पूरे उत्तर प्रदेश को खोद डालेंगे खनन मा़फिया, यूपी में अवैध खनन जारी है

buldozerउत्तर प्रदेश में भू-माफियाओं के आगे योगी सरकार किस तरह पस्त है, यह आपने ‘चौथी दुनिया’ की पिछली आमुख कथा में विस्तार से देख लिया. आपने यह भी जाना कि अकेले योगी सरकार ही क्या, उसके पहले भी जितनी सरकारें आईं, सबने भू-माफियाओं के आगे घुटने ही टेके. मायावती सरकार और अखिलेश सरकार ने भू-माफियाओं के आगे घुटने टेकने का तो रिकॉर्ड ही बनाया. योगी सरकार ने कम से कम भू-माफियाओं पर अंकुश लगाने की नीतिगत पहल तो की.

भ्रष्टाचार में पगे नौकरशाहों के कारण किसी भी कार्रवाई में धार नहीं आ पाती और उसका ठीकरा आखिरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सिर ही फूटना है. इस बार हम उत्तर प्रदेश में अवैध खनन के साम्राज्य का जायजा ले रहे हैं. पिछली सपा सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने खनन मंत्री गायत्री प्रजापति की कारगुजारियों और उसे संरक्षण देने के कारण बहुत नाम कमाया. योगी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद खनन का गोरखधंधा बंद कराने की दृढ़ता दिखाई, नीति बनाई, कड़े निर्देश भी जारी किए, लेकिन अवैध खनन का धंधा बंद नहीं हो पाया.

उत्तर प्रदेश के खनन माफियाओं ने यूपी से लगे छह राज्यों की सीमा और नेपाल से लगे सीमाक्षेत्र पर अवैध खनन का कारोबार फैला दिया है. आए दिन राज्यों के साथ-साथ नेपाल बॉर्डर पर तनाव और हिंसक झड़पों की खबरें आती हैं, लेकिन सत्ता-पीठ तक खबर पहुंचते-पहुंचते काफी देर हो जाती है और उसमें काफी घालमेल भी हो जाता है. उत्तर प्रदेश से लगे हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार और झारखंड राज्य की सीमा और यूपी से नेपाल को जोड़ने वाले अंतरराष्ट्रीय सीमाक्षेत्र में अवैध खनन का विस्तार जड़ें जमा चुका है. इस पर अंकुश लगाने में सरकारें नाकाम साबित हो रही हैं.

अवैध खनन के कारोबार में लगे माफियाओं की जड़ें इतनी गहरी हैं और पकड़ इतनी विस्तृत है कि न्यायतंत्र भी औंधे मुंह गिर जाता है. सरकार और शासनतंत्र की तो बात ही छोड़िए. जुलाई 2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे प्रदेश में अवैध खनन का धंधा बंद करने और अवैध खनन में सक्रिय माफियाओं को कानूनी तौर पर सामने लाने के लिए सीबीआई जांच कराने का आदेश जारी किया था. तब अखिलेश सरकार और उसके मंत्री गायत्री प्रजापति खनन माफियाओं के आगे नतमस्तक थे.

यहां तक कि बाद में गायत्री प्रजापति खुद ही खनन माफियाओं की कतार में जा खड़े हुए थे. तब हाईकोर्ट ने जांच के दायरे में सरकारी अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका को भी शामिल करने को कहा था. राज्य सरकार ने अदालत में यह दावा किया था कि अवैध खनन की जांच के लिए कमिटी गठित कर दी गई है, इस पर हाईकोर्ट ने गहरी नाराजगी जाहिर की थी और साफ-साफ कहा था कि लोगों की आंखों में सरकार धूल झोंक रही है.

विडंबना देखिए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर अमल शुरू भी नहीं हो पाया था कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में अवैध खनन के गोरखधंधे की सीबीआई जांच कराने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश समुचित तरीके से सोच-विचार या जांच ब्यूरो की प्रारंभिक रिपोर्ट का अवलोकन किए बगैर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने तब साफ-साफ कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एकदम सही आदेश दिया, क्योंकि यूपी सरकार के अफसरों की साठगांठ से ही प्रदेश में गैरकानूनी खनन का धंधा चल रहा है.

गैरकानूनी खनन रोकने के लिए तैनात किए गए अधिकारी खनन माफियाओं के साथ मिल कर इसकी सुविधा मुहैया करा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सीधी कार्रवाई के अधिकार से सीबीआई वंचित हो गई और जांच खरामा-खरामा चलती रही. कानून के सुविधाजनक विश्लेषण से अवैध खनन के धंधे की धारदार जांच भोथरी हो गई और उसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. सीबीआई जांच का दायरा कुछ जिलों से बढ़ कर पूरा प्रदेश हो गया और इसमें पूरी जांच का हाल प्रदेश जैसा ही हो गया. न किसी माफिया या अधिकारी की गिरफ्तारी हुई और न अदालत में अभियोग पत्र ही दाखिल हुआ. पूरे प्रदेश में नदियों के किनारे से लेकर पहाड़ों और तलहटियों तक आप जहां भी देखें, खनन माफियाओं का साम्राज्य कायम है.

जांच मद्धिम, पर अवैध खनन पूरी गति से चल रहा है. बुंदेलखंड से लेकर सोनभद्र तक के पहाड़ काट डाले गए और गौतमबुद्ध नगर से लेकर बलिया-देवरिया तक नदियों के किनारे खोद डाले गए. अवैध खनन के धंधे में सपा, बसपा और भाजपा नेताओं और उनके बिगड़ैल रिश्तेदारों के नाम हैं, लेकिन इनके नाम कौन उजागर करे! योगी सरकार ने माफियाओं के खिलाफ काम शुरू किया तो उनकी अपनी पार्टी के नेताओं से लेकर विपक्ष और पूरा तंत्र ही इसके खिलाफ खड़ा हो गया. बृहत्तर मिलीभगत (नेक्सस) ने यह साबित किया है कि अवैध खनन के धंधे में धन का पहाड़ खोदा जाता है. माफियाओं के हिस्से में अकूत धन और सरकार के हिस्से में पिलपिला चूहा मिलता है. माफियाओं को मिलने वाले धन में मंत्री, शासन के शीर्ष नौकरशाह, सम्बद्ध जिलों के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, स्थानीय प्रशासन, स्थानीय पुलिस, खनन विभाग, प्रदूषण विभाग, स्थानीय नेता, दलाल और स्थानीय पत्रकार का हिस्सा कटता है.

आप याद करें, सपा सरकार के कार्यकाल में अवैध खनन की अकूत कमाई को भाजपाइयों ने मुद्दा बनाया था. उस समय यह लगा था कि अवैध खनन राजनीतिक मुद्दा बनेगा, लेकिन बदले हुए राजनीतिक दौर में यह साबित हुआ कि भाजपाइयों का वह विरोध राजनीतिक नहीं, बल्कि ईर्ष्यागत था. सपा सरकार में सपा नेताओं और नौकरशाहों ने अंधाधुंध कमाई की. व्यापक पैमाने पर पहाड़ों के साथ ही गौरा पत्थर खदान और बालू की खदानें बुरी तरह खोद डालीं. सत्ता में आने के बाद भाजपाई भी कमाई के उसी दिखाए हुए रास्ते पर चल पड़े. भाजपाई नेता और संरक्षित माफिया बालू के अवैध खनन में जमकर कमाई कर रहे हैं. आप यकीन मानें, अवैध रूप से खोदे जा रहे बालू का अवैध भंडारण भी किया जा रहा है.

इस तरह शासन दे रहा उगाही का मौक़ा

सरकार का एक आदेश देखेंगे तो आपको बहुत मज़ा आएगा. हाईकोर्ट की बातें बिल्कुल सटीक दिखाई पड़ती हैं कि सरकारों का काम लोगों को केवल धोखा देना ही रह गया है. इसमें भाजपा सरकार कोई दूध की धोई नहीं है. अवैध खनन की गतिविधियों की सूचना राज्य पुलिस मुख्यालय को मिलती थी तो उसमें सीधे यूपी-100 को हस्तक्षेप करने का निर्देश भेजा जाता था. मुख्यालय से निर्देश मिलने के बाद यूपी-100 अवैध खनन में लगे वाहनों और उसके वहन में लगे वाहनों को चेक करने और आवश्यकतानुसार कार्रवाई करने के लिए अधिकृत होता था. इससे खनन माफियाओं के रास्ते में बाधा आने लगी. स्थानीय प्रशासन और स्थानीय पुलिस को भी अपना हिस्सा जाता हुआ दिखा. फौरन खनन-सिंडिकेट सक्रिय हो गया. सत्ता तक सीधी पहुंच का परिणाम फौरन ही सामने आ गया. बीते 17 मार्च 2018 को प्रदेश के गृह विभाग के प्रमुख सचिव अरविंद कुमार ने एक नायाब फरमान जारी कर डाला.

इस फरमान में कहा गया कि सौ नंबर से सम्बद्ध पुलिस प्रदेश में अवैध खनन के मामलों और खनन में लगे वाहनों की चेकिंग, जांच या कार्रवाई नहीं करेगी. मुख्यालय भी अगर निर्देश भेजता है तो वह सीधे सम्बद्ध सर्किल अफसर (सीओ) को भेजा जाएगा. सीओ के जरिए वह आदेश स्थानीय थाने पर जाएगा, फिर सीओ के साथ-साथ सिविल प्रशासन के स्थानीय एसडीएम उसमें शरीक होंगे और तब कार्रवाई होगी. तब तक अवैध बालू और मौरंग से भरे ट्रकों, ट्रैक्टरों और ट्रालियों का काफिला उनकी प्रतीक्षा में वहीं मौके पर खड़ा रहेगा. किस तरह की बचकानी हरकतें करते हैं शासन के शीर्ष पदाधिकारी! गृह विभाग के अधिकारी ने ही इस बात को काटा और कहा कि यह बचकानी नहीं शातिराना हरकतें हैं, जो बड़े सोच-समझ कर की जाती हैं.

अभी तो और देखिए. सरकारी फरमान के चुटकुला-चरित्र की गाथा यहीं समाप्त नहीं हुई है. गृह विभाग के प्रमुख सचिव अरविंद कुमार अपने आदेश में आगे कहते हैं कि चेकिंग बैरियर्स पर तैनात पुलिसकर्मी या अधिकारी वहां होने वाली अवैध वसूली नहीं रोकेंगे, वे उसे होता हुआ देखेंगे और उसकी सूचना अपने आला अधिकारियों को देंगे. अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उन्हें भी वसूली में लिप्त माना जाएगा. आप सोचिए कि जिस मुख्यमंत्री या जिन दो उप मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों की भीड़ को भरोसे के साथ सत्ता पर बिठाया गया है वे कितने समझदार धृतराष्ट्र हैं कि उन्हीं के नौकरशाह खुलेआम ऐसा आदेश जारी करते हुए तनिक भी लोक मर्यादा का ख्याल नहीं रखते.

यूपी से जुड़े राज्यों और नेपाल सीमा पर खनन-राज

उत्तर प्रदेश से लगे हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार और झारखंड राज्य की सीमा वाले इलाकों और नेपाल सीमा पर यूपी के खनन माफियाओं का राज कायम है. अभी आपने देखा कि पिछले दिनों बिहार-यूपी सीमा पर कुशीनगर के तमकुहीराज में नारायणी नदी से हो रहे बालू के अंधाधुंध खनन का विरोध करने पर किस तरह विधायक अजय कुमार लल्लू को गिरफ्तार कर देवरिया जेल भेज दिया गया. इस गिरफ्तारी के खिलाफ कांग्रेस नेता राज बब्बर समेत तमाम कांग्रेसियों ने धरना-प्रदर्शन किया और अवैध खनन बंद कराने की मांग की. कांग्रेस विधायक का कहना था कि अवैध खनन से एपी तटबंध के टूटने का खतरा है. यहां भी प्रशासन की खूबी देखिए कि खनन में गतिरोध उत्पन्न करने के आरोप का मुकदमा पुलिस ने खनन ठेकेदार अवधेश सिंह से लिखवाया और उसकी तहरीर पर विधायक समेत 36 नामजद और डेढ़ सौ अज्ञात लोगों के खिलाफ संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया.

नारायणी नदी से हो रहे बालू के अवैध खनन को लेकर कुशीनगर के जटहाबाजार थाना क्षेत्र के गांव कटाई भरपुरवा के ग्रामीणों की ओर से पुलिस कप्तान को पहले ही ज्ञापन दिया जा चुका था, लेकिन खनन रोकने की कोई कार्रवाई नहीं हुई. ज्ञापन में कहा गया था कि पूरे इलाके में खनन माफिया सक्रिय हैं और अवैध खनन से बंधा कमजोर हो रहा है. इससे बारिश के समय गांव पर संकट आएगा. इसी गांव से सटा हुआ सिंचाई विभाग का बंधा है और बगल में ही नारायणी नदी बहती है. यही नदी यूपी और बिहार की सीमा को विभाजित करती है. यहां बालू का अवैध खनन जोरों पर है. करीब पांच सौ से हजार ट्राली तक बालू हर रोज निकलता है, लेकिन प्रशासन को यह नहीं दिखता.

नारायणी नदी के किनारे-किनारे लंबे क्षेत्रफल में हो रहे अवैध खनन से न केवल भारत बल्कि नेपाल में भी नारायणी नदी के अस्तित्व पर संकट बढ़ गया है. इससे नारायणी नदी के बेहद करीब महराजगंज जिले के भी दर्जनभर गांव संकट में हैं. भारत सीमा से सटे नेपाल के नारायणी नदी में हो रहे अवैध खनन से तराई के दो दर्जन से अधिक सीमाई गांवों के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है. ये गांव बरसात में आने वाले खतरे को लेकर अभी से परेशान हैं. यूपी के खनन माफिया नेपाल के नवलपरासी जिले के कुड़िया, नर्सही व पकलियहवा स्थित नारायणी नदी को भी खोद रहे हैं. इसमें स्थानीय गुंडे और बदमाश भी शरीक हैं.

अवैध खनन के कारण नारायणी नदी तट पर बसे नवलपरासी जिले के पकलियहवा, नर्सही, गुथी परसौनी, गुठी सूर्यपुरा, त्रिवेणी सुस्ता, रुपौलिया, बैदौली, खैरटवा, सोमनी, भुजहवा सहित महराजगंज जिले के दर्जन भर गांवों का अस्तित्व संकट में आ गया है. खनन से उपजाऊ खेत नष्ट हो रहे हैं. दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले की भारत-नेपाल सीमा से सटे तुलसीपुर के सिरिया नाले से भी अवैध खनन का धंधा जोरों पर है. यहां से बालू खोद कर बैलगाड़ियों से ले जाया जाता है. खनन माफियाओं में पूर्व सांसद, पूर्व विधायक और नेता शामिल हैं.

बिहार से लगने वाले यूपी के दूसरे अन्य जिलों में भी यही स्थिति है. खनन माफिया बिहार से बड़ी-बड़ी नावों में लाल बालू लाकर यूपी की सीमा में गिराते हैं और बेरोकटोक धंधा करते हैं. बिहार की सीमा से सटे गंगा नदी के किनारे बालू का अवैध कारोबार जोरों पर है. बलिया के बैरिया थाना इलाके में भवन टोला में बालू माफिया सक्रिय हैं. बिहार से बड़ी-बड़ी नावों में लाल बालू यूपी की सीमा में लाकर गिराया जाता है.

इसके बाद उसे ट्रैक्टरों के जरिए ट्रकों में लोड कर बाहर भेजा जाता है और मोटी रकम पर बेच दिया जाता है. यूपी बिहार सीमा के बीच बहने वाली गंगा नदी के किनारे लाल बालू के टीले मीलों दूर तक दिखाई पड़ते हैं. अवैध बालू का कारोबार बलिया से लेकर जयप्रकाश नारायण के गांव बिहार के सिताबदियारा तक बेखौफ चल रहा है. बिहार के सोन नदी से निकलने वाला लाल बालू ट्रकों के ज़रिए बलिया आता था लेकिन सरकार की सख्त घोषणाओं के बाद बालू माफिया नावों के जरिए लाल बालू बलिया ला रहे हैं.

यूपी के बालू माफियाओं का बिहार के माफियाओं से भी कारोबारी रिश्ता बन गया है. यूपी सीमा से लगने वाले कैमूर के मोहनिया तक बालू का अवैध कारोबार फल-फूल रहा है. क्षेत्र के लोगों के लिए बालू की कमी है, जबकि वही बालू उत्तर प्रदेश आकर ऊंची कीमत पर बिकता है. इन दिनों बालू की सबसे अधिक अवैध निकासी मोहनिया-रामगढ़ प्रखंड सीमा पर पनसेरवां गांव के नजदीक दुर्गावती नदी से हो रही है. पनसेरवां और भिरखीरा इलाके में रात के समय जेसीबी से ट्रैक्टरों पर बालू की लोडिंग हो रही है. वहां बालू लोडिंग करनेवाले अधिकतर ट्रैक्टरों के नंबर यूपी के होते हैं.

बालू के अवैध खनन पर कार्रवाई करने का अब पुलिस को सीधा अधिकार नहीं रहा. अब खनन विभाग को यह अधिकार मिल गया है. जानकार कहते हैं कि यह कार्रवाई का नहीं, बल्कि पैसा खाने का अधिकार दिया गया है. उत्तर प्रदेश-झारखंड के बीच सोनभद्र-गढ़वा सीमा पर बांकी नदी में बालू खनन को लेकर हिंसक संघर्षों और लोगों की मौत आम दिनचर्या हो गई है. सीमा से महज 30 से 35 किलोमीटर दूर झारखंड राज्य के गढ़वा जिले में बांकी नदी के किनारे बसे जकपुरा जैसे क्षेत्र अवैध खनन का धंधा करने वालों का अड्‌डा बन गए हैं.

यूपी हरियाणा बॉर्डर पर भी अवैध खनन को लेकर हिंसक तनाव और खींचतान का सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है. अभी एक मई को ही यूपी हरियाणा बॉर्डर पर घरौंडा खंड के लालूपुरा गांव के पास यमुना नदी में जारी अवैध खनन का मसला फिर दो राज्यों के तनाव का मसला बन गया. अवैध खनन को लेकर हरियाणा प्रशासन दलबल के साथ वहां पहुंचा, लेकिन उत्तर प्रदेश की ओर से कोई भी अधिकारी नहीं आया. रस्म अदायगी के लिए यूपी पुलिस के कुछ जवान वहां आए. अवैध खनन पर राजस्व की कार्रवाई हमेशा की तरह एक बार फिर अटक गई.

यह पाया गया कि जिन खुदाई मशीनों से खनन किया जा रहा था उनमें से अधिकांश के नंबर उत्तर प्रदेश के हैं. हरियाणा के किसानों ने यमुना नदी में उनकी जमीन पर अवैध खनन किए जाने की शिकायत की थी. लालूपुरा गांव के किसानों का आरोप है कि यूपी के खनन माफिया ने उनकी 30 एकड़ से ज्यादा जमीन पर कब्जा कर रखा है और वहां अवैध खनन कर रहे हैं. खनन रोकने के प्रयास में कई बार लालुपुरा और यूपी के लोगों के बीच तीखी झड़प भी हो चुकी है. घरौंडा तहसील के कानूनगो ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि खोदी गई भूमि हरियाणा के किसानों की है. नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल की तरफ से खनन पर पूर्ण पाबंदी के बावजूद यमुना में हो रही अवैध खुदाई से यूपी के साथ-साथ हरियाणा के भी कई गांवों में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है. खनन के कारण गहराई बढ़ने से यमुना के पानी का दबाव हरियाणा की तरफ बढ़ेगा.

एमपी के काग़ज़ पर यूपी में खनन

मध्य प्रदेश से जुड़ने वाले यूपी के बुंदेलखंड क्षेत्र में अवैध खनन का धंधा जारी है. खनन माफिया केन नदी को तबाह करने पर तुले हैं. अवैध खनन में सपा नेता और कांग्रेस विधायक सीधे तौर पर लिप्त हैं. माफियाओं ने खनन का एक और जुगाड़ निकाला है. वे अब मध्यप्रदेश के ‘एमएम-11’ रवन्ना(खनन करने का अधिकार पत्र) पर यूपी क्षेत्र में धड़ल्ले से बालू खोद रहे हैं. वहां से लखनऊ, कानपुर, फतेहपुर और रायबरेली तक रोजाना डेढ़ से दो हजार ट्रकों से बालू सप्लाई हो रही है.

एमपी की सीमा के पास की इन खदानों से लिफ्टर मशीनों के जरिए यूपी के हिस्से की बालू निकाली जा रही है. केन नदी के पार एमपी की सीमा में रामपुर, कुरघना, गेरुहा, सिंगारपुर नेहरा, परेई की बालू खदानें हैं. इनका पट्‌टा झांसी और बांदा के दो विधायकों ने अपने करीबी लोगों के नाम करा रखा है. वहीं, कुरघना खदान का पट्‌टा किसी और के नाम है, लेकिन उसकी देख-रेख एक विधायक का बेटा कर रहा है. सिंगारपुर बालू खदान केन नदी से हटकर है. डंप बालू की बिक्री वहीं से की जा रही है.

10 टायरों वाले ट्रकों में 30 घन मीटर बालू भरा जाता है. ट्रक वालों को यह बालू एमपी की खदानों के नाम पर दिया जा रहा है, लेकिन इसका खनन यूपी में होता है. रवन्ना एमपी का होता है, लिहाजा रॉयल्टी भी मध्य प्रदेश सरकार के हिस्से में जा रही है. बालू भरे ट्रक यूपी की सड़कों से गुजरते हैं और यूपी की सड़कें खराब करते हैं. दूसरी तरफ यूपी मध्य प्रदेश सीमा पर भिंड जिले में क्वारी नदी के किनारे-किनारे भी अवैध खनन का धंधा खूब चल रहा है. आए दिन यहां हिंसक झड़पें भी होती रहती हैं. माफिया के गुर्गे क्वारी नदी पर दिनदहाड़े अवैध खनन करते रहते हैं. झांसी के पास भी एमपी से लगे समथर क्षेत्र में अवैध खनन का धंधा पनप रहा है. पहुंच नदी के किनारे-किनारे रात-रात भर खनन चलता रहता है.

वहां का बालू मध्य प्रदेश में बेचा जा रहा है. अवैध खनन के धंधे को समथर थाना क्षेत्र के बुढेरा घाट, बुढेरी, छेवटा गांव के प्रधानों का भी संरक्षण मिलता है. नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल की पाबंदियों के बावजूद मध्यप्रदेश के बिल्हरका के पास चांदीपाटी में खनन माफियाओं ने केन नदी को अवरुद्ध कर रखा है. नरैनी तहसील के गांव नसेनी के पास खनन माफियाओं ने नदी के आरपार पानी के अंदर बालू और पत्थर से ऐसा रास्ता बना दिया है, जहां से आसानी से बालू लदे ट्रक गुजरते हैं. खनन माफियाओं के गुर्गों ने चंदौरा के पास केन नदी की जलधारा को अवरुद्ध कर दिया था, बाद में बिल्हरका के पास मध्यप्रदेश के चांदीपाटी गांव में धारा रोक दी.

यूपी-उत्तराखंड सीमा को भी खोद डालेंगे खनन मा़िफया

यूपी-उत्तराखंड सीमा पर खनन करने वाले माफियाओं में सबसे बड़ी हिस्सेदारी बिजनौर के ठेकेदारों की है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और विधायकों की गाड़ियां इसी आसपास के क्षेत्र से गुजरती हैं, लेकिन उन्हें कुछ नजर नहीं आता. अवैध खनन के कारण उत्तराखंड में रिस्पना का पुल और कोटद्वार का पुल बह चुका है. मालदेवता के आसपास खनन माफियाओं ने पोकलैंड और डिच मशीनों से खनन करके पुल की नींव इतनी कमजोर कर दी है कि कभी भी कोई हादसा हो सकता है. हरिद्वार में आज भी अवैध खनन खुलेआम जारी है, लेकिन किसी भी नेता या अधिकारी को यह नहीं दिखता. स्पष्ट है कि शासन और नौकरशाह खनन माफियाओं के हाथों बिक चुके हैं.

यूपी उत्तराखंड सीमा पर काशीपुर तहसील के ग्राम दभौरा मुस्तहकम में खसरा नंबर 85 के सीमांकन को लेकर उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच का विवाद राज्य गठन के 17 साल बाद तक अनसुलझा है. इस सीमा विवाद के कारण कोसी नदी क्षेत्र में खनन माफिया फल-फूल रहे हैं. वर्ष 2012 में काशीपुर तहसील व स्वार (रामपुर) तहसील की टीमों ने अपने-अपने क्षेत्र में पैमाइश की थी. स्वार (रामपुर) की टीम ने पैमाइश के बाद उत्तराखंड की सीमा के ग्राम दभौरा मुस्तहकम में खसरा नंबर 85 के अंतर्गत 80 मीटर लंबे क्षेत्रफल पर अपना दावा जताया. जबकि काशीपुर तहसील टीम की पैमाइश में 69 मीटर लंबाई यूपी की सीमा में शामिल होने की दावेदारी की गई. तब से इस विवाद के निपटारे का कोई सार्थक प्रयास नहीं हो सका.

इसी विवादित क्षेत्र का लाभ खनन माफिया उठा रहे हैं. क्षेत्र का सही सीमांकन न होने से खनन माफिया एक-दूसरे के क्षेत्र में घुसपैठ कर धड़ल्ले से खनिजों का दोहन कर रहे हैं. सीमा निर्धारण न होने के कारण माफिया के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती. दूसरी तरफ यूपी राजस्थान सीमा पर भी आगरा के खैरागढ़ में खनन माफियाओं के हौसले बुलंद हैं. खैरागढ़ तहसील राजस्थान की सीमा से जुड़ी है. वहां रात में लगातार अवैध खनन होता है. राजस्थान से गाड़ियां उत्तर प्रदेश क्षेत्र में आती हैं और बालू ढोकर ले जाती हैं. नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध खनन का धंधा चल रहा है. इरादत नगर, गुंजन पूरा जैसे क्षेत्र भी अवैध खनन का क्षेत्र बने हुए हैं.

अवैध खनन से बुंदेलखंड का बुरा हाल

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र अवैध खनन से बदहाल है. बुंदेलखंड में खनन माफियाओं की समानान्तर सरकार चलती है. बुंदेलखंड की रात खनन माफियाओं की मानी जाती है. रात-रात भर नदियों का सीना चीरती मशीनों की आवाज गूंजती रहती हैं, लेकिन यह आवाज प्रशासन को सुनाई नहीं पड़ती. बुंदेलखंड का बांदा जिला तो अवैध खनन के लिए बदनाम है.

खप्टिहाकलां और चंदौर के बालू घाटों पर रात में जेसीबी और पोकलैंड मशीनों का शोर लोगों को परेशान करता है, लेकिन प्रशासन को परेशानी नहीं होती. नरैनी तहसील के राजापुर-मोतियारी, नसेनी, पुंगरी, लहुरेटा, मऊ-रिसौरा में केन नदी और अतर्रा क्षेत्र में भदावल, कुल्लूखेड़ा, सिंहपुर में बागै नदी से ट्रैक्टरों से पूरी रात बालू की ढुलाई होती रहती है. बदौसा क्षेत्र में पुलिस की साठगांठ से बागै नदी से रात भर बालू निकाला जाता है.

बुंदेलखंड क्षेत्र के हमीरपुर और बांदा में नदियों से अवैध तरीके से मौरंग का धुआंधार खनन हो रहा है. हमीरपुर के कोतवाली क्षेत्र के कलौलीतीर गांव में सत्ताधारी नेता के संरक्षण में यह धंधा होता है. ट्रकों में मौरंग भर कर रातों रात जिले की सीमा से बाहर पहुंचा दिया जाता है. कुरारा थाना के पतारा और बेरी खदानों में भी नदियों से खनन हो रहा है.

बांदा जिले के तो सभी पांच घाटों पर अवैध खनन जारी है. महोबा के पनवाड़ी और महोबकंठ थाना क्षेत्र की नदियों के आसपास बिजरारी, नोगाव फदना, इटौरा, पिपरी, महुआ, नकरा सहित आधा दर्जन घाटों पर अवैध खनन धड़ल्ले से हो रहे हैं. बुंदेलखंड में बसपा सरकार के कार्यकाल में खनन का कारोबार पांच-छह सौ करोड़ रुपए का था. सपा सरकार में यह धंधा हजार करोड़ तक पहुंचा. अब भाजपा की सरकार में भी धंधा वैसा ही चल रहा है.

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, गौतमबुद्ध नगर, फैजाबाद समेत कई अन्य जिलों में भी अवैध खनन की कमोबेश यही स्थिति है. इलाहाबाद में बलुआघाट अवैध खनन बड़ा अड्‌डा है. यमुनापार इलाके में बारा, घूरपुर, अरैल में सौ से अधिक खनन के छोटे पट्‌टे दिए गए हैं, लेकिन खुदाई में बड़ी-बड़ी जेसीबी मशीनें लगी रहती हैं. नेताओं से लेकर नौकरशाह और सरकारी मुलाजिमों तक घूस की रकम बंधी हुई है. लेकिन धन के धंधे में द्वेष और हिंसा भी खूब होती है.

90 के दशक में झूंसी के विधायक मारे गए तो 2010 में उस समय के बसपाई मंत्री (अब भाजपाई मंत्री) नंदगोपाल नंदी पर हुआ हमला आज भी याद किया जाता है. वह हमला भी अवैध खनन की अकूत कमाई के बंटवारे को लेकर ही हुआ था. हमले में अंग्रेजी अखबार के रिपोर्टर विजय प्रताप और गनर राकेश मालवीय की मौत हो गई थी. नंदी भी बुरी तरह जख्मी हुए थे. खनन-धन को लेकर अब तक दो दर्जन से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नोएडा और उसके आसपास सक्रिय रेत माफिया अवैध खनन से हर महीने 100 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई करते हैं. फैजाबाद के महराजगंज कस्बे के पउसरा में लिस्टर मशीन लगाकर दिन-रात खनन जारी है. रूधौली, सोहावल और सदर तहसील में सरयू नदी के किनारे- किनारे बालू निकालने का धंधा बेरोकटोक जारी है. यहां तक कि राजधानी लखनऊ में भी अवैध खनन का धंधा चल रहा है. गोमती नदी के किनारे बालू और मिट्टी की अवैध खुदाई सरेआम जारी है. गोमती के किनारे-किनारे बड़े पैमाने पर खोदी गई मिट्‌टी कहां गायब हो गई, इसकी छानबीन भी चल रही है.

फर्ज़ी साबित हुई केंद्रीय मंत्री की घोषणा

केंद्रीय मंत्री पीयुष गोयल ने वर्ष 2016 में ही कहा था कि यूपी में अवैध खनन रोकने के लिए हाईटेक निगरानी होगी. हाईटेक निगरानी(एमएसएस) की हाईटेक घोषणा बहुत घटिया दर्जे की सियासी घोषणा साबित हुई. गोयल ने कहा था कि अवैध खनन की निगरानी उपग्रह के माध्यम से की जाएगी और यह चार महीने के अंदर ही शुरू हो जाएगी. उक्त निगरानी प्रणाली केंद्रीय खान मंत्रालय ने विकसित की थी.  चार महीने के अंदर शुरू होने वाली योजना दो साल बाद तक लागू नहीं हो पाई. एक अधिकारी ने कहा कि यह भी खनन माफियाओं का ही प्रभाव है.