्भ में छिपे हैं, पर अभी जो कुछ हो रहा है उसे जानना इसलिए बेहद जरूरी है क्योंकि इस समय कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ताओं के मन में क्या है, यह जानना देश के लिए बहुत जरूरी है. ये वही लोग हैं, जिन्होंने कांग्रेस में अपने जीवन के चालीस-पचास साल दिए हैं, जो कांग्रेस को मरता हुआ नहीं देख सकते, जो कांग्रेस को खड़ा करना चाहते हैं. हमने ऐसे कई लोगों से बातचीत की, जो कांग्रेस संगठन को खड़ा करने में राजीव गांधी के समय से लगे हुए थे.

इनमें कुछ तो ऐसे हैं, जो इंदिरा जी के समय भी यूथ कांग्रेस और कांग्रेस में थे, जिन्होंने राजीव गांधी से पहले संजय गांधी के साथ काम किया. अब उन्होंने श्रीमती सोनिया गांधी के साथ काम किया. उनके मन में बहुत सारे सवाल हैं. इन सवालों पर आने से पहले जिस एक बात ने मुझे हैरान और परेशान किया है, वो है गुजरात का चुनाव. राहुल गांधी का एक प्रसिद्ध वक्तव्य चुनाव के बाद आया कि हमने सिर्फ तीन महीने गुजरात में मेहनत की. उससे हमें इतना अच्छा परिणाम देखने को मिला कि भारतीय जनता पार्टी 99 पर सिमट गई. राहुल गांधी के इस बयान से मुझे बड़ी हैरानी हुई.

राहुल गांधी को ये पता था कि गुजरात के चुनाव आने वाले हैं, तो उन्होंने एक साल पहले से गुजरात में मेहनत क्यों नहीं की? उन्होंने एक साल पहले से गुजरात में संगठन पर ध्यान क्यों नहीं दिया? उन्होंने एक साल पहले से गुजरात में बूथ लेवल और बूथ स्तरीय कमेटियां बने, इसके बारे में क्यों नहीं सोचा? उन्होंने गुजरात कांग्रेस के पदाधिकारियों से बातचीत क्यों नहीं की और सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने शंकर सिंह वाघेला को कांग्रेस से क्यों बाहर जाने दिया और उनके साथ संवाद नहीं रखा? राहुल गांधी सिर्फ उनसे मिल लेते, शंकर सिंह वाघेला की बातें सुन लेते तो वे कांग्रेस छोड़कर नहीं जाते. अगर वर्ष भर पहले राहुल गांधी ने कांग्रेस संगठन पर ध्यान दिया होता, तो आज गुजरात में कांग्रेस की सरकार होती. राहुल गांधी ने कांग्रेस के उन नेताओं पर कभी नकेल नहीं कसा, जो भारतीय जनता पार्टी की सरकार के साथ मिलकर ठेकेदारी कर रहे थे. अपनी कंपनियां चला रहे थे और कांग्रेस संगठन को न बनने देने की पूरी कोशिश कर रहे थे.

राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव के बाद तीन दिन गुजरात में लगाए.   उन्हें गुजरात की हार का विश्लेषण करना चाहिए. उन्होंने तीन दिन गुजरात के दौरे में भाषण दिए, लोगों से मिले, लेकिन उन्होंने इस विषय पर किसी से बातचीत नहीं की. सबसे बड़ी हैरानी की बात यह कि राहुल गांधी ने अब तक यानी इस अंक के निकलने तक उन लोगों से बात नहीं की, जिन्होंने गुजरात चुनाव में दो-तीन महीने का वक्त कांग्रेस पार्टी के कहने से दिया.

इन लोगों में दूसरे प्रदेशों के कांग्रेस नेता, कांग्रेस के सांसद, कांग्रेस के प्रमुख जो गुजरात भेजे गए, उन लोगों से राहुल गांधी ने अब तक एक भी बैठक नहीं की और न उनसे हार के कारणों पर उनकी राय जानने की कोई कोशिश की. होना तो ये चाहिए था कि कांग्रेस की पूरी सेना गुजरात में लग जाती, ठीक वैसे ही जैसे भारतीय जनता पार्टी ने अपने सारे सांसदों, सारे विधायकों, सारे मुख्यमंत्रियों, अपनी सारी कैबिनेट और जो भी जाकर जहां काम कर सकता है, उसे काम करने की नियोजित छूट दी. अगर राहुल गांधी भी सारे सांसदों को, सारे हारे हुए सांसदों को, राज्यों की विधानसभा के विधायकों को अगर गुजरात में लगाते, तो शायद आज गुजरात में कांग्रेस की सरकार होती. क्यों राहुल गांधी ने ये नहीं किया ये मेरी समझ में नहीं आ रहा. हालांकि ये मैं मानता हूं कि राहुल गांधी में इतनी समझ होनी चाहिए, तब उन्हें ऐसा करने से किसने रोका? शायद उन लोगों ने जो कांग्रेस के आने वाले संगठन के जिम्मेदार नेता बनना चाहते हैं.

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के चेहरे पर विवाद

राहुल गांधी ने जिन कामों को उपाध्यक्ष रहते नहीं किया, उन्हें अब ये काम करना पड़ेगा. सबसे पहले मध्यप्रदेश की बात लें. मध्यप्रदेश में गुटबाजी है. मध्यप्रदेश में तीन प्रमुख नेता हैं. भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, जो पिछले कई महीनों से नर्मदा यात्रा पर हैं और जिन्हें गुजरात आने का निमंत्रण मिला ही नहीं. माधव राव सिंधिया के सुपुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ हैं. राहुल गांधी ने एक मीटिंग बुलाई जिसमें दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया थे. अफवाहनुमा खबरों के हिसाब से, मीटिंग में दिग्विजय सिंह ने कहा कि अगर मध्यप्रदेश में चुनाव जीतना है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को नहीं, बल्कि कमलनाथ को मध्यप्रदेश की कमान सौंपनी चाहिए और उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में सामने रखना चाहिए. उन्होंने शायद ये भी कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव एक क्षेत्र में है और माधव राव सिंधिया भी ज्यादातर उसी क्षेत्र में अपना प्रभाव रखते आए हैं.

इन लोगों ने कभी पूरे मध्यप्रदेश का दौरा नहीं किया. कमलनाथ में क्षमता है कि वे सारे लोगों को अपने साथ जोड़ सकते हैं. मैं ये बात इस क्षमा याचना के साथ कर रहा हूं कि अफवाहनुमा खबर कांग्रेस के ही सूत्रों ने मुझे दी है. दूसरी तरफ, राहुल गांधी ने कमलनाथ से कहा कि मैं आपका नाम जल्द ही घोषित करूंगा. कमलनाथ आज तक उस समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं. एक मोटे अनुमान के हिसाब से, राहुल गांधी ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्यप्रदेश में कांग्रेस का चेहरा बनाना चाहते हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया समझदार हैं. उन्होंने अपना मंत्रालय भी अच्छी तरह चलाया है. लोगों में उनके पिता की वजह से उनका प्रभाव भी है, लेकिन वे भारतीय जनता पार्टी या शिवराज सिंह चौहान का मुकाबला मध्यप्रदेश में कर सकते हैं, इसे लेकर मध्यप्रदेश के कांग्रेस के लोगों में अभी संदेह है.

उनके लिए दिग्विजय सिंह और कमलनाथ ज्यादा स्वीकार्य हैं, जिनके साथ उनका संवाद लगातार बना रहता है. अगर कहीं संगठन खड़ा करना हो तो उसकी सबसे बड़ी चाबी अपने कार्यकर्ताओं के साथ लगातार संवाद बनाए रखना है. दिग्विजय सिंह नर्मदा यात्रा पर हैं और उनकी सभाओं में काफी भीड़ होती है. उनके साथ दो-तीन हजार लोग साथ चलते हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह से मध्यप्रदेश चुनाव के बारे में अभी तक राहुल गांधी से कोई बातचीत नहीं हुई है. बल्कि राहुल गांधी के यहां से ये संकेत दिया जा रहा है कि राहुल गांधी दिग्विजय को पसंद नहीं करते. शायद मध्यप्रदेश के लिए ये संकेत बहुत अच्छे नहीं हैं और वहां कांग्रेस शिवराज सिंह से कितनी सीटें छीनती है, बस इसकी लड़ाई रह जाएगी. शिवराज सिंह को वे मुख्यमंत्री पद से हटा सकें, इसकी अभी तक कोई संभावना नजर नहीं आती.

राजस्थान में होगी सचिन पायलट की परीक्षा

राजस्थान में वसुंधरा राजे के खिलाफ असंतोष है. पार्टी में भी असंतोष है. संघ में भी असंतोष है और हर स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच भी असंतोष है. वसुंधरा राजे की इस बार की कार्यशैली बिल्कुल ही बदली हुई है. वे जनता से बहुत दूर हैं. उनके प्रशासनिक रवैये को लेकर पूरे राजस्थान में रोष है. राजस्थान में पहली बार किसान आंदोलन संगठित हुआ है और किसान वसुंधरा राजे के खिलाफ हैं. इस स्थिति का फायदा कांग्रेस को अब तक उठा लेना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस इस स्थिति का फायदा नहीं उठा पाई. राजस्थान में कांग्रेस के दो बड़े नेता हैं, जिनमें एक अशोक गहलोत हैं, जो वहां के भूतपूर्व मुख्यमंत्री हैं. उन्होंने अपनी संगठन क्षमता गुजरात में साबित की है, जिसके वे प्रभारी थे. राजस्थान में सचिन पायलट को कांग्रेस की कमान सौंपी गई है. शायद राहुल गांधी सचिन पायलट को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित कर देंगे. राजस्थान कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से बातचीत करने पर ये बात सामने आई कि सचिन पायलट शायद मुख्यमंत्री बनने लायक बहुमत भी न जुटा पाएं.

इसके लिए उनकी नजर में सिर्फ अशोक गहलोत उपयुक्त व्यक्ति हैं, जिन्हें राजस्थान का चुनाव संचालित करने की पूरी जिम्मेदारी अगर कांग्रेस अध्यक्ष देते हैं, तो वसुंधरा राजे के लिए चुनाव जीतना लोहे के चने चबाने जैसा हो जाएगा. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि अशोक गहलोत को अपना जितना बेस्ट देना था, जितना उत्तम देना था, वो उन्होंने गुजरात में दे दिया. अब राहुल गांधी सचिन पायलट को ही राजस्थान की कमान सौंपने वाले हैं. यहां पर सचिन पायलट का इम्तिहान शुरू होता है कि वे राजस्थान के सभी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को अपने साथ कैसे खड़े करते हैं. अब तक कांग्रेस की हार में कार्यकर्ताओं की उदासीनता और जीत में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का उत्साह बहुत प्रमुख कारण रहा है.

सपा-बसपा को साथ लाना बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव नहीं है, लेकिन 2019 का लोकसभा चुनाव है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस इतिहास के अपने सबसे कम संख्या के ऊपर विधायक जिता पाई है. उनके और अखिलेश यादव के गठजोड़ ने कोई कमाल का काम नहीं किया, लेकिन दोनों ने घोषणा की है कि वे लोकसभा का चुनाव साथ लड़ेंगे. कांग्रेस उत्तर प्रदेश में 30 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है और अखिलेश यादव को कहना चाहती है कि वे 50 सीटों पर चुनाव लड़ें. ऐसे में पहला प्रश्न यह है कि क्या अखिलेश यादव 50 सीटों पर चुनाव लड़ना पसंद करेंगे? दूसरा सवाल, क्या कांग्रेस बहुजन समाज पार्टी को समाजवादी पार्टी के साथ खड़ा करने की कोशिश करेगी? अगर राहुल गांधी ये कमाल कर लेते हैं कि वे उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी यानी मायावती जी और अखिलेश को एक साथ मिला लेते हैं और अपने लिए कम सीटें मांगते हैं, तो शायद उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को पहले दिन से चुनाव परिणाम के बारे में संदेह नहीं रह जाएगा. लेकिन राहुल गांधी मायावती जी को तैयार कर पाएंगे, ये अगला सवाल है.

उत्तर प्रदेश का संगठन लुंज-पुंज संगठन है. ऐन मौके पर पिछली बार विधानसभा चुनाव के आसपास राजबब्बर को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का अध्यक्ष   बनाया गया. उत्तर प्रदेश में बुरी हार हुई, क्योंकि राजबब्बर कुछ कर नहीं सकते थे. समाजवादी पार्टी के हर नेता के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा था, लेकिन राजबब्बर ने अपनी आंखें नीची कर इस कड़वे घूंट को भी पीया. चुनाव परिणाम बहुत खराब रहा. राजबब्बर उत्तर प्रदेश में दोबारा कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं बनना चाहते थे, लेकिन राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव तक के लिए कांग्रेस का अध्यक्ष मनोनीत कर दिया.

उत्तर प्रदेश के नेताओं में, जो लोगों को संगठित कर सकते हैं, कांग्रेस के लिए वोट बढ़ाने का काम कर सकते हैं, उनमें से किसी के साथ राहुल गांधी का कोई संपर्क या संबंध नहीं है. ये सब ऐसे नेता हैं जिन्होंने श्रीमती सोनिया गांधी के साथ जी-जान से काम किया, लेकिन किसी भी नेता को अबतक राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की रणनीति बनाने के लिए अपने यहां नहीं बुलाया. बार-बार समय मांगने पर भी वे नेताओं को समय नहीं देते हैं. उत्तर प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्ता, जो नेहरू गांधी परिवार को अपना सबसे बड़ा सहारा मानते हैं या उनके साथ खड़ा होना चाहते हैं, उन लोगों को सबसे बड़ा दुख सिर्फ इस बात का है कि राहुल गांधी उन्हें मिलने का समय नहीं देते. उनकी बात ही नहीं सुनते.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि राहुल गांधी से गाहे-बेगाहे उन्हें समय मिलता भी है, तो वह सिर्फ पांच मिनट का होता है. उस पांच मिनट में राहुल गांधी उनकी बात सुनते हैं. बात सुनने के दौरान वे वॉट्‌सअप या इंटरनेट पर रहते हैं और कहते हैं, अच्छा, अब आप कनिष्क से बात कर लीजिए या आपकी जो समस्या है, लिखकर दे दीजिए. राजनीति में ये तरीका बहुत सफल नहीं होता, पर उत्तर प्रदेश में ऐसा ही हो रहा है.

उत्तर प्रदेश में पहली बार कांग्रेस को 11 प्रतिशत वोट मिले थे और लगभग 28 सीटें आई थीं. उस समय कांग्रेस के प्रभारी दिग्विजय सिंह और परवेज हाशमी थे, लेकिन इन दोनों को बेरहमी के साथ उत्तर प्रदेश से बाहर निकाल दिया गया. उसके बाद कांग्रेस का जनाधार घटता चला गया. कारण सिर्फ एक था कि प्रभारी को राजनीति की समझ होनी चाहिए और उसे कार्यकर्ताओं के लिए हरदम उपलब्ध होना चाहिए. उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान गुजरात के मधुसूदन मिस्त्री को दी गई. मिस्त्री को उत्तर प्रदेश का कोई ज्ञान नहीं, किसी कार्यकर्ता से कोई बातचीत नहीं लेकिन वे राहुल गांधी के विश्वासी थे, इसलिए उन्हें उत्तर प्रदेश भेज दिया गया. वहां हर चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी. कांग्रेस कार्यकर्ताओं में कोई उत्साह रहा ही नहीं.

बंगाल कांग्रेस बेहाल है. ओड़ीशा में चुनाव होने वाले हैं. वहां भारतीय जनता पार्टी तो नहीं जीतेगी, बीजेडी जीतेगी. लेकिन सबसे मजेदार चीज यह है कि जो गुजरात में हुआ वही ओड़ीशा में हो रहा है. जो नेता चुनाव जीता सकते हैं, वेे नेता कांग्रेस छोड़कर बाहर जा रहे हैं, बल्कि परिस्थितियां ऐसी बनाई जा रही हैं कि वे नेता बाहर चले जाएं. श्रीकांत जेना जैसे नेताओं से भी राहुल गांधी का कोई संपर्क नहीं है, जो उन्हें ओड़ीशा की वास्तविक स्थिति से परिचित करा सकते हैं.

राहुल को भ्रम है कि बिहार में कांग्रेस अपने बूते जीती

बिहार में राहुल गांधी या कांग्रेस को जो सीटें आईं, वे सभी सीटें नीतीश कुमार की दया पर आईं. कांग्रेस का उसमें कोई रोल नहीं था. नीतीश कुमार ने रणनीति बनाई कि वे कम सीटें लड़ेंगे, जबकि लालू यादव इसके सख्त खिलाफ थे. वे कह रहे थे कि कांग्रेस को आप 10 सीटें दे दीजिए. इससे ज्यादा देने की जरूरत नहीं है. लेकिन नीतीश कुमार ने कांग्रेस को 40 सीटें दीं. इन 40 सीटों में कांग्रेस लगभग 28 सीटें जीत गई, पर वो ऐसी सीटें थीं, जो नीतीश कुमार ने जबरदस्ती कांग्रेस को दी थी. उनका आकलन था कि कांग्रेस के पास जो पांच-छह प्रतिशत वोट है, अगर हम उसे छोड़ देते हैं, तो भाजपा को सीधे-सीधे हराने का कोई तरीका उन्हें नहीं दिखाई देता. कांग्रेस को वे जैसे ही शामिल करते हैं, भले ही कांग्रेस का पांच-छह प्रतिशत वोट हो, उनकी जीत की संभावना पहले दिन से बन जाती है और नीतीश कुमार ने यही किया. हालांकि मीडिया ने इस गठबंधन को गलत माना और मीडिया ने इस गठबंधन को बहुत तरजीह नहीं दी. राहुल गांधी प्रचार में गए. उनकी सभाओं में जैसी भी भीड़ हुई, लेकिन लोगों ने नीतीश कुमार के कहने पर कांग्रेस को जिताया.

अब राहुल गांधी को ये भ्रम है कि वहां कांग्रेस अपने दम पर जीती. बीच में खबर थी कि कांग्रेस के 14 विधायक टूट कर जनता दल यूनाइटेड में शामिल होने वाले हैं. हालांकि वो घटना नहीं हुई, लेकिन घटना ये बताती है कि वहां के सारे बड़े नेता नीतीश कुमार के संपर्क में हैं और वेे शायद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के साथ न होकर जेडीयू में शामिल होकर चुनाव लड़ेंगे. ये भी खबर थी कि 12 विधायक जेडीयू में शामिल होना चाहते थे, लेकिन कानूनी रूप से यह संख्या 14 होनी चाहिए. वो दो होने में थोड़ी देर हुई और तबतक नीतीश कुमार ने इस पूरी प्रक्रिया को रोक दिया. उनका और लालू का संबंध विच्छेद हो गया था और वे भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बना चुके थे.

ये कुछ राज्यों की गतिविधियां हैं, जिनमें दक्षिण के राज्यों का जिक्र हमने अभी नहीं किया. कर्नाटक में चुनाव आने वाले हैं. कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, लेकिन वहां कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा खतरा भीतरघात का है. वहां कांग्रेस में जबरदस्त गुटबाजी है और एचडी देवेगौड़ा के हाथ में बैलेंसिंग पावर है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवेगौड़ा को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं. हालांकि देवेगौड़ा ने ही सिद्धारमैया को बनाया. उन्हें वहां से अहमद पटेल उड़कर कांग्रेस में ले आए जिसे देवेगौड़ा भूल नहीं पाते. चुनाव के बाद अगर भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस किसी को बहुमत नहीं मिलता है, तो अपने बहुमत के लिए निश्चित रूप से देवेगौड़ा की तरफ हाथ बढ़ाएगा. ऐसे संभावित समय को देखते हुए कर्नाटक में कांग्रेस कोई योजना तैयार नहीं कर रही है. महाराष्ट्र में कांग्रेस शरद पवार के साथ है, लेकिन शरद पवार के साथ जितना होना चाहिए, उतनी कांग्रेस नहीं है.

राहुल टीम को कांग्रेस के इतिहास की जानकारी नहीं

दरअसल ये सारे सवाल दिल्ली के 28 अकबर रोड में बैठे हुए रणनीतिकार बनाएं, तब कुछ बात बने. लेकिन कांग्रेस में कौन रणनीति बनाता है, कौन किस राज्य का भार ले रहा है, राहुल गांधी की नई टीम क्या होगी, इन सारे सवालों पर पूर्णविराम लगा हुआ है. पुराने कार्यकर्ता अंदाजा लगा रहे हैं कि अब राहुल गांधी बिल्कुल नई टीम लेकर कांग्रेस को आगे बढ़ाएंगे, जो अपेक्षाकृत युवा होगी. इन लोगों में विदेशों में पढ़े हुए एनालिस्ट, बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ रिश्ता रखने वाले लोग, अंग्रेजी बोलने वाले और अंग्रेजी चाल-ढाल में जीवन बिताने वाले लोग प्रमुख होंगे. कांग्रेस के वे लोग जो सोनिया गांधी और राजीव गांधी के साथ काम कर चुके थे, उनमें से किसी के साथ राहुल गांधी का कोई संपर्क और संबंध नहीं है.

वे शायद उन्हें उतना तवज्जो भी नहीं देते हैं और इज्जत भी नहीं देते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इन्हीं लोगों की वजह से कांग्रेस का ये हाल हुआ है. वे बिल्कुल नए लोगों को साथ लेकर आना चाहते हैं. भले ही ऐसे लोगों को कांग्रेस के इतिहास का कम पता हो, भले ही ऐसे लोगों को कांग्रेस की परंपरा का कम पता हो, भले ही ऐसे लोगों को जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के संघर्ष के बारे में बहुत पता न हो, सिर्फ सुनी सुनाई बातें पता हो, लेकिन राहुल गांधी ऐसे ही लोगों को लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं. ये संदेश कांग्रेस के सारे पुराने कार्यकर्ताओं में है. वे सारे लोग जो रणनीति बनाते थे इस समय हाशिए पर हैं या कहें कि उनका कोई राजनीतिक वजूद ही नहीं है. उनसे कोई बात ही नहीं करता.

राहुल गांधी की सबसे बड़ी कमजोरी उनका किले के भीतर बंद हो जाना है. वे अध्यक्ष बनने से पहले हर तीसरे महीने विदेश जाते थे. अभी भी मेरी पक्की जानकारी के हिसाब से राहुल गांधी ने ये कह रखा है कि हर तीन महीने के बाद एक महीने के लिए उन्हें छुट्‌टी पर विदेश जाना है. वो छुट्‌टी छुट्‌टी नहीं कहलाएगी, लेकिन वे एक महीने विदेश में ही रहेंगे और काम करेंगे, जबकि यहां अप्रैल और मई से राज्यों की चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. 2018 में पांच राज्यों के चुनाव हैं. उनका कितना बड़ा काम है, पर शायद राहुल गांधी उस काम को कितनी गंभीरता से लेते हैं, ये इस खबर की पुष्टि के ऊपर निर्भर करता है कि वे देश में रहेंगे या एक महीने की छुट्‌टी के लिए देश के बाहर जाएंगे.

कट्‌टर विरोधियों को भी साथ रखने की कला

दूसरा सबसे बड़ा सवाल, राहुल गांधी किले का दरवाजा खोलते हैं या नहीं खोलते हैं. देश भर का कार्यकर्ता उनसे मिलना चाहता है और मिलकर कमजोरियों, शक्ति और रणनीति के बारे में बात करना चाहता है. राहुल गांधी को शायद इस बात का नहीं पता कि उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी लगातार कार्यकर्ताओं से मिलती थीं और जो परस्पर विरोधी गुट के कार्यकर्ता होते थे, उनसे तो जरूर मिलती थीं.   जब वे उनसे मिलती थीं, तो दोनों की बातें खामोश होकर सुनती थीं. उसी से उन्हें पता चल जाता था कि राज्य में कौन नेता काम कर रहा है, कौन नहीं कर रहा है और खामी कहां है, कमजोरी कहां है? इसे कैसे ताकत में बदलना चाहिए. यही काम काफी दिनों तक राजीव गांधी ने किया. जिस दिन से राजीव गांधी ने ये काम छोड़ दिया, उसी दिन से वे अपने पराभव की ओर बढ़ने लगे. राहुल गांधी को अपनी दादी से ये सीखना चाहिए कि जो उनका कट्‌टर विरोधी होता था, उसे भी वे अपने साथ लाने में कोई कोशिश बाकी नहीं रखती थीं. राहुल गांधी को वीरेंद्र पाटिल का किस्सा नहीं पता होगा. चिकमंगलूर में उनके खिलाफ इंदिरा ने चुनाव लड़ा था और बाद में इंदिरा गांधी उन्हें अपने साथ अपनी पार्टी में ले आईं. ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं.

भाजपा को अपने अखाड़े में लाना होगा

राहुल गांधी के लिए अगर नई राजनीति सीखनी हो तो उसका एक ही गुर है कि अपने किले के दरवाजे को कार्यकर्ताओं के लिए खोल दीजिए. जो कार्यकर्ता आपसे कहते हैं, उसे सुनिए. उन सारे लोगों को काम में लगाइए. जो लोग काम करने लायक हैं. इनमें चाहे 50 साल के लोग हों, चाहे 60 साल के लोग हों या चाहे 30 साल के लोग हों. खासकर उनको तो अवश्य काम में लगाइए, जो आपकी पार्टी से सांसद रहे हैं. भले ही वे मौजूदा हों या भूतपूर्व हों. अगर इन सारे लोगों को काम देने की रणनीति या इन सारे लोगों को उत्साह देने की रणनीति कांग्रेस अध्यक्ष या उनके साथियों को नहीं पता है तो फिर कांग्रेस 2019 के चुनाव में जनता की दया पर तो सीटें जीत सकती है, लेकिन अपने कार्यकर्ताओं के बलबूते पर वोटरों को घर से निकाल कर पोलिंग बूथ तक नहीं ला सकती.

यही सबसे बड़ी कमजोरी कांग्रेस की गुजरात में थी. इसी कमजोरी का सामना कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में और राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ इन सब राज्यों के चुनाव में करना पड़ सकता है. राहुल गांधी के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां हैं. अगर इन चुनौतियों का सामना वे कांग्रेस उपाध्यक्ष रहते हुए कर लेते, तो आज उनके सामने एक नया आसमान होता. उन्हें एक और चीज सीखने की जरूरत है, जो गुजरात में उन्होंने नहीं सीखी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हर दिन एक नया मुद्दा उछालते थे और राहुल गांधी उस मुद्दे का उत्तर तलाशने में लग जाते थे. अगर राहुल गांधी सिर्फ एक मुद्दे पर अड़े रहते कि मैं नरेन्द्र मोदी के सारे सवालों से सहमत हूं, पर मुझे वे सिर्फ ये बताएं कि गुजरात में कितने स्कूल गरीबों के लिए बने? कितने अस्पताल गरीबों के लिए बने? कहां और कैसा विकास हुआ? किसानों ने आत्महत्या क्यों की, जो उनका शुरू का मुद्दा था.

राहुल गांधी ने इन सवालों को नरेन्द्र मोदी के जाल में फंस कर जल्दी ही छोड़ दिया. राहुल गांधी को अपने मुद्दोंपर विरोधी को कैसे लाया जाए, इसे सीखना पड़ेगा. इस मामले में देश में अगर कोई पहला सबसे बड़ा समझदार नेता रहा है, तो वो श्रीमती इंदिरा गांधी थीं. वे हमेशा विपक्ष को अपने अखाड़े में ले आती थीं. उन्होंने कभी विपक्षी अखाड़े में फंस कर मात नहीं खाई, इसीलिए वे चुनाव नहीं हारीं, वे हत्यारों के गोली की शिकार हुईं. 1977 में वे चुनाव हारीं, लेकिन उस चुनाव की हार ने उन्हें एक नई इंदिरा गांधी बनाकर पेश किया, जो 1980 में दोबारा सत्ता में आ गईं.

राहुल गांधी को इस खेल को सीखना पड़ेगा. उन मुद्दों को समझना पड़ेगा कि कैसे विपक्ष को अपने अखाड़े में लाकर दूसरे शब्दों में कैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को या भारतीय जनता पार्टी को अपने मुद्दे के अखाड़े में लाकर लड़ने के लिए मजबूर करें न कि उनके अखाड़े में कूद पड़ें. अगर कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी के अखाड़े में कूद कर चुनाव लड़ेगी तो उसके जीतने की संभावना बहुत नहीं रहेगी. अगर वो भारतीय जनता पार्टी को अपने अखाड़े में लाने में कामयाब हो गई, तो फिर कहना ही क्या. यही चुनौती राहुल गांधी के सामने है और यही सीख भी उन्हें लेनी है.

कांग्रेस परिवार को एक साथ देखना चाहते हैं कार्यकर्ता

राहुल गांधी के साथ शुरू से कुछ समस्याएं चली आ रही हैं. उनसे वही मिल सकता है, जो उनके पसंद का व्यक्ति हो और वो तय भी वही करते हैं कि किसे मिलना है. शहजाद पूनावाला उनके रिश्ते में भाई लगते हैं. शहजाद पूनावाला ने काफी समय तक मीडिया में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं का आक्रामक ढंग से सफलतापूर्वक सामना किया. शहजाद पूनावाला राहुल गांधी से मिलना चाहते थे, लेकिन राहुल गांधी ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि शहजाद पूनावाला गुजरात चुनाव के समय जब राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनना था, उनके सामने खुलकर आ गए.

उन्होंने राहुल गांधी को प्रायोजित अध्यक्ष कहा, न कि निर्वाचित, जबकि राहुल गांधी कानूनी तौर पर सर्वसम्मति से बिना किसी विरोध के कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे. शहजाद पूनावाला ने इसके खिलाफ एक अभियान चला दिया था.  उनके सगे बहनोई रॉबर्ट वाड्रा आठ महीने से राहुल गांधी से मिलना चाहते थे, लेकिन राहुल गांधी उन्हें मिलने के लिए समय नहीं दे रहे थे. नतीजे के तौर पर रॉबर्ट वाड्रा ने शहजाद पूनावाला को उकसाया और उन्हें राहुल गांधी के खिलाफ बयान देने के लिए तैयार किया. ये खबर और कहीं से नहीं कांग्रेस के भीतर से ही आई. रॉबर्ट वाड्रा की औपचारिक मुलाकात तब हुई, जब राहुल गांधी अध्यक्ष पद की शपथ ले रहे थे और उस समय वे अपनी पत्नी प्रियंका गांधी के साथ शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे.  तीसरा अनसुलझा सवाल प्रियंका गांधी का है. कांग्रेस के कार्यकर्ता प्रियंका गांधी को नेतृत्व के रूप में देखना चाह रहे थे, लेकिन श्रीमती सोनिया गांधी राहुल गांधी को पूरी सत्ता सौंपना चाहती थीं. शायद राहुल गांधी को भी ये लगता था कि सत्ता के दो केन्द्र नहीं होने चाहिए.

प्रियंका गांधी अगर साधारण सदस्य के तौर पर भी कांग्रेस में काम करती हैं, तो भी वो सत्ता का केन्द्र बन जाएंगी. प्रियंका गांधी कांग्रेस की मुख्यधारा में आकर संगठन का काम करना चाहती या नहीं चाहतीं, ये तो नहीं पता, लेकिन जो लोग प्रियंका गांधी से मिलते हैं, वे यह बताते हैं कि प्रियंका गांधी कांग्रेस के लुंज-पुंज संगठन से बेहद नाराज हैं. वे लोगों को यही कह रही हैं कि सब ठीक हो जाएगा. जाहिर है, ठीक तो हो ही जाएगा, नहीं ठीक होगा तो सब बर्बाद हो जाएगा. पर प्रियंका हाल फिलहाल में कांग्रेस नेतृत्व का हिस्सा नहीं बन रहीं.

एक और सवाल वरुण गांधी का है. आज से छह साल पहले प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने वरुण से एक व्यक्तिगत समारोह में अलग बैठ कर प्रस्ताव रखा था कि हम मिलकर कांग्रेस को खड़ा करें और सारा परिवार एक साथ हो, क्योंकि लोग गांधी परिवार को एक साथ देखना चाहते हैं. उस समय वरुण गांधी ने इस बात को हंसकर टाल दिया था, पर प्रियंका लगातार वरुण गांधी पर इसके लिए दबाव डालती रहीं. बहुत दिनों तक प्रियंका गांधी और वरुण गांधी के बीच संवाद होता रहा, पर कुछ बात बनी नहीं. अब जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हो गए हैं, तो कांग्रेस के भीतर एक तेज चर्चा चल रही है कि क्या अब राहुल गांधी वरुण गांधी को कांग्रेस में लाएंगे या वरुण गांधी भारतीय जनता पार्टी में रहकर भविष्य के भूतपूर्व सांसद कहलाएंगे.

वरुण गांधी इन दिनों तेजी के साथ देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में नौजवानों से संवाद कर रहे हैं और नौजवान भी उनको सुनने के लिए बड़ी संख्या में आ रहे हैं. हालांकि वरुण गांधी को मीडिया कोई तवज्जो नहीं दे रहा है, लेकिन वरुण गांधी जहां जाते हैं, वहां की मीडिया में अपनी खासी जगह बना रहे हैं. वरुण गांधी के रिश्ते भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व के साथ बहुत अच्छे नहीं हैं. शायद नेतृत्व भी ये मान चुका है कि वरुण गांधी देर-सवेर भारतीय जनता पार्टी छोड़ने का मन बना सकते हैं. इन सबसे अलग, क्या राहुल गांधी वरुण गांधी के कांग्रेस में प्रवेश को अपनी सहमति देंगे. ये सवाल है और इस सवाल का जवाब आने वाले मार्च में मिल जाएगा.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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