जनसेवा के लिए संत समागम

देशभर के धर्माचार्य काशी में बनने जा रहे पूर्वांचल के सबसे बड़े अस्पताल संत कबीर मल्टी स्पेशिएलिटी हॉस्पीटल की आधारशिला रखेंगे. वाराणसी के शिवपुरी में बनने जा रहे इस अस्पताल के निर्माण से उत्तर प्रदेश और बिहार की जनता को सबसे अधिक राहत मिलेगी. अब उन्हें लखनऊ या दिल्ली नहीं भागना पड़ेगा. 24 फरवरी 2018 को धार्मिक अनुष्ठान के साथ हॉस्पीटल निर्माण स्थल पर भूमि पूजन का कार्यक्रम निर्धारित है. इस कार्यक्रम में हिंदू धर्म आचार्य सभा के विख्यात सदस्य शरीक हो रहे हैं. कबीर चौरा मठ मूलगादी के समारोह में पहली बार इतने धर्माचार्य पधार रहे हैं.

इनमें स्वामी अवधेशानंद गिरी, स्वामी गुरुशरणानंद महाराज (रमणरेती-वृंदावन), स्वामीज्ञानानंद जी महाराज (गीता-मनिषी अम्बाला), स्वामी परमात्मानंद जी (राजकोट), स्वामी हंसाराम जी महाराज (उदासीन भीलवाड़ा), स्वामी उमेशनाथ जी महाराज (वाल्मीकिधाम-उज्जैन), महंत दयासागर जी महाराज (छुणाणीधाम, झझ्झर), स्वामी जसमेर जी (घीसापंथी), ब्रह्मेश्वरानंद जी महाराज (दत्तात्रेय पीठ, गोवा), स्वामी नारायण पीठाधीश्वर (अहमदाबाद), स्वामी श्रीकृष्णमणि महाराज (प्रणामीधाम जामनगर) शामिल हैं. दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के पांचों आचार्यों और दो शंकराचार्यों के भी समारोह में शरीक होने की संभावना है.

बेहतर चिकित्सा के लिए तरस रहे पूर्वांचल के लोगों के लिए बीएचयू भी काफी कम पड़ रहा था, ऐसे समय में इस कमी को पूरा करने का बीड़ा उठाया है, संत कबीर साहब के अपने घर मूल गादी वाराणसी ने. कबीर साहब का अपना घर, उनकी साधनास्थली और कर्मस्थली कबीरचौरामठ मूलगादीवाराणसी सुमान्य सिद्धपीठ है और विश्वभर के कबीरपंथियों का ऐतिहासिक मुख्यालय भी. यहीं से कबीर साहब ने अपने विचार-दर्शन के अभियान का सूत्रपात किया था और आज भी यहीं से कबीरी-चेतना की अलख जगाई जा रही है. कबीर साहब निर्वैरी सन्त थे. निष्काम भाव से जगत कल्याण के लिए दोस्ती और दुश्मनी से परे होकर मानव जाति के लिए उन्होंने अपना संदेश प्रसारित किया है. आम आदमी के ही दु:ख को देखकर वे रोते थे और जागते थे. रोना और जागना उनकी मानवता का सबसे बड़ा पक्ष है.

समस्त संत-परम्परा ने कबीर साहब की साधना और उनकी परम्परा को स्वीकार किया है. जिस भक्ति-आन्दोलन को कबीर साहब ने मध्यकाल में काशी से चलाया था, उतना बड़ा आन्दोलन पूरे विश्व में कभी और कहीं नहीं हुआ. इस भक्ति-आन्दोलन को पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तथा कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से लेकर चेन्नई तक के संतों ने कबीर साहब की अगुआई में विस्तारित किया. इसीलिए इन संतों के बिना भक्ति-आन्दोलन की बात पूरी नहीं होती है. मठ का इतिहास और उसकी परम्परा उल्लेखनीय है. सन्‌ 1781 में अंग्रेजों के खिलाफ पहली लड़ाई मठ में ही हुई थी.

यहीं से अंग्रेजी हुकूमत के प्रथम गवर्नर वारेन हेंस्टिंग्स को पराजित होकर भागना पड़ा था. जब वारेन हेंस्टिंग्स ने बनारस पर पुन: आधिपत्य जमाया और राजा-चेत सिंह को बन्दी बना लिया गया; तब से अंग्रेजी हुकूमत की नजर मठ पर लगी रही. अंग्रेजों से लड़ाई में तीन-तीन बार मठ को ध्वस्त कर देने का आदेश जारी किया गया था. लेकिन जन-बल के सामने अंग्रेजों का बस नहीं चला. वारेन हेस्टिंग्स जब काशी में राजा चेतसिंह को पकड़ने आया था तो उसने चेतसिंह के महल शिवाला पर नहीं, बल्कि जनशक्ति के केन्द्र कबीरचौरामठ के पास माधो सिंह के बगीचे में डेरा जमाया था.

इसलिए कि राजा चेतसिंह की माता पन्ना रानी कबीरचौरामठ की शिष्या थीं और राजा चेतसिंह को मठ का पूरा संरक्षण प्राप्त था. सन्‌ 1760 से 1781 के बीच वारेन हेस्टिंग्स और राजा चेतसिंह के बीच घमासान युद्ध हुआ था. मठ के महन्त और सन्तों के आह्वान पर काशी की लाखों-जनता जमा हो गई थी और वारेन हेस्टिंग्स को छिपभागना पड़ा था. इसका उल्लेख कबीरचौरा के मुख्य मार्ग पर सन्‌ 1781 में लगे शिलालेख में है. सन्‌ 1760 से 1947 तक यह मठ अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकता रहा. सन्‌ 1942 के विद्रोह के समय मैदागिन चौराहे पर तिरंगा फहराते समय अंग्रेजों की गोली से मठ के तीन साधु आहत हो गए थे. कबीरचौरामठ के साधु-सन्त आजादी के सैनिक बन गए थे.

दो सौ वर्ष का समय कम नहीं होता है. कबीर साहब ने अपने समय में इतना बड़ा भक्ति-आन्दोलन चलाया, पर इस आन्दोलन का एकाएक थम जाना वज्रपात जैसी घटना थी. आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. सम्पूर्णानन्द कबीरचौरामठ मूलगादी के तत्कालीन महंत रामबिलास साहब से मिलने आए थे. उन्होंने मठ के विकास के लिए मदद का प्रस्ताव दिया, लेकिन देशभक्त और निवृत्तमार्गी महंतजी ने सरकारी मदद लेने से इनकार कर दिया था. महंतजी ने कहा था, ‘भारतवर्ष हमारा देश है और देश को आजाद कराना हमारा कर्तव्य एवं दायित्व था. इसलिए हम सरकार पर दोष नहीं लगा सकते हैं.’

आज मठ के विकास की जरूरत है. तमाम विरोधाभासों और विवादों से उबरते हुए अब कबीर मठ से जुड़ी तमाम परियोजनाएं प्रारम्भ हो रही हैं. देश एवं दुनिया में कबीर एवं कबीरमठ का कीर्तिमान स्थापित होने जा रहा है. पहली परियोजना कबीर संग्रहालय की है, जिसमें कबीर साहब की ऐतिहासिक चीजें तथा संत परम्परा के अन्य संतों की ऐतिहासिक वस्तुएं धरोहर के रूप में संग्रहीत की जाएंगी. यह संग्रहालय नीरू-टीला परिसर में बनेगा जहां कबीर साहब का पुराना घर है. इस परिसर में संग्रहालय के साथ कबीर की झोपड़ी बनेगी, जिसमें उनका ताना-बाना होगा. दूसरी परियोजना कबीर प्राकट्य स्थल लहरतारा पर कबीर-स्मारक स्थापित करने की है.

यह स्मारक दुनिया में अकेला एवं अनूठा होगा, जो मनुष्य जीवन के दैहिक और आध्यात्मिक पक्षों पर आधारित है. तीसरी परियोजना शिवपुरी वाराणसी में बन रहा संतकबीर मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल है. चौथी परियोजना है संतकबीर विद्यापीठ, जो सारनाथ वाराणसी में बनेगा. यह विद्यापीठ केवल संत परम्परा का अन्वेषण, शिक्षण एवं उन्नयन के लिए होगा. पांचवीं परियोजना कबीरचौरामठ आश्रम कन्हेरिया/झरनेश्वर देवास, मध्यप्रदेश का है. यह स्थल बहुत ही रमणीय और प्राकृतिक सौन्दर्य से ओत-प्रोत है. 80 एकड़ का परिक्षेत्र पहाड़ी पर उपलब्ध है, जो मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आवंटन की प्रक्रिया में शामिल है.

इस आश्रम में पांच सौ से भी अधिक सेवामुक्त लोगों में से बौद्धिक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस, अध्यापक तथा ऐसे तमाम लोग आश्रमी जीवन पालन करते हुए देशसेवा में भाग लेंगे. ये परियोजनाएं कबीर साहब को और मूलगादी की परम्परा को विश्वपटल पर स्थापित करेंगी. दिल्ली के मदनगीर स्थित कबीर आश्रम एवं कबीर शोध संस्थान की स्थापना भी मूलगादी वाराणसी की ऐतिहासिक थाती के बतौर शामिल हो गया है.

कबीर साहब को हम भगवान और सद्गुरु मानते हैं, लेकिन कबीर साहब एक मजदूरी के पेशे से आगे बढ़कर दुनिया के शिखर पर पहुंच गए. कबीर साहब ने श्रम और मजदूरी को शीर्ष पर प्रतिष्ठित किया. यह इतिहास और परम्परा के लिए एक बड़ी सीख है. करघा-चरखा और कपड़ा बनाने के साजो-समान को कबीर साहब ने मुक्ति का मार्ग बताया है. कबीर साहब के अनेक पद और साखियां हैं, जिसमें उन्होंने सूत, करघा, चरखा, रहटा, लहुरिया, तागा और धागे की चर्चा करते हैं. चरखा, करघा के ताने-बाने के माध्यम से कबीर साहब ने अध्यात्म के तमाम प्रतीकों में जीव, ब्रह्म और ईश्वर से जोड़कर अपने पेशे को सम्मानित और प्रतिष्ठित किया है.

इसलिए नीरू-टीला कबीर साहब का यह परिसर श्रम और साधना की दृष्टि से ऐतिहासिक है और सर्वाधिक महत्वपूर्ण भी. कबीर साहब की महिमा और उनके पंथ विस्तार के अनुकूल इस ऐतिहासिक स्थल का विकास नहीं हो सका था. आज विज्ञान के बढ़ते कदम के साथ इस स्थल का निर्माण कबीर साहब की झोपड़ी और सन्त-परम्परा का अनूठा तथा अकेला संग्रहालय का निर्माण होने जा रहा है. यह विश्व में अपने ढंग का अलग संग्रहालय होगा, जिसमें एक-एक वस्तु जनप्रेरणा का स्त्रोत बन सकेगा.

कबीर साहब के अलावा जिन सन्तों ने कबीर साहब के विचार और दर्शन को आगे बढ़ाया है, उन सौ से भी अधिक संतों की प्रेरणा का प्रतीक चिह्न यह संग्रहालय बनने जा रहा है. इस पूरी परियोजना में कबीर साहब के कर्म और श्रम की चर्चा आवश्यक है. इसीलिए इस परियोजना की शुरुआत में उनकी श्रमशीलता की चर्चा की जा रही है. कबीर साहब का पूरा जीवन ताने-बाने की संस्कृति से ओत-प्रोत है. इस पक्षधरता के बिना कबीर साहब के किसी भी पक्ष पर बात करनी अधूरी रहेगी. ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया’ उनके अध्यात्म और संस्कृति की पराकाष्ठा है. वे जीवन भर हरिनाम की चदरिया बीनते रहे हैं.

देशभक्ति में डूबी कबीरचौरा मठ की साधुता

कबीरचौरामठ मूलगादी का इतिहास और परम्परा कबीर साहब से आरम्भ होता है. यह मूलगादी कबीरचौरामठ कबीर साहब की कर्मभूमि, साधना-पीठ और उपदेश-स्थली रही है. यहां से करीब छह किलोमीटर की दूरी पर लहरतारा सरोवर के किनारे विक्रम सम्वत्‌ 1456 में इनका आविर्भाव हुआ था. नीरू-नीमा दम्पति इन्हें वहां से उठाकर लाए थे और इसी प्रखंड के एक-दूसरे भाग में इनका पालन-पोषण हुआ था. इसी प्रखंड में नीरू-नीमा का घर था. इसलिए आज यह प्रखंड नीरू-टीला के नाम से विख्यात है. जिस वर्तमान नीरू-टीले पर कबीर साहब का लालन-पालन हुआ था, उसी प्रखंड में उनका अपना घर था और आज इसी स्थल पर नीरू-नीमा की समाधियां भी बनी हुई हैं. कबीर साहब के इसी आवास स्थल पर काफी समय पहले मठ की तरफ से यात्रियों के लिए बारह कमरों की धर्मशाला बना दी गई थी. अब इन कमरों को हटाकर अत्याधुनिक कबीर की झोपड़ी और उनके ताने-बाने के घर का निर्माण होने जा रहा है. अब बहुत जल्दी कबीर की झोपड़ी और कबीर संग्रहालय विश्व पटल पर नज़र आएंगे.

वर्तमान नीरू-टीला परिसर के आस-पास कसाईयों और गणिकाओं की बस्ती थी. एक तरफ कबीर साहब का सत्संग चलता था, दूसरी तरफ कसाई बकरे काटते थे, साथ ही गणिकाओं के घुंघरुओं की खनखन की आवाज भी आती थी. ऐसे विपरीत माहौल का जब सत्संग-प्रेमियों ने विरोध किया तो कबीर साहब ने कहा…

‘कबीर तेरी झोपड़ी, गलकट्टों के पास/जो करेगा सो भरेगा, तुम क्यों होत उदास!’

ताने-बाने पर सत्संग के पाठशाले में जब जगह की कमी पड़ने लगी तब सत्संग-प्रेमियों ने ही मिलकर यहां से हटकर अलग एक विशाल चबूतरे का निर्माण किया. इस सत्संग चबूतरे का नाम कबीर-चबूतरा रखा गया. इसी चबूतरे से कबीर साहब ने देश-दुनिया और गांव-गांव में भ्रमण कर मनुष्य मात्र के लिए भक्ति, ज्ञान और कर्म का सन्देश फैलाया. इस दृष्टि से कबीर-चबूतरा एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित हुआ. जहां पर कबीर साहब ने लगभग एक सौ बीस वर्ष की आयु तक निवास कर अपना सम्पूर्ण जीवन बिताया. इसलिए आज विश्वभर के लोग इस स्थल पर दर्शन और पूजन करने आते हैं. कबीर साहब की इस कर्मभूमि और साधना-स्थली में कबीर साहब की महिमा और उनकी ऊर्जा, यहां के कण-कण में समाई हुई है. इसलिए भक्त, दर्शक और पर्यटक यहां आने पर स्वयं यहां की आध्यात्मिक-ऊर्जा पाकर शान्ति और सुख का अनुभव करते हैं.

कबीर साहब की साधुता के परिणतिकाल में इस चबूतरे का नाम कबीरचौरा पड़ गया, जो आज सिद्धपीठ कबीरचौरामठ मूलगादी के नाम से दुनियाभर में प्रसिद्ध है. कबीर साहब के महापरिनिर्वाण के बाद यहीं पर उनके उत्तराधिकारी शिष्य आचार्य सुरतिगोपाल साहब की अध्यक्षता में कबीरपंथ की नींव पड़ी. कबीर साहब के अनेक समकालीन शिष्य देश के अन्य भागों में फैलकर कबीरपंथ और कबीरवाणी का प्रचार-प्रसार करने लगे. कबीरचौरामठ मूलगादी कबीर साहब की कर्मभूमि और साधना-स्थली होने की वजह से यहां कबीरपंथ का मुख्य केन्द्र बना. इसलिए यह मठ कबीरपंथ की मूलगादी कहलाने लगा और जहां कबीर साहब के नाम पर जो केन्द्र, उपकेन्द्र बने, वे सभी पंथ की शाखाएं और उपशाखाएं कहलाने लगें.

कबीरचौरा सिर्फ कबीरचौरा नहीं है. कबीरचौरा धर्म क्षेत्र भी है और कुरुक्षेत्र भी. आदमी-आदमी को छोटा देखने वाली और अलग बांटने वाली धर्म-व्यवस्था और समाज-व्यवस्था के खिलाफ सही और सार्थक लड़ाई की शुरुआत यहीं से हुई थी. सबकी खैर चाहने वाला यह छोटा सा चबूतरा बढ़ते-बढ़ते कबीरचौरा बन गया. अब जहां से भी ईमानदार आवाज उठती है, वह जगह कबीरचौरा होती है. इसलिए कबीरचौरा स्थान भी है, चिन्तन भी है, आवाहन और वैचारिक युद्ध संकल्प भी है. कबीर साहब की जागरूकता की पहचान एक मात्र कबीरचौरामठ मूलगादी है. ईश्वर-अल्लाह को एक करके देखने वाले महात्मा गांधी ने अपने अभियान को कबीर साहब से जोड़कर चरखा-करघा, सूत और खादी की संस्कृति के प्रवक्ता के रूप में उन्होंने कबीर साहब के कार्यक्रम को ही आगे बढ़ाया. गांधीजी वाराणसी आए और कबीरचौरा आजादी की लड़ाई का योजना-शिविर बना.

गांधी ने लड़ाई के इस कदम को आगे बढ़ाया और राष्ट्रीय स्तर पर अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने यहीं से राष्ट्रीय-एकता और स्वतंत्रता की दीक्षा ली. महात्मा गांधी की माता कबीरपंथी थीं. यह घोषणा उन्होंने कबीरचौरामठ में आकर की. गांधीजी की यह घोषणा सन्‌ 1934 में प्रकाशित आज दैनिक से उद्धृत कबीरचौरामठ के प्रांगण में शिलापट्ट के रूप में लगा है. कबीर साहब का करघा और गांधीजी का चरखा, कबीर साहब का राम-रहीम और गांधीजी का ईश्वर-अल्लाह का नारा अलग नहीं है. यह इतिहास कबीरचौरामठ मूलगादी के इतिहास का दूसरा सुनहरा पन्ना है.

संत कबीर के नाम पर बनारस में बन रहा मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल, पूर्वांचल के लिए कबीर पीठ की सौगात

कभी इलाज के लिए जरूरी इंजेक्शन के लिए साठ रुपए नहीं मिले थे, लेकिन उन साठ रुपए के बरक्स अस्पताल स्थापित करने का सपना आज पूरा हो रहा है, जब वाराणसी में संतकबीर मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल का निर्माण होने जा रहा है. वाराणसी के शिवपुर में करीब पांच एकड़ में पांच सौ करोड़ रुपए के प्राथमिक बजट पर यह अस्पताल बनने जा रहा है. इस अस्पताल की परियोजना को साकार रूप देने के लिए मैंने दुनिया के कई देशों का भ्रमण किया. अमेरिका, नीदरलैंड, स्वीट्जरलैंड, जर्मनी, फ्रांस, मॉरीशस और सूरीनाम जैसे तमाम देशों के अस्पतालों का निरीक्षण किया.

वहां की आधुनिक तकनीक और आधुनिक उपकरणों और मशीनों का प्रयोग-उपयोग देखा. वहां का प्रशासनिक प्रबंधन देखा. उन देशों में भीड़ नहीं है. जबकि भारत अपार जनसंख्या वाला देश है. इन देशों में दूसरी खास बात है कि जन्म लेते ही बच्चे का हेल्थ इन्श्योरेंस कराने की कानूनी प्रक्रिया है. इसके कारण हॉस्पिटल की जिम्मेदारी सर्वप्रथम होती है. सूचना मिलते ही एम्बुलेंस आ जाती है और सम्पूर्ण इलाज के बाद ही मरीज को घर भेजा जाता है. उपलब्ध संसाधनों का ध्यान रखते हुए संत कबीर मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल में भी आम आदमी के इलाज की प्राथमिकता को लक्ष्य रखा गया है. अस्पताल व्यवसायिक नहीं बल्कि सेवा के लिए बन रहा है. कबीर साहब ने मानवीयता और सेवा का ही संदेश दिया है.

आज पूरी दुनिया में कबीर साहब का ‘क्रेज़’ है और हर जगह कबीर साहब की प्रासंगिकता की चर्चा हो रही है. इसके पीछे कई संतों का त्याग है. अंग्रेजों ने कबीरचौरामठ को अपने चरमपरिणति काल में दो सौ वर्षों तक नजरबन्द रखा था. इसका फायदा उठाते हुए कबीरपंथ के भीतर ही तीन तिकड़मी वंशों का जन्म हो गया. इन वंशों के मुखिया धरमदास थे. धरमदास ने कबीरपंथ की पूरी परम्परा को उलट-पुलट कर रख दिया. इस बदलाव का सम्पूर्ण तथ्य अनुराग-सागर व बोध-सागर जैसे तमाम सागर ग्रंथों में उल्लिखित है. धरमदास ने कबीर साहब की ऐतिहासिकता की पहचान मिटाई और कबीर साहब को चारों युगों में आने-जाने वाला अवतारी पुरुष घोषित कर दिया.

कबीर साहब की मूलवाणी और उनके दर्शन के खिलाफ दर्जनों से भी अधिक काल्पनिक कबीर-धरमदास संवाद-ग्रंथों की रचना करवाई गई. तमाम ऊल-जुलूल कहानियां गढ़ कर कबीर साहब की प्रखरता नष्ट करने की साजिश की गई. कबीर साहब के क्रान्तिकारी और विद्रोही स्वर को नष्ट करने का कुचक्र किया गया. अभी भी तथाकथित धरमदासीय परम्परा में कई-कई वंशों मसलन, विन्दवंश, नादवंश और वचनवंश का घिनौना खेल चला है. ये तीनों ‘वंश’ कबीर और कबीर-दर्शन से कोसों दूर हैं. कबीरचौरामठ मूलगादी की पांच परियोजनाओं से कबीर और कबीरपंथ की परम्परा और इतिहास का वास्तविक स्वरूप और सच सामने आएगा.

लहरतारा कबीर उद्भव स्थल पर बनने वाले कबीर-स्मारक का मॉडल बनकर तैयार है. आपसी विवाद के कारण इसका निर्माण रुका हुआ था. यह स्मारक कबीरवाणी और कबीर साहब के दर्शन पर आधारित विश्व में अनूठा कबीर-स्मारक होगा. इस भव्य कबीर-स्मारक का स्वरूप ठीक उसी भांति निर्धारित किया गया है, जिस भांति स्वयं कबीर साहब ने मनुष्य-जीवन को अपनी वाणियों में परिकल्पित किया है. इसतरह यह स्मारक मनुष्य-जीवन की व्याख्या है.

यह व्याख्या स्वयं कबीर साहब के शब्दों में है. उनके शब्दों को ही इस स्मारक के तौर पर स्वरूप और आकृति दी गई है. मनुष्य के दैहिक और जैविक स्वरूप की कबीर साहब ने जैसी व्याख्या की है, उस दैहिक और जैविक स्वरूप के विभिन्न घटकों की उन्होंने जैसी अवस्थिति पाई, चेतना को वैसा ही निर्मल बनाए रखते हुए ‘ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया’ के लिए सहज साधना की जैसी प्रविधियां उन्होंने सुझाईं, वे सब प्रतीकात्मक किन्तु मुखर व स्पष्ट रूप से कबीर-स्मारक में प्रकट हुई हैं.

मध्य प्रदेश के देवास झरनेश्वर के अस्सी एकड़ क्षेत्रफल में कबीरचौरामठ आश्रम का मॉडल बनकर तैयार है. इस आश्रम के निर्माण में कबीर साहब की बानी में अंकित प्रकृति और पर्यावरण को ध्यान में रखकर बनाया गया है. कन्हेरिया की पहाड़ी आश्रम के लिए आवंटन की स्थिति में है. यह पहाड़ी रमणीयता और सौन्दर्य की दृष्टि से अद्भुत और अनुपम है. इस आश्रम में एक हजार से अधिक पेड़-पौधे लगेंगे. वे पेड़ लगेंगे जिन पेड़ों की चर्चा कबीर साहब ने अपनी वाणी में की है. यह आश्रम कबीर साहब के बौद्धिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक केन्द्र के रूप में दुनिया का सबसे बड़ा केन्द्र होगा. कई सौ सेवामुक्त बौद्धिकजनों को साधु रूप में शामिल करने की रूप-रेखा तैयार की गई है.

मध्यप्रदेश के इसी क्षेत्र के मध्य भाग को मालवा कहते हैं. कबीर साहब ने मालवा देश को आत्मा का प्रतीक माना है. इसीलिए इस पहाड़ी पर बौद्धिक, शैक्षणिक और वैज्ञानिक आधारभूत महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत की जा रही है. मालवा कबीर साहब की वाणी का सबसे अधिक प्रभावकारी क्षेत्र है. यहां पर कबीरचौरा मठ आश्रम की स्थापना और निर्माण से दुनियाभर में कबीर साहब के बौद्धिक और वैज्ञानिक चिन्तन की पहचान बनेगी. मालवा क्षेत्र में छोटे-बड़े सौ से भी अधिक कबीरमठ और आश्रम हैं और सौ से भी अधिक कबीर भजन-गायकों की मण्डलियां हैं, जो मालवा लोकशैली में कबीर साहब के भजनों को गाते हैं और क्षेत्रीय जनता को सामाजिक तथा आध्यात्मिक रस से सराबोर करते रहते हैं. मालवा क्षेत्र के आश्रमों और भजन-गायक मण्डलियों की स्थिति ठीक नहीं है और इन सबों को सही दिशा निर्देश नहीं मिल पा रहा है.

कबीरचौरामठ कबीर साहब और कबीरपंथ की मूलगादी होने के नाते मालवा क्षेत्र से हजारों की संख्या में कबीर भक्त और अनुयायी वाराणसी मठ में आते ही रहते हैं और अपनी दयनीय दशा का बयान करते हैं. इन सारे भक्तों और अनुयायियों की मांग थी कि मालवा क्षेत्र में कबीर साहब का कोई बड़ा केन्द्र स्थापित हो. मालवा भर्तृहरी जैसे योगी की यह भूमि है. राजा विक्रमादित्य जैसे चक्रवर्ती राजा यहां पैदा हुए. कबीर साहब ने योगियों में भरथरी का नाम अत्यन्त आदर से लिया है और राजा में विक्रमादित्य जैसे राजा. कबीरसाहब ने इन दोनों इतिहास पुरुषों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है. कबीरसाहब ने अपनी वाणी में बार-बार यह बात कही है कि योगी हो तो भरथरी जैसा हो और राजा हो तो विक्रमादित्य के समान.

अकबर का ताम्रपत्र और लाल साहब का तकिया

कबीरचौरा मठ मूलगादी के पांचवें पीठाधीश्वर लाल साहब तकिया कबीर साहब के बाद सबसे सशक्त और प्रभावशाली संत थे. इन्होंने कबीर वाणी के प्रचार-प्रसार के लिए देशभर में 365 मठों की स्थापना की थी. उन्होंने दिल्ली, उत्तर प्रदेश, असम और बिहार में सबसे अधिक मठों की स्थापना की थी. लाल साहब तकिया अकबर के समकालीन थे. टोडरमल अकबर के नवरत्नों में से एक थे, जो कबीरचौरा मुहल्ले में ही रहते थे. टोडरमल ने ही बादशाह अकबर को बताया था कि कबीर पीठाधीश्वर लाल साहब तकिया सिद्ध फकीर तपस्वी संत हैं. इससे प्रभावित होकर अकबर मूलगादी मठ में लाल साहब से मिलने आए थे.

अकबर ने यह जाना कि लाल साहब कबीर साहब के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए देशभर में कबीर पीठों की स्थापना कर रहे हैं. अकबर बिहार की यात्रा पर जा रहे थे, अकबर ने अपने मातहत कारिन्दों से कहा कि कबीर पीठ की स्थापना के लिए जमीन की जरूरत है. अकबर ने बिहार के वर्तमान समस्तीपुर में सौ बीघा जमीन देने की घोषणा की. यही मठ बिहार के सतमलपुर गांव में कबीर पीठ मुलगादी का मुख्य केन्द्र बना. अकबर का लिखा हुआ ताम्रपत्र मठ में आज भी सुरक्षित है. यह अभीलेख फारसी में है. संग्रहालय बनने के बाद ऐसी सारी वस्तुएं संग्रहालय में सम्मिलित हो जाएंगी.

एक सन्त का करामाती कमण्डल

करीब तीन सौ साल पहले की बात है बिहार के वर्तमान चंडी ब्लाक के नजदीक जंगल में बाबा कृष्णदासजी कबीर की साधना कर रहे थे. बाबा प्रतिदिन रात में गंगा नहाने जाया करते थे और अपने पीने के लिए एक कमण्डल पानी लेकर आते थे. बिहारशरीफ के नवाब के पेट में वर्षों से असह्य पीड़ा हो रही थी. वे एक दिन पालकी में सवार होकर पटना के पास फुलवारीशरीफ किसी हकीम के पास जा रहे थे. बिहारशरीफ एवं पटना के बीचो-बीच जंगल में बाबा की कुटिया थी. नवाब को रास्ते में प्यास लगी तो पालकी के साथ चल रहे सिपाहियों को जंगल में बाबा की कुटिया दिखाई दी. बाबा से पानी मांगा.

बाबा ने अपने कमण्डल से गंगाजल नवाब को पीने के लिए दिया. पानी पीते ही नवाब की प्यास तो बूझी ही उनका पेट दर्द भी समाप्त हो गया. नवाब वहीं से वापस बिहारशरीफ लौट गए. नवाब ने बाबा को सौ बीघा जमीन दान में दी. यह मठ आज नालंदा जिले के बहादुरपुर गांव में स्थित है. वहां आज भी बाबा का कारामाती कमण्डल सुरक्षित रखा है. बिहार में बाबा कृष्णदास ने अपने समय में ऐसे अनेक ऐतिहासिक मठों की स्थापना की.

चमत्कारी चुम्बकीय घड़ा

सन्‌ 1600 के पूर्व मूलगादी मठ के आठवें आचार्य सुख साहेब दास जी. एक बार इनके पास एक सिद्ध तांत्रिक आया और विभिन्न विषयों पर शास्त्रार्थ करने लगा. तांत्रिक अपने साथ किसी खास धातु से बना हुआ घड़ा भी लाया था. इस घड़े में चुम्बकीय शक्ति थी. चीजों को आकर्षित करने की इसमें अद्भुत क्षमता था. इसका इस्तेमाल वह तांत्रिक चमत्कार के लिए करता था. उत्तर-प्रत्युत्तर में तांत्रिक सुख साहेब से बहुत प्रभावित हुआ और अपना यह घड़ा उन्हें समर्पित कर दिया. वे तांत्रिक कबीर साहब की सहज-साधना में शामिल हो गया.

शंख से सिकन्दर लोदी का सिंहासन डोल गया

सिकन्दर लोदी ने अपने शासन काल में धार्मिक व सांस्कृतिक नगरी काशी में जलालुद्दीन खिलजी नामक एक क्रूर कोतवाल नियुक्त कर रखा था. इस कोतवाल ने अपने समय में हिन्दू-धर्म के सभी क्रिया-कलापों जैसे पूजा-पाठ, घंटा-घड़ियाल और शंख आदि के बजाने पर प्रतिबंध लगा रखा था. एक पंडितजी के पूजा-घर में एक बच्चे ने अनजाने में शंख फुंक दिया. इसकी सूचना जब कोतवाल को मिली तो उसने बच्चे की हत्या करवा दी. इस घटना से हिन्दू-धर्म के लोगों में उत्तेजना फैल गई. वे स्वामी रामानन्दजी के पास गए. स्वामी रामानंद जी ने कहा कि कबीर दास उनके प्रिय शिष्य हैं, वे ही इसका समाधान निकालेंगे. दूसरे दिन सवेरे से अजान अपने आप बंद हो गई और मुस्लिमों के सभी धार्मिक क्रिया-कलाप ठप्प हो गए. कबीर साहब ने पंडितजी से वह शंख मंगवाया और अपने हजारों भक्तों को काशी में बुलाकर प्रात: से ही प्रतिदिन शंख बजा-बजाकर कहने लगे, ‘शंखासुर को काशी से भगाओ.’ यही संकीर्तन शुरू हो गया. वह शंख आज भी मूलगादी मठ में सुरक्षित है.

दादू दयाल की धुनकी और सोने से बनी घड़ी

सन्त दादू दयाल जी कबीर-परम्परा के एक श्रेष्ट श्रमजीवी सन्त थे. ‘बुड्‌ढन कबीर के दर्शन’ के बाद ही इन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ था. ये रुई धुनने का काम करते थे. बड़े-बड़े सन्तों की इनकी शिष्य-मंडली थी, पर इन्होंने अपने कार्य को कभी छोटा नहीं माना, न ही उसे छोड़ा. आजीवन अपने इस कार्य में संलग्न रहे. कबीर साहब के बाद इनकी वाणी जन सामान्य में सर्वाधिक प्रचलित है एवं लोग गुनगुनाते रहते हैं. मूलगादी मठ में इनका रुई धुनने का यंत्र रखा हुआ है, जिसके दर्शन मात्र से श्रम की प्रेरणा मिलती है.

कबीर मठ में सोने और प्लैटिनम से बनी दुर्लभ घड़ी भी अब संग्रहालय का हिस्सा बनने वाली है, जो मठ में उपेक्षित पड़ी मिली थी. स्वर्ण निर्मित प्राचीन घड़ी संभवतः घड़ी के आविष्कार-काल का शुरुआती संस्करण है. इसकी खासियत यह है कि यह स्वर्ण निर्मित है और इसे आठ दिनों में एक बार चाबी देकर सक्रिय किया जाता है. इसका बंध कवर प्लेटिनम से बना है. इसकी बाहरी कवर चांदी से निर्मित है. बेशकिमती माणिकों और रत्नों से इसके सामने वाले भाग को सजाया गया है.

दो दुर्लभ टेलिस्कोप

मूलगादी मठ में दो दुर्लभ टेलिस्कोप सुरक्षित रखे गए हैं. 1781 ई. में मूलगादी के समीप माधव सिंह की बगीची में वारेन हेस्टिंग्स ठहरा हुआ था. वह राजा चेतसिंह को पकड़ने आया हुआ था. जैसा ऊपर बताया कि राजा चेतसिंह की मां पन्नारानी मठ की शिष्या थी. मां के कहने पर राजा चेतसिंह ने मठ में शरण लिया हुआ था. तत्कालीन आचार्य के आह्वान पर हजारों लोग हेस्टिंग्स के विरोध में मठ में एकत्र हो गए थे और हेस्टिंग्स को अफरा-तफरी में वहां से भागना पड़ा था. इसी आपाधापी में उसके दो टेलिस्कोप छूट गए थे, जिसे मठ में सुरक्षित रख दिया गया है. इसमें से एक दूर तक के दृश्य को साफ दिखाता है और दूसरा धूमिल दिखने वाले ऑब्जेक्ट को स्पष्ट दिखाता है.

कोकिल साहब

कोकिल साहब कबीरपंथ के ग्यारहवें आचार्य थे. कोकिल साहब का नाम कोकिल इसलिए पड़ा कि उनकी आवाज मीठी और मधुर थी, जो लोगों को बहुत अधिक प्रभावित करती थी. वे अपनी बातों को खंजड़ी बजाकर भजन के माध्यम से प्रस्तुत करते थे. ‘रहना नहीं देश बिराना’ एवं ‘ना मैं धर्मी ना अधर्मीं’ की गूंज उनकी खंजड़ी की ताल में रची-बसी था. उनके द्वारा उपयोग में लाई गई खंजड़ी आज भी मठ में सुरक्षित है. अब संग्रहालय के लिए उसे संरक्षित कर दिया गया है.

(लेखक कबीरचौरा मूलगादी के मुख्य महंत हैं)