साहित्य में गंगा-जमुनी तहज़ीब!

साहित्य में गंगा-जमुनी तहजीब के झंडाबरदारों ने इतने सालों से ये सवाल नहीं उठाया, उनकी चुप्पी भी सवालों के कठघरे में है. प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच ने कभी इस सवाल से मुठभेड़ करने की कोशिश की हो, तो उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए. प्रगतिशीलता के ध्वजवाहकों ने भी मुक्तिबोध को समग्र रूप में उर्दू में उपलब्ध करवाने का कोई जतन किया हो, तो उसको भी हिंदी के पाठकों के सामने लाना चाहिए. गंगा-जमुनी तहजीब में गंगा भी है और जमुना भी है लेकिन साहित्य में तो ऐसा प्रतीत होता है कि गंगा की धारा बगैर किसी भेदभाव के लगातार सबको समेटे आगे बढ़ रही है लेकिन जमुना का बहाव कमजोर या बाधित हो रहा है. कुछ लोग ये प्रश्न उठा सकते हैं कि भाषा में इस तरह के सवाल उठाकर एक खास किस्म की सांप्रदायिक दृष्टि प्रतिपादित की जा रही है. ऐसे लोगों को विनम्रतापूर्वक कीनिया के मशहूर लेखक गुअवा थिन्योंगों के उस कथन की याद दिलाना चाहूंगा जहां वो कहते हैं ‘भाषा का चरित्र दोहरा होता है.

lekhakजब भी हमारे देश में सौहार्द की बात होती है, दो समुदायों के बीच प्रेम की बात होती है या जब भी कभी दो समुदायों के बीच किसी भी प्रकार की टकराहट या वैमनस्यता की बात होती है, तब एक शब्द युग्म बार-बार हमारे सामने आता है- गंगा-जमुनी तहजीब. बहुत जोर-शोर से इस गंगा-जुमनी तहजीब को बचाने और उसको कायम रखने की वकालत की जाती है. कथित रूप से समाज को बांटनेवाली ताकतों को गंगा-जुमनी तहजीब के जुमले से भारत में व्याप्त बहुलतावाद के सिद्धांत की याद दिलाई जाती है. इस शब्द युग्म के हवाले से दो समुदायों के बीच समरसता को मजबूत करने की दुहाई भी दी जाती है. अब जरा हम इस गंगा-जमुनी-तहजीब की पड़ताल साहित्य के क्षेत्र में करते हैं.जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष और कथाकार असगर वजाहत ने पिछले साल अक्टूबर में एक बातचीत में कहा था, जो कि प्रकाशित भी है, कि ‘आज की समकालीन हिंदी कविता गंगा जमुनी चेतना से बहुत दूर चली गई है और उसने यूरोपीय कविता का दामन थाम लिया है. यही वजह है कि हमारे हिंदी कवियों के अनुवाद किसी एशियाई भाषा में कम या नहीं, जबकि सीधे यूरोप की भाषाओं में अधिक होते हैं और कवि इस पर गर्व करते हैं.’ असगर वजाहत आगे कहते हैं कि ‘आज के पूरे परिदृश्य को समझने के लिए इतिहास में जाने की आवश्यकता है. हम सब जानते हैं कि फारसी लिपि में लिखी खड़ी बोली कविता का प्रारंभ 12-13 वीं शताब्दी में हो चुका था और 400 साल की यात्रा तय करती हुई यह 19वीं शताब्दी में विश्व स्तर की कविता बन चुकी थी.

यह वह समय था, जब खड़ी बोली कविता के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग नहीं या बहुत कम किया जाता था. यही कारण था कि 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में अयोध्या प्रसाद खत्री ने खड़ी बोली कविता आंदोलन चलाया था. उन्होंने उस समय नागरी लिपि में खड़ी बोली हिंदी कविता की चार शैलियों का उल्लेख किया है और गंगा-जमुनी चेतना से संपन्न ‘मुंशी स्टाइल’ के अंतर्गत मीर तकी मीर और नजीर अकबराबादी की कविता को इसमें शामिल किया है. उन्होंने ‘मुंशी शैली’ को हिंदी खड़ी बोली कविता के लिए आदर्श शैली माना था.

‘मुंशी शैली’ या गंगा-जमुनी काव्य संस्कार है क्या? यह मिली-जुली उत्तर भारत की उस संस्कृति का नाम है, जो मध्य एशिया और उत्तर भारत का सांस्कृति समन्वय थी. इस परंपरा के अंतर्गत जो कविता लिखी गई, वह गंगा-जमुनी संस्कार की कविता कही जाती है. यह भावना, विचार और शैली के अदभुत संयोजन पर आधारित थी और है. आधुनिक भारत में ‘मुंशी स्टाइल’ हिंदी कविता की मुख्यधारा नहीं बन सकी. इसके कई कारण हैं. पहला कारण तो यह है कि बीसवीं शताब्दी में उर्दू-हिंदी विवाद या विभाजन शुरू हो गया था और हिंदी और उर्दू दोनों अलग होकर अपनी अलग पहचान बना रही थीं. गंगा-जमुनी संस्कार क्योंकि समन्वय की चेतना है, इसलिए उसे काफी हद तक अस्वीकार कर दिया गया था. दूसरा कारण, हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता का बढ़ना था. इस कारण भी उर्दू और हिंदी का भेद उभारा गया था और मिली-जुली संस्कृति की भावना कमजोर पड़ गई थी.’

असगर वजाहत साहब इतिहास में जाने की बात अवश्य करते हैं और इतिहास के चुनिंदा अंशों को उद्धृत भी करते हैं. लेकिन वो एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न से टकराए बिना आगे निकलते हैं और अपनी राय प्रकट कर देते हैं. वो साहित्य में गंगा-जमुनी संस्कार के छीजते जाने के लिए हिंदी उर्दू के बीच के विभाजन या हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता को जिम्मेदार ठहराते हैं. अब जरा ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में इस कथन की पुष्टि कर ली जाए. असगर वजाहत साहब जिस हिंदी उर्दू-हिंदी विभाजन की बात करते हैं उसका असर हिंदी साहित्य पर तो दिखाई नहीं देता है. उर्दू के जितने रचनाकारों का हिंदी में अनुवाद हुआ है, उसकी संख्या उनकी इस स्थापना को खारिज कर देते हैं. सालों तक हिंदी के पाठक कृश्न चंदर को हिंदी का ही लेखक मानते रहे, क्योंकि उनकी रचनाएं हिंदी में अनुदित होकर छपती थीं और उसमें अनुवादक का नाम बहुधा होता नहीं था. कृश्न चंदर हिंदी में अनूदित होकर ही बेहद लोकप्रिय हुए.

इसी तरह अगर हम देखें तो कुर्तुल एन हैदर, सअदात हसन मंटो, इकबाल, गालिब, मीर, से लेकर जौन एलिया और इंतजार हुसैन तक की ढेरों रचनाओं का हिंदी में अनुवाद हुआ और अब भी हो रहा है. हिंदी के लोगों ने बगैर किसी भेदभाव के उनको ना केवल अपनाया बल्कि रचनाकार के तौर पर उनको सर माथे पर बिठाया. एक अनुमान के मुताबिक गालिब के जितने दीवान हिंदी में प्रकाशित हैं उतने दीवान तो उर्दू में भी प्रकाशित नहीं हैं. अहमद फराज के गजलों और शायरी को लेकर हिंदी में दो खंडों में ‘असासा’ का प्रकाशन हुआ. ये फेहरिश्त बहुत लंबी है. लेकिन इसकी तुलना में अगर हम हिंदी के लेखकों की रचनाओं का उर्दू में अनुवाद ढूंढते हैं तो वो ना के बराबर मिलती हैं. क्या उर्दू ने सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय ‘बच्चन’, महादेवी वर्मा, मुक्तिबोध, अज्ञेय जैसे दिग्गज हिंदी के लेखकों को अपनाया.

क्या उनकी रचनाएं उसी अनुपात में उर्दू में अनूदित हुईं, जिस अनुपात में उर्दू के कवियों और लेखकों का अनुवाद हिंदी में हुआ. इस प्रश्न का उत्तर है- नहीं. तो फिर हम किस गंगा-जुमनी तहजीब की बात करते हैं और उसपर आसन्न खतरे को लेकर छाती कूटते हैं. उस गंगा-जमुनी तहजीब में जहां हिंदी ने तो बहुत उदारता के साथ उर्दू के लेखकों को अपनाया, उनको प्रकाशित किया लेकिन उर्दू ने वो गर्मजोशी नहीं दिखाई. क्या ये भाषाई सांप्रदायिकता नहीं है? इसपर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है. असगर वजाहत गंगा-जमुनी संस्कार को समन्वय की चेतना मानते हैं और इसी वजह से उसको काफी हद तक अस्वीकार कर देने की बात करते हैं. प्रश्न यह है कि समन्वय की चेतना को किसने बाधित किया, इसका उत्तर ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए.

इस बात पर भी विचार करने की जरूरत है कि उर्दू में हिंदी के कवियों लेखकों को लेकर उत्साह क्यों नहीं दिखाई देता है. उर्दू पाठकों का एक विशाल वर्ग है. इस विशाल पाठक वर्ग को हिंदी की रचनात्मकता से वंचित रखने का उपक्रम इतने सालों से जारी है, लेकिन इसको लेकर साहित्य के किसी कोने अंतरे में किसी प्रकार की कोई बहस हुई हो, ऐसा ज्ञात नहीं है. यह अनायास तो नहीं हो सकता है कि हिंदी के लेखकों को लेकर उर्दू में उदासीनता का भाव हो, क्योंकि अगर अनायास होता तो ये इतने लंबे कालखंड तक नहीं चलता. गंगा-जमुनी तहजीब या गंगा-जमुनी काव्य संस्कार की पौरोकारी करनेवाले लेखकों को इस असंतुलन की इतने लंबे समय तक याद क्यों नहीं आई.

उर्दू के तमाम सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों के रहनुमाओं ने ये क्यों नहीं सोचा कि उर्दू के पाठकों को दिनकर और बच्चन की रचनाएं पढ़ाई जाएं. उनका परिचय मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं से करवाया जाए. असगर वजाहत हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता के उभार की बात करते हैं, लेकिन ये साहित्य में, खासतौर पर हिंदी में, तो दिखाई नहीं देता है. हिंदी के प्रकाशकों से लेकर पाठकों तक ने उर्दू के लेखकों को खूब प्रतिष्ठा दी लेकिन उर्दू के प्रकाशकों, पाठकों और लेखकों ने हिंदी के लेखकों को लेकर किसी तरह का कोई उत्साह नहीं दिखाया. ये कैसी सांप्रदायिकता है साहब, इसपर गौर करें.

साहित्य में गंगा-जमुनी तहजीब के झंडाबरदारों ने इतने सालों से ये सवाल नहीं उठाया, उनकी चुप्पी भी सवालों के कठघरे में है. प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच ने कभी इस सवाल से मुठभेड़ करने की कोशिश की हो, तो उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए. प्रगतिशीलता के ध्वजवाहकों ने भी मुक्तिबोध को समग्र रूप में उर्दू में उपलब्ध करवाने का कोई जतन किया हो, तो उसको भी हिंदी के पाठकों के सामने लाना चाहिए. गंगा-जमुनी तहजीब में गंगा भी है और जमुना भी है लेकिन साहित्य में तो ऐसा प्रतीत होता है कि गंगा की धारा बगैर किसी भेदभाव के लगातार सबको समेटे आगे बढ़ रही है लेकिन जमुना का बहाव कमजोर या बाधित हो रहा है.

कुछ लोग ये प्रश्न उठा सकते हैं कि भाषा में इस तरह के सवाल उठाकर एक खास किस्म की सांप्रदायिक दृष्टि प्रतिपादित की जा रही है. ऐसे लोगों को विनम्रतापूर्वक कीनिया के मशहूर लेखक गुअवा थिन्योंगों के उस कथन की याद दिलाना चाहूंगा जहां वो कहते हैं ‘भाषा का चरित्र दोहरा होता है. भाषा संवाद का माध्यम तो होती ही है, साथ ही वो संस्कृति की संवाहक भी होती है.’ अगर हम भाषा की इस दोहरी भूमिका और चरित्र को मानते हैं तो गंगा-जमुनी तहजीब या गंगा-जमुनी साहित्यिक संस्कार एक स्वांग नजर आता है.