दावों से दूर हक़ीक़त

इस टाइगर रिज़र्व में आने वाले पर्यटकों का अनुभव भी खासा निराशाजनक है. वाल्मीकिनगर फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में ठहरे उत्तर प्रदेश के कुशीनगर निवासी शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने चौथी दुनिया को बताया कि जंगल में वनप्राणियों का भरमार होने का दावा तो किया जाता है, परंतु जंगल सफारी के क्रम में बाघ व चीता आदि सहज ढंग से दिखाई दें, इसका कोई प्रयास नहीं हो रहा है.

biharप्रकृति की अनुपम छटा को अपनी गोद में संजोए बिहार का इकलौता वाल्मीकि टाइगर रिजर्व पर्यटकों को लुभाने में नाकाम साबित हो रहा है. पहाड़ियों के बीच बसा यह टाइगर रिजर्व गंडक, सोनहा, हरहा आदि दर्जनभर नदियों से गलबहियां करता है, लेकिन फिर भी यहां पर्यटकों की संख्या नहीं बढ़ रही है. हालांकि सरकार इसके विकास व देसी-विदेशी सैलानियों को यहां तक खींचने के लिए साल-दर-साल नई-नई योजनाओं के माध्यम से करोड़ों रुपए खर्च कर रही है.

वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के वन संरक्षक सह निदेशक एस चन्द्रशेखर ने चौथी दुनिया से बातचीत में कहा कि 1990 में बने इस 18वें टाइगर रिजर्व में फिलहाल बाघों की संख्या 28 से ज्यादा है. बाघों की संख्या के मामले में यह देश में चौथा स्थान रखता है. 901 वर्ग किलो मीटर में फैला यह टाइगर रिजर्व उत्तर में नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से घिरा है और पश्चिम में इसकी सीमा उत्तर प्रदेश से मिलती है. बाघ, चीता, वायसन, गेंडा, हिरण, भालू, चीतल, भेड़िया और तरह-तरह के सांप, सीरो जैसे वन्य जीवों से यह अभयारण्य भरा हुआ है.

यहां सैलानियों के ठहरने के लिए 12 रुम का 80 बेड वाला फौरेस्ट डोमेट्री बनाया गया है, साथ ही मंगुराहा, गोनौली, गोबरहियां में फॉरेस्ट गेस्ट हाउस है. ईको हर्ट कोतरहां, मदनपुर आदि में बम्बुहर्ट, ट्री हर्ट आदि की भी व्यवस्था की गई है. गंडक नदी में भ्रमण के लिए सिंचाई विभाग द्वारा 12 सीट वाला बोट भी यहां उपलब्ध कराया गया है. लेकिन इन तमाम सुविधाओं के कार्यान्वयन में कमी कहें, या कुछ और, यह टाइगर रिजर्व पर्यटकों को आकर्षित करने में चूक रहा है. इस साल फरवरी में वीटीआर- 1 में 225 एवं मार्च 2018 में 275 टूरिस्ट ही आ सके. 2017 के जुलाई में 101 व अगस्त व सितम्बर में मात्र 664 की संख्या में स्थानीय व बाहरी टूरिस्टों का आना चिंता का विषय है. वहीं वाल्मीकिनगर टाइगर रिर्जव डिविजन-2 में जुलाई 2017 से लेकर मार्च 2018 तक टूरिस्टों की संख्या 2623 से आगे नहीं बढ़ सकी.

फरवरी महीने में ही 22 तारीख को सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वाल्मीकिनगर टाईगर रिर्जव में 90 किलोमीटर तक भ्रमण कर सुरक्षा एवं विकास कार्यों का जायजा लिया. वाल्मीकिनगर से मंगुराहां तक भ्रमण करने के बाद, बाघों की सुरक्षा के लिए बेहतर अधिवास बनाने तथा ईको टूरिज्म को ऊंचाई देने के लिए भी उन्होंने अधिकारियों को मास्टर प्लान बनाने का ओदश दिया. नीतीश कुमार ने तब कहा था कि इन कार्यों में किसी तरह के आवंटन की कमी नहीं की जाएगी.

सीएम ने वहां कर्नाटक से मंगाए गए 4 हाथियों के निवास के लिए बने शेड का भी निरीक्षण किया. उन्होंने यह भी कहा था कि 8 हाथी और अंडमान निकोबार से मंगाए जाएंगे और इन हाथियों का इस्तेमाल जंगल के विकास, संरक्षण व निरीक्षण आदि में किया जाएगा. हाथियों के आ जाने से ईको टूरिज्म को भी बल मिलेगा तथा टूरिस्टों की संख्या बढ़ेगी. मुख्य वन्य संरक्षक एस चन्द्रशेखर ने बताया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्य के इस इकलौते टाईगर रिर्जव को अन्य राज्यों से बेहतर बनाने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम का भी गठन किया गया.

इस टाइगर रिजर्व में आने वाले पर्यटकों का अनुभव भी खासा निराशाजनक है. वाल्मीकिनगर फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में ठहरे उत्तर प्रदेश के कुशीनगर निवासी शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने चौथी दुनिया को बताया कि जंगल में वनप्राणियों का भरमार होने का दावा तो किया जाता है, परंतु जंगल सफारी के क्रम में बाघ व चीता आदि सहज ढंग से दिखाई दें, इसका कोई प्रयास नहीं हो रहा है. वहीं गंडक नदी में राफटिंग भी सहज नहीं है. हम टिकट लेकर गंडक नदी में सीधे बोट से उतर वाल्मीकिनगर के प्राकृतिक सौन्दर्यों का आनंद से सकें, यह कठिन है. अन्य पर्यटन स्थलों की तरह यहां राफटिंग भी आम जनों के लिए उपलब्ध नहीं है.

यहां बाघों की रेडियो कॉलरिंग भी नहीं हो पाई है, जिससे कि उनके सही लोकेशन का पता लगाया जा सके. अधिकारियों का तर्क है कि रेडियो कॉलरिंग के लिए आला अफसरों से अनुमति मांगी गई है. आदेश आते ही इसे पूरा किया जाएगा. डीएफओ अमित कुमार ने बताया कि बाघों की हाईटेक निगरानी के लिए आसमान में ड्रोन तथा जमीन पर हाथी के द्वारा नजर रखने का भी प्रस्ताव भेजा गया है. इस वन क्षेत्र के नौरंगिया जंगल में मोर अधिवास क्षेत्र बनाने की भी बात कही गई थी, साथ ही पर्यटकों के भ्रमण के लिए गंडक डैम को सुसज्जित किया जाना था, लेकिन ये सब योजनाएं अब तक अधर में हैं.

रिर्जव एरिया के अन्तर्गत आने वाले उदयपुर जंगल के बीच सरेया मन का आनंद लेना, तो दूर पर्यटकों के यहां तक पहुंचने में भी दुश्वारियां हैं. वन विभाग ने इसके प्रवेश द्वार पर ही ताला लटका दिया है. कोई भी पर्यटक अपने वाहन से सरेयामन तक नहीं जा सकता है. एक वर्ष पहले इसके खूबसूरत झील में नौका विहार के लिए आधा दर्जन मोटर बोट मंगाए गए थे. ये कुछ दिन चले भी, लेकिन रख-रखाव के अभाव में अभी सब बंद पड़े हैं. जिला मुख्यालय से मात्र 6 किलोमीटर दूर इस सरेया मन का नयनाभिराम दृश्य देखने के लिए पहले प्रत्येक रविवार को वहां भीड़ लग जाती थी, लेकिन अब सबकुछ वीरान पड़ा है.

यहां  लाखों की लागत से बने दो ईको-फ्रेन्डली हाउस भी सफेद हाथी साबित हो रहे हैं. रेंजर दिनेश पासवान का कहना है कि यहां वन्य जीवन के विचरण में कोई खलल नहीं पड़े, इसलिए वाहनों के आने पर प्रतिबंध लगा दिया है. लेकिन रेंजर के दावों की हकीकत यह है कि यह प्रतिबंध केवल आम लोगों के लिए ही है. आलाधिकारियों और नेताओं के लिए यहां आकर पिकनिक आदि मनाने पर कोई रोक नहीं है. आए दिन पटना या अन्य जगहों से अफसर अपने परिवार के साथ सरेयामन का आनंद उठाने आते हैं.

लालसर, लेजर रॉकेट, ग्रे-हॉर्न, स्टोन बिल्डकिंग, हिमालयन गोल्डेन बक, क्रिएटर कॉनमोरेट, ग्रे हेडेड लैपविंग, इमराल डव जैसे प्रवासी पक्षी हर साल यहां कलरव करते दिखते हैं. वर्ल्ड वाइल्ड फाउंडेशन इंडिया की ओर से चार सदस्यीय टीम ने यहां आकर दुर्लभ पक्षियों की 86 प्रजातियों को चिन्हित किया था. उस टीम ने सुझाव दिया था कि सरेया मन झील के समीप ऊंचे प्लेटफॉर्मों का निर्माण कराकर वहां उच्च क्षमता वाले दूरबीन लगाए जाएं, ताकि पर्यटक आसानी से इन पक्षियों को देख सकें.

पक्षियों के संबंध में पर्यटकों को जानकारी देने के लिए गाइड को ट्रेंड करने का सुझाव भी उस टीम ने दिया था. जिम कॉर्बेट के पक्षी विशेषज्ञ प्रशांत कुमार ने इन पक्षियों की फोटोग्राफी कर इनका डाटा बेस तैयार करने पर भी जोर दिया था. लेकिन अब तक इस दिशा में कोई प्रयास होता नहीं दिख रहा है. अगर समय रहते इनसब पर ध्यान नहीं दिया गया, तो उदयपुर का दुर्लभ पक्षियों का यह अभ्यारण्य केवल किस्सों और इतिहास तक सीमित रह जाएगा.

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