धर्म की जमीन पर जमेगा सियासी अखाड़ा

2019 के प्रयाग कुम्भ मेले को अभूतपूर्व बनाने में लगे योगी-धर्म की जमीन पर जमेगा सियासी अखाड़ा

yogi2019 के लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में भारतीय जनता पार्टी लोगों को व्यापक पैमाने पर अपने साथ भावनात्मक रूप से जोड़ने के लिए हिंदू आस्था से गहरे जुड़े कुम्भ को इस बार विशाल, विशेष और व्यक्तित्व केंद्रित करने की योजना बना रही है. कुम्भ के केंद्र में इस बार आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर, आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव, योग गुरु बाबा रामदेव, गंगा मुक्ति अभियान के गुरु स्वामी चिदानन्द सरस्वती रहेंगे. देश-दुनिया के ख्यातिलब्ध संत-महात्माओं के अलावा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत रहेंगे. इस बार भाजपा शासित राज्यों के सभी मुख्यमंत्री 2019 के प्रयाग कुम्भ में आ रहे हैं.

कुम्भ के जरिए हरित पर्यावरण पर भी व्यापक प्रयोग हो रहा है. धार्मिक आस्था के इस अवसर को हरित-कुम्भ बनाने की तैयारी चल रही है. गंगा के किनारे विस्तृत क्षेत्र में वृक्ष लगाने की योजना है. वृक्षारोपण की जिम्मेदारी स्वामी चिदानन्द सरस्वती के परमार्थ निकेतन और गंगा एक्शन परिवार ने उठाई है. प्रयाग कुम्भ चार फरवरी 2019 से चार मार्च 2019 तक चलेगा. आध्यात्मिक तौर पर इस बार का कुम्भ अर्धकुम्भ की श्रेणी में है, लेकिन सरकार ने इसे पूर्ण कुम्भ का दर्जा दे दिया है. स्वाभाविक है कि इस महाआयोजन के पीछे 2019 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक मंशा भी निहित है. अधिक संभावना है कि 2019 का लोकसभा चुनाव कुम्भ के तुरंत बाद ही हो.

पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ऋृषिकेश में परमार्थ निकेतन पहुंचे और स्वामी चिदानंद सरस्वती के साथ बैठ कर कुम्भ के भव्य आयोजन को लेकर विचार-विमर्श किया, उसी समय यह स्पष्ट हो गया था कि इस बार कुम्भ के आयोजन का राजनीतिक महत्व भी है. हालांकि कुम्भ को लेकर सभी सरकारें हमेशा गंभीर रही हैं, लेकिन इस बार की गंभीरता आम लोगों को अधिक से अधिक भाजपा की तरफ आकर्षित करने की है.

ऋृषिकेश में मुलाकात के बाद दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने कहा कि गंगा और हिमालय देश की दिव्यता और भव्यता के प्रतीक हैं. इसे हर हाल में बरकरार रखना है और कुम्भ के जरिए श्रद्धालुओं तक ऐसा ही संदेश पहुंचाना है. दोनों मुख्यमंत्रियों की स्वामी चिदानंद के साथ हुई बैठक में गंगा नदी का प्रवाह अविरल बनाए रखने, गंगा को प्रदूषण मुक्त करने, गंगा के किनारे-किनारे पौधरोपण करने, गंगा को हरियाली से आच्छादित करने के साथ-साथ कई ऐसे मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ, जिसे दोनों राज्यों को आपसी सहयोग से करना है. स्वामी चिदानंद सरस्वती ने योगी और रावत को ‘स्वच्छ कुम्भ, स्वच्छ भारत अभियान’ से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट भी पेश की. रिपोर्ट में कुम्भ को ऐतिहासिक बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं और व्यापक क्रियाकलाप का प्रस्ताव है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा भी कि 2019 में होने वाले महाकुम्भ मेले की तैयारियों की धमक लंदन तक है.

‘संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन’ (युनेस्को) द्वारा कुम्भ को विश्व की सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल किए जाने से भी कुम्भ को लेकर दुनियाभर में जिज्ञासा और रुचि बढ़ी है. इसे देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार विश्व के करीब 200 देशों में कुम्भ की ब्रांन्डिंग करने जा रही है. कुम्भ में दुनियाभर से लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है. इसकी शुरुआत लंदन से की गई, जहां फोटो के जरिए कुम्भ की भव्यता और उसके पौराणिक महत्व को दिखाया गया. इस बार कुम्भ का इतना महत्व है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद पूरी तैयारी का निरीक्षण कर रहे हैं. लंदन में कुम्भ-शो के बाद 200 देशों में मेगा रोड शो का आयोजन किया जा रहा है.

गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक गंगा नदी 2525 किलोमीटर की दूरी तय करती है. पांच राज्यों से होकर गुजरने वाली गंगा नदी अकेले उत्तर प्रदेश में 1140 किलोमीटर क्षेत्र से गुजरती है. गंगा के किनारे स्थित 27 जिलों में गंगा नदी के किनारे-किनारे कम से कम 200 मीटर के दायरे में सघन वृक्षारोपण की तैयारी चल रही है. गंगा के किनारे हरियाली के आच्छादन से जलस्तर बढ़ेगा और प्रदूषण कम होगा. स्वामी चिदानंद सरस्वती ने गंगा के किनारे-किनारे वृक्षारोपण का बीड़ा उठाया है. उन्होंने दोनों मुख्यमंत्रियों को यह आश्वस्त किया है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में गंगा नदी के किनारे-किनारे सघन वृक्षारोपण का काम शीघ्र शुरू होगा. दोनों प्रदेशों के तमाम सिनेमाघरों में भी कुम्भ का ‘लोगो’ और उसे लेकर खास डॉक्यूमेंट्री दिखाई जा रही है. कुम्भ मेले के लिए रोडवेज की 10 हजार बसें लगाई जाएंगी. मेले को लेकर पूर्वांचल पर खास ध्यान दिया जा रहा है. रेल मंत्रालय भी इस मौके पर कई विशेष ट्रेनें चलाएगा.

रेल और सड़क मार्ग पर समुचित परिवहन सुविधा के साथ-साथ प्रयागराज (इलाहाबाद) को जल मार्ग से भी जोड़ा जाएगा. इलाहाबाद को हवाई मार्ग से जोड़ने का काम पूरा हो चुका है. कुम्भ मेले में विदेशी पर्यटकों के लिए छतनाग के आसपास टेंट सिटी बसाई जा रही है, जहां करीब पांच हजार कॉटेज बनाए जाएंगे. सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्‌डों पर विदेशी भाषाओं के जानकार गाइडों की तैनाती भी की जाएगी. इस बार कुम्भ मेले में 193 देशों से कुल मिलाकर 10 लाख विदेशी पर्यटकों के आने की संभावना जताई जा रही है. इनके आवागमन के लिए इलाहाबाद से वाराणसी के बीच शताब्दी स्तर की दो ट्रेनें चलाने की योजना है.

इसके लिए ट्रैक को दुरुस्त करने का काम हो रहा है. इलाहाबाद से वाराणसी के बीच सड़कों पर फ्लाईओवर बनाने का काम हो रहा है. सड़कों को भी चौड़ा किया जा रहा है. इलाहाबाद में रेल मंत्रालय कुल 2,300 करोड़ की योजनाओं पर कार्य कर रहा है. इसके साथ ही केंद्रीय सड़क मंत्रालय भी 2,000 करोड़ रुपए की लागत से इलाहाबाद की तरफ जाने वाले मार्गों को दुरुस्त कर रहा है. इलाहाबाद में गंगा नदी पर 1905 में बने कर्जन रेलवे ब्रिज को स्काई वॉक के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव भी है. देश में केवल आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी स्थित गोदावरी नदी पर बने ब्रिज पर ही स्काई वॉक की सुविधा मौजूद है. कुम्भ से पहले गंगा में इलाहाबाद से हल्दिया के बीच रिवर ट्रैफिक की शुरुआत होगी. केंद्र इस योजना पर 5,500 करोड़ रुपए खर्च करेगा. शहर में इसके चार टर्मिनल बनाए जाएंगे.

इस बार कुम्भ मेले का क्षेत्रफल भी पहले के कुम्भ मेलों से अधिक होगा. इस बार ढाई हजार हेक्टेयर में मेला क्षेत्र बसाया जाएगा, जिसमें 20 सेक्टर होंगे. हर सेक्टर में हजार से दो हजार तक रैन बसेरे बनेंगे. मेले के दौरान शहर के सभी प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों को बिजली से रौशन किया जाएगा. मुख्यमंत्री यह उम्मीद जता चुके हैं कि 2019 के कुम्भ मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 12 करोड़ से कम नहीं होगी.

चुनाव के पहले हो रहे कुम्भ को मिलेगा भरपूर पैसा 

इस बार का कुम्भ मेला लोकसभा चुनाव के पहले हो रहा है. भाजपा इसका पूरा राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है, इसलिए मेले के आयोजन में धन की कोई दिक्कत नहीं होने दी जाएगी. कुम्भ मेले की तैयारियों के लिए पहली ही किस्त में मुख्यमंत्री ने 1993.68 लाख रुपए दिए. योगी सरकार ने यह धन कुम्भ मेला-2019 के लिए इलाहाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा कराए जाने वाले आठ कार्यों के लिए दिया है. कुम्भ मेले के आयोजन के लिए योगी सरकार ने कुल 7975.13 लाख रुपए की मंजूरी दी है, जो विभिन्न किस्तों में रिलीज़ की जाएगी. सारा काम सितम्बर 2018 तक पूरा हो जाना है.

जैसा आपको ऊपर बताया कि इस बार के कुम्भ में आध्यात्मिक संत-महात्माओं के अतिरिक्त बड़े राजनीतिक व्यक्तित्वों का भी जमावड़ा लगने जा रहा है. 2019 का कुम्भ एक बड़े राजनीतिक अखाड़े के रूप में दिखेगा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ-साथ कई विश्वस्तरीय नेता भी कुम्भ में दिखेंगे. कुम्भ के दौरान ही वाराणसी में प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन भी किया जा रहा है. आप इसके निहितार्थ आसानी से समझ सकते हैं.

वाराणसी में प्रवासी भारतीय दिवस समारोह 21, 22 और 23 जनवरी को होगा, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे और समापन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद करेंगे. स्वाभाविक है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी कुम्भ मेले में पहुंचेंगे. प्रधानमंत्री के विशेष दूत के रूप में केंद्रीय मंत्री पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह इलाहाबाद और वाराणसी का जायजा लेकर जा चुके हैं. इस साल के आखिर में 193 विभिन्न देशों के प्रतिनिधि अधिकारी इलाहाबाद आकर कुम्भ की तैयारियों का जायजा लेंगे और अपने-अपने देशों को रिपोर्ट भेजेंगे. उन देशों के राष्ट्र प्रमुखों को न्यौता भेजा जा रहा है.

आने वाले दिनों में कुम्भ मेला राजनीति का अखाड़ा बनेगा, इसके संकेत उसी समय मिल गए, जब सपा नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी ने अर्ध-कुम्भ को कुम्भ घोषित किए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी. चौधरी ने कहा था कि पुरातन काल से अर्धकुम्भ और कुम्भ को लेकर जो परिपाटी और व्यवस्था चली आ रही है, उसे कैबिनेट बैठक के जरिए बदलना सर्वथा अनुचित है. प्राचीन मान्यताओं और विधान को भाजपा सरकार अपने राजनीतिक हित के लिए उपयोग करना चाहती है. यह हमारी धार्मिक परंपरा और संत-महात्माओं का अपमान है. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने भी अर्धकुम्भ को कुम्भ किए जाने की आलोचना की थी. परिषद ने कहा था कि यह फैसला संत-समाज ही कर सकता है. परंपरा को बदलने के पीछे कोई बड़ा कारण होना चाहिए.

हरित-कुम्भ का दावा, पर काट रहे हैं जंगल के दुर्लभ पेड़

सियासत के भी कितने घिनौने और दोयम दर्जे के चेहरे होते हैं, यह इससे पता चलता है कि एक तरफ तो हरित-कुम्भ बनाने के दावे किए जा रहे हैं, दूसरी तरफ उसी कुम्भ के लिए जंगल में पेड़ों की कटान का आदेश जारी हो रहा है. स्वामी चिदानंद सरस्वती गंगा के किनारे-किनारे हरियाली के आच्छादन की बात कर रहे हैं. यूपी-उत्तराखंड के मुख्यमंत्री उसकी तस्दीक कर रहे हैं, वहीं लखीमपुर खीरी के संवेदनशील टाइगर जोन के वन की लकड़ी काटने का आदेश दिया गया है, ताकि कुम्भ मेले के दौरान नदी पर पुल बनाया जा सके और जरूरी बंदोबस्त में लकड़ियों का इस्तेमाल हो सके. यह विडंबना नहीं तो और क्या है?

कुम्भ मेले के लिए लखीमपुर खीरी वन रेंज के बफर जोन की लकड़ी भेजे जाने के लिए कटान शुरू कर दी गई है. वन निगम उन लकड़ियों को इलाहाबाद भेजेगा. जंगल की दुर्लभ लकड़ियों से गंगा पर कई अस्थाई पुलों का निर्माण किया जाएगा. इस काम के लिए लखीमपुर के दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर जोन के भीरा और मैलानी रेंज की लकड़ी भेजी जा रही है. लखीमपुर के जंगल की लकड़ी से गंगा नदी पर अस्थाई पुल बनाए जाएंगे. कुम्भ मेले के बाद लकड़ियां बर्बाद हो जाएंगी, लेकिन उसके पहले ही जंगल की बर्बादी का एक और अध्याय सरकार खुद अपने हाथों से पूरा कर देगी.

वन विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि अस्थाई पुल लकड़ी के स्लीपर से बनाए जाएंगे. लकड़ी की आपूर्ति उत्तर प्रदेश वन निगम के जरिए होगी. इलाहाबाद के लोक निर्माण विभाग ने वन निगम के महाप्रबंधक को 14 फुट के 400 और 12 फुट के 100 स्लीपरों की औपचारिक डिमांड भेजी है. ये सारे स्लीपर दुर्लभ साल की लकड़ी के होंगे. वन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि कटान में छायादार परिपक्व पेड़ भी अंधाधुंध काटे जा रहे हैं.

इसी कटान के बहाने भ्रष्ट वन अधिकारियों और स्थानीय अधिकारियों के भी वारे-न्यारे हो रहे हैं. कटे हुए पेड़ों की लकड़ियों की कुम्भ की मांग के मुताबिक कटाई-छंटाई लखीमपुर के निकट छाउछ की आरा मशीनों पर कराई जा रही है. उधर दुधवा टाइगर रिजर्व से जुड़े मैलानी रेंज की खरेटहा बीट कंपार्टमेंट 9,7 और 1-ए के अलावा दक्षिण भीरा कंपार्टमेंट 14 और 15 में टाइगर कंजर्वेशन योजना के तहत लगे पेड़ों का भी कटान हो रहा है. कटे पेड़ों को वन निगम के हाथों सौंपा जा रहा है.

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