भाजपा की खामोशी अनायास नहीं है

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश में लगे राजनेताओं की लंबी फेहरिस्त है. महागठबंधन में सबसे अधिक लाभ लेने की स्थिति में राजद है और उसे मिलना तय भी है. राजग में इसके कई दावेदार हैं जिनके तरीके अपने-अपने हैं. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद चारा घोटाले के सजायाफ्ता कैदी हैं और जेल में बंद हैं, पर अपने लोगों को दलितों के बीच जाने का फरमान उन्होंने तब जारी कर दिया, जब राजग के नेता इस बारे में सोच ही रहे थे.

bjp-biharपछिया तेज चलने लगी है और काल-बैसाखी के दौर भी शुरू हो गए हैं. चुनाव नजदीक आ रहे हैं, तो मौसम भी रंग बदलने लगा है. यह कहीं भगवा रंग हासिल कर रहा है तो कहीं नीला, कहीं हरा दिख रहा है तो कहीं लाल. इन सब के बीच कमल की खोज हो रही है तो कहीं हाथ की, तीर की खोज हो रही है तो हाथी की. सब के अपने नायक हैं, अपने खलनायक हैं, पर देश का कोई नायक है, यह पता ही नहीं चल रहा है.

ऐसे में एससी/एसटी कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज होने के साथ आरोपी की गिरफ्तारी के प्रावधान को शिथिल करने के सुप्रीम कोर्ट का आदेश और चुनावी वर्ष- एक तो करैला दूजे नीम चढ़ा. इस मामले ने देश, विशेषकर हिन्दी पट्‌टी की राजनीति में नया उबाल पैदा कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर दलित संगठन उत्तेजित हो गए और स्थानीय सत्ता राजनीति ने उनका साथ दिया. फिर क्या था, इस महीने की दूसरी तारीख को भारत बंद के आह्‌वान ने नया रंग हासिल कर लिया.

देश की राजनीति अब भी उसी रंग में डूबी हुई है और बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि राज्यों में इसके असर दिख रहे हैं. दलित आक्रोश के नए उभार से भाजपा का नेतृत्व परेशान है तो कहीं राजग के अन्य घटक दलों की उछल-कूद को भी गौर से देख रहा है. दलित संगठनों के भारत बंद के दौरान हिंसक घटनाओं में कोई बीस लोगों की मौत हो गई. इससे सबसे ज्यादा प्रभावित रहा मध्यप्रदेश, जहां इसी साल विधानसभा चुनाव है. यहां भाजपा की कोई डेढ़ दशक पुरानी सत्ता को इस बार विरोधी राजनीति ही नहीं, गैर राजनीतिक हलकों से भी गंभीर चुनौती मिल रही है. इसमें अब एक नया तबका दलित भी जुड़ गया है. इसके बरअक्स, आरक्षण के खिलाफ दस तारीख को आहूत भारत बंद का हालांकि वैसा गंभीर असर नहीं दिखा, पर इसने सत्ता के स्थानीय जातीय समीकरण के द्वंद्व को उजागर तो कर ही दिया है.

यह द्वंद्व अभी भले ही काफी धूमिल दिखता हो, पर भावी चुनाव में इसके रंग देखे जा सकते हैं. देश में दलित आबादी, और इसके साथ अतिपिछड़े वंचितों के मानस में यह बात पैठ रही है कि उसके हित से जुड़े कानूनों को धीरे-धीरे नख-दंत हीन बनाया जा रहा है. दलितों की आबादी कोई 17 प्रतिशत है, पर अतिपिछड़े वंचितों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक हालत दलितों जैसी है. राजनीतिक हालत तो और भी दयनीय है. सो, देश व राज्य की बड़ी आबादी ठगा महसूस कर एकजुट हो रही है. विविध रंगी राजनीति इस एकजुटता का उपयोग अपने ढंग से करना चाहती है-कहीं राम के नाम पर तो कहीं भीम के नाम पर.

ऩफरत की राजनीति

सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ के उक्त आदेश की प्रतिक्रिया या प्रति-प्रतिक्रिया में बिहार की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उससे अधिक गंभीर और राजनीतिक गतिविधि बंद कमरों में हुई. इन गतिविधियों के परिणाम अभी सामने नहीं आ रहे हैं. सत्ता राजनीति में इसे महत्वपूर्ण तत्व का स्वरूप देने की झलक पिछले हफ्तों में मिली ही है-अजनबी बने दोस्तों की दोस्ती को प्राचीन दिखलाने का जोरदार प्रयास हो रहा है. इसके साथ और जातिगत गोलबंदी के तत्व नए सिरे से आकार ले रहे हैं. हालांकि जातियों के सम्मेलनों का दौर अब भी ढंग से शुरू नहीं हुआ है या ऐसे सम्मेलन हो रहे हैं, तो छोटे स्तर पर ही, मगर इनके जोर पकड़ने की उम्मीद तेज होती जा रही है.

इसी तरह पिछले कुछ हफ्तों में राम और भारत माता के नाम पर भी कम विवाद नहीं हुआ है. अररिया से लेकर नवादा तक सूबे के आधा दर्जन से अधिक जिलों में कई दिनों तक अशांति रही, इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई, कहीं निषेधाज्ञा से ही काम चल गया तो कहीं कर्फ्यू लगाया गया. सूबे को जलाने की हरसूरत कोशिश की गई. सत्ता कह रही थी कि ऐसे तत्वों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. ऐसा वह तब कह रही थी जब ऐसी वारदात के मसालची यानी आग को लहकानेवालों को साथ लेकर चल रही थी. यह भी जन-पक्षी राजनीति का एक नमूना ही है. हालांकि ये दोनों दो प्रकृति की घटनाएं हैं, पर इनका मकसद एक ही है-वोट की राजनीति.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश में लगे राजनेताओं की लंबी फेहरिस्त है. महागठबंधन में सबसे अधिक लाभ लेने की स्थिति में राजद है और उसे मिलना तय भी है. राजग में इसके कई दावेदार हैं जिनके तरीके अपने-अपने हैं. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद चारा घोटाले के सजायाफ्ता कैदी हैं और जेल में बंद हैं, पर अपने लोगों को दलितों के बीच जाने का फरमान उन्होंने तब जारी कर दिया, जब राजग के नेता इस बारे में सोच ही रहे थे.

उनके इस राजनीतिक निर्देश का पालन किए जाने का दावा किया जा रहा है. इस बीच राजद ने अपने सुप्रीमो की उस पुरानी मांग को फिर जोरदार तरीके से दोहराया है कि आरक्षण को बढ़ाया जाए, इसे आबादी के अनुपात में किया जाए. अब देखना है कि वह अपनी इस मांग को कितनी हवा देता है. इसमें राजद को जो भी सफलता मिलेगी, यदि वह मिली, तो राजग नेतृत्व के लिए नई परेशानी का सबब बनेगा. पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के महागठबंधन में शामिल होने का भी अतिरिक्त लाभ राजद को मिलता दिख रहा है.

नीतीश कुमार के महादलितवाद को इससे जरूर झटका लगा है. इतना ही नहीं, राजद ने इस तबके पर फोकस किया है. पार्टी के युवा नेता तेजस्वी प्रसाद यादव ने पिछले महीने ही मुसहर सम्मेलन किया था, महादलितों के अन्य सामाजिक समूहों के भी सम्मेलन करने पर पार्टी में विचार किया जा रहा है. 1990 के दशक में लालू प्रसाद ने अपनी राजनीति को शिखर तक पहुंचाने के लिए जातीय सम्मेलनों की बैसाखी का खूब उपयोग किया था. उस दौर में पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियों की कई रैलियां की गई थीं. रैलियों से उन सामाजिक समूहों को कितना लाभ मिला, यह कहना तो कठिन है, पर लालू प्रसाद की राजनीतिक हैसियत जरूर ‘लार्जर दैन लाइफ’ दिखने लगी थी. इस बार दल फिर उधर जाता दिख रहा है. जातियों की रैलियां शुरू हो गई हैं, निषाद समुदाय की रैली हो चुकी है. बदले नेतृत्व में इसका क्या असर होगा, इस बारे में अभी अनुमान लगाना कठिन है.

सहयोगियों पर भाजपा की नज़र

राजग में मामला इतना सहज नहीं है, इसके नेता अब तक सीधे रास्ते पर चलते नहीं दिख रहे हैं. भाजपा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और उसके बाद की घटनाओं के कारण हुई क्षति की भरपाई की कोशिश में है, तो अपने सहयोगी दलों की राजनीतिक गतिविधियों को लेकर भी काफी सतर्क है. बिहार के संदर्भ में नीतीश कुमार व रामविलास पासवान की राजनीति की निगहबानी काफी बढ़ गई है. जद(यू) सुप्रीमो व लोजपा सुप्रीमो इधर लगातार किसी न किसी बहाने मिल रहे हैं. बिहार की राजनीति में ये दोनों आम तौर पर अजनबी की तरह दिखते रहे हैं, अब अचानक एक साथ होते दिखना चाहते हैं. हालांकि रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा की राजनीतिक गतिविधि भी भाजपा नेतृत्व के रडार पर है, लेकिन उन्हें वह अधिक तरजीह नहीं देना चाहता.

पिछले विधानसभा चुनावों में वोट ट्रांसफर की कुशवाहा की ताकत को वह देख चुका है, इधर लालू प्रसाद के साथ उनके मेल-जोल को भी सहजता से नहीं लिया जा रहा है. नीतीश कुमार बिहार की सरकार के मुख्यमंत्री हैं और उनका जद(यू) राजग का सबसे बड़ा घटक है. इतना ही नहीं, अपने अनेक फैसलों से नीतीश कुमार ने अतिपिछड़ी जातियों, महादलित व महिलाओं के बीच किसी राजनेता के बनिस्वत बेहतर और गहरी पैठ बनाई है. इन समुदायों को वोट बैंक के तौर पर विकसित करने की उन्होंने हरसूरत कोशिश की है. मगर चुनावी लहर के दौरान इन समुदायों का सीमित समर्थन ही उन्हें मिलता रहा है, गत संसदीय व विधानसभा चुनाव इसके उदाहरण हैं. जातियों की राजनीति से परहेज करने का दावा नीतीश कुमार सदैव करते हैं, पर इससे उन्हें परहेज भी नहीं रहा है.

भाजपा नेतृत्व कई अन्य कारणों से भी जद(यू) सुप्रीमो को अभी छूट देने को विवश है. लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान खुद को राजग के लिए अपरिहार्य मानते हैं. वे समझते हैं, और यह सच ही समझते हैं, कि जीतनराम मांझी के महागठबंधन में चले जाने के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन में वही दलित नेता रह गए हैं. यह उनकी मोल-तोल की ताकत को बढ़ाता है. नीतीश कुमार की महादलित सूची से अब तक एक ही दलित समुदाय बाहर रह गया था-पासवान. अब मुख्यमंत्री ने अंबेदकर जयंती के दिन इस जाति को भी महादलित में शामिल करने की घोषणा कर दी है. इस एक तीर से कई शिकार हो गए-पासवान समुदाय में नीतीश की पैठ बनी, रामविलास पासवान का अपनों के बीच नेतृत्व बरकरार रखने में वे मददगार बने और यह निर्णय भाजपा को गहरे तक चुभ गया.

हिन्दू एकीकरण की कोशिश

राजग में सबसे खामोश है भाजपा. अगले संसदीय चुनाव की चिन्ता उसे अपने किसी सहयोगी दल से अधिक है, पर यह खामोशी रणनीतिक है. उसकी चिंता के मूल में हिन्दू एकीकरण है जिसका इज़हार पिछले संसदीय चुनावों में हुआ था. इस बार माहौल काफी कुछ बदल गया और दलित वोटरों का बड़ा तबका उससे दूर चला गया दिखता है. इस माहौल की दिशा बदलने की रणनीति की तलाश और उसे सार्थक तरीके से लागू करना उसकी चिंता का मूल है. हालांकि इस काम में राम व भारतमाता जैसे हथियार उसके पास हैं. इनका उपयोग बिहार में किया भी गया. पार्टी नेतृत्व पर भरोसा करें तो इसके लाभ भी दिखे. कोई दो दशक बाद इस सूबे में उत्कट हिन्दुत्व का माहौल बनने लगा, लेकिन छवि को लेकर अति संवेदनशील राजग के मुख्यमंत्री के कारण इसके उत्कट हिन्दुत्ववादी तबके को फूंक-फूंक कर कदम रखने पड़ रहे हैं.

हालांकि नीतीश कुमार ने अब तक कोई ऐसा कदम नहीं उठाया है जिससे भाजपा के हिन्दुत्ववादी नेताओं को कहीं सफाई देनी पड़े. नीतीश-प्रशासन ने कुछ भी ऐसा नहीं किया, जिसमें अश्विनी कुमार चौबे व गिरिराज सिंह की बात जाने दीजिए, उत्कट हिन्दुत्व के अर्जित शाश्वत जैसे नए चेहरे को भी परेशानी हो. इसके बरअक्स, दीन बचाओ, देश बचाओ जैसे आयोजन को परोक्ष समर्थन देकर वे भाजपा को कुछ खास संदेश दे रहे हैं. यह क्या हो सकता है, यह समझना किसी के लिए कठिन नहीं है. इस खामोशी के बावजूद भाजपा सूबे के दलित वोटरों को दल और केन्द्र सरकार की ओर से बारबार संदेश दे रही है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दलित बस्तियों में रात गुजारने के, दलित समुदाय के लिए राजग सरकार के कार्यों के प्रचार-प्रसार के तथा एससी/एटी कानून को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में दी गई दलीलों को इस संदर्भ में काफी महत्व दिया जा रहा है. अंबेदकर के नाम पर पखवाड़े के कार्यक्रम को भी दलित तुष्टिकरण के तौर पर ही देखा जा रहा है. देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह साफ कर दिया है कि दलित आरक्षण का अर्थ है हिन्दू दलित को आरक्षण. इस नाम पर अन्य धर्म के दलितों को कोई लाभ नहीं मिलेगा. यह भी तुष्टिकरण की नीति ही है. बिहार विधान परिषद के चुनाव में दलित को उम्मीदवारी देने को भी इसी आलोक में देखा जा रहा है.

इसका अर्थ यह नहीं है कि भाजपा ने बिहार में अपने एजेंडा में राम व भारतमाता को पृष्ठभूमि में डाल दिया है. ऐसा समझने की भूल कदापि न करें. हां, अर्जित शाश्वत के मामले व सूबे के विभिन्न हिस्सों में हुए उपद्रव को लेकर नीतीश कुमार के रुख ने भाजपा के हिन्दुत्ववादी तबके को कुछ दिनों के लिए शांत भले कर दिया है, उन्हें पीछे हटने को मजबूर नहीं. भाजपा का ऐसा अभियान फिर शुरू होगा. यह कब हो सकता है, यह कहना कठिन है.

संघ परिवार के कथित गैर राजनीतिक संगठन को माकूल अवसर व भाजपा से सार्थक संकेत की प्रतीक्षा है. हो सकता है इसके लिए हमें शरद की प्रतीक्षा करनी पड़े या वैसा अवसर पहले ही आ जाए. नीतीश कुमार अब भाजपा के लिए कुछ वर्ष पहले की तरह अबूझ नहीं रहे. उनकी खूबियों व कमजोरियों के साथ-साथ राजनीतिक ताकत-वोट बैंक व वोट बैंक को गोलबंद करने की क्षमता को राजग की यह सबसे बड़ी पार्टी बहुत बेहतर तरीके से समझती है.

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