फैक्टर : चुनावी चन्दा और राजनीतिक दलों में सुधार का एक प्रयास

facterआजकल चुनाव में जिस तरह से पैसा खर्च हो रहा है, उससे राजनीतिक दल कितना ईमानदार और पारदर्शी रह पाते हैं, ये एक बड़ा सवाल है. इसकी वजह से टिकट वितरण या कहें टिकट बेचने का जो खेल शुरू होता है, वो आखिर में हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ही घातक सबित होता है. हम लगातार देख रहे हैं कि करोड़पति उम्मीदवारों, विधायकों और सांसदों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. सवाल है कि चुनाव खर्च में कमी कैसे लाए जाए. स्वच्छ और ईमानदार उम्मीदवार का चुनाव कैसे हो.

चुनावी चन्दे पर लगाम कैसे लगे? गौरतलब है कि वकील, डॉक्टर या किसी भी काम करने के लिए कुछ आवश्यक योग्यताओं की जरूरत होती है, लेकिन हैरानी की बात है कि किसी शैक्षिक योग्यता या प्रशिक्षण के बगैर कोई व्यक्ति संसद सदस्य बन सकता है. ये ठीक बात है कि सांसद बनने के लिए उम्मीदवार के पास किसी यूनिवर्सिटी की डिग्री हो, लेकिन कम से कम उसने जमीनी स्तर पर लोगों की सेवा की हो, काम किया हो, यह तो जरूरी है. लेकिन, आजकल जिस तरह से लोग पार्टी में शामिल होते हैं और कल टिकट मिल जाता है, इससे राजनीतिक दलों की मंशा पर तो सवाल उठते ही हैं.

अरुण कुमार श्रीवास्तव स्वयं जनता दल (यूनाइटेड) के नेता हैं. वे चाहते हैं कि मौजूदा राजनीतिक हालात में सुधार हो. चुनावी चन्दे में पारदर्शिता आए, राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र हो. जाहिर है, ये ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जो राजनीति में सुधार के लिए वर्षों से उठाए जा रहे हैं. अरुण श्रीवास्तव भी इस दिशा में काम कर रहे हैं. उन्होंने फैक्टर नाम की एक संस्था बनाई है, जो आजकल दिल्ली से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में उपरोक्त सवालों पर विमर्श का आयोजन कर रहा है. इसी कड़ी में दिल्ली में एकदिवसीय विमर्श का आयोजन हुआ, जिसमें मेधा पाटेकर, जया जेटली, प्रोफेसर प्रेम सिंह, चुनाव आयोग के रिटायर वरिष्ठ अधिकारी, जद (यू) नेता गोविन्द यादव ने अपनी बातें रखीं.

अरुण श्रीवास्तव के मुताबिक, यदि सभी राजनैतिक दल ये निर्णय ले लें कि पंचायत चुनाव के लिए 3 वर्ष, विधान सभा चुनाव के लिए 5 वर्ष और लोक सभा के लिए 8 वर्ष पार्टी के सक्रिय सदस्यता व पार्टी के संगठन में काम करने वालों को ही टिकट दिया जाएगा, तो इस एक निर्णय से बहुत सी समस्याए दूर हो जाएंगी. उनका कहना था कि चुनावों में राजनैतिक दल द्वारा खर्च की कोई सीमा नहीं है. राजनैतिक दलों द्वारा लिए जाने वाले चंदे व खर्च को पारदर्शी बनाना होगा.

उनके मुताबिक, आजकल कोई कॉरपोरेट किसी राजनीतिक दल को चन्द नहीं देता, बल्कि वो उसमें पैसा निवेश करता है. चुनाव आयोग देश में लोकतंत्र को बचाने के लिए राजनैतिक दलों पर निगरानी रखे, मसलन आय, व्यय, दलों द्वारा अपने ही बनाए संविधान का पालन तथा दलों के आंतरिक चुनाव में चुनाव अधिकारी, चुनाव आयोग खुद नियुक्त करे. राजनैतिक दलों को देश में लोकतंत्र बनाए रखने के लिए अपने-अपने दलों में भी लोकतंत्र स्थापित करना होगा और इसके लिए काम करना होगा.

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर प्रेम सिंह का कहना था कि राजनीतिक दल किसी भी कार्यकर्ता को संगठन में 5-7 साल काम करने के बाद ही टिकट दें. उनके मुताबिक 5 हजार से ज्यादा का चन्दा ड्राफ्ट या चेक से देना अनिवार्य हो और जरूरत पड़े तो किसने चन्दा दिया, इसकी पहचान भी सार्वजनिक कराई जाए. प्रोफेसर प्रेम सिंह का मानना है कि कॉरपोरेट चन्दे का सीधा असर नीति-निर्माण पर पड़ता है और जाहिर है कि ऐसी स्थिति में कोई भी सरकार नीति बनाते वक्त जनता से अधिक कॉरपोरेट घराने के हित का ही ख्याल रखेगी. उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर भी सवाल उठाए और कहा कि आजकल एक ही नेता अपनी पार्टी का कई सालों तक अध्यक्ष बना रहता है, इससे पार्टी के भीतर का लोकतंत्र समाप्त हो जाता है. इस दिशा में भी काम किए जाने की जरूरत है.

अरुण श्रीवास्तव ने बताया कि फैक्टर ये मानता है कि चुनाव में कोई राजनीतिक दल एक पैसा भी खर्च न करे. सरकार की तरफ से मंच बना कर दिया जाए, पोस्टर बैनर भी निश्चित संख्या में दिए जाएं, ताकि चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा किया जाने वाला अनाप-शनाप खर्च बन्द हो सके. इस बहस में अपनी बात रखते हुए मेधा पाटेकर ने कहा कि आज राजनीति में कैडर, विचारधारा और कार्यक्रम का महत्व खत्म हो रहा है. उन्होंने ये सवाल उठाया कि जिस पिपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट के तहत राजनीतिक दल बनते हैं, क्या उस एक्ट के तहत सचमुच जनता का प्रतिनिधित्व हो पा रहा है.

आज मनी और मार्केट पिपुल्स रिप्रजेंटेशन के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आखिर घोषणापत्र में किए गए वादे बंधनकारी क्यों नहीं बनाए जाते हैं? उन्होंने एक सुझाव दिया कि राजनीतिक प्रक्रिया में सिविल सोसायटी और एनजीओं को क्यों नहीं मॉनिटरिंग यूनिट के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है? उन्होंने जनप्रतिनिधि का समाज से कम होते संवाद पर भी चिंता जाहिर की. उन्होंने एक साथ सारे चुनाव कराए जाने के विचार का विरोध यह कहते हुए किया कि हर क्षेत्र की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं होती हैं, इसलिए एक साथ सारे चुनाव कराए जाने से हर क्षेत्र की समस्या पर बातचीत नहीं हो सकती. उन्होंने राजनीति में (विधायिका में) 50 फीसदी महिला अधिकार (आरक्षण) की भी वकालत की.

बहस के दूसरे सत्र में ईवीएम मशीन पर चर्चा करते हुए जद (यू) नेता गोविन्द यादव, जिन्होंने इस मुद्दे पर अध्ययन किया है और चुनाव आयोग से सूचना के अधिकार कानून के तहत कई सवाल भी पूछे हैं, ने कहा कि इस बात पर बहस होनी चाहिए कि ईवीएम के इस्तेमाल से हमारे मताधिकार जैसे मूल अधिकार की रक्षा हो रही है या नहीं. उन्होंने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग से लेकर ईवीएम मशीन बनाने वाली देश की दो सरकारी कंपनियों ने आजतक उनके सवाल के संतोषजनक जवाब नहीं दिए हैं. बहरहाल, इस बहस और विमर्श से कई सवाल उभर कर सामने आए और साथ ही कई सुझाव भी मिले. लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन सुझावों पर अमल कौन करेगा और कब करेगा?

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