साहित्य के ‘अखाड़े’ में ‘कमज़ोर समानांतर साहित्य उत्सव’

दरअसल अगर हम पूरे आयोजन को लेकर समग्रता में विचार करें, तो यह बात समझ में आती है कि इसकी बुनियाद ही गलत रही. बीच में जिस तरह से इसके उद्देश्यों को लेकर एक पर्चा जारी किया गया था, उसमें भी प्रकरांतर से जयपुर लिट फेस्ट का विरोध ही था. एक आयोजन के खिलाफ दूसरा आयोजन करने से जो संदेश गया वो अच्छा नहीं था. अगर कोई नकारात्मक चीज हो रही थी, तो नकारात्मकता से नहीं बल्कि सकारात्मकता के साथ प्रतिरोध करना चाहिए. नहीं तो होता यह है कि आयोजन दीर्घजीवी नहीं हो पाता है. किसी भी भाषा या आयोजन का सिर्फ इस आधार पर विरोध करना उचित नहीं है कि वहां आपकी महात्वाकांक्षाओं को जगह नहीं मिलती है. शनिवार से शुरू हुए इस साहित्य महोत्सव के मंच से वक्ताओं ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को लेकर जो बातें की, उससे इस बात को बल मिलता है. प्रतिरोध के नाम पर कुंठा के सार्वजनिक इजहार से साहित्य का भला नहीं होगा.

manoharइस वक्त देश और दुनिया के साहित्यिक जगत में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को लेकर चर्चा जारी है, लेकिन हिंदी साहित्य जगत में जयपुर में ही प्रगतिशील लेखक संघ के आयोजन ‘समानांतर साहित्य उत्सव’ को लेकर भी बातें हो रही हैं, खासकर फेसबुक पर. दरअसल कुछ दिनों पहले राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ ने साहित्य में बढ़ती अपसंस्कृति के खिलाफ उन्हीं दिनों में जयपुर में लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित करने का एलान किया, जिन दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित होना था. आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ का था, इसलिए इसके अध्यक्ष ऋतुराज को इसका संयोजक बनाया गया. इस आयोजन का एलान करते हुए ऋतिराज के जो बयान अखबारों में छपे उसके मुताबिक उनका मानना था कि जयपुर लिट फेस्ट एक व्यावसायिक इवेंट बन गया है जो कि पर्यटन, होटल और प्रकाशन जगत द्वारा स्पांसर किया जाता है.

ये पर्यटन सीजन के दौरान चलनेवाला एक तमाशा है, जिसमें कथित तौर पर आए सेलिब्रिटी का दर्शक स्वागत करते हैं. उन्होंने तब ये भी कहा था कि समांतर साहित्य महोत्सव युवा लेखकों को नकली और गंभीर लेखन के फर्क को समझने की समझ को भी विकसित करेगा. तो कुल मिलाकर जिस तरह से बयान छपे या इस आयोजन से जुडे लोगों ने फेसबुक पर पोस्ट लिखा, उससे ये संदेश गया कि ये जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के विरोध में आयोजित किया जा रहा है. पत्रकार और लेखक ईश मधु तलवार को इस आयोजन का मुख्य समन्वयक और विवादित लेखक कवि कृष्ण कल्पित को फेस्टिवल का संयोजक नियुक्त किया गया. फेसबुक पर इसका जोरदार प्रचार किया जाने लगा.

फेसबुक पर इस फेस्टिवल के संयोजक कृष्ण कल्पित ने अपनी (कु) ख्याति के मुताबिक, विवादास्पद पोस्ट लिखने शुरू किए. गधों की फोटो लगाकर उसकी तुलना जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आमंत्रित लेखकों से की गई. जयपुर में सांस्कृतिक रूप से सक्रिय संदीप भूतोड़िया की पुरानी तस्वीर को लगाकर उनके बयान लिखे जाने लगे. विश्वसीनयता पर सवाल उठे, तो उस पोस्ट को डिलीट कर दिया. संयोजक को लेकर लगातार आपत्तियां आने लगीं. इस आयोजन के उद्घाटनकर्ताओं और शामिल होने वालों के नामों को लेकर संशय बना रहा. कई लोगों ने नाम होने के बावजूद आने से इंकार करना शुरू कर दिया. ज्यादातर लोगों की आपत्ति इस फेस्टिवल के संयोजक को लेकर थी, जिन्होंने पूर्व में लेखिकाओं के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक बातें की हैं.

अनामिका से लेकर गगन गिल और गीताश्री तक को. हसीनाबाद जैसी उपन्यास लिखकर चर्चा में आईं लेखिका गीताश्री ने विरोध का मोर्चा खोला और अपनी फेसबुक पर लिखा- ‘किसी भी समूह या मंडल में कृष्ण कल्पित की उपस्थिति स्त्री गरिमा के लिए संघर्षरत स्त्री लेखिकाओं के लिए भयावह स्मृतियों का एक पूरा सिलसिला उकेर देने वाली तकलीफ़ पैदा करती है और समूह या मंडल की प्रगतिशीलता पर भी बुनियादी सवाल खड़े करती है! प्रगतिशील लेखक संघ के अन्य सदस्यों के प्रति सम्मान रखती हुई भी बहनापे में विश्वास करने वाली कोई स्वाभिमानी स्त्री वहां नहीं जा पाएगी! आपने बुलाया, आभार, पर उपर्युक्त कारण से मैं वहां जा न पाऊंगी! मुझे क्षमा करें. आयोजन में मेरे परम मित्र ईश मधु तलवार जी से विशेष क्षमा कि वे समझेंगे मेरी मन:स्थिति.’

दरअसल अनामिका पर जब कृष्ण कल्पित ने विवादास्पद टिप्पणी की थी, उस वक्त गीताश्री ने अनामिका का पक्ष लिया था, तो गुस्से में कृष्ण कल्पित ने उनके खिलाफ बेहद अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था. गीताश्री ने अपने पोस्ट में प्रकरांतर से अन्य लेखिकाओं को भी ललकारा कि उनको इस आयोजन से अपने आपको अलग रखना चाहिए. आश्चर्य की बात ये रही कि लेखिकाओं का जितना समर्थन गीताश्री को मिलना चाहिए था वो नहीं मिला. अनामिका और गगन गिल को भी इस मोर्चे पर सक्रिय होना चाहिए था. उधर स्त्री अस्मिता को लेकर लगातार अपने लेखन और पोस्ट से क्रांतिवीर लेखिकाओं ने भी इस मसले पर चुप्पी साध रखी है. क्या स्त्री अस्मिता की बात भी सुविधानुसार तय होगी, ये बड़ा सवाल है.

फेसबुक पर जारी चर्चा के मुताबिक तो मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि शानदार साहित्य उत्सव में शानदार स्त्रियां ही बुलाई जाती हैं. मैत्रेयी पुष्पा को साफ करना चाहिए कि शानदार स्त्रियों से उनका तात्पर्य क्या है. किस तरह की स्त्रियों को वो इस कोष्ठक में रखती हैं. प्रगतिशील लेखक संघ के मंच से स्त्रियों के बारे में ये बात कही गई है, तो अब तो संघ से भी अपेक्षा है कि वो इस मसले पर अपना स्टैंड साफ करेंगे. ऋतुराज जैसे वरिष्ठ और संजीदा कवि से ये अपेक्षा की जा सकती है, क्योंकि प्रगतिशील लेखक संघ का पूर्व का स्टैंड स्त्रियों को लेकर ढुलमुल रहा है. सफाई तो आयोजकों को भी देनी चाहिए.

इसके बाद अशोक वाजपेयी की वहां उपस्थिति को लेकर प्रचार शुरू हो गया. जिस जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के विरोध में ये समानांतर साहित्य उत्सव का आयोजन हो रहा था. उसमें सक्रिय रहनेवाले अशोक वाजपेयी को प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा बुलाना उनके घोषित उद्देश्य से भटकना था. लेकिन केदारनाथ सिंह की तबियत खराब होने और सुरजीत पातर की उपस्थिति संदिग्ध होने की खबरों के बाद आयोजक अशोक वाजपेयी में अपने आयोजन को सफल बनाने की संभावना देखने लगे. जमकर प्रचार हुआ लेकिन आयोजन से दो दिन पहले अशोक वाजपेयी ने समानांतर साहित्य उत्सव से अपने को अलग कर लिया.

उन्होंने राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष ऋतुराज को पत्र में लिखा- ‘स्वयं लेखकों द्वारा उनके एक संगठन के माध्यम से समानांतर साहित्य उत्सव आयोजित करने की पहल का आप जानते हैं मैंने स्वागत किया था और आपके निमंत्रण पर उसमें ‘राष्ट्र, हिंसा और साहित्य’ विषय पर एक व्याख्यान देना भी स्वीकार किया था. मुझे तब पता नहीं था कि इस आयोजन का संयोजक एक ऐसा व्यक्ति है, जो विशेषतः अन्य लेखिकाओं पर घोर अभद्रता और अश्लीलता की हद तक जाकर अत्यंत आपत्तिजनक टिप्पणियां करने के लिए बदनाम है.

ऐसे व्यक्ति के संयोजक रहते और उसकी अब भी जारी अभद्रता के चलते मुझे लगता है इस समारोह में भाग लेना उस अभद्र और अश्लील कदाचार को वैध या उचित ठहराना होगा और उसके लेखिका-विरोधी कदाचरण का प्रकारांतर से साथ देना भी होगा. मेरा अंतःकरण इसकी इजाज़त नहीं देता. इसलिए मैं खेदपूर्वक इस समारोह से अपने को अलग कर रहा हूं. आपसे अनुरोध है कि वे मेरा व्याख्यान कृपया रद्द कर दें और सभी लेखक बंधुओं से मेरी ओर से क्षमा मांग लें.’ अशोक वाजपेयी के इस बयान ने समानांतर साहित्य महोत्सव का रास्ता वक्र बना दिया. कृष्ण कल्पित ने पूर्व में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की फेस्टिवल डायरेक्टर नमिता गोखले के खिलाफ बेहद अपमानित करनेवाली भाषा का इस्तेमाल किया था और ऐसे विशेषणों का उपयोग किया था जो कि उनके लेखक होने पर सवाल खड़ा करते हैं. लेखकों से ऐसी दोयम दर्जे की भाषा की अपेक्षा नहीं की जाती है.

दरअसल अगर हम पूरे आयोजन को लेकर समग्रता में विचार करें, तो यह बात समझ में आती है कि इसकी बुनियाद ही गलत रही. बीच में जिस तरह से इसके उद्देश्यों को लेकर एक पर्चा जारी किया गया था, उसमें भी प्रकरांतर से जयपुर लिट फेस्ट का विरोध ही था. एक आयोजन के खिलाफ दूसरा आयोजन करने से जो संदेश गया वो अच्छा नहीं था. अगर कोई नकारात्मक चीज हो रही थी, तो नकारात्मकता से नहीं बल्कि सकारात्मकता के साथ प्रतिरोध करना चाहिए. नहीं तो होता यह है कि आयोजन दीर्घजीवी नहीं हो पाता है. किसी भी भाषा या आयोजन का सिर्फ इस आधार पर विरोध करना उचित नहीं है कि वहां आपकी महात्वाकांक्षाओं को जगह नहीं मिलती है. शनिवार से शुरू हुए इस साहित्य महोत्सव के मंच से वक्ताओं ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को लेकर जो बातें की, उससे इस बात को बल मिलता है. प्रतिरोध के नाम पर कुंठा के सार्वजनिक इजहार से साहित्य का भला नहीं होगा. क्या समानांतर लिटरेचर फेस्टिवल के लिए ये बेहतर नहीं होता कि वो कृष्ण कल्पित को इस आयोजन से अलग करते या उनसे सार्वजनिक रूप से महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर खेद प्रकट करवाते.

ऐसा हो नहीं सका. हो तो ये भी नहीं सका कि इस आयोजन को एक गरिमा प्रदान की जाती और जयपुर साहित्य उत्सव के खिलाफ भड़ास का मंच नहीं बनने दिया जाता. सवाल यही कि रोके कौन. यहां तो प्रगतिशील लेखक संघ के साथ कुछ अन्य वामदलों से सबंधित लेखकों ने इसको समर्थन दिया. तो क्या ये माना जाए कि समानांतर साहित्य उत्सव महिलाओं को अपमानित करने का एक उपक्रम था, क्योंकि कृष्ण कल्पित के अलावा मैत्रेयी पुष्पा ने भी वहां स्त्री के खिलाफ बयान दिया. आनेवाले दिनों में इस सवाल ये सवाल प्रगतिशील लेखक संघ के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है, क्योंकि आधी आबादी को कठघरे में खड़ा करके, उसको अपमानित करनेवाली टिप्पणी कर हिंदी में बच निकलने का इतिहास रहा नहीं है.

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