पर्वत को मैदान मत बनाओ

गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन भाजपा सरकार को 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले मुश्किलों में डाल सकता है. उत्तराखंड के लोगों का कहना है कि राजधानी के मसले को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पिछले 17 वर्षों से पहाड़ के लोगों को धोखा देते आए हैं. इसके लिए अकेले भाजपा ही जिम्मेदार नहीं है. 2017 के चुनाव में भाजपा को मिले जनादेश में राजधानी निर्धारण की मांग शामिल थी.

Gairsainगैरसैण को उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बनाने की मांग इस बार पूरी गति से पर्वत प्रदेश में गूंज रही है. मौजूदा राजधानी देहरादून समेत प्रदेश के कई इलाकों में धरना प्रदर्शन हो रहे हैं. अस्थायी राजधानी गैरसैण में विधानसभा का बजट सत्र शुरू होते ही, सदन से लेकर सड़क तक गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने मांग उठने लगी. राज्यपाल के अभिभाषण में गैरसैण को प्राथमिकता दी गई. गैरसैण के भराड़ीसैण में मिनी सचिवालय के निर्माण के लिए 67.50 एकड़ भूमि दिए जाने का भी जिक्र किया गया. लेकिन गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग पर विपक्ष अड़ा हुआ है. विधायकों ने सदन के अंदर, तो विभिन्न विपक्षी दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सड़क पर प्रदर्शन किया और धरना दिया. धरना प्रदर्शन में महिलाओं की भागीदारी खास तौर पर रेखांकित करने लायक है. सत्ता गलियारे के जानकारों का कहना है कि भारी जन-दबाव के कारण ही सरकार ने गैरसैण में एक हफ्ते का विधानसभा सत्र आहूत किया. इससे पहले कभी भी बजट सत्र गैरसैण में नहीं आयोजित हुआ.

गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन भाजपा सरकार को 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले मुश्किलों में डाल सकता है. उत्तराखंड के लोगों का कहना है कि राजधानी के मसले को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पिछले 17 वर्षों से पहाड़ के लोगों को धोखा देते आए हैं. इसके लिए अकेले भाजपा ही जिम्मेदार नहीं है. 2017 के चुनाव में भाजपा को मिले जनादेश में राजधानी निर्धारण की मांग शामिल थी. लिहाजा, पहाड़ के लोगों को भाजपा सरकार से उम्मीद है. गैरसैण में पहली बार विधानसभा के बजट सत्र आयोजित किए जाने से लोगों की यह उम्मीद और बढ़ी है. पिछले साल विधानसभा के शीतकालीन सत्र का भी आयोजन गैरसैण में किया गया था, लेकिन सात दिनों का सत्र महज डेढ़ दिन में निपटा दिया गया.

गौरवशाली है गैरसैण का अतीत

याद करते चलें कि नौ नवम्बर 2000 को उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया था. इन 17-18 वर्षों के दरम्यान इस पर्वतीय प्रदेश की स्थायी राजधानी नहीं बन पाई. गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने के मसले पर भाजपा में ही अंतरविरोध है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्‌ट गैरसैण को राजधानी बनाने के हिमायती हैं, तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत विरोधी. रावत ने अभी हाल ही दिल्ली में कहा था कि गैरसैण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी के तौर पर विकसित किया जाएगा. गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग पहाड़ के लोगों की भावनाओं और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है. अंग्रेज शासनकाल में रॉयल गढ़वाल राइफल्स के जवान चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व वाली टुकड़ी ने पेशावर में पठानों पर गोली चलाने का अग्रेजों का आदेश ठुकरा दिया था. पहाड़ के लोग 23 अप्रैल 1930 का वह दिन भूलते नहीं, जब हवलदार चंद्र सिंह गढ़वाली ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का ऐलान करते हुए एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी थी. इतिहास में यह घटना ‘पेशावर कांड’ के नाम से दर्ज है.

उसी जांबाज फौजी के कारण गैरसैण को चंद्रनगर भी कहा जाता है. इसी ऐतिहासिकता के कारण पहाड़ के लोग गढ़वाल और कुमाऊं की सीमा पर बसे गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने की मांग कर रहे हैं. उत्तराखंड आंदोलन के दरम्यान गैरसैण को ही राजधानी के रूप में देखा जाता था. उत्तराखंड क्रांति दल ने 25 जुलाई 1992 को गैरसैण को पहाड़ की राजधानी घोषित किया था और शहर का नाम चंद्रनगर रखते हुए राजधानी का शिलान्यास भी कर दिया था. इसके पहले 1990 में कौशिक समिति ने भी गैरसैण को राजधानी बनाए जाने की सिफारिश की थी.

लेकिन वर्ष 2000 में जिस ‘उत्तर प्रदेश राज्य पुनर्गठन विधेयक’ के जरिए उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, उसमें राजधानी के सवाल पर चर्चा ही नहीं की गई. लिहाजा, प्रदेश की पहली सरकार ने राजधानी के निर्धारण के लिए दीक्षित आयोग का गठन कर दिया. ढीले-ढाले दीक्षित आयोग ने अत्यधिक समय बर्बाद करने के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी, वह भी लटकी रह गई. वैसे इस एक सदस्यीय आयोग ने गैरसैण को राजधानी बनाए जाने की सिफारिश नहीं की और कहा कि राजधानी के लिए देहरादून सबसे सही जगह है. आयोग के अध्यक्ष वीरेंद्र दीक्षित ने वर्ष 2008 में पेश की अपनी रिपोर्ट में गैरसैण को राजधानी बनाने के प्रस्ताव को खारिज करते हुए वहां विषम भौगोलिक स्थिति, भूकम्पीय संभावनाएं और अन्य बाधाओं का हवाला देकर कहा था कि गैरसैण स्थायी राजधानी के लिए सही स्थान नहीं है.

आयोग ने रामनगर और ऋषिकेश को भी राजधानी के लिए अनुपयुक्त करार दिया था. आयोग ने तो इतना तक कहा था कि राजधानी के लिए देहरादून के बाद दूसरा सबसे उपयुक्त क्षेत्र ऊधम सिंह नगर का काशीपुर शहर है. दीक्षित आयोग का गठन 2001 में भाजपा सरकार ने किया था, लेकिन उसका कार्यकाल कांग्रेस सरकार ने बढ़ाया. विचित्र विडंबना यह है कि अपने गठन के बाद के 17 वर्षों में प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों ने सरकार चलाई और उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) इन दोनों पार्टियों की सरकार में शामिल रहा, लेकिन राजधानी कहां हो, इसे तय नहीं किया. आज कांग्रेस और उक्रांद राजधानी के सवाल पर आंदोलन की राजनीति कर रहे हैं. पर्वतीय प्रदेश की पीड़ा यह भी है कि पर्वतीय क्षेत्र के पास 46,035 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र होने के बावजूद जनसंख्या अत्यंत कम और मात्र 7,448 वर्ग किलोमीटर के तीन मैदानी जिलों में जनसंख्या पहाड़ी क्षेत्र से कहीं अधिक है.

जनसंख्या का यह असंतुलन पर्वतीय प्रदेश को असंतुलित कर रहा है, इसलिए वे राजधानी को पर्वतीय क्षेत्र के केंद्र में ले जाना चाहते हैं. गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग पर बाबा मोहन उत्तराखंडी की 38 दिनों की भूख हड़ताल वर्ष 2004 में उनकी जान ले चुकी है. गैरसैण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन तय करने के लिए 11 फरवरी को श्रीनगर में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था. इसी सम्मलेन में यह तय हुआ था कि 20 मार्च से गैरसैण में होने वाले बजट सत्र के दौरान आंदोलन को प्रखरता से सामने लाया जाए. इस मांग को लेकर पिछले कई महीनों से अनशन और भूख हड़ताल का क्रम जारी है.

2019 के लिए बनेगा बड़ा मुद्दा

पर्वतीय क्षेत्र में जनसंख्या कम होते जाने की मुख्य वजह वहां से होने वाला पलायन है. पर्वतीय क्षेत्र का समुचित विकास नहीं होने के कारण और बार-बार की आपदा और स्वास्थ्य एवं संचार की सुविधा नहीं होने की वजह से लोगों ने बड़ी संख्या में अपने गांव छोड़ दिए. अधिकतर घरों में अब ताले लगे हैं. उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों का तानाबाना टूटा है और सुरक्षा और आपदा के दृष्टिकोण से भी गांव के गांव निर्जन हो रहे हैं.

आम लोगों के साथ-साथ सम्पन्न लोग और राजनीति करने वाली अवसरवादी जमात भी देहरादून या तराई क्षेत्र में केंद्रित होती गई. पर्वतीय प्रदेश उत्तराखंड राज्य का आधार शहर और मैदानी क्षेत्रों में केंद्रित होता गया. स्थिति यह है कि विधायक और दूसरे जनप्रतिनिधि अपना क्षेत्र छोड़ कर देहरादून में ही अड्‌डा बना कर रहने लगे. पहाड़ और गांव से उनके सरोकार करीब-करीब खत्म हो गए. इसे देखते हुए ही पहाड़ के लोगों को यह लग रहा है कि देहरादून को राजधानी बनाकर उत्तराखंड राज्य सुदृढ़ और विकसित नहीं हो सकता. उनका सवाल है कि पहाड़ के नाम पर उत्तर प्रदेश से अलग होकर राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड का औचित्य क्या है? अगर उत्तराखंड को भी मैदानी ही बनना है, तो वह उत्तर प्रदेश के साथ ही ठीक था. पहाड़ के लोग यह मानते हैं कि देहरादून राजधानी के रूप में कई विसंगतियां लेकर आया है. राज्य में खनन बेतहाशा बढ़ता गया.

उर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा और ढांचागत विकास बिल्कुल चरमरा गया. राज्य गति नहीं पकड़ सका. ऐसे में उत्तराखंड के पहाड़ में राजधानी बने तो हालात संभल सकते हैं. इस उम्मीद के साथ ही गैरसैण को राजधानी बनाने का आंदोलन तेजी से बढ़ रहा है. प्रदेशभर में जन यात्राएं हो रही हैं. शहरों में भी पर्चे बंट रहे हैं. गैरसैण की चर्चा केवल प्रदेश तक नहीं, बल्कि लखनऊ, दिल्ली और मुंबई तक तेजी से फैल रही है. मुंबई, दिल्ली और लखनऊ जैसे शहरों में भी गैरसैण को राजधानी बनाने के लिए यात्राएं निकाली जा रही हैं. पहाड़ की राजनीति पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ यह मानते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले उत्तराखंड की राजधानी के निर्धारण का मसला तय हो सकता है.

दीक्षित आयोग ने धोखे में रखा पहाड़ के लोगों को

उत्तराखंड की राजधानी तय करने के लिए बने दीक्षित आयोग ने उत्तराखंड के लोगों के साथ धोखा किया और विभिन्न सरकारों ने इस धोखेबाजी में साथ दिया. दीक्षित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में आंकड़ों के फेरबदल और तथ्यों में उलटफेर का सहारा लिया और उत्तराखंड के लोगों के साथ फरेब किया. वर्ष 2000 में बने आयोग ने 2008 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, लेकिन उसे वर्ष 2009 में सदन में रखा गया. उसमें भी सरकार ने रिपोर्ट के कुछ हिस्से सदन में नहीं रखे. इसे लेकर आज तक भ्रम की स्थिति बनी है. दीक्षित आयोग की रिपोर्ट भ्रामक आंकड़ों, तथ्यों और पक्षपातपूर्ण रवैये से भरी पड़ी है.

दीक्षित आयोग की रिपोर्ट पहले चरण से ही यह स्थापित करती दिखती है कि राजधानी के लिए देहरादून जैसा दूसरा कोई मुफीद शहर है ही नहीं. भौगोलिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त दीक्षित आयोग राजधानी के लिए केवल तराई और मैदानी क्षेत्र की वकालत करता है. आयोग कहता है कि पहाड़ में राजधानी बनाए जाने से पारिस्थितिकी (पर्यावरण संतुलन) के लिए खतरा पैदा हो जाएगा. दूसरे चरण के अंत में रिपोर्ट इस नतीजे पर पहुंचती है कि देहरादून खासकर सौंग नदी के किनारे वाला क्षेत्र निर्विवादित रूप से राजधानी के लिए सबसे उपयुक्त जगह है.

दूसरे विकल्प के रूप में काशीपुर को भी आयोग ने पूरे मन से हरी झंडी दिखाई. पहाड़ी क्षेत्र के अन्य विकल्पों को भी दीक्षित आयोग ने बेसाख्ता खारिज कर दिया. तीसरे चरण की रिपोर्ट में दीक्षित आयोग ने केवल देहरादून की प्रशंसा में ही अपनी ऊर्जा और सरकारी धन व्यय किया और गैरसैण, ऋषिकेश, रामनगर और कालागढ़ के विकल्प को खारिज कर दिया. 195 पेज की दीक्षित आयोग की रिपोर्ट कौशिक समिति की सिफारिशों को भी खारिज करती है और आंकड़ों का ऐसा पोस्टर बनाती है, जिस पर देहरादून की एकतरफा सिफारिश और गैरसैण की एकतरफा अस्वीकृति बदसूरती के साथ दिखती है. इस पूर्वाग्रही रिपोर्ट में तथ्यों के भी भौंडे विरोधाभास उजागर हुए, जिस पर राजनीतिक दल चुप्पी साध गए. दीक्षित आयोग ने झूठे आंकड़े देकर यह दिखाने की कोशिश की कि गैरसैण में राजधानी बनने की संभावना नहीं है.

लोगों ने यह आरोप भी लगाए कि दीक्षित आयोग ने कभी गैरसैण का दौरा ही नहीं किया और बिना कोई सर्वेक्षण किए तथ्यों और आंकड़ों को गलत-सलत तरीके से पेश किया. यही वजह है कि रिपोर्ट में चौखुटिया को चमोली जिले में भिकियासैण तहसील के अंतर्गत दिखाया गया. जबकि चौखुटिया और भिकियासैण अल्मोड़ा जिले की तहसीलें हैं. आठ साल का समय और सरकार का धन खर्च करने के बाद आयोग ने उत्तराखंड के लोगों के साथ ऐसा खिलवाड़ किया, जो आज राजनीतिक दलों के लिए मारक साबित होने वाला है. आयोग को 268 लोगों और संस्थाओं के सुझाव प्राप्त हुए थे.

इनमें 126 सुझाव गैरसैण के पक्ष में थे. देहरादून के लिए 42 और कालागढ़ को राजधानी बनाने के लिए 23 सिफारिशें मिली थीं. फिर भी आयोग ने जनपक्ष को ताक पर रखते हुए देहरादून के पक्ष में अपनी सिफारिश की. गैरसैण के पक्ष में मिली 126 जन-सिफारिशों के अतिरिक्त पांच ऐसी भी सिफारिशें थीं, जिसमें कहा गया था कि प्रदेश की राजधानी कुमाऊं-गढ़वाल के मध्य में बने. कुमाऊं-गढ़वाल के मध्य स्थल पर ही गैरसैण स्थित है. तीन लोगों ने गैरसैण या एक अन्य स्थान को राजधानी बनाने को कहा. दो लोगों ने चौखुटिया और एक व्यक्ति ने नागचूलाखाल को राजधानी बनाने की बात कही.

ये दोनों स्थल गैरसैण के प्रस्तावित राजधानी स्थल की परिधि में ही आते हैं. इसके बाद भी आयोग ने इन 11 जनपक्षों को गैरसैण के पक्ष में आए मत से बाहर निकाल दिया. आयोग ने राजधानी होने की दौड़ में शामिल ऋषिकेश के पक्ष में आए छह प्रतिशत मतों को भी देहरादून के मत में शामिल करने का गैरवाजिब कृत्य किया. उन 11 मतों को भी गैरसैण के पक्ष में जोड़ दिया जाए तो 268 में से 137 मत गैरसैण के पक्ष में जाते हैं, जो आधे से अधिक होते हैं. लेकिन दीक्षित आयोग ने इसे सिर्फ 45 प्रतिशत बता कर झूठ बोला और उसे खारिज कर दिया.

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