किसानों के पीठ पर लात और कॉरपोरेट से गलबहिया

भारतीय रिज़र्व बैंक के ताजा आंकड़े कहते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के फंसे हुए कर्ज में सबसे बड़ी हिस्सेदारी कॉरपोरेट ऋण की है. सरकारी बैंकों का कुल 641 लाख करोड़ रुपए का कर्ज फंसा हुआ है, जिसका तीन चौथाई केवल उद्योग जगत के पास है. वहीं, इस कर्ज में सर्विस सेक्टर की हिससेदारी 1321 फीसदी और रिटेल सेक्टर की 371 फीसदी है. अब गौर करने वाली बात यह है कि जिन किसानों की कर्जमाफी की मांग को सरकार फैशन करार देती है, उनके पास बैंकों के पूरे कर्ज का मात्र नौ फीसदी हिस्सा है. भारत की एक प्रमुख जमा आकलन एजेंसी, रेटिंग इंडिया की एक रिपोर्ट कहती है कि 2011 से 2016 के बीच कम्पनियों पर 7.4 लाख करोड़ के कर्ज में से चार लाख करोड़ के करीब कर्ज मा़फ कर दिया जाएगा. सरकार का ही आंकड़ा है कि 2013-16 के बीच कॉरपोरेट सेक्टर को 17 लाख 15 हजार करोड़ रुपए की टैक्स माफी दी गई.

अब सोचने वाली बात है कि किसानों की कर्जमाफी पर हायतौबा मचाने वाली सरकार और व्यवस्था कॉरपोरेट की कर्जमाफी पर क्यों चुप्पी साध जाती है. और तो और इसे अर्थव्यवस्था के लिए जरूरत बता दिया जाता है. जब किसानों की कर्ज माफी की बात की जाती है, तो ऊपर बैठे जिम्मेदार लोगों को इसमें अर्थव्यवस्था का नुकसान दिखने लगता है. पिछल साल उत्तर प्रदेश कर्जमाफी की चर्चा के दौरान भारतीय स्टेट बैंक की तत्कालीन चेयरमैन अरुंधति भट्‌टाचार्य का एक बयान आया था कि ऐसी कर्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ जाता है और एक बार कर्ज माफ कर देने के बाद किसान फिर आगे भी ऐसी मांग करता है. गौर करने वाली बात है कि किसानों की कर्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ने को लेकर चिंतित अरुंधति भट्‌टाचार्य ने ही कर्ज में डूबे टेलीकॉम सेक्टर को सरकारी मदद के लिए सरकार से अपील की थी और कहा था कि उनके लिए प्रो-एक्टिव कदम उठाने की जरूरत है. मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमण्यम ने तो कॉरपोरेट कर्जमाफी को पूंजीवाद के काम करने का तरीका बता दिया था.

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