हो गई शत्रु सम्पत्ति अब भारत सरकार की

  • देशभर में 16 हज़ार से अधिक शत्रु सम्पत्तियां, यूपी में सबसे अधिक 4,991, हो गई शत्रु सम्पत्ति अब भारत सरकार की
  • अरबों की सम्पत्ति में कोठियां, ज़मीनें, सोना, जेवरात, शेयर्स और बैंक बैलेंस, सरकार के खजाने में जाएगा शत्रु का धन

propertyदेशभर में फैली एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कीमत की 9,400 शत्रु सम्पत्तियों को केंद्र सरकार जब्त करने जा रही है. जब्त शत्रु सम्पत्तियों पर सरकारी काम होंगे या उन्हें नीलाम किया जाएगा. गृह मंत्रालय ने सभी शत्रु सम्पत्तियों की पहचान की प्रक्रिया लगभग पूरी कर ली है. छानबीन में 16 हजार से अधिक शत्रु सम्पत्तियों का पता चला, जिनमें 9,400 सम्पत्तियों पर अब कोई पेंच नहीं है. करीब 66 सौ अन्य सम्पत्तियों की छानबीन का काम भी प्रक्रिया में है, कुछ राज्य सरकारों के असहयोग के कारण उसमें थोड़ी देर हो रही है.

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि कानून बन जाने के कारण अब राज्य सरकारों की बाध्यता है कि इस काम को पूरा करें. जिन शत्रु सम्पत्तियों पर कब्जे का कोई कानूनी आधार नहीं है, उनकी जल्दी ही बोली लगने वाली है. यह एक लाख करोड़ से भी अधिक की सम्पत्ति है, जो सीधे सरकारी खजाने में जाएगी. पाकिस्तान पहले ही भारतीयों से जुड़ी सम्पत्तियां बेच चुका है. कानून के मुताबिक विभाजन के दौरान या उसके बाद पाकिस्तान और चीन जाकर बसने वाले लोगों की सम्पत्तियों पर उनके वारिस का अधिकार नहीं रहेगा, लिहाजा उन सम्पत्तियों को शत्रु सम्पत्ति के दायरे में रखा गया है.

शत्रु सम्पत्ति संशोधन विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा दोनों से मंजूरी मिल चुकी है. चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान या युद्ध के बाद वहां जाकर बसे लोगों और उनके उत्तराधिकारियों की भारत में छूटी सम्पत्ति को इस कानून के तहत जब्त करने का अधिकार भारत सरकार को मिल गया है. उल्लेखनीय है कि लोकसभा में बिल पारित होने के बाद यह राज्यसभा में अटक गया था. राज्यसभा ने इसे ‘सेलेक्ट कमेटी’ के पास भेज दिया था. बिल के लंबित रहने के कारण सरकार को पांच-पांच बार अध्यादेश लाना पड़ा था. ‘सेलेक्ट कमेटी’ ने बिल में कुछ संशोधनों की सिफारिश की थी.

सुधार की जो भी सिफारिशें की गई थीं, उसे विधेयक में शामिल किया गया. इस कानून में जाति या धर्म आधार नहीं है, बल्कि सिर्फ पलायन आधार है. यह केवल पाकिस्तान चले गए लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि चीन गए लोगों के संदर्भ में भी है. इस कानून के मुताबिक, भारत विभाजन के समय या 1962, 1965 और 1971 के युद्ध के बाद चीन या पाकिस्तान पलायन करके वहां की नागरिकता लेने वाले लोगों को ‘शत्रु नागरिक’ और उनकी सम्पत्ति को ‘शत्रु सम्पत्ति’ की श्रेणी में रखने का प्रावधान है और सरकार को इसे जब्त करने का अधिकार दिया गया है. सरकार को यह अधिकार भी प्राप्त है कि वह किसी शत्रु सम्पत्ति के लिए अभिरक्षक या संरक्षक (कस्टोडियन) नियुक्त कर दे.

शत्रु नागरिकों के भारत में रह रहे उत्तराधिकारियों को भी छूटी सम्पत्ति के इस्तेमाल का कोई अधिकार नहीं रहेगा. शत्रु सम्पत्ति अधिनियम पर संसद की ‘सेलेक्ट कमेटी’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी नागरिकता ग्रहण कर लेने वालों की 11,882 एकड़ में फैली कुल 9,280 अचल सम्पत्तियां भारत में हैं. ऐसी अचल सम्पत्तियों की कुल कीमत 1.04 लाख करोड़ रुपए आंकी गई है, जबकि 266 लिस्टेड कम्पनियों में 2,610 करोड़ रुपए के शेयर के रूप में भी चल सम्पत्तियां हैं. इनके अलावा चल सम्पत्ति में 318 अनलिस्टेड कम्पनियों में 24 करोड़ रुपए के शेयर, 40 लाख रुपए का सोना और गहने, 177 करोड़ रुपए का बैंक बैलेंस, सरकारी सिक्योरिटीज में 150 करोड़ रुपए का निवेश और 160 करोड़ रुपए के फिक्सड डिपॉजिट्स भी शामिल हैं.

पांच सौ और हजार के नोटों पर ग्रहण लगाने के बाद ही केंद्र सरकार ने शत्रु सम्पत्तियों के अधिग्रहण की तैयारियां शुरू कर दी थीं. नोटबंदी का आदेश जारी होने के महीने भर बाद खुफिया एजेंसियों को देशभर में मौजूद ‘शत्रु सम्पत्ति’ की ताजा स्थिति के बारे में छानबीन कर रिपोर्ट पेश करने को कहा गया था. केंद्र सरकार के पास रिपोर्ट आ जाने के बाद उन सम्पत्तियों पर काबिज लोगों से कब्जे का कानूनी आधार मांगा गया था.

इसी क्रम में केंद्रीय खुफिया एजेंसी को कई ऐसी सम्पत्तियों का भी पता चला जिन पर माफिया सरगना दाऊद इब्राहीम के गुर्गों और सगे-सम्बन्धियों का कब्जा था. इसी तरह शत्रु सम्पत्ति के नाम पर ऐसी भी तमाम सम्पत्तियां मिलीं, जिन पर दशकों से संदेहास्पद लोगों का कब्जा है. ऐसी सम्पत्तियां अब सरकार अपने कब्जे में लेकर नीलाम करेगी या सरकारी इस्तेमाल में लाएगी. इसके लिए केंद्र सरकार ने दिसम्बर (2016) में ही शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और वैधीकरण) अध्यादेश लाकर अपना कानूनी पक्ष मजबूत कर लिया था. शत्रु सम्पत्तियों पर सरकार के अधिग्रहण या उसकी नीलामी की प्रक्रिया में निचली अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं. शत्रु सम्पत्ति का पता लगाने का काम पहले से चल रहा था.

ताजा पड़ताल के बाद पाया गया कि शत्रु सम्पत्ति जितनी अब तक बताई जा रही थी, उससे कहीं अधिक है. केंद्रीय खुफिया एजेंसी के एक अधिकारी ने कहा कि कई राज्य सरकारों ने शत्रु सम्पत्ति का पता लगाने में रुचि नहीं ली. इनमें पश्चिम बंगाल सरकार अव्वल है. जबकि सभी सम्बद्ध राज्यों के जिलाधिकारियों को गृह मंत्रालय की ओर से पहले ही निर्देश भेजा गया था कि वे अपने-अपने जिले की शत्रु सम्पत्तियों पर काबिज लोगों से कब्जे का कानूनी आधार हासिल करें. जो कब्जे कानून सम्मत पाए जाएंगे उनका किराया बाजार दर और निर्धारित सरकारी शर्तों पर लागू किया जाएगा और जिन कब्जों का कोई कानूनी आधार नहीं होगा, उन्हें जब्त कर लिया जाएगा.

इसी छानबीन के क्रम में उत्तर प्रदेश में 4,991 शत्रु सम्पत्तियों का पता चला, जिनपर भांति-भांति के लोग काबिज थे, उन्हें सरकारी नोटिस दी गई थी और कब्जे का कानूनी आधार मांगा गया था. इनमें लखनऊ के हजरतगंज जैसे बेशकीमती इलाके में स्थित लारी बिल्डिंग, महमूदाबाद मेंशन, मौलवीगंज स्थित लाल कोठी, चारबाग गंगा प्रसाद रोड स्थित सिद्दीकी बिल्डिंग, गोलागंज इमामबाड़ा स्थित मलका जमानिया जैसी कुछ प्रमुख सम्पत्तियां शामिल हैं, जिस पर लोग दशकों से काबिज हैं. अधिकांश लोग किराया नहीं दे रहे थे. जो कभी-कभार किराया दे भी रहे थे, वे सब चालीस के दशक के दर पर निर्धारित सस्ती के जमाने के किराए थे. बेशकीमती इलाकों में स्थित इन शत्रु सम्पत्तियों पर काबिज लोगों को कौड़ियों का किराया जमा करने में भी तकलीफ हो रही थी.

इनमें हजरतगंज के मशहूर कपूर होटल, प्रमुख व्यवसायिक प्रतिष्ठान हलवासिया समूह, घनश्याम ऑप्टिकल्स, शर्मा एसोसिएट्स, मेसर्स ओरिएंट मोटरकार, कोहली ब्रदर्स जैसे प्रतिष्ठानों के धनपति मालिकों के नाम शामिल हैं. इनमें से कई लोगों ने तो कभी किराया दिया ही नहीं. अब इन्हें बकाये का किराया तो जमा करना ही पड़ा साथ ही यह भी बताना पड़ा कि शत्रु सम्पत्ति पर उनके कब्जे का कानूनी आधार क्या है. इस तरह की नोटिसें प्रदेशभर में दी गई थीं. इस प्रक्रिया के बाद अभी केंद्र की तरफ से वह सूची जारी नहीं हुई कि इनमें से कौन-कौन सी सम्पत्तियां जब्त कर नीलामी के लिए चढ़ाई जाने वाली हैं और किन सम्पत्तियों पर बाजार भाव से किराया लेकर उनका कब्जा जारी रखने का निर्णय लिया गया है. शत्रु सम्पत्ति के दायरे में रिहाईशी इमारतें, व्यवसायिक इमारतें, कृषि भूमि वगैरह आते हैं.

लखनऊ जिला प्रशासन का कहना है कि राजधानी स्थित शत्रु सम्पत्तियों पर काबिज 35 प्रमुख डिफॉल्टरों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. पुख्ता कानूनी आधार पाए जाने के बाद उनका सारा लंबित किराया वसूले जाने की कार्रवाई हो रही है. अगर पूरा किराया नहीं जमा हुआ तो सम्पत्ति जब्त करने की कार्रवाई की जाएगी. जिन कब्जों का कोई कानूनी आधार नहीं पाया गया उन्हें जब्त किया जा रहा है. लखनऊ जिला प्रशासन ने लखनऊ की सदर तहसील की करीब डेढ़ सौ से भी अधिक शत्रु सम्पत्तियों का भौतिक निरीक्षण कराया था और काबिज लोगों के खिलाफ नोटिस जारी की गई थी.

देशभर में सबसे ज्यादा शत्रु सम्पत्तियां उत्तर प्रदेश में हैं. लखनऊ में शत्रु सम्पत्तियों की संख्या 167 के करीब है. इसमें राजा महमूदाबाद की 40 सम्पत्तियां शामिल हैं. सबसे ज्यादा 112 सम्पत्तियां सदर में, 29 शत्रु सम्पत्तियां मलिहाबाद में, 17 मोहनलालगंज में और नौ बख्शी का तालाब तहसील क्षेत्र में हैं. लखनऊ में बटलर पैलेस, हजरतगंज में महमूदाबाद मेंशन, हलवासिया कोर्ट, लारी बिल्डिंग, गोलागंज में मलका जमानिया महमूदाबाद की हैं. सीतापुर में एसपी आवास, डीएम आवास, सीएमओ आवास और लखीमपुर-खीरी का एसपी बंगला भी शत्रु सम्पत्ति है. इसके अलावा लखनऊ का पुराना एसएसपी कार्यालय भवन, कैसरबाग हाता, अमीनाबाद की वारसी बिल्डिंग, चौक इलाके की कनीज सईदा बेगम पुरानी बाड़ी खाना कोठी, क्ले स्न्वायर स्थित हैदरी बेगम हवेली भी शत्रु सम्पत्ति में शामिल है.

शत्रु सम्पत्ति का ब्यौरा जुटाने में सेना भी लगी थी. सेना के मध्य कमान के दायरे में आने वाले सात राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और ओड़ीशा में से यूपी, एमपी और उत्तराखंड में सबसे अधिक शत्रु सम्पत्तियां हैं. सेना के मध्य कमान का मुख्यालय लखनऊ में है. यूपी में लखनऊ, फैजाबाद, बरेली, सीतापुर, कानपुर, फतेहगढ़, रामपुर, कासगंज, मुरादाबाद, मेरठ, झांसी जैसे इलाकों, उत्तराखंड में देहरादून, नैनीताल, हल्द्वानी, मसूरी और मध्य प्रदेश में भोपाल, महू, जबलपुर, इंदौर जैसे इलाकों में शत्रु सम्पत्तियों का ब्यौरा इकट्‌ठा करने में सेना खास तौर पर जुटी थी. भोपाल के नवाब की सम्पत्ति भी शत्रु सम्पत्ति के रूप में घोषित है.

गृह मंत्रालय ने इन सम्पत्तियों को कब्जे में करने का निर्देश जारी कर दिया है. भोपाल में ऐसी करीब डेढ़ सौ शत्रु सम्पत्तियों को जब्त करने की कार्रवाई प्रक्रिया में है. गृह मंत्रालय के दस्तावेज बताते हैं कि देश में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की अचल शत्रु सम्पत्ति है. करीब तीन हजार करोड़ रुपए की चल सम्पत्ति के होने का अब तक प्रमाण मिला है. शुरुआत में 2186 शत्रु सम्पत्ति का ही पता लगा था, जो अब 16 हजार से अधिक का आंकड़ा पार कर गया है.

शत्रु सम्पत्ति का पता लगाने में कई राज्यों ने केंद्र का सहयोग नहीं किया. इनमें पश्चिम बंगाल अव्वल है. उसके बाद बिहार का नम्बर था. हालांकि बिहार सरकार ने बाद में यह काम शुरू किया, लेकिन वह भी धीमी रफ्तार से. शत्रु सम्पत्ति के पांच हजार से अधिक मामले पश्चिम बंगाल सरकार की फाइल में बंद पड़े हुए हैं. शत्रु सम्पत्ति के पहले वाले आंकड़े यानि, कुल 2186 शत्रु सम्पत्तियों में से 1468 सम्पत्तियां अकेले उत्तर प्रदेश में थीं, जो बढ़ कर 4,991 हो गईं. अन्य राज्यों में मसलन, पश्चिम बंगाल में 351, दिल्ली में 66, गुजरात में 63, बिहार में 40, गोवा में 35, महाराष्ट्र में 25, केरल में 24 व शेष शत्रु सम्पत्तियां कुछ अन्य राज्यों में थीं, लेकिन छानबीन के बाद इसकी संख्या 16 हजार के पार चली गई.

अब मौजूदा आंकड़े के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 2,735 शत्रु सम्पत्तियां और देश की राजधानी दिल्ली में 487 सम्पत्तियां हैं. पाकिस्तान में जाकर बस जाने वाले लोगों की 9,280 सम्पत्तियां शत्रु सम्पत्ति के दायरे में हैं, उसी तरह चीन जाकर बस जाने वाले लोगों की 126 सम्पत्तियां शत्रु सम्पत्ति के दायरे में हैं. देश की 31 शत्रु सम्पत्तियों का इस्तेमाल केंद्रीय सुरक्षा बल कर रहे हैं. इनमें से 12 का इस्तेमाल केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ), सात का इस्तेमाल नेशनल सिक्युरिटी गार्ड (एनएसजी), छह का इस्तेमाल केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ), चार का इस्तेमाल सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) और दो शत्रु सम्पत्तियों का इस्तेमाल नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स (एनडीआरएफ) कर रहा है.

जहां तक माफिया और आतंकी सरगना दाऊद इब्राहिम की भारत में अवैध सम्पत्ति का मसला है, इसे भी शत्रु सम्पत्ति के दायरे में रखा जा रहा है. भारत में रियल इस्टेट के धंधे में कई प्रमुख और मशहूर कंपनियों में दाऊद का पैसा लगा हुआ है. केंद्रीय खुफिया एजेंसी और प्रवर्तन निदेशालय ने दाऊद इब्राहिम की ऐसी नौ विशाल सम्पत्ति का पता लगाया था, जिसे बेचने का कुचक्र चल रहा था. हालांकि दाऊद ने केंद्र के सतर्क होने के पहले अपनी कई सम्पत्तियां बेच भी डालीं. ये सम्पत्तियां मुम्बई, पुणे, मैसूर, मसूरी, लखनऊ, दिल्ली और कोलकाता शहर में हैं. उत्तराखंड के मसूरी में होटल, लखनऊ में होटल और रियल इस्टेट के साथ-साथ कई फार्म हाउस और रिज़ॉर्ट्स में भी दाऊद का धन लगा है, जिसे बाहर से सफेदपोश चला रहे हैं.

वर्ष 2015 के दिसम्बर महीने में ही सरकार ने मुम्बई के नागपाड़ा में दाऊद के एक होटल ‘दिल्ली जायका’ को जब्त कर उसे नीलाम कर दिया था. दिल्ली के सदर बाजार स्थित बेलीराम मार्केट की लगभग 200 दुकानों को लेकर भी शत्रु सम्पत्ति का विवाद चल रहा है. दिल्ली के बल्लीमारान स्थित मुस्लिम मुसाफिरखाना भी लंबे अर्से तक शत्रु सम्पत्ति विवाद में फंसा रहा था. शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और वैधीकरण) अध्यादेश के तहत भोपाल में पूर्व नवाब की अरबों रुपए की सम्पत्ति भी शत्रु सम्पत्ति में शुमार है. भोपाल नवाब परिवार की सम्पत्ति भोपाल और उसके आसपास के तीन विधानसभा क्षेत्रों में फैली है. भोपाल शहर के कई मोहल्ले नवाब की सम्पत्ति पर ही बसे हुए हैं.

देश में अकूत शत्रु सम्पत्तियां, पर राजस्व शून्य

उत्तर प्रदेश के ‘राजा’ महमूदाबाद उर्फ आमीर मोहम्मद खान की लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य जिलों और उत्तराखंड राज्य में स्थित अकूत सम्पत्ति शत्रु सम्पत्ति के रूप में घोषित है. शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और वैधीकरण) अध्यादेश के तहत शत्रु सम्पत्तियों का मालिकाना हक केंद्र सरकार को तो मिल गया, लेकिन अधिकांश सम्पत्ति अवैध कब्जे में हैं और उससे सरकारी राजस्व कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा है. यही हाल प्रदेश की अन्य सभी शत्रु सम्पत्तियों का भी है, जहां लोग कब्जा जमाए बैठे हैं और सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. महमूदाबाद (लखनऊ के नज़दीक सीतापुर जिले की तहसील का नाम है) की ऐसी सम्पत्तियों की कुल संख्या 936 है. महमूदाबाद की सम्पत्ति लखनऊ, सीतापुर और नैनीताल में है, जो शत्रु सम्पत्ति के रूप में घोषित है. लखनऊ में महमूदाबाद की सम्पत्तियों में मशहूर बटलर पैलेस, महमूदाबाद हाउस और हज़रतगंज की आलीशान दुकानें और होटल्स हैं. सीतापुर के जिलाधिकारी, एसएसपी और सीएमओ का आवास भी महमूदाबाद की सम्पत्तियों का ही हिस्सा हैं.

मोहम्मद आमिर अहमद खान भारत विभाजन के बाद ईराक में रह रहे थे. 1957 में उन्होंने भारतीय नागरिकता छोड़कर पाकिस्तानी नागरिकता ले ली. भारत ने देश छोड़कर पाकिस्तान जा बसे लोगों की सम्पत्तियां ‘भारत के रक्षा नियम (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स) 1962’ के तहत अपने संरक्षण में ले ली थीं. भारत सरकार ने यह कार्रवाई 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद की, जबकि पाकिस्तान यह काम पहले ही कर चुका था. मोहम्मद आमिर अहमद खान की 1973 में लंदन में मौत हो गई. उनके बेटे मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान ने पिता की सम्पत्ति पर उत्तराधिकार का दावा पेश किया था. लखनऊ सिविल कोर्ट ने उन्हें सम्पत्ति का वारिस माना था. मुम्बई हाईकोर्ट ने भी महमूदाबाद के पक्ष में फैसला दिया था. सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर महमूदाबाद के वारिस को सम्पत्ति का अधिकार मिल गया. 2010 में कांग्रेस सरकार शत्रु सम्पत्ति अधिनियम में संशोधन का अध्यादेश लाई और सभी सम्पत्तियों को फिर से कब्जे में ले लिया.

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि अधिकांश शत्रु सम्पत्तियों पर भू माफियाओं और संदेहास्पद तत्वों का कब्जा है. कई स्थानों पर भू माफियाओं द्वारा शत्रु सम्पत्तियां बेची जा रही हैं. लखनऊ समेत फैजाबाद, कासगंज, बरेली, रामपुर जैसे कई जिलों में ऐसे मामले सामने आए हैं. राजनीतिक छत्र-छाया वाले माफियाओं के खिलाफ प्रशासन कुछ नहीं कर पा रहा. शत्रु सम्पत्ति पर काबिज लोग सरकारी राजस्व के भी शत्रु बन गए हैं और सरकारी कर जमा नहीं कर रहे हैं. प्रदेश के राजस्व विभाग के अधिकारी ने कासगंज जिले का हवाला देते हुए बताया कि जिले में 152 शत्रु सम्पत्तियां चिन्हित की गई थीं, इन पर करोड़ों का राजस्व बकाया है.

इन शत्रु सम्पत्तियों पर अवैध कब्जा है. कासगंज तहसील के किनावा में एक, वाहिदपुर माफी में एक, ढोलना में तीन, खेड़िया में छह, रहमतपुर माफी में छह, विरहरा में एक, तालिकपुर सराय में 10, नरायनी में सात, मुबारिकपुर में चार, भिटौना में 19 और टंडोली माफी में 50 शत्रु सम्पत्तियां शिनाख्त की गईं, लेकिन इनमें से अधिकांश सम्पत्तियां अनाप-शनाप कीमत पर लोगों को बेच डाली गईं. खरीद-बिक्री भी अवैध तरीके से हुई, जिसका कोई राजस्व रिकार्ड नहीं है. अब सरकार के सामने उन सम्पत्तियों के मालिकाना हक की पहचान करने की भारी समस्या है. उसे जब्त करने और नीलाम करने के अलावा प्रशासन के पास दूसरा विकल्प नहीं है.

ऐसा ही हाल नैनीताल स्थित महमूदाबाद की सम्पत्ति का भी हुआ. नैनीताल स्थित मेट्रोपोल होटल भी शत्रु सम्पत्ति घोषित है, लेकिन अरबों की इस सम्पत्ति पर हुए कब्जे के खिलाफ नैनीताल जिला प्रशासन ने कुछ नहीं किया. मल्लीताल कोतवाली में एक प्राथमिकी दर्ज कर जिला प्रशासन मस्त हो गया. मेट्रोपोल होटल अपने जमाने में नैनीताल का सबसे बड़ा होटल हुआ करता था. 41 कमरों के इस होटल का निर्माण एक अंग्रेज मिस्टर रेंडल ने किया था. बाद में यह मोहम्मद आमिर अहमद खान महमूदाबाद की सम्पत्ति हो गई. इस पर अनेक लोगों का कब्जा रहा. 1995 तक यह होटल के रूप में चलता रहा, फिर 2010 में अदालत के आदेश पर जिला प्रशासन ने बतौर कस्टोडियन इसे कब्जे में ले लिया. जिला प्रशासन ने इस पर कब्जा तो जमा लिया, लेकिन इसकी देखरेख में कोई दिलचस्पी नहीं ली.

भूमाफियाओं ने होटल में आग लगवा दी, जिसमें बॉयलर रूम, बैडमिंटन कोर्ट और 14 कमरों वाला हिस्सा खाक हो गया. सम्पत्ति पर कब्जे के इरादे से ही यह आग लगवाई गई थी. इसमें जिला प्रशासन की संदेहास्पद भूमिका से भी इन्कार नहीं किया जा सकता. शत्रु सम्पत्ति का कानूनी संरक्षक जिला प्रशासन ही होता है, लेकिन सम्पत्तियों के नाम जोड़ने-घटाने का भी खेल प्रशासन ही करता रहता है. सामर्थ्यवान लोग शत्रु सम्पत्ति की लिस्ट से अपनी सम्पत्ति हटवाने में कामयाब हो जाते हैं. ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं.

ब्रिटेन के बैंक में फंसे हैं करोड़ों रुपए

शत्रु सम्पत्ति विवाद में प्रमुख रूप से महमूदाबाद रियासत, भोपाल नवाब, मुम्बई में मोहम्मद अली जिन्ना का घर और लंदन के एक बैंक में जमा हैदराबाद फंड का मसला शुमार है. ब्रिटेन के रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (जो पहले नेशनल वेन्समिंस्टर बैंक के नाम से जाना जाता था) में तीन सौ करोड़ रुपए से अधिक की रकम 1948 से ही जमा है. इस पर पाकिस्तान भी दावा करता रहा है, लेकिन ब्रिटेन की अदालत ने पाकिस्तानी दावे को अनुचित करार दिया है. हैदराबाद के विलय के समय तत्कालीन निजाम के वित्त मंत्री ने ब्रिटेन के नेशनल वेस्टमिंस्टर बैंक में 1,007,940 पौंड और 9 शिलिंग पाकिस्तानी उच्चायुक्त हबीब इब्राहिम रहमतल्लाह के खाते में जमा करवा दिए थे.

इसकी सूचना मिलते ही निजाम ने बैंक को वह रकम वापस उनके खाते में ट्रांसफर करने का संदेश भेजा, लेकिन बैंक ने मना कर दिया. निजाम ने अदालत की शरण ली तो पाकिस्तान ने भी दावा ठोक दिया. मामला इंग्लैंड के न्यायालय के ट्रिब्यूनल में चला गया. भारत भी दावेदार था. अदालती कार्रवाई के कारण खाता फ्रीज कर दिया गया था. भारत का कहना है कि हैदराबाद फंड हैदराबाद की जनता का पैसा है और रियासत का भारत में विलय हो जाने के बाद पूरी रकम भारत को मिलनी चाहिए.

2008 में भारत सरकार ने फंड के बंटवारे पर सहमति कायम करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन पाकिस्तान ने इन्कार कर दिया और 2013 में गुपचुप तरीके से फिर कानूनी पहल शुरू कर दी. लेकिन तब तक पाकिस्तान को हैदराबाद फंड की सुरक्षा के अधिकार से वंचित किया जा चुका था. पाकिस्तान सरकार अपने यहां सारी शत्रु सम्पत्तियां जब्त कर चुकी है, जबकि भारत में शत्रु सम्पत्तियों के मसले में भी सियासत ही होती रही है.

शत्रु सम्पत्ति कानून से घबरा गया है चीन

शत्रु सम्पतियों को जब्त करने के कानून से चीन में घबराहट है. उसे यह चिंता है कि अगर भारत के साथ युद्ध जैसी कोई बात हुई तो भारी तादाद में उसके व्यापारिक निवेश के जब्त कर लिए जाने का खतरा रहेगा. पिछले कुछ वर्षों में चीन ने भारत में काफी निवेश किया है. शाओमी और लेनेवो जैसी तमाम कंपनियां भारत में धन कमा रही हैं. इसके अलावा विप्रो, सिप्ला एसीसी, टाटा और डीसीएम ग्रुप कंपनी, बॉम्बे बुमरा ट्रेंडिंग कंपनी, बल्लारपुर इडंस्ट्रीज, डीएलएफ, हिंदुस्तान यूनिलीवर, आईटीसी, बजाज इलेक्ट्रिकल्स, इंडिया सीमेंट और आदित्य बिड़ला नुवो जैसी कंपनियों में भी चीन के शेयर हैं. चीनी नागरिकों की 149 अचल सम्पत्तियां पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और दिल्ली सरकारों के अधीन हैं.

स्वाभाविक है कि युद्ध की स्थिति में उन सम्पत्तियों को भारत सरकार द्वारा कब्जा करने की आशंका रहेगी. दोनों देशों के रिश्तों की तल्खी दुनिया जानती है. चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने लिखा भी कि अगर चीन और भारत सैन्य संघर्ष में उलझते हैं, तो भारत में कारोबार कर रही चीनी कंपनियों पर कब्जा हो सकता है. लेख में कहा गया है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सुधारों से भारत निवेश के लिहाज से आकर्षक बन गया है, लेकिन शत्रु सम्पत्ति कानून में संशोधन से चीनी निवेशकों में डर की भावना पनप रही है.

‘ग्लोबल टाइम्स’ में छपे लेख में कहा गया है, ‘अगर शत्रु सम्पत्ति कानून चीनी निवेशकों में डर पैदा करता है और खुद को निवेश का आकर्षक स्थल बनाने के भारत के प्रयासों में बाधा उत्पन्न होती है, तो दूसरी कोशिशें भी बेकार साबित होंगी. निवेशकों का भरोसा दोबारा जीतने के लिए भारत को कानूनी सुधार की जरूरत है. चीन की नागरिकता लेने वाले लोगों की भारत में छूट गई सम्पत्तियां जब्त करने की कार्रवाई को लोग चीन के खिलाफ भारत की शत्रुतापूर्ण कार्रवाई समझेंगे. इससे भारत को मिलनेवाले चीनी निवेश को नुकसान पहुंचेगा.

हाल के वर्षों में स्मार्टफोन बनाने वाली कम्पनी शाओमी और कम्प्यूटर निर्माता लेनोवो समेत कई चीनी कंपनियों ने भारत में खूब निवेश किया है. 2016 में चीन का भारत में प्रत्यक्ष निवेश पिछले साल के मुकाबले कई गुना बढ़ गया है. इस निवेश से रोजगार का संकट झेल रहे भारत के युवाओं को नौकरियां भी मिली हैं. जबकि निवेश बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि चीनी कम्पनियां जोखिमों से अवगत नहीं थीं. चीन के कुछ लोग सीमा विवाद के वक्त भी डर गए थे. भारत अगर चीनी निवेशकों की सम्पत्ति और उनके लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर उनमें फिर से भरोसा पैदा नहीं कर सका तो शत्रु सम्पत्ति कानून से निवेशकों का विश्वास हिलेगा.’

बेनामी सम्पत्तियां भी सरकार की निगाह में, जल्दी ही होंगी जब्त

बेनामी सम्पत्तियों पर केंद्र सरकार की निगाह 2015 से ही थी. सरकार ने 13 मई 2015 को लोकसभा में बेनामी ट्रांजेक्शन एक्ट पेश किया था. एक नवम्बर 2016 से देश में बेनामी सम्पत्ति निषेध कानून लागू हो गया था. इस कानून के जरिए चल-अचल सम्पत्ति से सम्बन्धित सभी खरीद-फरोख्त आधार कार्ड और पैन कार्ड से जोड़ दिए गए. साथ ही जमीन की खरीद-फरोख्त करने वालों को इसका विस्तृत ब्यौरा आयकर विभाग को देना पड़ रहा है. कानून के मुताबिक बेनामी सम्पत्ति वह है, जिसे किसी दूसरे के नाम पर लिया जाए और उसकी कीमत का भुगतान कोई और करे.

लिहाजा उन सारी सम्पत्तियों को बेनामी माना जा रहा है जो किसी फर्जी नाम से खरीदी गई और जिसके असली मालिक का पता नहीं है. इसके अलावा दूसरे नामों से बैंक खातों में किए जाने वाले फिक्स्ड डिपॉजिट्‌स भी काला धन के दायरे में आ गए. अब केंद्र सरकार को ऐसी सारी सम्पत्तियां जब्त कर लेने और बेनामी सम्पत्ति के तहत ट्रांजेक्शन करने वाले लोगों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है. बेनामी सम्पत्ति के खिलाफ कार्रवाई में आयकर विभाग ने पिछले साल 3,185 करोड़ रुपए की अघोषित आय का पता लगाया था. इसके अलावा 428 करोड़ रुपए की नकदी और गहने जब्त किए गए थे.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन
शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...
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