बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा विशेष राज्य का दर्जा

रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा ने भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का पुरजोर समर्थन किया है. श्री पासवान ने कहा कि बिहार काफी पिछड़ा राज्य है, इसे सभी जानते हैं. इस मामले में जो तकनीकी दिक्कतें हैं उसे दूर कर बिहार के विकास की गति को तेज करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार इस मसले को अच्छी तरह से देख रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ विशेष राज्य के मसले पर सांसद पप्पू यादव ने आक्रामक रुख अपना लिया है. पप्पू यादव ने इस मुद्दे पर लोकसभा से इस्तीफा देने तक की धमकी दे डाली.

modiसबको यह बात याद है कि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाने और बिहार में वोट बैंक का दायरा बढ़ाने के लिए नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का मसला जोर-शोर से उठाया था. इसके लिए दिल्ली से लेेकर पटना तक में रैली और सम्मेलनों का दौर चला. नीतीश कुमार की सोच बहुत ही साफ थी कि विशेष राज्य के मसले पर राजनीतिक तौर पर उनका विरोध संभव नहीं है. उस समय हुआ भी यही कि विपक्षी भाजपा ने भी नीतीश कुुमार के सुर में सुर मिलाया. महागठबंधन में टूट के बाद जब भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार ने सरकार बनाई तो यह आम उम्मीद थी. लोगों को भी लगा कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार है तो अब बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने में कोई परेशानी नहीं होेगी.

इस बीच प्रधानमंत्री कई बार बिहार आए पर बिहारवासियों की यह उम्मीद पूरी नहीं हो पाई. पिछले छह महीने से तो इस पर चर्चा भी बंद हो गई थी. यहां तक की विपक्षी दल राजद के लिए भी यह बड़ा मुद्दा नहीं रह गया. लेकिन जैसे ही आंध्र प्रदेश केे मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने अपने सूबे के लिए विशेष राज्य का दर्जा देने का मामला उठाया, वैसे ही बिहार में भी गरमाहट आ गई. मामले को राजनीतिक रंग देते हुए चंद्रबाबू नायडू के दोनों मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार से बाहर आ गए. बिहार के लिए इतना काफी था. अब राजद और कांग्रेस ने एक सुर में नीतीश कुमार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया.

तेजस्वी यादव ने कहा कि नीतीश कुमार को चंद्रबाबू नायडू से सबक लेना चाहिए. सब कुछ सत्ता ही नहीं है. बिहार के लोगों का कल्याण हो, ऐसी चाहत रखनी होगी और इसके मद्देनजर नीतीश कुमार को कुछ कड़े फैसले लेने चाहिए. कांग्रेस के बिहार प्रभारी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए नीतीश कुमार को एनडीए से बाहर आने की सलाह दे दी और कहा कि विशेष राज्य के मसले पर पार्टी नीतीश कुमार के साथ है. लेकिन नीतीश कुमार की दुविधा यह है कि अब चूंकि वे एनडीए में हैं तो खुलकर केंद्र सरकार का विरोध नहीं कर सकते. वे साफ कहते हैं कि नीति और वित्त आयोग इस मामले को देेख रहा है. नीतीश कुमार का मानना है कि मैं तो हमेशा यही चाहता हूं कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले और इससे पीछे हटने का कहां सवाल पैदा होता है.

इसी बात को आगे बढ़ाया उनकी पार्टी के नेता आरसीपी सिंह ने. पिछले दिनों 15वें वित्त आयोग को दिए जाने वाले ज्ञापन की तैयारी के सिलसिले में आयोजित सर्वदलीय बैठक में राज्यसभा में जदयू के नेता आरसीपी सिंह केंद्र सरकार से यह सवाल कर चुके हैं कि आखिर केंद्र सरकार क्यों यह मांग नहीं मान रही है? बिहार का क्या अपराध है?  इस मुद्दे पर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव संजय झा ने यह कहकर राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया कि विशेष दर्जा की मांग पर न पुरानी सरकार और न ही नई सरकार ने बिहार के साथ इंसाफ किया है. संजय झा ने यह भी कहा कि हमारी इस मांग पर पूरा राज्य हमारे साथ है. लोग लाठी या जाति की रैली करते हैं. विकास के मुद्दे पर पहली बार नीतीश कुमार ने रैली की. बिहार को विशेष दर्जा दिलाने के लिए उन्होंने पहले पटना के गांधी मैदान और फिर दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली की.

हम इस मांग से पीछे नहीं हट सकते. उल्लेखनीय है कि आरसीपी सिंह ने सर्वदलीय बैठक में अपने संबोधन में उस रघुराम राजन कमिटी की अनुशंसा को ठंडे बस्ते में डाल देने की भी चर्चा की थी, जो जदयू की विशेष दर्जा की मांग को देख तत्कालीन यूपीए सरकार ने गठित की थी. कमिटी ने राज्यों की तीन श्रेणी बनाई थी, और उनके लिए केंद्र से राशि उपलब्ध कराने का नया फॉर्मूला तय करने की वकालत की थी. केंद्र से यूपीए सरकार जब हटी और उसकी जगह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी तो प्रदेश में भी राजनीतिक स्थिति बदल गई थी. नीतीश कुमार एनडीए से अलग हो चुके थे. परन्तु जब पिछले वर्ष जुलाई में नीतीश कुमार फिर एनडीए में शामिल हुए तो लोगों की उम्मीद जगी   कि अब बिहार के विकास के लिए ‘डबल इंजन’ काम करेगा. क्योंकि केंद्र एवं राज्य, दोनों ही जगहों पर एक ही गठबंधन की सरकार थी.

लेकिन साल बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है. आंध्र प्रदेश के प्रकरण के बाद नीतीश कुमार की राह मुश्किल हो गई है. विपक्ष आगामी चुनावों में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाने जा रहा है. चूंकि मामला बिहार के विकास और प्रतिष्ठा से जुड़ा है, इसलिए राजद और कांग्रेस इस मामले को जोर शोर से उठाने की रणनीति को अंतिम रूप देने में लगे हुए हैं. दोनों दलों को लग रहा है कि विशेष राज्य के मसले पर जाति व धर्म से अलग हटकर लोगों का समर्थन उसे मिलेगा. दूसरी तरफ नीतीश कुमार इस मसले पर बैकफुट पर नजर आएंगे.

उनसे सीधा सवाल होगा कि अब तो केंद्र में भी आपके ही गठबंधन की सरकार है तो फिर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिल रहा है? इसका जवाब बिहार की जनता को देना नीतीश कुमार को बहुत ही मुश्किल होगा. जानकार बताते हैं कि विशेष राज्य का मसला चुनावी मुद्दा बनना तय है और इस संवेदनशील मुद्दे पर जरा सी भी लापरवाही बहुत ज्यादा चुनावी नुकसान कर सकती है. इसलिए नीतीश कुमार की पार्टी ने यह बताने की कोशिश शुरू कर दी है कि जदयू ने ही सबसे पहले इस मुद्दे को उछाला और पटना से लेकर दिल्ली तक आंदोलन किया. जदयू  की रणनीति यह होगी इसमें हो रही देरी के लिए वह सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी की सरकार पर ठीकरा फोड़ दे. लेकिन यह समाधान नहीं है, क्योंकि चुनाव तो भाजपा के साथ ही लड़ना है. भाजपा भी इस मुद्दे को लेकर चौकन्नी हो गई है. पार्टी को लग रहा है कि अगर रास्ता नहीं निकला तो राजद और कांग्रेस को इसका फायदा हो सकता है. बिहार के लोगों की भावना विशेष राज्य को लेकर जुड़ी हुई है.

बिहार भाजपा चाहती है कि अगर सीधे-सीधे बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने में कोई तकनीकी अड़चन है तो फिर इसके तहत मिलने वाली सुविधा को किसी दूसरे स्वरूप में बिहार को देने की व्यवस्था केंद्र सरकार को चुनाव से पहले जरूर कर देना चाहिए. बिहार भाजपा को लगता है कि अगर केंद्र सरकार इस तरह की कोई पहल समय रहते करे तो फिर सूबे की जनता को पार्टी किसी न किसी तरह समझा ही लेगी. गौरतलब है कि नीतीश कुमार ने यह कहकर नई सरकार बनाई थी कि वे जो भी कर रहे हैं वह बिहार के विकास के लिए है. अगर सही मायनों में विकास दिखाई नहीं देगा तो फिर नुकसान तो नीतीश कुमार की छवि और उनकी राजनीति का ही होगा. विपक्ष यह शोर मचाने से बाज नहीं आएगा कि नीतीश कुमार केवल सत्ता पाने की राजनीति करते हैं और विकास की राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं है.

इधर रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा ने भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का पुरजोर समर्थन किया है. श्री पासवान ने कहा कि बिहार काफी पिछड़ा राज्य है, इसे सभी जानते हैं. इस मामले में जो तकनीकी दिक्कतें हैं उसे दूर कर बिहार के विकास की गति को तेज करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार इस मसले को अच्छी तरह से देख रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ विशेष राज्य के मसले पर सांसद पप्पू यादव ने आक्रामक रुख अपना लिया है. पप्पू यादव ने इस मुद्दे पर लोकसभा से इस्तीफा देने तक की धमकी दे डाली. पप्पू यादव कहते हैं कि मैं शुरू से ही इस मत का रहा हूं कि बिना विशेष पैकेज के बिहार का बंटवारा नहीं होना चाहिए.

मैंने इसके लिए आडवाणी जी के हाथ से बिल छीनने का भी काम किया था. उन्होंने कहा कि 10 साल तक यूपीए की सरकार, ढाई साल तक गुजराल और देवगौड़ा की सरकार और 10 साल तक वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की सरकार ने बिहार को केवल ठगा है. रामविलास पासवान, लालू प्रसाद और उपेंद्र कुशवाहा सभी इनमें से किसी न किसी सरकार में मंत्री रहे हैं, लेकिन बिहार को विशेष दर्जा मिले, इसके लिए इन नेताओं ने कोई प्रयास नहीं किया. पप्पू यादव ने कहा कि बिहार को विशेष दर्जा या फिर विशेष पैकेज दिलाने के लिए वे 25 मई को बिहार बंद करवाएंगे.

पप्पू यादव का मानना है कि अगर बिहार के बड़े नेता चाहते तो बिहार को कब का विशेष दर्जा या पैकज मिल जाता, पर ऐसा नहीं हो पाया. लेकिन अब मैं इस मुद्दे को जोर-शोर से संसद से लेकर सड़क तक उठाने वाला हूं. देखा जाए तो विशेष राज्य का मसला एक बार फिर जोर पकड़ चुका है और आगामी चुनावों में यह सूबे के लिए बड़ा मुद्दा बनने वाला है. यही कारण है कि सभी दल और नेता अभी से  इस मुद्दे को लेकर अपनी अपनी लाइन तय कर रहे हैं. अब इस तरह की कवायद से बिहार को फायदा होता है या फिर इन नेताओं को, यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा.

 

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