एक नए जातीय संघर्ष का संकट सामने खड़ा है

leninदेश में एक बहुत ही दुखद स्थिति पैदा की जा रही है. इसे पैदा करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता और भाजपा के रणनीतिकार राम माधव की भूमिका है. राम माधव ने लेनिन की मूर्ति तोड़े जाने को अच्छा कदम बताते हुए देश भर के अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया है कि उन सभी की मूर्तियां, जो संघ विचारधारा के नजदीक नहीं हैं, तोड़ दी जाएं. मेरी समझ से ऐसा करना आग से खेलना होगा. अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री, जो सिर्फ ‘मन की बात’ में बोलते हैं, ने मूर्ति तोड़ने की घटना के खिलाफ बयान दिया है. लेकिन भारतीय जनता पार्टी को जिस तरीके से प्रतिकिया देनी चाहिए वैसी प्रतिक्रिया नहीं दे रही है, सिर्फ खंडन कर रही है.

सोशल मीडिया पर अगर प्रधानमंत्री मोदी के ऊपर कोई छोटी टिप्पणी हो, कोई कार्टून बने तो वो व्यक्ति गिरफ्तार कर लिया जाता है. दूसरी तरफ तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता राजा ट्‌वीट कर मूर्तियां तोड़ने की वकालत करते हैं और उसके बाद पेरियार की मूर्ति तोड़ दी जाती है. लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती. भारतीय जनता पार्टी को तो उन्हें पार्टी से निकाल देना चाहिए था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा कदम न उठाकर ये संदेश दिया है कि हम सिर्फ लीपापोती कर रहे हैं. ऐसे सभी लोगों की मूर्तियां तोड़ने की घटना, जो संघ की विचारधारा के नजदीक नहीं हैं या भारतीय जनता पार्टी के नजदीक नहीं हैं, संदेह पैदा करती है.

मुझे बिहार चुनाव याद आ रहा है. बिहार चुनाव में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक प्रयोग किया था. उन्होंने आरक्षण के खिलाफ बयान दिया था. उस बयान ने भारतीय जनता पार्टी को पिछले चुनाव से भी कम सीट पर ला दिया. शायद ये बयान इसलिए था कि अगर बिहार में जीत जाएंगे तो वे आरक्षण को समाप्त करेंगे. यह भारतीय जनता पार्टी का शुरू से स्टैंड रहा है. संघ का यह स्टैंड तो है ही कि आरक्षण समाज को बांटता है और आरक्षण सबको बराबरी का हक नहीं देता. उसी तरीके से उन सारे प्रतीकों को तोड़ने की कोशिश की जा रही है. आरक्षण को लेकर भारतीय जनता पार्टी का ये आरोप है कि एक नया वर्ग बन गया है, जो एक बार आरक्षण का फायदा ले लेता है और बार-बार लेता रहता है.

इसीलिए शायद अब सारे देश में प्रतीकों की मूर्तियां तोड़कर प्रयोग किया जा रहा है कि क्या देश आरक्षण के खिलाफ या उन सारे नेताओं के खिलाफ है, जो अब तक दलित समाज या बैकवर्ड समाज का नेतृत्व करते रहे हैं. ये अलग बात है कि भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व भी पूरी तरह पिछड़ा वर्ग से है और इसे कहने में भारतीय जनता पार्टी के नेता संकोच भी नहीं करते हैं. भाजपा में परंपरागत रूप से ब्राह्‌मण समाज या अगड़े समाज का वर्चस्व शीर्ष नेतृत्व पर था.

लेकिन अब वहां पर ज्यादातर पिछड़े समाज का नेतृत्व है. दूसरी तरफ जिन लोगों ने पिछड़ों या दलितों की लड़ाई लड़ी, उनके खिलाफ अभियान चल रहा है. इसका मतलब एक नए तरीके का ध्रुवीकरण करने की कोशिश हो रही है और ये टटोलने की कोशिश हो रही है कि यह देश पिछले चार सालों में संघ की विचारधारा के कितना नजदीक आया है. ये अंदाजा लगा लिया जाए तो फिर वे अपने मुद्दे अगले लोकसभा चुनाव के लिए तय करेंगे. अब इसमें परेशानी यह है कि देश में जितने भी पिछड़े वर्ग के नेता हैं या दलित नेता हैं, वे खामोश हैं. एक हाथ में संविधान पकड़े हुए और एक हाथ हवा में उठाए हुए अंबेदकर साहब की मूर्ति देश की हर बस्ती में मिल जाएगी. जब सरकार के पास लूट, हत्या या अपहरण से जनता को बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं है, तो फिर वो हर मूर्ति को कैसे सुरक्षित प्रान करेगी.

ऐसी घटनाओं का दुष्परिणाम ये होगा कि जिस देश में हजारों साल से लोग मिलकर एक दूसरे की मदद करते थे, समाज का वो तानाबाना टूट जाएगा. हम आजादी के बाद से अगर उन नेताओं का नाम लें, जिन्होंने समाज सुधार की वकालत की, तो उनमें से 80 प्रतिशत नेता ऐसे थे, जो दलित या पिछड़े समाज से नहीं आते थे. अब स्थिति यह हो गई है कि पिछड़ों और दलितों के नेता खामोश हैं, लेकिन दलित और पिछड़ा समाज उद्वेलित है.

उन्हें लग रहा है कि मूर्तियां तोड़े जाने से उनकी अस्मिता पर कुठाराघात हो रहा है. उनकी विचारधारा का अपमान हो रहा है. उन्हें जो मिला है उसको छीनने की कोशिश हो रही है. इस भावना को शायद भारतीय जनता पार्टी या उसके नेता नहीं समझ रहे हैं. तमिलनाडु में लोग पेरियार की मूर्ति तोड़े जाने से जितने उद्वेलित हैं, उससे जुड़ी उतनी खबरें दिल्ली नहीं आ रही हैं. पिछले दो-तीन साल में देश भर में जिस तरह से दलित और पिछड़े समाज के ऊपर हमले हुए हैं, उसने लोगों को उद्वेलित कर दिया है.

दिल्ली से चलने वाले टेलीविजन चैनल और अखबार इन्हें अपनी रिपोर्टिंग का विषय नहीं मानते. उल्टे खबर को दबाने की कोशिश करते हैं. लेकिन अगर आप जिलों के अखबारों को देखें, तो पाएंगे कि 60 प्रतिशत खबरें दलित और पिछड़े समाज के लोगों के ऊपर अत्याचार की होती हैं. ये घटनाएं चूंकि जिलों में घटित हो रही हैं, इसलिए प्रदेश की राजधानी के अखबारों की सुर्खियां भी नहीं बन पाती हैं. नतीजे के तौर पर सब सोच रहे हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है. लेकिन सब ठीक-ठाक नहीं चल रहा है.

भारतीय जनता पार्टी से मेरा अनुरोध है कि वो फौरन अपने कार्यकर्ताओं को ऐसी घटनाओं को अंजाम देने से रोके. जो लोग ऐसी घटनाओं में लिप्त पाए जाते हैं, उनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए और उन्हें पार्टी से तत्काल निकाल देना चाहिए. अगर नहीं निकालेंगे तो यह संदेश जाएगा कि हम इसका समर्थन करते हैं. यह एक खतरनाक स्थिति देश में पनप रही है. इसे रोकने की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है. लेकिन राजनीतिक दलों का नेतृत्व यहां है ही नहीं. सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता सिंगापुर में घूम रहे हैं.

देश को तोड़ने का आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसका सामना करना मुश्किल है. वो सामना कोई राजनीतिक दल नहीं कर रहा है. स्वयं दलितों की सबसे बड़ी नेता मानी जाने वाली मायावती खामोश हैं. मायावती जी अगर इन मुद्दों पर कुछ करती हैं तो मेरा ख्याल है कि उसका स्वागत ही होगा. उनके समाज को संबल मिलेगा. वो शायद गोरखपुर में होने वाले उपचुनाव के परिणाम की प्रतीक्षा कर रही हैं. लेकिन तब तक देश में जमीनी स्तर पर जो प्रेम का धागा, सौहार्द का धागा जुड़ा हुआ है, वो धागा टूट जाएगा. आप इंटरनेट पर हैं, यूट्‌यूब पर हैं, आप देख सकते हैं. अमेरिका में इस समय एक सीरियल चल रहा है ‘होम लैंड’.

इसमें अमेरिका के समाज में जो घटित होता है, वही दिखाया जाता है. एक एपिसोड में ये दिखाया गया है कि देश का राष्ट्रपति बहुत ही क्रूर और असंवेदनशील बन जाता है. वहां का मीडिया राष्ट्रपति के समर्थन में वाहवाही कर रहा है. उस होम लैंड सीरियल में दिखाया गया है कि वहां पर लोग छोटे-छोटे रेडियो स्टेशन चलाते हैं, जिनके करीब एक लाख श्रोता हैं. राष्ट्रपति लोगों की बात नहीं सुनता है, प्रेस नहीं सुनता है, इसलिए लोग रेडियो से अपनी बात कहने लगते हैं. हमारे देश में भी यही स्थिति बन गई है. लोगों को लग रहा है कि सरकार उनकी बात नहीं सुन रही है.

लोग सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात कह रहे हैं. अब बहुत सारे लोगों के चैनल बन गए हैं, छोटे-छोटे अखबार शुरू हो गए हैं. स्थानीय स्तर पर लोग जो सोचते हैं, उसे होमलैंड सीरियल के जरिए एक अलग तरीके से दिखाया जा रहा है और वह लोगों तक कम्युनिकेट हो रहा है. हमारे देश में यह श्रेय सोशल मीडिया और ब्लॉग को जा रहा है. वो भी सुप्रीम कोर्ट की वजह से. वर्ना सरकार तो सोशल मीडिया को भी नियंत्रित करने की कोशिश करती रहती है. नरेन्द्र मोदी निरंकुश प्रधानमंत्री नहीं हैं, जैसा होमलैंड सीरियल में वहां के राष्ट्रपति को दिखाया गया है. जो स्थितियां यहां की हैं और जिस तरह मीडिया लोगों की भावनाओं को नजरअंदाज कर रहा है, उसके नतीजे में यहां भी लोग सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात कह रहे हैं और पढ़ रहे हैं.

मैं देश के नेताओं से, खासकर सत्तारूढ़ दल के नेताओं से ये अनुरोध करना चाहता हूं कि आप कुछ कदम उठाएं अन्यथा, अगर निचले स्तर के लोगों में वैमनस्य बढ़ा तो फिर ये एक ऐसी आग में बदल सकता है, जिस आग को नियंत्रित करना शायद सरकार के लिए मुश्किल होगा. एक चीज सरकार अच्छी तरह समझ रही है कि आर्थिक नीतियों की वजह से जो बिखराव हो रहा है और जिस तरह से लोग विकास के दायरे से दूर जा रहे हैं, वो अगर नफरत की इस आग से मिल गया तो देश एक विकट स्थिति में पहुंच जाएगा. सरकार को चाहिए कि वो उन चीजों पर फौरन ध्यान दे, जो देश में दलित और पिछड़े वर्गों की समस्याओं से लोगों का ध्यान हटाकर व्यर्थ के मुद्दों की ओर ले जाते हैं, ताकि चुनाव जीत सकें. ऐसा करना एक खतरनाक खेल हो सकता है.

आप भी अगर ब्लॉग लिखते हैं, आप भी अगर सोशल मीडिया पर कुछ करते हैं तो इस आग को रोकने के लिए जो भी कर सकते हैं करें, न कि इस आग को आगे बढ़ाएं. एक टेलीविजन चैनल ये प्रचारित करता है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति तोड़ने से क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं? वो इस मुद्दे पर बहस करता है. अब इस मीडिया हाउस का मानसिक दिवालियापन देखिए. आप सारे नेताओं का नाम नहीं ले रहे हैं. आप सिर्फ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ले रहे हैं. आप ऐसा कर के सत्तारूढ़ पार्टी के वर्कस को ये संदेश देना चाह रहे हैं कि तुम आगे ऐसा काम और करो. ऐसा नहीं होना चाहिए. इसीलिए, सोशल मीडिया में जो लोग उपस्थित हैं, उन लोगों को चाहिए कि वे इसको नियंत्रित करें. अगर नहीं नियंत्रित करेंगे तो देश के सामने एक और भयानक स्थिति आने वाली है. देश के सामने एक नए जातीय संघर्ष का संकट खड़ा है. उसे दरवाजे के अंदर जाने से रोकिए.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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