अन्ना हजारे के अनशन की अंतर्कथा

देवेंद्र फड़णवीस ने अन्ना को तैयार किया कि अन्ना की मांगों को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह एक पत्र लिखेंगे और एक ऐसा जवाब देंगे, ताकि अन्ना कह सकें कि हमारी बात सरकार ने मान ली और सरकार कह सके कि हमने उनकी एक भी बात नहीं मानी. रोजाना के कार्यक्रम के हिसाब से जब देवेंद्र फड़णवीस से बातचीत हुई, तो अन्ना ने इसपर स्वीकृति दे दी. उसके बाद देवेंद्र फड़णवीस ने जितेंद्र सिंह से कहा कि आप इस तरह का एक खत लिख दें और जितेंद्र सिंह इसके लिए तैयार हो गए.


मेरे सामने सवाल ख़डा किया गया कि मैंने 23 मार्च को रामलीला मैदान में आयोजित अन्ना हजारे के अनशन की अंतर्कथा क्यों नहीं लिखी. जिन लोगों ने यह सवाल उठाया, वो साख वाले लोग हैं और उनमें से कोई भी अन्ना का विरोधी नहीं है. सभी अन्ना के सामाजिक कार्यों के प्रशंसक हैं. इन लोगों ने मेरे समक्ष एक सवाल तो ख़डा कर दिया कि अगर मैं इस अनशन की कथा नहीं लिखता हूं, तो मैं सत्य की तलाश करने वाले पत्रकार के रूप में तो जाना जाऊंगा, लेकिन एक दाग लग जाएगा.

इसके बाद, जब मैंने अन्ना के अनशन की कहानी लिखनी शुरू की, तो मुझे पता चला कि इस बार अन्ना के साथ एक बिल्कुल नई टीम थी. इस टीम ने अन्ना हजारे की बैठकें देश में कई जगह कराई. जहां-जहां ये बैठकें हुईं, वहां-वहां भीड़ भी आई. लेकिन उनके साथियों का ये कहना था कि अगर प्रधानमंत्री पिछले तीन साल में अन्ना के खत का सिर्फ जवाब दे देते, तो शायद अन्ना हजारे 23 मार्च का अनशन नहीं करते. अब यहां सवाल पैदा होता है कि 23 मार्च का अनशन प्रधानमंत्री से रिश्ता जो़डने के लिए तो नहीं किया गया था? यह सवाल मेरा नहीं है. यह सवाल अन्ना के नजदीकी साथियों का है, जो उन्होंने मुझसे किया. इसका जवाब भी उन्होंने खुद ही दिया. उनका कहना था कि उन्हें लगता है कि यह अनशन प्रधानमंत्री मोदी से रिश्ता जो़डने के लिए ही किया गया था. जब मैंने और गहराई से प़डताल की, तो पता चला कि महाराष्ट्र सरकार के कई मंत्री लगातार अन्ना हजारे के संपर्क में थे और पिछले तीन महीने से वे लगातार अन्ना के पास जा रहे थे और बात कर रहे थे. इतना ही नहीं, अन्ना से लगातार बात करने वालों में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस भी थे. देवेंद्र फडणवीस को अन्ना अच्छा आदमी मानते हैं और फड़णवीस भी अन्ना को लगातार यह समझाते रहे कि आप किसी भी तरह अनशन वाली राजनीति में न पड़ें. लेकिन अन्ना को शायद लगा होगा कि चूंकि मैंने 23 मार्च के अनशन की घोषणा कर दी है, तो फिर मैं अनशन पर बैठूंगा ही बैठूंगा.

एक और बात मेरे सामने खुल कर आई कि उन्होंने जिन एक मंत्री, गिरीश महाजन के साथ गहरा रिश्ता जो़डा हुआ था, उन्हें अमित शाह ने चेतावनी दी थी कि किसी भी कीमत पर अन्ना को दिल्ली नहीं आने देना है और अनशन तो बिल्कुल नहीं करने देना है. अमित शाह ने गिरीश महाजन से यह भी कहा था कि अन्ना ने अगर अनशन किया, तो उन्हें मंत्रिमंडल से निकालने का आदेश दे देंगे. यह इतनी ब़डी धमकी थी, जिसने इन मंत्री महोदय की स्थिति खराब कर दी. देवेंद्र फड़णवीस को भी लगा कि अगर दिल्ली में अन्ना का अनशन हुआ और ज्यादा भी़ड आ गई, तो उनकी भी कुर्सी जा सकती है. जब अन्ना दिल्ली आए, तो कम भी़ड थी. पहले दिन पांच हजार लोग थे और फिर भी़ड घटती गई. यह संख्या तीन हजार, दो हजार तक आ गई. लोगों की कम संख्या ने अन्ना के मन को भी थो़डा हिलाया होगा. अन्ना का स्वभाव भी है कि जहां भीड़ होती है, वहां तो वे अन्ना हजारे होते हैं, लेकिन जहां भीड़ नहीं होती है, वहां वे फौरन सामाजिक क्रांतिकारी नेता से राजनेता बन जाते हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि अन्ना के दिल्ली आने से पहले मंत्री महोदय (गिरीश महाजन) रालेगण सिद्धि में बैठे रहे और जब अन्ना दिल्ली आए, तो मंत्री महोदय 21 मार्च से लगातार दिल्ली स्थित महाराष्ट्र सदन में विराजमान रहे. इस दौरान वे लगातार देवेंद्र फडणवीस से बात करते रहे. 23 मार्च को जब अन्ना का अनशन शुरू हुआ, तब से लेकर 26 मार्च तक हर रात ये मंत्री महोदय अन्ना के कैंप में जाते थे और अन्ना की बात देवेंद्र फड़णवीस से कराते थे. कई तरह के फॉर्मूले बनाए गए. मसलन, केंद्र का कोई मंत्री आए और अन्ना की मांगों पर आश्वासन देने वाला कोई खत उन्हें सौंपे कि सरकार इन मांगों पर विचार करेगी या मानेगी और फिर अन्ना अनशन तो़ड दें. शायद अन्ना और उनके साथियों के मन में शुरू से यह बात थी कि प्रधानमंत्री मोदी स्वयं आएंगे और उनका अनशन त़ुडवाएंगे. लेकिन अन्ना और उनके साथी प्रधानमंत्री के मनोविज्ञान से अपरिचित हैं. प्रधानमंत्री मोदी किसी भी ऐसे व्यक्ति को भाव नहीं देते हैं, जो उनकी तरफ आंख उठा कर अपनी मांग रखता है.

देवेंद्र फड़णवीस ने अन्ना को तैयार किया कि अन्ना की मांगों को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह एक पत्र लिखेंगे और एक ऐसा जवाब देंगे, ताकि अन्ना कह सकें कि हमारी बात सरकार ने मान ली और सरकार कह सके कि हमने उनकी एक भी बात नहीं मानी. रोजाना के कार्यक्रम के हिसाब से जब देवेंद्र फड़णवीस से बातचीत हुई, तो अन्ना ने इसपर स्वीकृति दे दी. उसके बाद देवेंद्र फड़णवीस ने जितेंद्र सिंह से कहा कि आप इस तरह का एक खत लिख दें और जितेंद्र सिंह इसके लिए तैयार हो गए.

यहीं से अन्ना के खिलाफ उनके समर्थकों का गुस्सा शुरू हुआ. अन्ना के साथ 25-30 सालों से जुड़े हुए कार्यकर्ता, जो इस अनशन स्थल पर थे, उन्होंने सोचा कि हम मीडिया को अपनी असहमति और अपना गुस्सा बताएं, लेकिन फिर उन्हें लगा कि इतने सालों का पुराना सम्बन्ध है, हम अपना गुस्सा जाहिर करेंगे, तो इससे अन्ना के व्यक्तित्व पर छींटे पड़ेंगे. इसलिए उन्होंने अपना मुंह बंद रखना ज्यादा अच्छा समझा. अन्ना के अनशन में कुछ ही किसान संगठन आए थे. किसानों ने भी पहले से मान लिया था कि यह अनशन उनको कोई फायदा नहीं देने वाला है, बल्कि यहां उनकी साख का इस्तेमाल किया जाएगा. इसलिए किसान ज्यादा संख्या में नहीं आए. लेकिन जो थोड़े-बहुत किसान पंजाब से आए थे या किसान संगठनों के जो कार्यकर्ता वहां पर थे, उनमें बहुत रोष उत्पन्न हो गया. सबसे चौंकाने वाली खबर यह है कि किसानों ने अन्ना से सवाल किया कि आप यह जो पत्र लेकर अनशन तोड़ रहे हैं, इसमें किसानों के लिए क्या मांग है और किसानों को इसका क्या फायदा मिलने वाला है. आपने किसानों का इतना नाम लिया, भविष्य में किसान आंदोलन को लेकर किसानों के मन में शंका उत्पन्न हो जाएगी. अन्ना हजारे किसान संगठनों की इस मांग से तुनक गए और गुस्सा हो गए. उन्होंने कहा कि आपको अगर अपनी मांगे रखनी हैं, तो आप मेरी जगह यहां अनशन पर बैठ जाइए, मैं खत्म कर रहा हूं. आप यहां अनशन को शुरू रखिए, मैं पानी पीकर रालेगण चला जाता हूं. ये अन्ना के समर्थकों के लिए एक बड़ा झटका था. उनके मन में बनी अन्ना की तस्वीर चूर-चूर हो गई. अन्ना हजारे ने वही किया. उन्होंने अपने किसी साथी से राय नहीं ली, किसी साथी से मशविरा नहीं किया. उन्होंने देवेंद्र फड़णवीस से कह दिया कि आप खुद आ जाइए चिट्‌ठी लेकर और मैं अनशन तोड़ दूंगा.

वही हुआ, देवेंद्र फड़णवीस आए. उन्होंने अन्ना का अनशन तुड़वाया. उन्हें एक खत दिया, जो जलेबी की तरह टेढ़ा था. इस खत को लेकर अन्ना और उनके कुछ साथियों ने कहा कि हमारी जीत हो गई. अब देश की सारी समस्याएं अगले कुछ सालों में ठीक हो जाएंगी. सरकार खुश हो गई कि हमने अन्ना का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर लिया.

इसके बाद महाराष्ट्र के सारे अखबार और समाज सेवक अन्ना के खिलाफ हो गए. सारे अखबारों ने अन्ना के खिलाफ सम्पादकीय और लेख लिखे. लोगों ने यह कहा कि हम शुरू से अंदाजा लगा रहे थे कि अन्ना का प्रेम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ है और वही इस अनशन में दिखाई दिया. अन्ना ने जब पिछला अनशन तोड़ा था, जिसमें उनके साथ अरविंद केजरीवाल थे, उस समय उन्होंने एक गलती की थी. वे अनशन समाप्त करके सीधे रालेगण सिद्धि चले गए. अगर वे उसके बाद देश में घूमते तो उन लोगों को सहारा मिलता, जिन्होंने उनके साथ एक महीने तक धरना और प्रदर्शन किया था. देशभर में एक नई आशा जगी थी. अन्ना ने उस समय जिस तरह सभी लोगों को अकेला छोड़ा था, उसी तरह इस बार भी सभी को अकेला छोड़ा और वापस रालेगण सिद्धि चले गए. सारे किसान संगठनों के लोग नाराज हुए. वहां लगभग नारे लगने की स्थिति उत्पन्न हो गई. मजेदार बात यह है कि अन्ना और उनके साथी आपस में बात करते थे कि हम पिछली बार जब यहां अनशन कर रहे थे तो कितने कैमरे लगे थे और इस बार कैमरे नहीं लगे. अन्ना शायद यह मानते थे कि कैमरे लगेंगे, प्रसारण होगा और लोग आएंगे. उसमें कहीं पर भी ये चर्चा नहीं होती थी कि अनशन के लिए तर्क और साख कैसे बनती है. अन्ना हजारे ने महात्मा गांधी के अनशन के इतिहास को शायद नहीं पढ़ा. यतिन्द्रनाथ दास ने भगत सिंह के साथ जेल में अनशन किया था और अनशन के दौरान जेल में ही उनकी शहादत हो गई. दर्शन सिंह फेरूमान अकाली दल के नेता था. उन्होंने अनशन किया था, जिसमें उनकी मृत्यु हो गई. अन्ना यह नहीं समझ पाए कि अनशन मजाक नहीं है. अनशन को मजाक में राजनीतिक दलों के लोग लेते हैं. लेकिन जब आप समाज के लिए, देश के लिए और उन लोगों के लिए अनशन करने की घोषणा करते हैं, जिन्होंने आपको अपने दुखों को दूर करने वाले मसीहा के रूप में देखा है, तो फिर वो अनशन जब तक अपने अंतिम परिणाम तक नहीं पहुंचता, तब तक उसे समाप्त नहीं करना चाहिए. अंतिम परिणाम दो ही होते हैं, या तो जिस स्थिति के खिलाफ अनशन किया गया है, वो स्थिति सुधरे या फिर अनशन में शहादत हो जाय. अफसोस की बात यह है कि जिस तरह राजनीतिक दलों ने अनशन का मजाक बना दिया, अन्ना ने भी लगभग वैसा ही किया. यही उनके साथियों का दुख है, जो उनके साथ अनशन पर बैठे थे. कुछ लोगों का उद्देश्य था कि उनका सारे देश में नाम हो जाए और वे देश में नए नेता के रूप में उभरें, जैसे अरविंद केजरीवाल उभरे थे. उनकी भी आशाएं टूट गईं. उन्हें किसी ने पहचाना ही नहीं. दूसरी तरफ, किसान संगठनों के लोग सर पीटते हुए बाहर आए कि शायद अब निकट भविष्य में कोई भी आंदोलन के ऊपर विश्वास नहीं करेगा.

एक और अहम जानकारी मुझे मिली कि जब अन्ना से उनके करीबी सहयोगियों ने पूछा कि आप अनशन ख़त्म करने के लिए क्यों मान रहे हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि 2019 में अभी कांग्रेस सत्ता में नहीं आने वाली है. नरेन्द्र मोदी ही सत्ता में आएंगे. इसलिए मोदी से रिश्ता रखना चाहिए, तभी ये सब मांगे मनवाने में सहूलियत रहेगी. इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि शायद रालेगण सिद्धि के लिए ग्रामीण विकास के नाम पर कुछ सौ करोड़ रुपए मिल जाएं. जनलोकपाल से ग्राम विकास का यह सफ़र अन्ना के आन्दोलन का शुभ परिणाम माना जा सकता है.

व्यवस्था में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए अन्ना हजारे का यह अनशन एक प्रहार के रूप में सामने आया. दूसरी तरफ, उन्हें इसका फायदा मिला, जो देश में अत्याचार और शोषण कर रहे हैं. चाहे वो किसी भी पार्टी के हों. निकट भविष्य में कोई भी दिल्ली में आंदोलन या अनशन जैसी बात करने की सोचेगा भी नहीं. इसमें किसकी सफलता किसकी असफलता है, इसे आंकना कोई बहुत बड़ा अनसुलझा रहस्य नहीं है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.