भाजपा की अंदरूनी दुर्गति दूर करने लखनऊ पहुंचे राष्ट्रीय अध्यक्ष: खाली सिर पर ठीकरे का डर!

amit-shah2019  के लोकसभा चुनाव की कवायद में उतरने के पहले उत्तर प्रदेश में भाजपा की अंदरूनी दुर्गति को दुरुस्त करने के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को मैदान में उतरना पड़ा. अमित शाह भी क्या-क्या ठीक करेंगे..! गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उप चुनाव में वहां के निवर्तमान सांसदों क्रमशः योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य की पसंद को ठोकर पर रखने का नतीजा हार में भुगतना पड़ा.

क्या शाह उसे ठीक करेंगे या योगी के कामकाज में अड़ंगा डाल रहे उप मुख्यमंत्री मौर्य को ठीक करेंगे! सत्ता से लेकर संगठन तक अराजकता का सृजन करने वाले प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल को ठीक करेंगे या ओमप्रकाश राजभर और अनुप्रिया पटेल जैसे अतिमहत्वाकांक्षी सहयोगी को मेढ़क बनने से रोकेंगे! अमित शाह पार्टी में गहराते जा रहे पुराने बनाम नए का अंतरविरोध ठीक करेंगे या दलित बनाम पिछड़ा बनाम अगड़ा का रगड़ा ठीक करेंगे! एक पुराने भाजपाई ने कहा कि अमित शाह आखिर क्या-क्या ठीक करेंगे, सारा रायता तो उन्हीं का फैलाया हुआ है, वे कहां-कहां पोछेंगे! सुनील बंसल को तरजीह शाह ने दी. योगी बनाम मौर्य भेद को शह शाह ने दी.

पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और दूसरी पार्टियों से नेताओं की घुसपैठ शाह ने कराई, फिर शाह ही उन गंदगियों को कैसे लीपेंगे! इस तरह के कई सवाल हैं, जिसमें भाजपा उलझी हुई है और जवाब अकेले अमित शाह को देना है. चुनाव सामने है और समय कम है. अगर समय रहते इसे दुरुस्त नहीं किया गया तो भारतीय जनता पार्टी बाहरी गठबंधन और तालमेल से नहीं, अंदरूनी विरोधाभास और अराजकता में ही धंस जाएगी.

पिछले दिनों लखनऊ पहुंचे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बैठक दर बैठक की और फेरबदल के संकेत देते हुए हाथ हिलाते हुए कर्नाटक के लिए उड़ गए. शाह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ भी लंबी बैठक की. पार्टी के जानकार नेताओं ने कहा कि शाह को सरकार से अधिक पार्टी की गिरती साख की चिंता थी और बैठकों में वे इसी चिंता के समाधान की दिशा में रास्ता तलाश रहे थे. पार्टी के नेता भी मान रहे हैं कि पार्टी की अंदरूनी स्थिति का जायजा लेकर लौटे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह शीघ्र ही प्रदेश भाजपा में संगठनात्मक ‘सर्जरी’ करेंगे और बीमार हिस्सों को काट फेकेंगे.

ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार और संगठन की साख के साथ खेलने वाले नेता-कार्यकर्ता जल्दी ही किनारे किए जाएंगे. कुछ मंत्रियों को भी सरकार से अलग कर उन्हें संगठन के काम में लगाने की रणनीति पर शाह की मुख्यमंत्री से बात हुई है. सरकार में फेरबदल की प्रक्रिया में दलित और पिछड़ी जाति के नेताओं को शामिल करने की संभावना है. बात यहां तक है कि प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पांडेय को हटा कर किसी दलित या पिछड़ी जाति के नेता को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाए.

सरकार और संगठन के बीच संवाद और समन्वय की स्थिति इतनी बदरूप हो गई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को योगी से पूछताछ करनी पड़ी. उत्तर प्रदेश में लोकसभा की दो सीटों पर हुए उपचुनावों में भाजपा की हार और दलित सांसदों के असंतोष-पत्र को प्रधानमंत्री ने काफी गंभीरता से लिया और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से तत्काल प्रभाव से ‘क्राइसिस-मैनेजमेंट’ पर मंत्रणा की. मोदी ने योगी से यूपी के हालात के बारे में जब सीधी बात की तभी यह संकेत मिल गया था कि सरकार और संगठन में फेरबदल सन्निकट है.

इसके बाद ही हालात का जायजा लेने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दो वरिष्ठ पदाधिकारियों को यूपी भेजा गया था. संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी कृष्ण गोपाल और दत्तात्रेय होसबोले ने यूपी आकर भाजपा कार्यकर्ताओं, संघ के सदस्यों, पार्टी पदाधिकारियों, मंत्रियों और दोनों उप मुख्यमंत्रियों से मुलाकात की थी. संघ की रिपोर्ट मिलने के बाद ही अमित शाह का लखनऊ दौरा तय हुआ.

भाजपा संगठन को पड़ रहा दौरा, इसीलिए हुआ शाह का दौरा

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का लखनऊ दौरा ऐसे समय हुआ है, जब पार्टी का अंदरूनी दौरा काफी बढ़ गया. हृदय गति रुक न जाए, इसलिए शाह को लखनऊ आना पड़ा. साफ है कि संगठन और सरकार के सामने तमाम चुनौतियां आ पड़ी हैं, हालांकि इसके लिए दोषी भी पार्टी के शीर्ष नेता ही हैं. 2019 का लोकसभा चुनाव सामने है, लेकिन उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हालात 2014 जैसे कतई नहीं हैं. तब पार्टी के नेता-कार्यकर्ता सब एकजुट थे, लेकिन अब नेता-कार्यकर्ता दोनों असंतुष्ट और उपेक्षित हैं. अभी राज्यसभा में तो पार्टी ने अपना तिकड़म साध लिया, लेकिन विधान परिषद चुनाव में एक साथ इतनी महत्वाकांक्षाएं टकराने लगीं कि पार्टी नेतृत्व बौखला गया. किसे ले जाएं और किसे छोड़ें का संकट खड़ा हो गया.

भाजपा अपने ही सांसदों-विधायकों और सहयोगी दलों के बागी तेवर से आक्रांत है. इसी की छटपटाहट है कि अमित शाह भाग कर लखनऊ आ रहे हैं और इस बार सांसदी का टिकट देने में अभी से सतर्कता बरत रहे हैं. इस सतर्कता के कारण कई सांसद अपना पत्ता कटता हुआ देख रहे हैं. वही सांसद पार्टी के लिए चुनौती भी बन रहे हैं. पार्टी को रिपोर्ट गई है कि कई सांसदों की छवि उनके अपने ही संसदीय क्षेत्र में ठीक नहीं है और कार्यकर्ताओं में उनके खिलाफ नाराजगी है. दो दर्जन से अधिक सांसद ऐसे हैं जिनके खिलाफ आलाकमान के पास रिपोर्ट पहुंची है.

स्वाभाविक है कि इनका टिकट कटेगा और भाजपा को इनका विरोध और भितरघात झेलना पड़ेगा. विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत ने सांसदों के नाकारेपन को पैबंद की तरह ढंकने का काम किया, लेकिन पैबंद से आखिर कबतक काम चले! निकाय चुनावों में सांसदों का नाकारापन जमीनी स्तर पर उजागर हुआ और इससे भाजपा की काफी किरकिरी हुई. भाजपा को इस किरकिरी को छुपाने के लिए आंकड़ों की तमाम बाजीगरी करनी पड़ी. वह भी जनता के समक्ष उजागर हो गई. नकारात्मक छवि वाले सांसदों की सूची आलाकमान के पास जा चुकी है. उन नामों के बरक्स बेहतर छवि वाले नाम जांचे-परखे जा रहे हैं. शाह की बेचैनी इस वजह से भी है.

अमित शाह ने लखनऊ आकर भाजपा के सहयोगी दल भारतीय समाज पार्टी (सुहेलदेव) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर और अपना दल की नेता केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल व उनके पति आशीष पटेल से भी मुलाकात की. आशीष पटेल अपना दल के अध्यक्ष हैं और विधान परिषद की सीट पाने के लिए व्याकुल हैं. दलितों की भावना की भरपाई के लिए अमित शाह ने लखनऊ आते ही ज्योतिबा फुले की प्रतिमा पर जाकर माल्यार्पण किया. फुले की प्रतिमा मायावती के शासनकाल में स्थापित हुई थी. राजनीति की बाल की खाल निकालने वाले विशेषज्ञ कहते हैं कि मायावती को न्यूट्रल करने की सियासी जुगत भी साथ-साथ चल रही है. फुले की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर अमित शाह ने अपनी पार्टी की सांसद सावित्रीबाई फुले के विद्रोही तेवर पर भी पानी डालने की कोशिश की.

शाह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय, राष्ट्रीय सह महामंत्री संगठन शिवप्रकाश और प्रदेश संगठन मंत्री सुनील बंसल के साथ अलग-अलग बैठकें की और सबसे अलग-अलग जायजा लिया. शाह ने दूसरे चरण की बैठक दोनों उप मुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य और डॉ. दिनेश शर्मा के साथ की. तीसरे चरण की बैठक में सहयोगी दलों के नेता शामिल हुए. अंतिम चरण में संगठन के सभी प्रदेश महामंत्रियों को मुख्यमंत्री आवास पर ही बुलावा भेज कर शाह ने उनसे मुलाकात की और बातचीत की.

सहयोगी दल के नेताओं ने शाह से मुलाकात में अपनी मांगें और शर्तें रखीं. लोकसभा चुनाव के नजदीक आने से सहयोगी दल अब अपना भाव चढ़ाने लगे हैं. भारतीय समाज पार्टी (सुहेलदेव) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने तो राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने सात मांगें रख दीं. साथ ही राजभर ने पिछड़ों के 27 प्रतिशत आरक्षण में अति पिछड़ी जातियों का कोटा तय करने और 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की खैरख्वाही की. यह मांग सपा की थी. सपा सरकार के कार्यकाल में ही इन जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था. राजभर ने कह दिया कि भाजपा गठबंधन धर्म नहीं निभा रही है.

राजभर ने तमाम जगह योगी सरकार की खिल्ली उड़ाई. सरकार पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और कहा कि प्रदेश के नौकरशाह जन प्रतिनिधियों को सेंट नहीं रहे हैं. राजभर के बिगड़े बोल को चुनाव के पहले के मोल-जोल के रूप में देखा जा रहा है. ओमप्रकाश राजभर योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. फिर भी उनके बिगड़े बोल से प्रदेश की राजनीति का माहौल बिगड़ रहा है. राजभर के बयानों की वजह से भाजपा नेता अनुशासन और मर्यादा के उल्लंघन पर सीधे उंगली उठा रहे हैं. योगी सरकार पर अनाप-शनाप आरोप लगाने वाले राजभर ने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लखनऊ आने के पहले कहा कि शाह का इंजेक्शन भी कारगर नहीं हुआ तो 2019 के चुनाव में भाजपा का बुरा हश्र होगा. राजभर ने भाजपा आलाकमान को चुनौती दी कि उनकी शिकायतें दूर की जाएं नहीं तो ‘2019 में सब ठीक कर देंगे’.

राजभर कहते हैं कि उन्होंने भाजपा रूपी गाय को ‘चारा’ खिलाया है तो ‘दूध’ कौन पीयेगा! दूसरी तरफ नौ विधायकों और दो सांसदों वाला अपना दल भी बगावती तेवर अख्तियार किए है. अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने अपने पति आशीष पटेल को विधान परिषद भेजने की मांग के साथ-साथ प्रदेशभर में 50 फीसदी से अधिक अन्य पिछड़ा वर्ग के जिलाधिकारियों, पुलिस अधीक्षकों और थानेदारों को तैनात करने की मांग कर डाली.

पूर्वोत्तर राज्यों में विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ के इस्तेमाल और वहां मिली जीत और यूपी के उपचुनावों में हार के बाद अमित शाह का यह पहला यूपी दौरा था. कर्नाटक विधानसभा चुनाव की जद्दोजहद के बीच शाह का लखनऊ आना यह बताने के लिए काफी था कि प्रदेश भाजपा का माहौल अंदरूनी तौर पर इतना विद्रूप हो चुका है कि शाह को लखनऊ के लिए समय निकालना पड़ा. दलित एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विपक्ष ने जिस तरह दलित ध्रुवीकरण की राजनीति गरमाई उससे भाजपा का चिंतित होना स्वाभाविक था. भाजपा आलाकमान की चिंता और इसलिए भी गहरा गई कि दलित मुद्दे पर भाजपा के चार सांसदों ने भी मुखर विरोध शुरू कर दिया. इन चार सांसदों में तीन तो यूपी के ही हैं. दूसरी तरफ ओम प्रकाश राजभर और अनुप्रिया पटेल के भगेड़ू संकेतों ने भाजपा आलाकमान को सकते में डाल रखा है.

सपा और बसपा के तालमेल और भविष्य में कांग्रेस के भी गठबंधन में शामिल होने की संभावनाओं से भाजपा नेतृत्व अलग ही परेशान है. भाजपा सरकार अति पिछड़ों और अति दलितों को अलग से आरक्षण देने की तैयारी कर ही रही थी कि दलित-मुस्लिम गोलबंदी का मसला भाजपा के सिर आ गिरा. भाजपा सांसद सावित्री बाई फुले ने भारतीय संविधान और आरक्षण बचाओ आंदोलन शुरू करने की घोषणा करके भाजपा का सिरदर्द और बढ़ा दिया. दलितों की अनदेखी के बहाने सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्‌ठी लिख दी. उनका आरोप है कि भाजपा शासनकाल में दलितों के लिए कोई काम नहीं हुआ.

सांसद सावित्री बाई फुले ने तो लखनऊ में रैली तक कर दी. इटावा के सांसद अशोक दोहरे ने आरोप लगा दिया कि भारत बंद के बहाने दलितों पर झूठे मुकदमे ठोके जा रहे हैं. पार्टी के नेता कहते हैं कि भाजपा के अंदर की मोर्चेबंदी संगठन और सरकार दोनों को परेशान कर रही है. भाजपा अपने शीर्ष नेताओं की करतूतों के कारण अपने ही लोगों से मुसीबत में घिर गई है. स्थिति यहां तक आ पहुंची कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कई नेताओं से हलफनामा तक लिखवाना पड़ा है.

खाई पाटने की कोशिश पर संदेह, आशंकाओं से घिरे हैं कार्यकर्ता

उपेक्षा और अनादर से फैले असंतोष को कम करने और खाई पाटने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और जिला पदाधिकारियों को जिम्मेदारी के काम पर लगाया जा रहा है. सेक्टरों में बांट कर बूथ समितियों के स्तर तक फिर से ‘सबकुछ ठीक’ करने की कोशिश की जा रही है. संगठन के पेंच कसने की पूरी कवायद हो रही है, लेकिन अंदरूनी दरार इतनी बढ़ गई है कि 2019 तक शायद ही इसकी भरपाई हो सके. सभी स्तर पर पार्टी को पुनर्गठित करने की कवायद कम मुश्किल और अंतरविरोधों से भरी नहीं है. विजय दंभ में पार्टी ने अपने जिस आनुषांगिक संगठन की उपेक्षा शुरू कर दी, आखिरकार उसी की शरण में जाकर मदद ली जा रही है.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ क्षेत्रवार समन्वय बैठकें कर रहा है. पार्टी कार्यकर्ताओं को सामाजिक समीकरणों पर खास ध्यान रखने की हिदायत दी जा रही है. पिछड़ों और दलितों पर पार्टी फोकस कर रही है और दलित पिछड़ा बहुल इलाकों में उसी समुदाय का पदाधिकारी नियुक्त करने की कसरत भी चल रही है. हार और हताशा से सचेत हुई पार्टी अब निष्क्रिय कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को बाहर करने और प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने के रास्ते पर आती दिख रही है. एक भाजपाई ने कहा कि रास्ते पर आ जाए तब समझिए कि अब ठीक हो रहा है, उसके पहले कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता. यह बात कार्यकर्ताओं के संदेह और आशंकाओं से घिरे होने का संकेत देती है.

सपा निश्चिन्त, कांग्रेस सुगबुगाई, शाह का डर स्वाभाविक

बसपा से गठबंधन करके और उप चुनाव में दो सीटें जीत कर समाजवादी पार्टी निश्चिन्त हो गई. बसपा का ध्यान विधान परिषद में कम से कम एक सीट हासिल करने पर लगा है. दूसरी तरफ कांग्रेस जमीनी स्तर पर सुगबुगाहट दिखाने लगी है. कांग्रेस का कोई नया प्रदेश अध्यक्ष अब तक नहीं चुना गया है. प्रदेश संगठन में कई और फेरबदल अपेक्षित और प्रतीक्षित हैं, लेकिन कांग्रेस ने अपने पूर्व अध्यक्ष राज बब्बर को ही मैदान में उतार दिया है. आप जानते ही हैं कि राज बब्बर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं.

खनन माफियाओं का विरोध करने वाले कांग्रेस नेता अजय कुमार लल्लू से राज बब्बर ने पिछले दिनों देवरिया जेल जाकर मुलाकात की और कुशीनगर के विरवट कोन्हवलिया बंधे पर ग्रामीणों के साथ धरने पर बैठ गए. खनन माफियाओं के खिलाफ 64 दिनों तक धरना देने के कारण कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता अजय कुमार लल्लू को गिरफ्तार कर लिया गया था.

राज बब्बर ने आरोप लगाया कि चुनावी चंदे के लिए यूपी सरकार और संगठन खनन माफिया को तरजीह दे रही है. बजट सत्र के दरम्यान भी यह मामला विधानसभा में उठा था, लेकिन सरकार ने समय रहते कार्रवाई नहीं की. वैध खनन के कारण कई गांव खतरे में हैं. विडंबना यह है कि कुशीनगर बाढ़ खंड के अधिशासी अभियंता ने भी जिलाधिकारी को पत्र लिखकर अवैध खनन की शिकायत की थी और इसके खतरे से आगाह करते हुए इसे तत्काल रोकने की मांग की थी.

अभियंता ने लिखा था कि विरवट कोन्हवलिया में अवैध खनन कर गंडक नदी से बालू निकाला जा रहा है, जबकि उस जगह से बंधे की दूरी महज 200 मीटर है. अवैध खनन से बांध को बेहद खतरा है. अहिरौलीदान-पिपराघाट तटबंध बहुत संवेदनशील है और यह यूपी और बिहार की सीमा को जोड़ता है. खनन माफिया पर कार्रवाई करने के बजाय जिला प्रशासन ने उल्टा विधायक समेत 30 नामजद ग्रामीणों और तीन सौ अज्ञात लोगों पर सरकारी काम में बाधा डालने, बलवा के लिए उकसाने और गाड़ियों में तोड़फोड़ करने समेत गंभीर धाराओं में मुकदमा ठोक दिया.

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी बसपा से गठबंधन करने के बाद उसी में मगन है. अब सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी पार्टी में मायावती का काम कर रहे हैं. जिस तरह मायावती अपनी पार्टी में सोशल इंजीनियरिंग पढ़ाती थीं, उसी तरह अब अखिलेश अपनी पार्टी की बैठकों में सोशल इंजीनियरिंग पढ़ा रहे हैं. सपा के नेता और कार्यकर्ता सोशल इंजीनियरिंग पर अखिलेश-संबोधन सुनने के लिए विवश हैं.

एक सपाई ने कहा कि यह सोशल इंजीनियरिंग का पाठ नहीं है, यह तो मायावती-इंजीनियरिंग का पाठ है जिसे सपाइयों को घोंटाया जा रहा है. लगातार हो रही बैठकों में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव गठबंधन धर्म का पालन करने की सीख देते हुए सोशल इंजीनियरिंग की पाठशाला चला रहे हैं. जिस सोशल इंजीनियरिंग का मजाक उड़ाते हुए अखिलेश सत्ता तक पहुंचे थे, अब उसी को सामाजिक सद्भाव और लोकतंत्र की मजबूती का आधार बता रहे हैं.

सपाई इसे पचा नहीं पा रहे हैं, ऊपर-ऊपर अखिलेश का ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ सुनने के लिए विवश हैं. अखिलेश कहते हैं कि भाजपा द्वारा की जा रही ध्रुवीकरण की राजनीति से जनता को सचेत और सतर्क करने की जरूरत है. ऐसा कहते हुए अखिलेश दलित-मुस्लिम ध्रुवीकरण की सपा-बसपा की कोशिशों के बारे में अपने नेता-कार्यकर्ताओं के मन में बैठी जिज्ञासा शांत नहीं करते. अखिलेश सपा-बसपा गठबंधन को तोड़ने की कोशिशों से काफी चिंतित भी हैं. राज्यसभा चुनाव में जया बच्चन को जितवा कर और बसपा प्रत्याशी को हरवाकर उन्होंने जो गलती की उसकी भरपाई वे विधान परिषद चुनाव में करके किसी तरह गठबंधन को बचाए रखने के प्रयास में लगे हैं.

जिस सोशल इंजीनियरिंग का रट्‌टा अब सपा में लग रहा है, 2014 के लोकसभा चुनाव में वह भाजपा की तरफ शिफ्ट कर गया था. उस हस्तांतरण में सवर्ण, पिछड़ा और दलित समाज सब एकजुट होता दिखा और नतीजा यह हुआ था कि उस लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 73 सीटें जीत कर रिकॉर्ड कायम किया. भाजपा ने तब 42 प्रतिशत वोट पाए थे. लेकिन इन पांच वर्षों में भाजपा के सोशल इंजीनियरिंग में भी सेंध लग गई. 2019 का लोकसभा चुनाव अब नजदीक दिखने लगा है.

इस कारण सियासी समीकरणों पर चर्चा, कयासबाजियां और अफवाहों की कलाबाजियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं. इस बार लोकसभा चुनाव में यूपी किसके सिर पर ताज रखेगा और कौन धराशाई होगा, इसे लेकर विश्लेषण और आकलन अभी से किए जाने लगे हैं. लड़ाई के केंद्र में भाजपा तो है, लेकिन वह अंदर और बाहर दोनों तरफ से चक्रव्यूह में फंसती जा रही है.

2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीत का रिकॉर्ड बनाया. लेकिन शीर्ष नेताओं में जीत का दंभ इतना गहराया कि साख नीचे के रास्ते जाने लगी. सियासत का पैमाना और स्तर तेजी से बदलने लगा. पार्टी की कमान अब भी उसी अमित शाह के हाथ में है, जिन्हें जीत का श्रेय मिलता गया, लेकिन अब हार का ठीकरा भी उन्हीं के माथे फूटना है, इसके लिए अमित शाह को तैयार रहना पड़ेगा. 73 लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा को इस बार कम सीटें मिलीं तो अमित शाह की क्या दशा होगी, यह अभी से साफ-साफ दिखने लगा है.

भाजपा के गले की फांस बन रहा अपना दल

–संतोष देव गिरि

परिवारवाद को बढ़ावा देने की बिना पर अपनी मां और बहन से किनारा कर लेने वाली अनुप्रिया पटेल आज खुद परिवारवाद की ही राह पर चलते हुए अपने पति आशीष पटेल को राजनीति में स्थापित करने में लगी हुई हैं. अपने नेतृत्व वाले अपना दल (एस) का अध्यक्ष बनाने के बाद अब अनुप्रिया अपने पति को विधान परिषद के रास्ते मंत्री बनाने का जुगाड़ निकालने में जुटी हैं. मिर्जापुर से सांसद चुने जाने के बाद केंद्र में राज्यमंत्री बनीं अनुप्रिया पटेल यूपी के गाजीपुर से विधायक और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री व भारतीय समाज पार्टी (सुहेलदेव) के नेता ओमप्रकाश राजभर की तरह भाजपा पर दबाव बना रही हैं.

2019 का लोकसभा चुनाव नजदीक है, लिहाजा भाजपा दबाव में आ भी सकती है. उप चुनाव में हारी भाजपा लोकसभा चुनाव में कोई जोखिम उठाना नहीं चाह रही है. भाजपा की ही तरह उसके सहयोगी दलों में भी असंतोष है. पूर्वांचल के मिर्जापुर लोकसभा सीट से सांसद चुने जाने के बाद अपना दल ने यूपी विधान सभा चुनाव में नौ सीटें जीतीं. स्वाभाविक है कि अब अनुप्रिया अपनी पार्टी के प्रभाव क्षेत्र में विस्तार चाहती हैं.

अनुप्रिया अपने पति को विधान परिषद भेजने के प्रयास में हैं. इसके पहले फूलपुर लोकसभा सीट के उप चुनाव में उन्होंने अपने पति आशीष पटेल को चुनाव मैदान में उतारने का प्रयास किया था, लेकिन भाजपा इस उप चुनाव में किसी सहयोगी पार्टी को प्रत्याशी बनाने को तैयार नहीं थी. चर्चा है कि अनुप्रिया पटेल भाजपा आलाकमान पर दबाव बनाने में नाकाम हुईं तो आने वाले दिनों में अपना दल (एस) सपा-बसपा गठबंधन में शामिल हो सकता है.

हालांकि अनुप्रिया को यह भी डर है कि ऐसा करने से उसके कम से कम आधा दर्जन से अधिक विधायक भाजपा में शामिल हो जाएंगे और उन पर दलबदल कानून लागू भी नहीं हो पाएगा. अपना दल (एस) के कुछ विधायक तो अपनी गाड़ी पर बाकायदा भाजपा का झंडा भी लगाकर चल रहे हैं. अपना दल (एस) की बागडोर जबसे आशीष पटेल के हाथों सौंपी गई है, तबसे पार्टी में असंतोष का माहौल है. यह असंतोष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा जहानाबाद (फतेहपुर) के अपना दल विधायक जयकुमार जैकी को राज्यमंत्री बनाए जाने के कारण है. असंतोष इसलिए है क्योंकि कई वरिष्ठ विधायक मंत्री होने से रह गए. प्रतापगढ़ में भी पार्टी को अप्रिय स्थिति झेलनी पड़ी और आखिरकार प्रदेश अध्यक्ष हटाए गए. दूसरी ओर अपना दल से सांसद चुने गए कुंवर हरिवंश सिंह से बनी दूरी भी अब कोई छुपी बात नहीं है.

वाराणसी का रोहनियां इलाका, जो कभी अपना दल के संस्थापक स्वर्गीय सोनेलाल पटेल का घर हुआ करता था, आज बिखर चुका है. पिता की कर्मभूमि रोहनियां विधानसभा सीट से 2012 में विधायक चुनी गईं अनुप्रिया पटेल 2014 के चुनाव में मिर्जापुर से सांसद बनीं, लेकिन उनके परिवार के लिए रोहनियां सीट बरकरार रखना मुहाल हो गया. रोहनियां विधानसभा सीट पर अनुप्रिया की मां कृष्णा पटेल मैदान में उतरीं तो मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया. केंद्र में स्वास्थ्य राज्यमंत्री होने के बावजूद अनुप्रिया पटेल ने अपने संसदीय क्षेत्र में स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई काम नहीं किया. इसके अलावा जिले में वर्षों से लंबित पड़ी विकास परियोजनाओं के बारे में कोई पूछने वाला नहीं है. जिले में स्वास्थ्य विभाग की लचर व्यवस्था जगजाहिर है.

संगठन मंत्री सुनील बंसल का पार्टी में विरोध बढ़ा

संगठन मंत्री सुनील बंसल की सरकार में सीधी दखलंदाजी और तमाम अन्य शिकायतों को लेकर दिल्ली तक शिकायतों का पुलिंदा जमा हो चुका है. गोरखपुर और फूलपुर संसदीय उप चुनाव में योगी और मौर्य की पसंद का उम्मीदवार नहीं देने के फैसले के पीछे सुनील बंसल की मुख्य भूमिका देखी जा रही है, जिसका खामियाजा पार्टी ने भुगत लिया. अब इस फैसले का खामियाजा सुनील बंसल के भुगतने की बारी है. पार्टी के ही नेता कहते हैं कि सुनील बंसल की गुटबाजी के कारण संगठन में खेमेबंदियां और अराजकता बढ़ी है.

इस वजह से पार्टी की साख नीचे गिरी है. दलालों, बिल्डरों, खनन और भूमाफियाओं से सम्पर्क के कारण भाजपा में भी एक गायत्री प्रजापति होने के चर्चे सरेआम हैं. इनका विरोध करने के कारण संघ के वरिष्ठ सदस्य और क्षेत्र प्रचारक शिवनारायण को हटाए जाने से भी नेताओं-कार्यकर्ताओं में भीषण नाराजगी है. इन बातों को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संगठन महामंत्री सुनील बंसल के बीच बढ़ी तल्खी, संगठन और सरकार दोनों को गहरे विवाद के घेरे में ले रही है.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन
शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...

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