नहीं टूटेगा राजद , क़ानूनी घेरा बड़ी चुनौती

rjdसाल 2018 में राजद का क्या होगा इसे लेकर सियासी गलियारों में गरमा-गरम बहस जारी है. लालू प्रसाद को सीबीआई की विशेष अदालत ने जब से दोषी करार दिया है तभी से यह कयासबाजी हर स्तर पर जारी है कि आखिर लालू के बाद कौन? राजद बचेगा या टूटेगा. इस तरह के सवालों पर मीडिया से लेकर सत्ता केंद्रों में अटकलों का बाजार गर्म है. इसमें कोई शक नहीं है कि नया साल न केवल राजद के लिए बल्कि सारे लालू परिवार के लिए बेहद ही चुनौती भरा होने वाला है.

महागठबंधन टूटने के बाद से ही यह कहा जाने लगा कि लालू प्रसाद अब धीरे-धीरे  तेजस्वी यादव के कंधों पर पार्टी की जिम्मेदारी डाल देंगे. विधायक दल की बैठक में और पार्टी की बैठक में भी यह साफ प्रस्ताव पास करा दिया गया कि राजद अगला चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में ही लड़ेगा. इसलिए मोटे तौर पर इस बात पर भ्रम की स्थिति नहीं है कि लालू प्रसाद के बाद राजद का सेनापति कौन होगा? जहां तक राजद के टूटने या फिर एकजुट रहने का सवाल है तो इस पर कुछ बहस की गुंजाइश बनती है. गौरतलब है कि साल 1995 में राजद का गठन हुआ था.

आज जनवरी 2018 तक पार्टी में टूट का कोई इतिहास नहीं है. इस दरम्यान लालू प्रसाद महीनों जेल में रहे पर राजद के दूसरे नेताओं ने कभी बगावती तेवर नहीं दिखाए. इसी रिकार्ड को पैमाना मानते हुए राजद के नेता दावा कर रहे हैं कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और टूट की कोई भी गुंजाइश बनती ही नहीं है. जबकि एनडीए के बहुत सारे नेताओं का अनुमान है कि तेजस्वी यादव के क्रियाकलापों से पार्टी के वरिष्ठ नेता नाराज हैं और जल्द ही पार्टी में एक बड़ी टूट होगी. बिहार की राजनीति खासकर राजद की राजनीति को बारीकी से समझने वाले बताते हैं कि लालू प्रसाद जेल में रहें या जेल से बाहर, राजद में कोई फर्क नहीं पड़ता है.

लालू प्रसाद को वोट करने वालों को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. कमोबेश इस तरह की घटनाओं से वे और भी एकजुट होते हैं और जबतक लालू प्रसाद का वोटबैंक उनके साथ है, राजद का कोई भी सासंद और विधायक राजद से बाहर जाने का आत्मघाती कदम नहीं उठा सकता है.नए साल में न केवल लालू प्रसाद, बल्कि उनकी पत्नी व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, बड़ी बेटी मीसा भारती, दामाद शैलेस कुमार, छोटे पुत्र व पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव समेत परिवार के अन्य सदस्यों का समय अदालतों के चक्कर लगाने में बीतेगा. बता दें कि बहुचर्चित चारा घोटाले में सीबीआई ने लालू प्रसाद के खिलाफ कुल छह मामले दर्ज किए थे. इनमें लालू परिवार के किसी अन्य सदस्य को अभियुक्त नहीं बनाया था.

इनमें से पांच मामले रांची स्थित सीबीआई की विशेष अदालत में तथा एक मामला पटना स्थित सीबीआई की विशेष अदालत में चल रहा है. इनमें से दो में अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है. वर्ष 2013 में रांची की विशेष सीबीआई अदालत ने लालू प्रसाद को पांच साल की कैद की सजा सुनाई थी, जबकि इसी अदालत ने देवघर कोषागार से 89.4 लाख की अवैध निकासी मामले में लालू प्रसाद को दोषी करार दिया है.

इसके अलावा सीबीआई ने लालू प्रसाद पर चाईबासा कोषागार से 37 करोड़ की अवैध निकासी (आरसी-67ए/96), दुमका कोषागार से 3.5 करोड़ की अवैध निकासी, डोरंडा कोषागार से 184 करोड़ की अवैध निकासी तथा भागलपुर व बांका कोषागार से 45.96 लाख की अवैध निकासी मामले का फैसला भी अगले साल मई-जून तक आने की संभावना है. लालू प्रसाद व उनके परिवार की मुश्किलें यहीं खत्म होती नजर नहीं आती हैं. रेलवे टेंडर घोटाले में सीबीआई ने लालू प्रसाद समेत उनकी पत्नी राबड़ी देवी और छोटे पुत्र तेजस्वी यादव को भी नामजद किया है. सूत्र बताते हैं कि रेलवे टेंडर घोटाले में सीबीआई अगले एकाध महीने में लालू समेत अन्य अभियुक्तों के खिलाफ आरोपपत्र दायर करने वाली है. उधर, लालू प्रसाद की बड़ी बेटी व सांसद मीसा भारती व उनके पति शैलेस कुमार के खिलाफ ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में आरोपपत्र दाखिल कर दिया है.

राजनीतिक लड़ाई में राजद को ऩुकसान

कहा जाए तो साल 2018 में कानूनी फंदे से निकलने में ही लालू परिवार की पूरी शक्ति लगी रहेगी और इसी का फायदा उनके विरोधी उठा सकते हैं. 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं और अगर लालू और उनका पूरा परिवार कानूनी घेरा तोड़ने में ही लगा रहा तो फिर आमने-सामने की राजनीतिक लड़ाई में राजद को परेशानी हो सकती है. जानकार सूत्र बताते हैं कि इसलिए एनडीए का एक बड़ा तबका चाहता है कि सूबे में विधानसभा का चुनाव भी लोकसभा चुनाव के साथ ही करा लिया जाए. कहा जा रहा है कि दुश्मन जब सबसे कमजोर हो तो उसी समय उस पर सबसे कड़ा प्रहार करना ही राजनीति है. लालू प्रसाद और उनके परिवार के लिए सबसे राहत वाली बात यह है कि सोनिया गांधी पूरी तरह लालू प्रसाद का साथ दे रही हैं.

कांग्रेस का यह साथ ही लालू को नरेंद्र मोदी के खिलाफ जंग लड़ने के लिए प्रेरित कर रहा है. राजद और कांग्रेस जोर-जोर से यह बात कह रहे हैं कि लालू प्रसाद को एक साजिश के तहत चारा घोटाले में फंसा कर बदनाम किया जा रहा है. जगन्नाथ मिश्र छूट जा रहे हैं और लालू प्रसाद जेल जा रहे हैं. लेकिन चारा घोटाले की जांच को अंजाम तक पहुंचाने वाले अधिकारी उपेन विश्वास इसमें किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से इनकार करते हैं. सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक व पूरे मामले की जांच के प्रभारी रहे उपेन विश्वास का कहना है कि एक आईएएस अधिकारी ने अगर उनकी मदद नहीं की होती, तो आज शायद लालू यादव दोषी सिद्ध नहीं हो पाते.

काग़ज़ कभी झूठ नहीं बोलता

उनका कहना है कि चारा घोटाले में कई मजबूत साक्ष्य व दस्तावेज मिले थे. वर्तमान में पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के नेता व पूर्व मंत्री विश्वास कहते हैं कि उन्होंने तत्कालीन सीबीआई निदेशक जोगिंदर सिंह को बताया था कि केस बहुत मजबूत है और इसमें सजा होकर रहेगी. उन्होंने आईएएस अधिकारी के नाम का पर्दाफास करने से इन्कार करते हुए कहा कि उन्होंने ही हमें बताया था कि घोटाले की सभी फाइलें इंडेक्स में रखी हैं और वहां रेड कीजिए. इसके बाद अगले दिन ही रेड कर उन्होंने 60 फाइलें जब्त की थीं. यही इस केस का सबसे टर्निग प्वाइंट था. विश्वास ने कहा, इन फाइलों की पड़ताल में गड़बड़झाला देख उनके होश उड़ गए थे. इसमें पता चला कि बिना माल की सप्लाई के ही लाखों लाख रुपए के पेमेंट हो गए.

उन्होंने कहा कि कागज में जिन ट्रकों से माल की सप्लाई की बात कही गई थी वह स्कूटर व अन्य दोपहिया वाहनों का नंबर निकला. यानी रास्ते से जो वाहन गुजर रहे थे, उसी का नंबर पढ़कर खजांची ने कागज पर बैठा दिया था. सीबीआई के पूर्व जांच अधिकारी ने कहा कि उस दौरान कई प्रभावशाली लोगों ने जांच को प्रभावित करने की कोशिश की थी. उस दौरान उन्हें भी डर लग रहा था कि इतने पैसे, सत्ता व रसूख के दम पर कहीं आरोपी बच ना जाए, लेकिन उन्हें इस बात का पूरा भरोसा था कि कागज कभी झूठ नहीं बोलता और इस मामले में दोषी सिद्ध होने के लिए पर्याप्त तथ्य उपलब्ध थे.

खैर अब जब अदालत ने लालू प्रसाद को दोषी ठहरा दिया है तो उपेन विश्वास की यह बात माननी होगी कि इस मामले में लालू प्रसाद के खिलाफ साक्ष्य थे. इधर इस मामले में बरी हुए जगन्नाथ मिश्र ने यह कह कर सनसनी फैला दी कि मुझे चारा घोटाले में सीताराम केसरी और लालू प्रसाद को देवेगौड़ा ने फंसाया है.

राजद और उनके लाखों समर्थकों को तो यही लग रहा है कि यह सारा कुछ उनके नेता को फंसाने की साजिश थी. समर्थकों का यही भरोसा राजद को एकजुट बनाए रखेगा और पार्टी को टूटने नहीं देगा. लेकिन नए साल में लाख टके का सवाल यह जरूर है कि लालू और उनका पूरा परिवार कानूनी झंझावातों से अपने को निकालने में किस हद तक सफल हो पाएगा.

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