धड़ल्ले से सफेद हो रहे हैं प्रतिबंधित नोट, ज़रिया बन रहे मित्र देशों के बैंक, नोटबंदी इनके लिए नहीं

नोटबंदी के बाद प्रतिबंधित नोटों के चलन पर लगाई गई सख्ती भारत सरकार का दिखावा है. पांच सौ और हजार के प्रतिबंधित नोट्स आज भी चल रहे हैं. कुछ पड़ोसी देशों के बैंक भारत के प्रतिबंधित नोट्स अब भी जमा कर रहे हैं. जिन पड़ोसी देशों से भारत का सीधा व्यापारिक सम्बन्ध है और जहां भारतीय मुद्रा का चलन है, भारत में नोटबंदी लागू होने के बाद वहां के बैंकों में पांच सौ और हजार के नोट जमा तो हुए लेकिन भारत सरकार ने उसका हिसाब-किताब नहीं लिया. सारे नोट वहीं डंप पड़े हुए हैं. पड़ोसी देशों के बैंकों ने इसका फायदा उठाया और भारत के नेताओं, व्यापारियों, माफियाओं और काले धन के जमाखोरों से मिलीभगत करके वे मनमाने रेट पर प्रतिबंधित नोट अपने यहां नामी-बेनामी खातों में जमा कर रहे हैं. इस काम में पड़ोसी देशों के स्थानीय व्यापारियों के खाते भी काम आ रहे हैं.

notebandiफैक्ट फाइल

  • पड़ोसी देशों के बैंकों में डंप हैं प्रतिबंधित नोट्स, जानबूझ कर नहीं ले रहे वापस
  • डंप नोटों का सरकार के पास कोई हिसाब नहीं, इसी बहाने काला हो रहा सफेद
  • सोचे-समझे तरीके से मुहैया कराई जा रही है, काला धन सफेद करने की सुविधा
  • सरकार, आरबीआई, नेता और धंधेबाज सब मिले हुए हैं, सबके होठ सिले हुए हैं

नोटबंदी के दरम्यान भारतीय बैंकों के भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों ने जिस तरह अनाप-शनाप तरीके से काला धन सफेद कर माल कमाया, उसी तरह पड़ोसी देशों के बैंक अधिकारी भी भारत की नोटबंदी का लाभ कमा रहे हैं. फर्क यह है कि विदेशी बैंकों पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं है, लिहाजा वे बेखौफ हैं. भारतीय रिजर्व बैंक के कुछ अधिकारी यह भी कहते हैं कि पड़ोसी देशों के बैंकों में डंप प्रतिबंधित भारतीय करंसी को नोटबंदी के सवा साल बाद भी वापस लाने में कोताही बरतना सुनियोजित लापरवाही है. ऊंची पहुंच वाले धनपशुओं को काला धन सफेद करने की यह सुविधा बड़े ही सोचे-समझे तरीके से मुहैया कराई जा रही है. भारत सरकार को यह पता ही नहीं है कि नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका, बर्मा, अफगानिस्तान, भूटान, मालदीव और थाईलैंड समेत दक्षिण एशियाई मित्र देशों के बैंकों में कितनी प्रतिबंधित भारतीय करंसी डंप पड़ी है.

भारत सरकार जब इसका हिसाब-किताब लेगी, तब तक तो यह धंधा जारी रहेगा! नोट बदली का गोरखधंधा खास तौर पर उन मित्र देशों के बैंकों में चल रहा है, जहां जाने के लिए वीज़ा लेने का नियम नहीं है. नेपाल इसमें अव्वल है. नोटबंदी के बाद प्रतिबंधित हुए पांच सौ और हजार के नोटों को मौद्रिक मुख्यधारा में चलाने का जाल इस कदर फैल चुका है कि अगर वहां डंप पड़े नोट्स भारत सरकार ने शीघ्र वापस नहीं लिए तो यह अलग प्रकार के आर्थिक असंतुलन की मुश्किलें पैदा कर देगा. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के रिसर्च एंड इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट से सम्बद्ध एक अधिकारी ने बताया कि नेपाल के ढाई दर्जन कमर्शियल बैंकों के अलावा 36 विकास बैंक, 25 वित्तीय संस्थान और करीब 50 माइक्रो क्रेडिट डेवलपमेंट बैंकों के जरिए प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा को चलाने का काम हो रहा है.

विचित्र बात यह है कि भारत सरकार ने पांच सौ और दो हजार के नए नोटों के चलन को वैध करने के लिए विदेशी मुद्रा विनिमय प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के तहत अधिसूचना तो आनन-फानन जारी कर दी, लेकिन नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका समेत दक्षिण एशियाई मित्र देशों के बैंकों में जो भारतीय मुद्रा नोटबंदी के बाद से डंप है उसे वापस लेने का कोई प्रबंधन आजतक नहीं किया. भारतीय मुद्रा की वापसी के तौर-तरीके पर दोपक्षीय सहमति कैसे बने, इसे लेकर कोई कवायद नहीं हो रही है. स्पष्ट है कि भारत सरकार यह जानबूझ कर कर रही है, ताकि खास-खास लोगों का काला धन सफेद हो सके.

भारत में नोटबंदी लागू होने के दो दिन के अंदर ही नेपाल राष्ट्र बैंक में 33,600,000 (336 लाख) रुपए जमा हो गए थे. विदेश मंत्रालय के नेपाल डेस्क के अधिकारी कहते हैं कि अब तक यह रकम हजारों करोड़ रुपए हो चुकी होगी. प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा आज भी नेपाल के बैंकों में जमा हो रही है. भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस पर चुप्पी साधे है. आरबीआई के एक अधिकारी ने इस चुप्पी या लापरवाही को भौंडा तर्क देकर ढंकने की कोशिश की और कहा कि नेपाल जाली करंसी का बड़ा जरिया बना रहा है इसलिए नेपाल के बैंकों में जमा भारतीय मुद्रा को वापस लेने के पहले नकली नोटों की पहचान जरूरी है. जबकि नेपाल राष्ट्र बैंक (एनआरबी) यह कह चुका है कि आरबीआई जो तकनीक सुझाएगा उसे वह नेपाल में आजमाने को तैयार है, जिससे नकली नोटों की पहचान हो सके और बाकी नोटों को भारतीय अथॉरिटी को औपचारिक तरीके से सुपुर्द किया जा सके.

एनआरबी ने यह भी विकल्प दिया था कि आरबीआई खुद अपने विशेषज्ञों को भेज कर नोटों की पहचान करा ले और अपनी मुद्रा वापस ले ले. लेकिन आरबीआई ने न तकनीक सुझाई और न अपनी टीम भेजी, बस चुप्पी साध ली. नेपाल की अत्यधिक निर्भरता उन नेपाली श्रमिकों पर भी है जो भारत में कमाते हैं और छुटि्‌टयों में भारतीय मुद्रा नकद लेकर नेपाल जाते हैं. यह रकम अरबों में होती है. वर्ष 2016 में यह रकम 42 अरब 36 करोड़ 35 लाख 55 हजार रुपए थी. स्वाभाविक है कि नोटबंदी के बाद इस मुद्रा में से भी पांच सौ और हजार का हिस्सा बैंकों में डंप हुआ होगा.

भूटान से नकली और फर्जी नोटों की आमद अत्यंत कम है, इसके बावजूद भूटान के बैंकों में डंप भारतीय मुद्रा अब तक वापस क्यों नहीं ली जा सकी? इस सवाल का जवाब भारत सरकार के पास नहीं है. भूटान में भारतीय मुद्रा का चलन भूटानी मुद्रा से अधिक है. लिहाजा, नोटबंदी का भूटान पर व्यापक असर पड़ा. भूटान ने पांच सौ और हजार के प्रतिबंधित नोटों को फौरन अपने बैंकों में जमा कराना शुरू कर दिया था, लेकिन भारत इन नोटों को वापस नहीं ले सका. भूटान की रॉयल मॉनिटरी अथॉरिटी का कहना है कि उसके पास तीन हजार करोड़ रुपए की भारतीय मुद्रा रिजर्व में है. इसके अलावा नोटबंदी के बाद जमा हुई भारतीय मुद्रा भी है, जिसे औपचारिक रूप से भारत सरकार को सुपुर्द करना है.

आठ नवम्बर 2016 के नोटबंदी आदेश के बाद खास तौर पर दो पड़ोसी देशों नेपाल और भूटान की बैंकिंग व्यवस्था हिल गई थी. भूटान में भारतीय मुद्रा के चलन को सरकारी तौर पर मंजूरी मिली हुई है और नेपाल में भारतीय मुद्रा का चलन पारंपरिक है. नोटबंदी के बाद भारत सरकार ने दोनों देशों को करंसी-एक्सचेंज का कोई कारगर रास्ता नहीं दिखाया. भारतीय रिजर्व बैंक और नेपाल राष्ट्र बैंक के बीच अब तक कोई औपचारिक सहमति का रास्ता नहीं निकल पाया जिससे नेपाल के बैंकों में जमा प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा का समुचित विनिमय हो सके और वह भारत लौट सके.

यही छेद काले धन को सफेद करने का जरिया बना हुआ है. नेपाल राष्ट्र बैंक और नेपाल स्थित बैंकों के अलावा वहां के वित्तीय संस्थानों और नेपाल के नागरिकों के पास भी भारतीय मुद्रा है. यह कितनी है और इसकी गिनती कैसे हो, इसका कोई मैकेनिज्म अब तक नहीं ढूंढ़ा जा सका है. भारतीय रिजर्व बैंक ने नेपाल सरकार को साढ़े चार हजार रुपए की भारतीय मुद्रा का विनिमय करने की सलाह दी थी, लेकिन नेपाल सरकार ने प्रत्येक नेपाली नागरिक को कम से कम 25 हजार रुपए भारतीय मुद्रा रखने की मंजूरी पहले से दे रखी थी. पूर्व गोरखा सैनिकों समेत लाखों लोगों के पास भारत सरकार की ओर से मिलने वाले पेंशन की राशि भारतीय मुद्रा में ही रखी थी.

नेपाल के बैंकों में डंप प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा की वापसी के लिए नेपाल राष्ट्र बैंक के फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट के प्रमुख भीष्मराज धूंगना और आरबीआई के अधिकारियों के बीच कई राउंड की बैठक हो चुकी, लेकिन सारी बैठकें बेनतीजा रहीं. नेपाल के वित्त मंत्री और भारतीय वित्त मंत्री के बीच भी बातचीत हुई लेकिन कोई ठोस रास्ता नहीं निकला. भारत के वित्त मंत्री ने एक्सचेंज सुविधा देने का वादा भी किया था, लेकिन अपने वादे पर वे कायम नहीं रहे.

उधर म्यांमार (बर्मा) के बैंकों में भी प्रतिबंधित नोटों का डंप भारत वापस लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है. आरबीआई के अधिकारी बर्मा के बैंकों में महज 18 लाख प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा पड़े होने का दावा करते हैं, जबकि जानकार बताते हैं कि बर्मा के गोल्डन पैगोडा को ही दान में मिले करोड़ों रुपए डंप पड़े हुए हैं. प्रतिबंधित भारतीय करंसी म्यांमार इकोनॉमिक बैंक और म्यांमार फॉरेन ट्रेड बैंक में जमा है. विडंबना यह है कि इन दोनों बर्मी बैंकों के कोलकाता के यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया में ‘वोस्ट्रो’ अकाउंट हैं, इसके बावजूद वह रकम भारत ट्रांसफर नहीं हो पा रही है. म्यांमार और भारत के बीच व्यापारिक सम्बन्ध हैं. म्यांमार स्थित तामू विद्युत प्रबंधन इंफाल से बिजली खरीदता है. यूबीआई के जरिए पैसे का लेनदेन होता है, लेकिन प्रतिबंधित करंसी बर्मा में डंप पड़ी हुई है. बर्मा सरकार की तरफ से लगातार इस बारे में लिखा जा रहा है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही. बांग्लादेश सरकार भी अपने बैंकों में डंप प्रतिबंधित भारतीय नोट्स भारत सरकार को वापस नहीं कर पा रही है.

बांग्लादेश के जनता बैंक, अग्रणी बैंक, रूपाली बैंक और सोनाली बैंक में भारत की प्रतिबंधित मुद्राएं डंप पड़ी हुई हैं. पहले यह कहा गया था कि सोनाली बैंक अपनी सिलिगुड़ी स्थित शाखा के जरिए भारतीय मुद्रा भेज सकता है, लेकिन वह भी विलंबित ताल में चला गया. जानकार बताते हैं कि बांग्लादेशी बैंकों के जरिए भी प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा को ‘सफेद’ करने का गोरखधंधा चालू है. पड़ोसी देशों के साथ व्यापार पर नोटबंदी का बुरा असर पड़ा है. खास तौर पर अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान, थाईलैंड और श्रीलंका के साथ. यहां के बैंकों में डंप पड़े भारतीय नोट्स के हस्तांतरण का काम अब तक नहीं होने से विदेश व्यापार प्रभावित हो रहा है. इन देशों के साथ भारत का व्यापार वर्ष 2015-16 में 2160 करोड़ डॉलर का था, जो वर्ष 2016-17 में काफी घट गया.

नोटबंदी के सवा साल बाद भी पांच सौ और हजार के प्रतिबंधित नोटों की बरामदगी जारी है. सवाल है कि इतनी सख्ती और पाबंदी के बावजूद लोग अपने पास ये नोट क्यों रख रहे हैं? इसका जवाब है कि प्रतिबंधित नोटों को सफेद करने के लिए नेपाल, बांग्लादेश व अन्य पड़ोसी देशों के बैंकों से मदद ली जा रही है. देश में जो नोट बरामद हो रहे हैं और जो नोट पड़ोसी मुल्क के बैंकों के जरिए बदले जा रहे हैं उनके ‘वजन’ में काफी फर्क है. नोटों की बरामदगी दिखावा है और अदला-बदली असलियत. यह खबर सार्वजनिक हो चुकी है कि नेपाल के जुआखानों (कैसीनो) और डांस बार के अड्‌डों पर भी भारत के प्रतिबंधित नोट्स खुलेआम चल रहे हैं. नेपाल में दो हजार से अधिक कैसीनो और डांस बार हैं. नेपाल के कैसीनो में पांच सौ के पुराने प्रतिबंधित नोट के बदले तीन सौ से चार सौ नेपाली रुपया मिलता है जबकि पांच सौ के नए नोट के बदले आठ सौ नेपाली रुपया मिलता है. नेपाल के जुआघरों और डांस-बार में पांच सौ और हजार रुपए के प्रतिबंधित नोट अधिक तादाद में ले जाने पर ही बदले जा रहे हैं.

कैसीनो से इसके बदले में ग्राहकों को टोकन मिलते हैं. जानकार कहते हैं कि जुआघरों और डांस-बार से अधिक मुफीद रास्ता बैंकों का है. नेपाल के ‘सम्पर्क’ वहां के बैंक अधिकारियों से मिलवाते हैं और ऊंचे कमीशन पर भारतीय मुद्रा जमा कर ली जाती है. नेपाल के कैसीनो व्यापारियों के बैंकों से लिंक हैं, कैसीनो व्यापारी भी प्रतिबंधित भारतीय करंसी बैंकों में जमा करा रहे हैं. भारत में प्रतिबंधित नोटों को नेपाल में किस तरह खपाया जा रहा है उसे इस आधिकारिक सूचना से भी समझा जा सकता है कि नगालैंड के गृह मंत्री नौ लाख रुपए के प्रतिबंधित नोट लेकर एक शादी समारोह में शरीक होने काठमांडू गए थे.

आप यह भी ध्यान में रखते चलें कि नेपाल के जुआखानों और डांस-बार्स पर भारतीय मूल के व्यापारियों का ही वर्चस्व है. काठमांडू में कई बड़े कैसीनो हैं, जिनमें होटल सॉलटे, होटल याक एंड येति, होटल हयात रीजेंसी और होटल संगरीला भी शामिल है. इसके अलावा काठमांडू में कुछ मिनी कैसीनो और नेपाल-भारत सीमा पर भी कई मिनी कैसीनो हैं. कैसीनो के लगभग दो तिहाई ग्राहक भारतीय ही हैं. इसी तरह मिनी कैसीनो में 95 फीसदी ग्राहक भारतीय ही आते हैं. ऐसे में प्रतिबंधित भारतीय करंसी का विनिमय कितनी आसानी से होता होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है.

प्रतिबंधित नोटों को बदलने का ‘मौका’ देने के लिए ही नेपाल सरकार और भारत सरकार के बीच मुद्रा विनिमय को लेकर होने वाली सहमति लगातार टाली जा रही है. आधिकारिक तौर पर दोनों सरकारों को यह नहीं पता है कि कितनी करंसी जमा है और किन शर्तों पर उसे वापस लिया जाना है. जब सहमति औपचारिक शक्ल लेगी तब नेपाल के बैंक जितनी करंसी लौटाएंगे, उतनी भारत सरकार को वापस लेनी होगी. तब तक काले धन के धंधेबाज बहती गंगा में हाथ धो चुके होंगे.

नेपाल के सेंटर फॉर इकोनॉमिक एंड टेक्निकल स्टडीज़ के एक्जेक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. हरिवंश झा का कहना है कि भारत सरकार के आग्रह पर नेपाल में पहले भी पांच सौ और हजार के नोट पर प्रतिबंध लगा था. जाली नोटों का चलन रोकने के लिए भारत सरकार ने नेपाल सरकार से ऐसा करने का आग्रह किया था. भारत में नोटबंदी लागू होते ही नेपाल में उन भारतीय नोटों की आमद बेतहाशा बढ़ गई जो भारत में प्रतिबंधित किए गए थे. पांच सौ के बदले चार सौ नेपाली रुपए पर भारतीय करंसी सफेद की गई. जबकि नेपाल में भारत के सौ रुपए की कीमत 160 रुपए से अधिक है, लेकिन नोटबंदी में नेपाल में भी इससे खूब कमाई की गई.

झा कहते हैं कि नेपाल में जितना प्रतिबंधित नोट जमा बताया जा रहा है वास्तविक स्थिति उससे कहीं अधिक है. नेपाल के बैंकों में भारतीय मुद्रा के 40 करोड़ रुपए पहले से डंप पड़े हुए हैं, जब वहां इन नोटों को पहले दौर में प्रतिबंधित किया गया था. नेपाल ने इसे भारत सरकार को सुपुर्द करने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उस पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई. आरबीआई के सूत्र बताते हैं कि नेपाल के बैंकों में डंप पड़े पांच सौ और हजार रुपए के प्रतिबंधित भारतीय नोटों की अदलाबदली का फार्मूला निकालने के लिए 22 फरवरी को एक उच्चस्तरीय टीम नेपाल भेजी जाने वाली थी, लेकिन वह टीम नहीं गई. नेपाल राष्ट्र बैंक भारतीय टीम की प्रतीक्षा ही करता रह गया. इससे यह सूचना पुख्ता हुई कि बचे हुए प्रतिबंधित नोटों की खेप को नेपाल में खपाने के बाद ही अब कोई आधिकारिक पहल होगी.

प्रतिबंधित नोटों की वापसी पर आरबीआई का दावा झूठा तो नहीं!

पड़ोसी देशों के बैंकों में जिस तरह भारत की प्रतिबंधित करंसी के डंप होने की सूचनाएं मिल रही हैं, उससे यह आशंका बढ़ी है कि नोटबंदी के बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने जितने नोट जमा होने का दावा किया था, वह झूठा तो नहीं था! भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने यह दावा किया था कि अवैध घोषित किए गए नोटों में 15.28 लाख करोड़ की कीमत के नोट्स वापस जमा हो चुके हैं. आरबीआई के मुताबिक जमा हुए नोट्स पांच सौ और हजार के कुल छपे नोट्स का 99 प्रतिशत हैं. फिर वे नोट्स किस प्रतिशत में शामिल होंगे जो नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, बर्मा समेत पड़ोसी देशों के बैंकों में जमा हैं, या भारत में विभिन्न छापेमारियों में बरामद हो रहे हैं? आरबीआई ने बताया था कि कुल 15 लाख 44 हजार करोड़ के पुराने नोट प्रतिबंधित किए गए थे.

इनमें से 15 लाख 28 हजार करोड़ की रकम बैंकों में लौट गई. नोटबंदी के बाद पुराने 1,000 रुपए के कुल 632.6 करोड़ नोटों में से 8.9 करोड़ नोट अब तक नहीं लौटे. यानि, हजार के डिनॉमिनेशन के 8,900 करोड़ रुपए बैंक के पास वापस नहीं पहुंचे. आरबीआई के मुताबिक नोटबंदी के बाद 1,000 रुपए के 1.4 प्रतिशत नोट छोड़कर इस डिनॉमिनेशन के बाकी सभी नोट बैंकों में वापस आ गए. आरबीआई ने यह भी दावा किया था कि वर्ष 2016-17 में 7.62 लाख नकली नोटों का पता चला. इसके पहले वर्ष 2015-16 में 6.32 लाख नकली नोट पकड़े गए थे. आरबीआई के इन दावों के बरक्स आपको यह बता दें कि नोटबंदी के बाद संसद की आकलन समिति ने आरबीआई को नए सिरे से रिपोर्ट को अद्यतन कर उसे दोबारा प्रस्तुत करने की सलाह दी थी. संसदीय समिति ने यह शिकायत की थी कि आरबीआई ने पांच सौ और हजार के नोटों का ब्यौरा नहीं दिया था और नोटबंदी के बाद के हालात पर अद्यतन जानकारियां नहीं दी थीं. आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल संसदीय समिति के सामने दो बार उपस्थित हुए थे, लेकिन दोनों बार यह नहीं बता पाए कि नोटबंदी के बाद कितने प्रतिबंधित नोट बैंकों के पास वापस आए.

भारत सरकार और रिज़र्व बैंक का रु़ख दुर्भाग्यपूर्ण है

नेपाल और अन्य पड़ोसी देशों के बैंकों में जमा प्रतिबंधित भारतीय नोटों के बारे में रिजर्व बैंक को कुछ नहीं पता. रिजर्व बैंक को यह भी नहीं पता कि काला धन सफेद करने वाला बैंक एचएसबीसी क्या बला है और लिंचेस्टाइन, पनामा गेट, पैराडाइज स्कैम जैसे महाघोटाले क्या हैं. जब आरबीआई इतनी ‘इन्नोसेंट’ है तो भारत सरकार की मासूमियत तो और भी रिकार्डतोड़ होगी. फिर भारत सरकार को क्या पता होगा कि अनाज और दूसरे सामानों से लदे ट्रकों में छुपा कर प्रतिबंधित नोट्स नेपाल भेजे जा रहे हैं.

हम आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश और बिहार को नेपाल से जोड़ने वाले विशाल सीमा-क्षेत्र से यह गोरखधंधा खूब चल रहा है. पश्चिम बंगाल से लगने वाली नेपाल सीमा के जरिए भी यह धंधा चल रहा है, लेकिन अपेक्षाकृत कम. पश्चिम बंगाल से प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा बांग्लादेश जा रही है और वहां से जाली नोट्स भारत आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल इस आवागमन का केंद्र बना हुआ है. उधर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नगालैंड से कम मात्रा में भारतीय करंसी बर्मा जा रही है. लेकिन प्रतिबंधित भारतीय मुद्रा के जाने की गति असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा से बांग्लादेश की तरफ तेज बनी हुई है. खुफिया एजेंसी के सूत्रों का कहना है कि म्यांमार के तामू और रिह बॉर्डर को मणिपुर से जोड़ने वाले मोर और मिजोरम को जोड़ने वाले जॉखथर बॉर्डर पर प्रतिबंधित भारतीय नोट्स पकड़े भी जा चुके हैं.

नेपाल, बर्मा या बांग्लादेश सीमा पर पकड़े जाने वाले प्रतिबंधित भारतीय नोट्स की तादाद कम है जबकि निकल जाने वाले नोटों की तादाद कहीं अधिक. नेपाल में जाली नोटों की बढ़त के कारण वर्ष 2011 में जब भारत सरकार ने वहां पांच सौ और हजार के नोट बैन किए थे, तभी तीन करोड़ रुपए से अधिक के भारतीय नोट जब्त किए गए थे, जबकि खातों में बाकायदा जमा किए गए प्रतिबंधित नोटों की तादाद करीब 50 करोड़ थी. यानि, पकड़ा जाना केवल दिखावा साबित हो रहा है.

अभी पिछले ही दिनों नेपाल में पांच करोड़ के भारतीय नोट के साथ 15 लोग पकड़े गए थे. पकड़े गए लोगों के कहने पर काठमांडू के कालीमाटी से 29 लाख 59 हजार के भारतीय नोट के साथ कृष्णा श्रेष्ठ और काठमांडू के बूढ़ा नीलकंठ इलाके से हरियाणा निवासी किरण वर्मा उर्फ सोनी को साढ़े 50 लाख के प्रतिबंधित भारतीय नोट्स के साथ पकड़ा गया था. लेकिन छापामारी और बरामदगी करने वाले अधिकारी ही बताते हैं कि नेपाल के विभिन्न सरकारी बैंकों के माध्यम से खपाने के लिए करोड़ों के प्रतिबंधित भारतीय नोट्स स्टॉक किए गए हैं, इसमें दो-चार करोड़ रुपए की बरामदगी कुछ भी नहीं.

अब आते हैं सबसे दिलचस्प लेकिन दुखद तथ्य की तरफ. भारतीय रिजर्व बैंक ने यह आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उसे काला धन सफेद करने का धंधा करने वाले हॉन्गकॉन्ग एंड शंघाई बैंकिंग कॉरपोरेशन (एचएसबीसी), लिंचेस्टाइन बैंक, पनामा-गेट, पैराडाइज जैसे महाघोटालों के बारे में कुछ भी नहीं पता. गैर-जिम्मेदार भारतीय रिजर्व बैंक के कारण ही देश का धन विजय माल्या या नीरव मोदी जैसे घोटालेबाज व्यापारियों और भ्रष्ट बैंक अधिकारियों के जरिए विदेश जा रहा है.

सूचना के अधिकार के तहत संजय शर्मा द्वारा पूछे गए सवाल पर आरबीआई ने कहा है कि एचएसबीसी और लिंचेस्टाइन बैंक के काले धन को सफेद करने के कारोबार की जांच के लिए क्या कार्रवाई की गई और कार्रवाई का क्या नतीजा सामने आया, इसकी उसे कोई जानकारी नहीं है. आरबीआई को यह भी नहीं पता है कि पनामा पेपर्स और पैराडाइज पेपर्स प्रकरण में कौन लोग और कौन प्रतिष्ठान लिप्त थे. देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले घोटालों और काले धन से जुड़े बड़े मामलों के बारे में आरबीआई का यह रुख वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन
शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...

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