नए जातिगत झमेले में झारखंड, अब कुर्मी और आदिवासी आमने-सामने

1950 में कुर्मी को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाकर ओबीसी में शामिल किया गया था. अब कुर्मी और तेली फिर से खुद को आदिवासी का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं. लेकिन आदिवासी इनकी दलीलों और मांगों को सिरे से खारिज कर रहे हैं. इस मुद्दे पर सियासी व सामाजिक गतिविधियां तेज हो गई हैं. दशकों से भाईचारे के साथ रहते आए कुर्मी, तेली और आदिवासी एक-दूसरे को अब अपना प्रतिद्वंद्वी समझने लगे हैं. दोनों का ही अपना तर्क है. कुर्मी, तेली का कहना है कि वे लोग शुरू में आदिवासी के ही अंग थे. लेकिन आदिवासी समुदाय को उनकी यह दलील स्वीकार नहीं है.

lalgarh-adivasiझारखंड गठन के बाद जब भारतीय जनता पार्टी की पहली बार बहुमत की सरकार बनी तो यहां के लोगों में यह उम्मीद बंधी कि अब इनलोगों के दिन बहुरेंगे और विकास की किरण इनके गांवों तक पहुंचेगी. लेकिन एक के बाद एक रघुवर दास की सरकार विवादित मुद्दों में घिरती जा रही है. पहले सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन और फिर पत्थलगड़ी आंदोलन को लेकर सरकार ने आदिवासियों को आंदोलित करने का काम किया और अब कुर्मी और तेली समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग और इसे लेकर आदिवासियों के विरोध ने सरकार को सांसत में डाल दिया है.

1950 में कुर्मी को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाकर ओबीसी में शामिल किया गया था. अब कुर्मी और तेली फिर से खुद को आदिवासी का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं. लेकिन आदिवासी इनकी दलीलों और मांगों को सिरे से खारिज कर रहे हैं. इस मुद्दे पर सियासी व सामाजिक गतिविधियां तेज हो गई हैं. दशकों से भाईचारे के साथ रहते आए कुर्मी, तेली और आदिवासी एक-दूसरे को अब अपना प्रतिद्वंद्वी समझने लगे हैं. दोनों का ही अपना तर्क है. कुर्मी, तेली का कहना है कि वे लोग शुरू में आदिवासी के ही अंग थे. लेकिन आदिवासी समुदाय को उनकी यह दलील स्वीकार नहीं है.

इस मुद्दे को लेकर दोनों ही स्थानीय समुदायों के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है. चूंकि झारखंड में इन दोनों समुदायों की आबादी सबसे ज्यादा है, इसलिए राजनीतिक पार्टियां भी इसमें बहुत सोच-समझकर कदम बढ़ा रही हैं, क्योंकि वो किसी भी एक समुदाय की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहतीं. हालांकि झारखंड के 42 विधायकों एवं 2 सांसदों ने कुर्मी तेली को आदिवासी का दर्जा दिए जाने की लिखित वकालत की है. गौरतलब है कि यह मुद्दा 2002-03 में भी उठा था, तत्कालीन सरकार ने जनजातीय कल्याण शोध संस्थान से इस मुद्दे पर राय मांगी थी. शोध संस्थान ने तब स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कुर्मी तेली के रीति-रिवाज, खान-पान, परम्परा और रहन-सहन आदि आदिवासियों से मेल नहीं खाते हैं. अब एक बार फिर से वर्तमान सरकार ने जनजातीय शोध संस्थान से इस बारे में मंतव्य मांगा है.

आर-पार की लड़ाई के मूड में कुर्मी

इस मुद्दे पर जारी चर्चा के बीच राज्य सरकार ने 10 फरवरी को भारत सरकार के जनजातीय मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा कि झारखंड की कुर्मी जाति में आदिवासी विशेषताओं का अभाव है. वर्तमान समय में वे सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण से अपेक्षाकृत मजबूत हैं और इनके बीच छुआछूत जैसा कलंक भी नहीं है. साथ ही ये अन्य समुदाय के लोगों के साथ सम्पर्क करने में भी संकोच नहीं करते. लिहाजा, झारखंड में निवासरत कुर्मी (महतो) तेली को न तो अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखा जा सकता है और न ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में. इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने की आवश्यकता है. इधर कुर्मी समुदाय के नेता इस मामले में यह तर्क दे रहे हैं कि वर्ष 1931 तक कुर्मी जाति भी आदिम जनजाति की श्रेणी में थी. 1950 में अनुसूचित जनजाति वर्ग अस्तित्व में आया, उस समय एसटी के लिए जो सूची बनी, उसमें कुर्मी को शामिल नहीं किया गया था, यह भूलवश छूट गया था.

उसी वक्त एक सांसद ह्नदयनाथ कुजूर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से इस सम्बन्ध में अनुरोध किया था, तो नेहरू जी ने राज्य सरकार से इस सम्बन्ध में अनुशंसा कराने की बात कही थी. लेकिन राज्य सरकारें तभी से टीआरआई की बात कहकर बरगलाने का काम कर रही हैं. सरकार चाहे तो कैबिनेट से अनुशंसा कर इसे केंद्र सरकार को भेज सकती है, लेकिन सरकार की मंशा ही ठीक नहीं है. कुर्मी समुदाय के लोग अपने आदिवासी दर्जे के लिए दिल्ली तक धरना-प्रदर्शन की तैयारी में हैं. इनका कहना है कि हम अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल होने की सभी अर्हता रखते हैं. अगर सरकार से हमें न्याय नहीं मिला तो अपने संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई एवं न्याय के लिए अदालत की शरण लेंगे. भाजपा सांसद विद्युत चरण महतो ने सवार्जजनिक रूप से ऐलान कर दिया है कि कुर्मियों को आदिवासी का दर्जा दिलाने के लिए वे कोर्ट तक जाएंगे.

सांसद ने कहा कि अपना अधिकार लेने के लिए पूरे समाज को एकजुट होना होगा, किसी को भी किसी का अधिकार छीनने का हक नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड में जिन उद्योगों की स्थापना हुई, वो सभी कुर्मियों की जमीन पर ही हुई है. इस समाज ने आज तक किसी की जमीन नहीं छीनी. कुर्मी समाज के लोग दान देते हैं, भीख नहीं मांगते. भाजपा सांसद का यह ऐलान सरकार और भाजपा के लिए परेशानी की घंटी है. कुर्मी समाज अगर एकजुट होकर सड़कों पर उतरता है, तो सरकार परशान हो जाएगी और उसे बाध्य होकर इस जाति को एसटी में शामिल करना होगा. एक बड़ा वोट बैंक होने के कारण बाकी राजनीतिक दल भी इनकी मांगों का विरोध करने का साहस नहीं कर सकते हैं.

आदिवासियों को अस्तित्व मिटने का डर

इधर कुर्मियों की मांग पर आदिवासी समुदाय आक्रोषित है. आदिवासियों को यह अहसास हो रहा है कि उनका अस्तित्व मिटाने की कोशिश की जा रही है. इसलिए वे एकजुट होकर इसका विरोध कर रहे हैं. आदिवासी समुदाय ने साफ तौर पर कहा है कि कुर्मी को एसटी तो नहीं ही बनने देंगे, आगे से राज्य में भाजपा की सरकार भी नहीं बनने देंगे. अपनी लड़ाई को लेकर आदिवासियों ने नारा दिया है- ‘एक तीर एक कमान, सभी आदिवासी एक समान.’ आदिवासियों का कहना है कि झारखंड में अब उसे ही राज करने दिया जाएगा, जो आदिवासियों की हित का बात करने वाला हो. उन्होंने यह भी कहा है कि कुर्मी अगर आदिवासी बने, तो हम गांवों में विधायकों और सांसदों को घुसने नहीं देंगे. अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के उपाध्यक्ष मुकेश बिरुवा का कहना है कि आदिवासियों को आरक्षण की सुविधा लेने के लिए आदिवासी होने के गुणों का पालन करना जरूरी है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी 2004 के अपने फैसले में आदिवासियों के लिए पांच गुणों की बात कही थी, जो इसप्रकार हैं- आदिम विशिष्टता, भिन्न संस्कृति, भौगोलिक रूप से अलग जगहों में वास, संकोची स्वभाव और आर्थिक पिछड़ापन. कुर्मियों में यह सब नहीं है. इसके बावजूद यदि उन्हें आदिवासी बनाया जाता है, तो इससे सबसे ज्यादा आदिवासियों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर ही खतरा होगा. आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण वे इनकी जमीनें लेने योग्य हो जाएंगे और ज्यादा से ज्यादा जमीन मूल आदिवासियों से लेकर इन्हें भूमिहीन बना देने के खतरे से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है. आदिवासियों का यह भी तर्क है कि पूरे देश में 8.2 फीसदी आदिवासी हैं, लेकिन आरक्षण 7.5 फीसदी ही मिलता है, अब इसमें कुर्मियों को कहां एडजस्ट किया जाएगा. कुर्मी अपने आरक्षण में बढ़ोतरी की बात करें, आदिवासी बनने का प्रयास न करें.

आदिवासी नेताओं ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि आदिवासियों को कोई रोक नहीं सकता, रोकने वाले को हमारी ताकत का अंदाजा नहीं है. केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की ने कहा है कि अब हम राजधानी में भी पत्थलगड़ी करेंगे, वह भी सरकार की छाती पर चढ़कर. सरकार को चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने कुर्मी और तेली को आदिवासी बनाने के पक्ष में जो अनुशंसा पत्र केंद्र सरकार को भेजा है वो वापस ले, नहीं तो भाजपा के सांसदों और विधायकों को गांवों में घुसने नहीं दिया जाएगा. आदिवासी संघ ने यह भी संकल्प लिया है कि हम इस बार किसी भी कीमत पर भाजपा की सरकार नहीं बनने देंगे.

विपक्ष को मिला मुद्दा, सरकार सांसत में

इस मुद्दे ने एक तरफ विपक्षी दलों को सरकार पर हमले का मौका दे दिया है, वहीं दूसरी तरफ सत्ताधारी पार्टी भाजपा सांसत में है. सरकार दोनों में से किसी भी समुदायों को नाराज नहीं करना चाहती. भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव का कहना है कि हम ऐसा फार्मूला निकालेंगे, जो दोनों पक्षों को पसंद आए. उन्होंने कहा कि विभिन्न पक्षों से प्राप्त आवेदनों को सरकार ने ट्राइबल रिसर्च इंस्टीच्यूट (टीआरआई) को भेज दिया है. टीआरआई सम्बन्धित विषय का अध्ययन कर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पक्षों के आधार पर अपनी रिपोर्ट देगी और इसी के अनुसार सरकार आगे कार्यवाही करेगी.

झामुमो ने सियासी हवा का रुख देखकर कुर्मी तेली समुदाय की मांगों को अपना समर्थन दे दिया है और मांग की है कि केंद्र सरकार आरक्षण का दायरा बढ़ाए. झामुमो के महासचिव सह मुख्य प्रवक्ता सुप्रियो भट्‌टाचार्य ने कहा है कि अगर सरकार की नीयत साफ है तो आबादी के लिहाज से कुर्मी समुदाय के आरक्षण का दायरा बढ़ाए. इससे आदिवासी समुदाय के 26 प्रतिशत और ओबीसी के 14 प्रतिशत आरक्षण पर असर नहीं पड़ना चाहिए. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने भी इस मांग का समर्थन किया है.

झाविमो भी दोनों तरफ संतुलन बनाकर चलना चाहती है. पार्टी के प्रधान महासचिव प्रदीप यादव ने कहा है कि आरक्षण मिले, लेकिन आदिवासियों की हकमारी न हो. राज्य में जिसकी जितनी आबादी है, उस अनुरूप आरक्षण मिलना चाहिए. इससे नौकरी समेत अन्य सेक्टर्स में समान प्रतिनिधित्व मिल सकेगा. इसमें यह भी देखना होगा कि आदिवासियों का एक बड़ा वर्ग आज भी हर मामले में कमजोर है, उनकी हकमारी नहीं होनी चाहिए. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि कुर्मियों को आदिवासी का दर्जा दिए जाने के मामले में अभी हमारी पार्टी स्तर पर चर्चा नहीं हुई है. कार्यसमिति की बैठक में इस पर समग्र विचार होगा, उसके बाद पार्टी अपना स्टैंड साफ करेगी.

कांग्रेस ने अभी इस मामले पर अपना स्टैंड क्लीयर नहीं किया है. कांग्रेस प्रवक्ता राजेश ठाकुर ने कहा है कि पार्टी फोरम पर इस मुद्दे को लेकर चर्चा हुई है और कांग्रेस ने तय किया है कि पार्टी के अंदर सभी आदिवासी व कुर्मी नेताओं से मशविरा कर आगे की रणनीति बनाई जाएगी. इस मसले को लेकर प्रदेश प्रभारी आरपीएन सिंह ने भी पार्टी पदाधिकारियों को निर्देश दिए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी और कुर्मी समाज के हित में ही कांग्रेस कोई भी निर्णय लेगी. हम समाज को बांटने वाली किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे.

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *