न्यू इंडिया का मंत्र: बेरोज़गार खत्म, बेरोज़गारी खत्म!

बेरोज़गारी खत्म होना किसी भी सरकार या देश के लिए अच्छी खबर मानी जाती है, लेकिन क्या विडंबना है कि अब देश से बेरोज़गार भी खत्म हो रहे हैं. यह रिपोर्ट देश के उन करीब साढ़े चार करोड़ लोगों की मौजूदा स्थिति की पड़ताल है, जिन्हें ‘गुमशुदा बेरोज़गार’ करार दिया गया है…

jobलोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान 7 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोजगार सृजन के मसले पर विपक्ष को जवाब देते हुए कहा था कि ‘आज का मध्यमवर्गीय नौजवान नौकरी करने की बजाय नौकरी देने वाला बन रहा है.’ प्रधानमंत्री के इस दावे की जमीनी पड़ताल करें, तो मुद्रा और स्टार्टअप जैसी योजनाओं की खस्ता हालत खुद स्वरोजगार के मसले पर सरकार के प्रयासों की कलई खोल रही हैं, इस बीच एक और रिपोर्ट सामने आई है, जो बताती है कि बीते एक साल में देश से 4 करोड़ 30 लाख बेरोजगार ‘खत्म’ हो गए. गौर करने वाली बात है कि बेरोजगारी खत्म नहीं हुई, बेरोजगार खत्म हुए हैं, क्योंकि इन्हें नौकरी नहीं मिली है. इसे यह भी कह सकते हैं कि देश से 4 करोड़ 30 लाख बेरोजगार ‘गायब’ हो गए हैं.

एक साल के अंतराल पर आईं सीएमआईई यानि सेंटर फ़ॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी की दो रिपोर्ट्‌स के जरिए यह खुलासा हुआ है. मार्च 2016 में आई इस संस्था की रिपोर्ट में देश में बेराजगारों की संख्या 7 करोड़ 80 लाख बताई गई थी और इसी सीएमआईई द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2017 में बेरोजगारी का आंकड़ा घटकर 3 करोड़ 70 लाख हो गया. गौर करने वाली बात यह है कि सीएमआईई की ही रिपोर्ट कहती है कि इस दौरान बेरोजगारी दर में बढ़ोतरी देखने को मिली. अब सवाल यह उठता है कि जब बेरोजगारी दर में बढ़ोतरी हुई, तो फिर बेरोजगार कम कैसे हो गए.

बेरोजगारी के आंकड़ों में उलटफेर का यह पूरा मामला नोटबंदी के आसपास का है. पूरी कहानी कुछ यूं हैं कि मार्च 2016 में देश में 3 करोड़ 80 लाख लोग बेरोज़गार थे और 4 करोड़ वो थे, जिनके पास नौकरी तो नहीं थी, लेकिन वो कोई न कोई काम कर रहे थे. इसके बाद नोटबंदी हुई और करीब 20 लाख बेरोजगार इसमें और जुड़े. इस तरह से बेरोजगारों की पूरी संख्या होती है 8 करोड़. लेकिन इसके बाद जो रिपोर्ट आई, उसमें बताया गया कि बेरोजगारों की संख्या घटकर 2.6 करोड़ और नौकरी नहीं ढूंढ रहे बेरोजगारों की संख्या सिर्फ 1.1 करोड़ रह गई है, यानि कुल 3 करोड़ 70 लाख. बचे हुए 4.3 करोड़ लोग कहां हैं, उन्हें रोजगार मिला या नहीं, उसके बारे में इस रिपोर्ट में कुछ नहीं कहा गया है. यह रिपोर्ट ऐसे 4 करोड़ 30 लाख लोगों को ‘गुमशुदा बेरोजगार’ बताती है.

आंकड़ों से सरकार का डर

बढ़ती जा रही बेरोजगारी के आंकड़ों से डर के कारण ही शायद सरकार ने अब इसकी गणना बंद कर दी है. श्रम मंत्रालय के अधीन लेबर ब्यूरो इस तरह का सर्वे कराता था, जिसे 2016 के बाद से बंद कर दिया गया है. श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने इस बारे में एक जवाब में बताया था कि बेरोजगारी से जुड़े मुद्दे हल करने के लिए बनाई गई एक टास्क फ़ोर्स की सलाह के बाद ऐसा किया गया है. फिलहाल रोज़गार की स्थिति जानने के लिए सरकार ईपीएफओ से मिलने वाले आंकड़ों पर निर्भर है.

सरकार भले ही देश में बेराजगारी की सही और असली तस्वीर नहीं देखना चाहती, लेकिन यह तो सच है कि हालत दिन-ब-दिन बुरे होते जा रहे हैं. काम के लिए बाजार में उतर रहे युवाओं को तो निराश होना ही पड़ रहा है, पहले से नौकरी-पेशा लोगों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा होता दिख रहा है. इसमें सरकारी नौकरीप्राप्त लोगों को छोड़ दें, तो निजी क्षेत्रों में काम कर रहे अधिकतर लोग हर दिन इस डर के साए में जी रहे हैं कि कहीं उनकी नौकरी भी मंदी या नए नियमों की भेंट न चढ़ जाए.

बेंगलुरु की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में प्रोग्रामर स्वाति प्रधान ने इस मुद्दे पर ‘चौथी दुनिया’ से बातचीत में बताया कि ‘मैंने देश के एक बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान से एमबीए किया, उसके बाद यहां नौकरी शुरू की, लेकिन पिछले दो सालों में जिस तरह से यहां छंटनी हो रही है, उसने हमारे अंदर डर बैठा दिया है. ऐसा भी नहीं है कि छंटनी के बाद नए लोग लाए जा रहे हैं, जो लोग बचे हैं उन्हीं से पूरे काम लिए जा रहे हैं. हम नौकरी छुटने के डर से बढ़े हुए काम को लेकर मना भी नहीं कर सकते, क्योंकि अभी इस इंडस्ट्री की हालत बहुत खराब है. कहीं और काम मिलना मुश्किल है.’ चकाचौंध के पीछे बाजार की असलियत देखें, तो स्वाति का डर स्वाभाविक है.

कंपनियों का खस्ता हाल

इसी साल आई कॉरपोरेट मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि 31 जनवरी 2018 तक 17 लाख कंपनियां रजिस्टर्ड थीं, जिनमें से अब तक 5 लाख 38 हजार कंपनियां बंद हो चुकी हैं. इन 5 लाख 38 हजार में से 4 लाख 95 हजार कंपनियों ने बिजनेस न मिलने को बंद का कारण बताया. केवल 2017 में करीब 3 लाख कंपनियों ने अपना कारोबार समेट लिया. बंद हुई इन कंपनियों को लेकर सरकार का यह तर्क है कि ये नियमों का पालन नहीं कर रही थीं या टैक्स चुकाने में इनकी तरफ से अनियमितता बरती गई.

लेकिन कई कंपनियां बैंक के्रडिट की कमी और लोन डिफाल्ट के कारण भी बंद हुईं. उधर कंपनियां बंद हुईं और इधर उनमें काम करने वाले लोग बेरोजगार हो गए. कहा जाता है कि किसी भी क्षेत्र में बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा नए अवसर पैदा करती है, लेकिन दूरसंचार क्षेत्र में ठीक इसका उल्टा हुआ. हाल के दिनों में इस क्षेत्र के कर्मचारियों को सबसे ज्यादा छंटनी के दौर से गुजरना पड़ा है. कभी रोजगार सृजन का प्रमुख क्षेत्र रहने वाला दूरसंचार अभी नौकरियों के मामले में सबसे ज्यादा बदहाली के दौर से गुजर रहा है.

रिलायंस-जीयो की धमक के आगे बाकी सभी कंपनियों को घुटने टेकने पड़े. घाटे और मंदी से हुई शुरुआत ने इस क्षेत्र को गर्त की ओर अग्रसर कर दिया और इसी का परिणाम है कि बीते एक साल में दूरसंचार क्षेत्र से करीब 40 हजार नौकरियां जा चुकी हैं. रिलायंस टेलीकॉम के बाद एअरसेल को भी 6 महत्वपूर्ण सर्कल्स में अपनी सेवाएं बंद करनी पड़ी. इस कंपनी पर 20 हजार करोड़ का कर्ज था. एअरसेल के बंद होने से टेलीकॉम सर्विस पर तो असर पड़ा ही, इससे जुड़े हुए कर्मचारियों के सामने भी बेराजगारी वाली स्थिति उत्पन्न हो गई.

इस क्षेत्र से नौकरियां जाने का यह क्रम आगे भी बना रहने वाला है. इसी साल जनवरी महीने में आई बेंगलुरु स्थित सीआईईल एचआर सर्विसेज की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगले 6 से 9 महीनों में दूरसंचार क्षेत्र से 50 हजार और नौकरियां जाने वाली हैं. इसप्रकार 2017 के बाद 2018 बीतते-बीतते दूरसंचार क्षेत्र में काम करने वाले करीब एक लाख लोग नौकरियों से हाथ धो बैठेंगे. पूरे दूरसंचार क्षेत्र पर अभी करीब 5 लाख करोड़ का कर्ज है. कई कंपनियां इससे उबर पाने की स्थिति में नहीं हैं और इसलिए वो बंद होने की कगार पर हैं, दूसरी तरफ कुछ कंपनियां किसी अन्य कंपनी के साथ मर्जर कर रही हैं. कुछ समय पहले ही एयरटेल ने टेलिनॉर इंडिया और टाटा टेलिसर्विसेज को खरीदा था. अब भारत की दूसरी सबसे बड़ी टेलिकॉम कंपनी वोडाफोन इंडिया और तीसरी सबसे बड़ी कंपनी आइडिया का मर्जर होना है. कंपनियां चाहे बंद हों, या उनका मर्जर हो, दोनों ही स्थितियों में कर्मचारियों के हाथ से नौकरी जाएगी.

फिसड्‌डी साबित हुईं स्वरोज़गार वाली पीएम मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाएं

लक्ष्य भटक गई मुद्रा योजना

मुद्रा योजना का लक्ष्य उन लोगों को स्वरोजगार देना था, जो पूंजी की कमी के कारण अपना कोई उद्यम या उपक्रम शुरू नहीं कर पाते. लेकिन एक तरफ इस योजना के जरिए अपने अच्छे दिनों का सपना देख रहे लोगों की उम्मीदें टूट रही हैं, तो दूसरी तरफ बैंकों के अधिकारी मनमाने तरीके से मुद्रा योजना के पैसों का बंदरबांट कर रहे हैं. बीते फरवरी में राजस्थान के बाड़मेर से खबर आई कि वहां के पंजाब नेशनल बैंक के ब्रांच मैनेजर ने बिना जांच पड़ताल किए 26 संदिग्ध लोगों को मुद्रा योजना के तहत 62 लाख का लोन दे दिया. उससे पहले के ब्रांच मैनेजर ने तो करीब 22 लाख रुपए अपनी पत्नी, मां और भाई के खातों में ट्रांसफर कर दिया था. इस मामले में अब सीबीआई जांच कर रही है. घपलों और अनियमितता से इतर अगर बात करें, तो जिस तरह से आंकड़ेबाजी करके मुद्रा योजना की सफलता दिखाई जा रही है, असलियत में वैसा नहीं है. इस योजना के तहत तीन श्रेणियों में लोन दिए जाते हैं.

50 हजार तक के लोन को शिशु श्रेणी, 50 हजार से 5 लाख तक के लोन को किशोर श्रेणी और 5 लाख से 10 लाख तक के लोन को तरुण श्रेणी कहा जाता है. अब तक के लोन वितरण के आंकड़ों पर गौर करें, तो पता चलता है कि मुद्रा योजना के तहत दिए गए लोन में से 92 फीसदी शिशु श्रेणी के, 6.7 फीसदी किशोर श्रेणी के और मात्र 1.4 फीसदी तरुण श्रेणी के लोन हैं. जिस शिशु श्रेणी के तरहत 92 फीसदी लोन वितरित किए गए उनका भी औसत काफी कम है. 2015-16 में इसका औसत 19 हजार और 2016-17 में 23 हजार था. गौर करने वाली बात यह भी है कि 30 जून 2017 तक मुद्रा योजना के तहत दिए गए लोन में से 39 लाख 12 हजार रुपए एनपीए हो गए हैं, यानि उनके वापस लौटने की कम संभावना के मद्देनजर बैंकों ने उन्हें बट्‌टे खाते में डाल दिया है. ये सब उस योजना के आंकड़े हैं, जिसकी सफलता को लेकर आए दिन सत्ताधारी पार्टी के नेता और यहां तक की प्रधानमंत्री भी ढोल पीटते रहते हैं.

रफ्तार नहीं पकड़ सकी स्टार्टअप इंडिया

स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि लोगों के पास बहुत से आइडियाज हैं, मौका मिले तो वे कमाल करके दिखा सकते हैं. स्टार्टअप इंडिया के जरिए हमारी कोशिश देश के युवाओं को जॉब सीकर से जॉब क्रिएटर बनाने की है. अफसोस कि स्टार्टअप को लेकर देखा गया प्रधानमंत्री का सपना टूट रहा है. हाल में आई संसदीय समिति की रिपोर्ट में स्टार्टअप को लेकर जो बातें कही गई हैं, उनसे इस योजना के कार्यान्वयन पर सवालिया निशान लगते हैं.

इस रिपोर्ट के अनुसार, 6 फरवरी 2018 तक डीआईपीपी यानि औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग ने 6981 स्टार्टअप चयनित किए थे, लेकिन उनमें से मात्र 99 स्टार्टअप्स को फंड और मात्र 82 को कर्जमाफी के सर्टिफिकेट आवंटित किए गए हैं. मार्च 2019 के लिए डीआईपीपी ने 100 नए स्टार्टअप्स की मदद का लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन अब तक के प्रदर्शन को देखते हुए इस लक्ष्य को प्राप्त करना भी मुश्किल ही लग रहा है.

ऐसा भी नहीं है कि स्टार्टअप्स को फंड मिलना ही उनकी सफलता की गारंटी है. सरकार की तरफ से ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि एक बार जिन्हें फंड दे दिया गया, उनकी स्थिति की पड़ताल की जा सके. आईबीएम की रिपोर्ट बताती है कि वित्तीय कमी के कारण 90 फीसदी स्टार्टअप शुरू होने के पांच साल के भीतर बंद हो जाते हैं. स्टार्टअप इंडिया के प्रचार-प्रसार को लेकर सरकार की सुस्ती पर भी संसदीय समिति ने सवाल उठाया है. 2017-18 में स्टार्टअप इंडिया के प्रचार-प्रसार के लिए 10 करोड़ आवंटित किए गए थे, लेकिन इनमें से मात्र 4 लाख रुपए ही खर्च हो पाए. इन आंकड़ों के जरिए स्वरोजगार सृजन के प्रयासों को लेकर सरकार की उदासीनता सहज ही समझी जा सकती है.

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