बिहार-झारखंड सीमावर्ती क्षेत्र में उद्योग बनता जा रहा अपहरण

biharआज बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में चल रही एनडीए की सरकार लाख दावा करे, लेकिन यह कहा जा सकता है कि राज्य में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. विधि व्यवस्था और पुलिस का खौफ अपराधियों में अब नहीं दिख रहा है. प्रतिदिन बिहार के किसी न किसी क्षेत्र से अपहरण की घटनाएं सामने आ रही हैं. कभी उद्योग का रूप ले चुका फिरौती और लेवी के लिए होने वाला अपहरण अब फिर से शुरू हो चुका है. आपराधिक गिरोह लेवी वसूलने के लिए अपहरण और हिंसक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं. झारखंड की सीमा से लगा बिहार का पूरा क्षेत्र इन दिनों अपहरण उद्योग का केन्द्र बन गया है. बिहार-झारखंड सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित करीब सौ किलोमीटर लम्बे राष्ट्रीय उच्च पथ-2 (जीटी रोड) के आस-पास का क्षेत्र अपहर्ता गिरोहों का अड्‌डा बनता जा रहा है. पिछले चार वर्षों में इस क्षेत्र में करीब दो दर्जन अपहरण के बड़े मामले सामने आए हैं. इस क्षेत्र में अपहर्ता गिरोहों के अलावा प्रतिबंधित नक्सली संगठन भी सक्रिय हैं, जो लेवी के लिए यहां चल रहे विकास कार्यों को बाधित करते हैं.

9 जनवरी 2018 को गया जिले के शेरघाटी अनुमंडल में गोपालपुर के निकट जीटी रोड से अनाज व्यवसायी विनोद प्रसाद का अपहरण कर लिया गया. अपहरणकर्ताओं ने 12 जनवरी को उन्हें छोड़ा. पुलिस ने इसे अपनी सफलता बताई, लेकिन खबर आई कि वे फिरौती देकर छूटे हैं. इस मामले को लेकर पूरे शेरघाटी अनुमंडल के व्यापारियों ने सड़क पर उतरकर आन्दोलन भी किया. जनवरी 2018 के तीसरे सप्ताह में खगड़िया जिले के पौरा थाना क्षेत्र से बिहार के प्रसिद्ध लोकगायक सुनील छैला बिहारी के बड़े भाई अनिल सिह का अपहरण कर लिया गया. ये मामला भी फिरौती का ही था. जीटी रोड से हुई अपहरण की घटनाओं में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा था गया के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ पंकज गुप्ता और उनकी पत्नी शुभा गुप्ता का अपहरण.

1 मई 2015 को गिरिडिह से लौटते वक्त जीटी रोड पर बाराचट्‌टी थाना क्षेत्र से ऑडी गाड़ी समेत इनका अपहरण कर लिया गया था. इस अपहरण कांड के बाद गया जिला समेत पूरे बिहार के चिकित्सकों तथा आम लोगों ने खूब धरना-प्रदर्शन किया था. इस मामले में भी खबर आई थी कि वे फिरौती देकर छूटे. हालांकि इस अपहरण में शामिल अपहर्ता बाद में लखनऊ से पकड़े गए, लेकिन चिकित्सक दंपती ने जेल व कोर्ट में अपहरणकर्ताओं को पहचानने से इन्कार कर दिया. इस मामले में रफीगंज, औरंगाबाद निवासी अजय सिंह अभी भी गया केन्द्रीय कारा में बंद है. अपै्रल 2015 में अजय सिंह के गिरोह ने ही जीटी रोड के बाराचट्‌टी थाना क्षेत्र के इसी स्थान से ठेकेदार रंजन कुमार सिंह का अपहरण किया था. इनकी रिहाई भी फिरौती के बाद हुई थी. यह सिलसिला आज भी जारी है. इस अनुमंडल में पुलिस अपहरणकर्ता गिरोह पर अंकुश लगाने में सफल नहीं हो पा रही है. अपहरण के मामले में कार्रवाई का पुलिस रिकार्ड यहां बेहतर नहीं है.

पिछले साल 3 दिसम्बर को डुमरिया की भंगिया पंचायत के नोनीसोत गांव से अगवा किए गए वृद्ध ग्रामीण जिक्रुल्लाह अंसारी को दस दिनों तक झारखंड के इलाके में अपहर्ताओं ने बंधक बनाए रखा, लेकिन पुलिस निष्क्रिय बनी रही. इस मामले में अब तक एक भी अपहर्ता गिरफ्तार नहीं हो सका है. दो साल पूर्व आमस के बनकट से अगवा हुए वृद्ध ग्रामीण जगलाल यादव का तो अबतक पता ही नहीं चल सका है. आशंका है कि उनकी हत्या कर दी गई है. नामजद रिर्पोट दर्ज कराए जाने के बावजूद पुलिस इस मामले में कार्रवाई नहीं कर सकी. उसी तरह से शेरघाटी से कई वर्ष पूर्व अगवा व्यवसायी अरविंद कुमार और डोभी के लम्बोगढा गांव से अपहृत ग्रामीण गोपाल साव के परिजनों को अब भी इनके लौट आने का इंतजार है. नीतीश सरकार के जिस कार्यकाल को सुशासन की संज्ञा दी जाती है, उस दौरान भी यहां अपराधियों के हौसले बुलंद थे और पुलिस उनपर काबू नहीं कर पाती थी.

31 मार्च 2012 को इमामगंज के लुटूआ के निकट से शम्भू यादव और शत्रुघ्न साव का अपहरण हुआ, लेकिन पुलिस ने उस मामले में प्राथमिकी भी दर्ज नहीं की. 20 जुलाई 2012 को डोभी के निकट सें गैमन इंडिया के दो अधिकारियों का अपहरण, 1 जनवरी 2013 को डुमरीया के एक ग्रामीण की अपहरण के बाद हत्या, 8 अगस्त 2013 को डुमरीया के टेकरा से सहदेव यादव का अपहरण, 28 नवंवर 2013 को रानीगंज के कपड़ा व्यपारी गजाधर यादव का अपहरण, 9 अप्रैल 2014 को कोठी थाना क्षेत्र से एक डॉक्टर का अपहरण, 4 मार्च 2015 को डोभी से दो ग्रामीणों का अपहरण जैसे अनगिनत मामले हैं, जो इस क्षेत्र में अपहरण गिरोहों की पुलिस से बेफिक्री दिखाते हैं. झारखंड की सीमा से लगे होने और पहाड़ों से आच्छादित होने के कारण अपराधी गिरोह बिहार के इस क्षेत्र से अपहरण कर जंगल और पहाड़ों के रास्ते झारखंड की सीमा में चले जाते हैं. बिहार और झारखंड पुलिस में समन्वय का आभाव भी इन अपराधी गिरोहों के लिए मददगार साबित होता है.

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