कांग्रेस के एजेंडे में किसान बैकफुट पर भाजपा

किसान समस्या जैसे जमीनी मुद्दे को उठाकर कांग्रेस मैदान में है. कांग्रेस ने अंगद की तरह पैर जमाए शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया है. अब वे अपनी सरकार की उपलब्धियों, खुद के चहेरे के बजाय संगठन के सहारे चुनाव लड़ने का राग अलाप रहे हैं.

rahul-gandhi6 जून को मंदसौर गोलीकांड के एक साल पूरे हो चुके हैं, जिसमें कृषि कर्मण अवार्ड के कई तमगे हासिल कर चुकी मध्यप्रदेश सरकार ने किसानों पर गोलियां चलवाने का खिताब भी अपने नाम दर्ज करवा लिया था. तमाम कोशिशों के बाद भी मध्यप्रदेश के किसान मंदसौर गोलीकांड के जख्म को भूल नहीं पा रहे हैं. सूबे में किसान आन्दोलन एक बार फिर जोर पकड़ रहा है. किसान संगठनों ने 1 से 10 जून तक पूरे प्रदेश में पूरी तरह से ग्राम बंद हड़ताल करने का ऐलान किया है, जिसके तहत किसान अपनी उपज की बिक्री नहीं करेंगे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी 6 जून को ही मध्यप्रदेश में अपने चुनावी अभियान के रूप में चुना है. चुनावी साल में किसानों का यह गुस्सा और तेवर शिवराज सरकार के लिए बड़ी चुनौती पहले से ही थी, इधर राहुल गांधी की मंदसौर रैली ने इस परेशानी को और बढ़ा दिया है.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए मंदसौर गोलीकांड एक ऐसी घटना है, जिसने उनके किसान पुत्र होने की छवि का बंटाधार कर दिया है. पिछले एक साल के दौरान तमाम धमकियों, पुचकार और फरेब के बावजूद किसानों का गुस्सा अभी तक शांत नहीं हुआ है. मंदसौर गोलीकांड के बाद सबसे पहले आन्दोलनकारियों को एंटी सोशल एलिमेंट के तौर पर पेश करने की कोशिश की गई थी. जब मामला हाथ से बाहर जाता हुआ दिखा, तो खुद मुख्यमंत्री धरने पर बैठ गए. बाद में यह थ्योरी पेश की गई कि किसान आंदोलन को अफीम तस्करों ने भड़काया और हिंसक बनाया.

शिवराजसिंह चौहान कुछ भी दावा करें कोई भी तमगा हासिल कर लें, लेकिन मध्यप्रदेश में किसानों की बदहाली को झुठलाया नहीं जा सकता है. हालत ये है कि मध्यप्रदेश में पिछले पांच सालों के दौरान 5231 किसानों व कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की है. सूबे में किसानों की हालत पस्त है, कर्ज और फसल का सही भाव न मिलने के दोहरे मार से वे बदहाल हैं. बदहाल व्यवस्था ने उन्हें प्याज एक से लेकर तीन रुपए किलो तक बेचने को मजबूर कर दिया है. भावान्तर का अनुभव भी भयानक है. प्रदेश भर के सभी हिस्सों से किसानों द्वारा अपनी समस्याओं को लेकर प्रदर्शन करने की खबरें लगातार आ रही हैं.

इन सबके बीच किसानों को लेकर भाजपा नेताओं के बयान घाव पर नमक छिड़कने वाले साबित हो रहे हैं. इसी तरह का ताजा बयान उज्जैन के भाजपा नेता हाकिम सिंह आंजना का है. वे पिछले दिनों वायरल हुए एक वीडियो में किसानों के लिए बहुत ही अपमानजनक और अभद्र भाषा का प्रयोग करते दिखते हैं. वे वीडियो में किसानों को हरामी, बेईमान और चोर कहते हुए नजर आ रहे हैं. हालांकि बाद में पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन तब तक उनका वीडियो लोगों की मोबाइल तक पहुंच चुका था.

इन परिस्थितियों में 1 से 10 जून के बीच किसानों का ग्राम बंद हड़ताल, मंदसौर गोलीकांड व राहुल गांधी की मंदसौर में रैली ने प्रदेश की सियासत में उबाल ला दिया है. कांग्रेस विधानसभा चुनाव को देखते हुए इस मौके को भुनाने की कोशिश में है. इससे शिवराज सरकार की नींद उड़ी हुई है. विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस अध्यक्ष का मध्यप्रदेश में ये पहला कार्यक्रम है, जिसे सफल बनाने के लिए कांग्रेस संगठन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. इसमें दो लाख किसानों को जुटाने का लक्ष्य रखा गया है.

कांग्रेस की इस रणनीति से भाजपा कितनी बैचेनी है, इसे राहुल की रैली को लेकर उसकी प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है. सबसे पहले जिला प्रशासन द्वारा राहुल गांधी को रैली करने की इजाजत 19 तरह के शर्तों के साथ दी गई. फिर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ऐलान किया कि वे राहुल गांधी की रैली से पहले 30 मई को किसानों का हाल जानने के लिये मंदसौर जाएंगे. इस दौरान कई किसानों ने सामने आकर मंदसौर प्रशासन पर आरोप लगाया कि राहुल की रैली में शामिल होने को लेकर उन्हें धमकाया जा रहा है.

स्थानीय प्रशासन द्वारा कई किसानों और कांग्रेस नेताओं को प्रतिबंधात्मक नोटिस भी जारी किए गए हैं. शिवराज सरकार के इस रवैये पर मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने कहा है कि कितना शर्मनाक है कि प्रदेश का किसान पुत्र  मुखिया, जो किसानों को भगवान और ख़ुद को पुजारी कहता है, उसकी सरकार उन्हीं भगवान से कुख्यात अपराधी की तरह शांति भंग के बॉन्ड भरवा रही है. मंदसौर गोलीकांड में मृत किसानों के परिजनों तक को नोटिस भेज दिए गए हैं.

इधर कांग्रेस एबीपी न्यूज और लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे को लेकर भी उत्साहित है, जिसमें उसके वोट शेयर में 2013 के मुकाबले 13 प्रतिशत की बढ़त दिखाई गई है. सर्वे के मुताबिक़ इस बार मध्यप्रदेश में कांग्रेस को 49 फीसदी वोट शेयर मिल सकता है, जबकि भाजपा को 34 प्रतिशत वोट शेयर ही मिल सकता है. जाहिर है सर्वे के मुताबिक़ कांग्रेस को बड़ी बढ़त मिल रही है. भाजपा के वोट प्रतिशत में भारी गिरावट भाजपा के लिए खतरे की घंटी की तरह है.

इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी अनौपचारिक रूप से मध्यप्रदेश की राजनीति में सक्रिय हो चुके हैं. चुनाव के मद्देनजर उन्हें कोआर्डिनेशन कमिटी का चेयरमैन बनाया गया है, जो एक तरह से महत्वपूर्ण भूमिका है. दरअसल कांग्रेस की मूल समस्या ही नेताओं और उनके अनुयायियों के बीच समन्वय का अभाव होना रहा है. अब दिग्विजय सिंह जैसे नेता को इसकी जिम्मेदारी मिलने से इसमें सुधार देखने को मिल सकता है.

इस दौरान उनकी सियासी यात्रा के लिए नई तारीखों का ऐलान भी कर दिया गया है, जो 31 मई से 31 अगस्त तक चलेगी. इस दौरान वे अपने कोआर्डिनेशन कमिटी के साथ हर जिले का दौरा करके प्रदेश भर में कार्यकर्ताओं और नेताओं को एकजुट करने का प्रयास करेंगे. हालांकि पिछले दिनों प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा होने के बाद से ही जिस तरह से आपसी विवाद खुल कर सामने आए हैं, उससे लगता है कि कांग्रेस अब भी आपसी गुटबाजी की पुरानी बीमारी से उबर नहीं पाई है.

बहरहाल भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर, अपनी नयी टीम, एबीपी न्यूज और लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे और किसान समस्या जैसे जमीनी मुद्दे को उठाकर कांग्रेस मैदान में है. कांग्रेस ने अंगद की तरह पैर जमाए शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया है. अब वे अपनी सरकार की उपलब्धियों, खुद के चहेरे के बजाय संगठन के सहारे चुनाव लड़ने का राग अलाप रहे हैं.

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