कश्मीर समस्या का समाधान छोटे-छोटे क़दमों में है

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kashmirवर्ष 2017 में भी भारत और पाकिस्तान संबंध सामान्य होते नहीं दिखे. दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच एक साल की मुलाकात का कोई नतीजा निकलता नहीं दिखा. रिश्तों में खटास के कारण सीमाओं पर तनाव और गोलाबारी आम हो गई है. इसका प्रतिकूल प्रभाव जम्मू-कश्मीर में दिखाई देता है, जहां हिंसा एक नियमित चीज़ बन गई है.

पूंछ सेक्टर में 15 जनवरी को नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर चार पाकिस्तानी सैनिक (भारत का कहना है सात) मारे गए थे. वो कार्रवाई उरी सेक्टर में घुसपैठ की कोशिश की जवाबी कार्रवाई के तौर पर की गई थी. उस घटना में चार घुसपैठिए मारे गए थे. ये घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में आई गिरावट को दर्शाती हैं. पिछले दिनों दोनों तरफ कम से कम आठ लोग मारे गए हैं.

कूटनीतिक तकरार के मामले में पिछले दो साल नई दिल्ली और इस्लामाबाद के लिए खराब साबित हुए हैं. रिश्तों में सुधार की उम्मीद की किरण आखिरी बार उस समय दिखाई दी थी, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने तत्कालीन समकक्ष नवाज शरीफ़ के जन्मदिन के मौके पर नवाज़ शरीफ के रायविंड स्थित निवास का दौरा किया था.

लेकिन उसके फ़ौरन बाद हुए पठानकोट एयर बेस हमले ने इसपर भी ठंडा पानी डाल दिया. उसके बाद मोदी और शरीफ दोनों को बैकफुट पर चले जाना पड़ा था. उस घटना के बाद भी आगे बढ़ने की कोशिश हुई और पठानकोट हमले की जांच के लिए इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) अधिकारियों को एयर बेस पर जाने की अनुमति दे दी गई. हालांकि यह कोशिश भी दोनों देशों के निहित अविश्वास की भेंट चढ़ गई. हमलावरों के लिए आधार के तौर पर इस्तेमाल की गई जगह की जांच के लिए अपनी टीम भेजने की भारत की मांग पर पाकिस्तान ने सहयोग नहीं किया.

मोदी के गुडविल जेस्चर को आश्चर्य के तौर पर देखा गया था, लेकिन उसके पीछे कई तरह के प्रयास थे और कई तरह की रुकावटें भी थीं. उसमें से एक थी, इस क्षेत्र के नेता के तौर पर अपनी अमिट छाप स्थापित करने की महत्वाकांक्षा. लेकिन इतिहास से यह साबित होता है कि दो देशों के बीच का मौसम किसी भी समय बदल सकता है. मोदी से पहले, नवाज शरीफ़ ने भी सेना की इच्छा के खिलाफ मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने दिल्ली जाने की हिम्मत दिखाई थी. दोनों पक्षों के बीच सभी मुद्दों पर प्रगति हुई, लेकिन जुलाई 2014 में कश्मीर बीच में आ गया. मोदी सरकार ने हुर्रियत कांफ्रेंस और भारत दौरे पर आए पाकिस्तान के विदेश सचिव की मुलाक़ात की अनुमति नहीं दी, जबकि यह परम्परा 1994 के बाद से जारी है.

भारत के साथ संबंधों के मामले में कश्मीर को अलग कर देना पाकिस्तान के लिए असंभव है. पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने 8 दिसंबर को दिल्ली में एक गोलमेज सम्मेलन में कहा भी था कि पाकिस्तान हुर्रियत को मामले से अलग नहीं रख सकता. उन्होंने कहा कि हमें अपने लोगों को बताना पड़ा कि हमने उन्हें (कश्मीरियों को) नजरअंदाज नहीं किया है और हम उनकी भावनाओं को महसूस करते हैं. पाकिस्तान में लोग बहुत नाराज़ थे. विपक्षी और अतिवादी तत्व इस धारणा को हवा दे रहे थे कि ‘हमने (कश्मीर मामले में) धोका दिया है. यदि हम कश्मीर के लोगों को प्रक्रिया में शामिल करते हैं, तो यह पाकिस्तान में हमारे लिए बचाव का काम करेगा, क्योंकि यह उन्हीं के लिए है. किसी भी अर्थपूर्ण संवाद प्रक्रिया में हुर्रियत का शामिल होना जरूरी है.’

हालांकि दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) ने अपना सम्पर्क समाप्त नहीं किया है, लेकिन 26 दिसंबर को बैंकाक में उनकी मुलाकात ने लोगों को आश्चर्यचकित भी किया. उस समय भारत और पाकिस्तान के बीच काफी तनाव था, क्योंकि एक दिन पहले ही पाकिस्तान की जेल में क़ैद कुलभूषण जाधव से उनकी मां और पत्नी ने मुलाकात की थी. अधिकारियों के मुताबिक, वो बैठक सौहार्दपूर्ण और मैत्रीपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई थी. उससे पहले दोनों एनएसए की मुलाक़ात पिछले साल मई में रूस में हुई थी. हालांकि इन अनौपचारिक मुलाकातों से बहुत कुछ हासिल नहीं किया जा सका, इसका प्रमाण नियंत्रण रेखा पर गरजती बंदूकें हैं, लेकिन फिर भी इन्हें बनाए रखना महत्वपूर्ण है.

भारत-पाकिस्तान की आपसी बातचीत की प्रक्रिया थोड़ी आगे बढ़ी है. लेकिन पुनः सख्त रुख अपनाना शांति-विरोधी ताक़तों को प्रोत्साहन देने जैसा है. जो शांति नहीं चाहते वे ऐसी स्थिति का इस्तेमाल अपने विचारों को मजबूती देने के लिए करते हैं. भारत में सत्तारूढ़ भाजपा के सामने चुनाव थे, उनमें से एक चुनाव महत्वपूर्ण राज्य गुजरात में था. यहां पाकिस्तान उनके लिए फायदेमंद बन गया और अंततः उनके पक्ष में काम किया. पाकिस्तान ने मिलिटेंसी और घुसपैठ को नियंत्रित करने के भारतीय चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त काम नहीं किया है. हालांकि इस्लामाबाद हमेशा इससे इनकार करता रहा है.

पाकिस्तान के साथ बातचीत को प्रोत्साहन देना भाजपा की नीति नहीं है. टीवी चैनल्स का एक बड़ा हिस्सा लगातार सरकार को इस दिशा में आगे बढ़ने रोकता है और देश में पाकिस्तान विरोधी भावनाओं को बढ़ाता है. यही कारण है कि शीर्ष स्तर पर संवाद का दरवाज़ा खुलना चमत्कार के जैसा है.

यह संवाद निकट भविष्य में कोई बड़ा बदलाव नहीं लाने जा रहा है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में चुनाव होने वाले हैं, इसलिए तनाव को बनाया रखा जाएगा. प्रोत्साहित करने वाली बात यह है कि कश्मीर और भारत अब पाकिस्तान में चुनाव अभियान का हिस्सा नहीं हैं. लेकिन भारत में बदलते परिदृश्य में पाकिस्तान और सर्जिकल हमलों को गुजरात और उत्तर प्रदेश के चुनाव अभियान का हिस्सा बनाया गया. इसकी प्रबल सम्भावना है कि 2018 के चुनावों में शायद कश्मीर चुनावी राजनीति में वापस आ जाए. ऐसी स्थिति में गर्मजोशी वाले संवाद के लिए 2019 का आम चुनाव खत्म होने का इंतजार करना होगा.

चूंकि पूरा मामला चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है, इसलिए 2003 से 2007 के दौरान की भव्य शांति प्रक्रिया जैसे मौकों की सम्भावन कम है. लेकिन छोटे-छोटे कदम, तनाव और जानी नुकसान को कम करने में मददगार हो सकते हैं. पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने सही कहा है कि बेहतर संबंधों के लिए यह तरीका सही है. सरन अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘हाउ इंडिया सी द वर्ल्ड’ में लिखते हैं- पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते केवल छोटे और लगातार उठाए गए क़दमों से बनाने जा सकते हैं, ना कि कोई बिग-बैंग प्रक्रिया के जरिए. वर्ष 2004 से 2006 तक सरन विदेश सचिव के रूप में इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल थे.

भले ही भारत और पाकिस्तान अपने दावों और प्रतिदावों के मुद्दे पर एक-दूसरे के साथ कुश्ती करते रहें, लेकिन उनकी वास्तविक परीक्षा यह है कि वे कश्मीर समस्या से कैसे निपटते हैं. यह मुद्दा उनके ख़राब संबंधों का सबसे बड़ा कारण रहा है और पूर्व में देखा गया है कि जब भी राजनीतिक तरीके से इस समस्या से निपटने की कोशिश की गई है तो हताहतों की संख्या में कमी आई है. नई दिल्ली यह कह सकती है कि कश्मीर में जो कुछ भी हो रहा है, वह पाकिस्तान प्रायोजित है और इस्लामाबाद का अपना पक्ष हो सकता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि जम्मू-कश्मीर वर्चस्व की लड़ाई में दो पाटों के बीच पिस रहा है.

राज्य के लोगों को इंसान की तरह नहीं, बल्कि ऐसे लोगों की तरह देखा जाता है जो ज़मीन के एक टुकड़े पर रहते हैं. कश्मीर का राजनीतिक समाधान तलाश करने की ज़िम्मेदारी दिल्ली पर है, क्योंकि प्रतिरोध इस तरफ की वास्तविकता है. पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर और गिलगिट-बल्तिस्तान के लोगों की अपनी समस्याएं हो सकती हैं, लेकिन यहां समस्या का आकर अधिक बड़ा है. जम्मू और कश्मीर में लोग मारे जा रहे हैं और यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सर्वाधिक सैन्य तैनाती वाला क्षेत्र है. यह युद्ध क्षेत्र नहीं है, जहां इतनी अधिक सैन्य तैनाती को उचित ठहराया जा सके. आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, यहां सिर्फ 300 मिलिटेंट हैं, जिनकी तलाश की जा रही है.

यहां के लोगों के दिमाग में जिंदा रखे गए इस विचार को समाप्त करना मुश्किल है. इसका समाधान करने का एकमात्र तरीका राजनीतिक है, जिसके दो पहलू हैं. पहला, नई दिल्ली-इस्लामाबाद और दूसरा, नई दिल्ली-श्रीनगर. बेशक, दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार नियुक्त किया गया है, लेकिन उनके अधिकार क्षेत्र क्या हैं, किसी को नहीं पता. फिलहाल उन्हें अधिक से अधिक केवल शिकायत निवारण प्रबंधक के रूप में देखा जा सकता है और कश्मीर एक छोटी सी शिकायत नहीं है, बल्कि एक शक्तिशाली राजनीतिक मुद्दा है, जिसे पीछे नहीं रखा जा सकता है.

-लेखक राइजिंग कश्मीर के संपादक हैं.

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