2020 तक जल संकट वाला राष्ट्र बन जाएगा भारत

समय-समय पर सर्वोच्च अदालत ने इन औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्टों के बहाव पर रोक लगाने के लिए राज्यों को सख्त निर्देश भी दे रखे हैं, लेकिन कुछ को छोड़ दें, तो ज्यादातर जगहों पर ये बेअसर ही साबित हुए हैं. ग्रामीण इलाकों में संकट ज्यादा गंभीर है. केवल हैंडपंप लगा देना काफी नहीं है, पानी पीने लायक भी हो, यह सुनिश्चित करना भी सरकारों की जिम्मेदारी है.

indiaaविकास के आकर्षक पर खोखले दावों के बीच जीवन का सबसे बड़ा आधार पानी संकट में है. देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गंदा पानी पीने को मजबूर है. हालात इतने गंभीर इसलिए हो गए कि देश के ज्यादातर हिस्सों में जमीन के भीतर का पानी गंदा और जहरीला हो चुका है.

भू-जल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह और नाइट्रेट जैसे तत्वों, लवणों और भारी धातुओं की मात्रा इस कदर बढ़ चुकी है कि ऐसे पानी को पीने वाले गंभीर बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं. इससे त्वचा संबंधी रोग, सांस की बीमारियां, हडि्‌डयां कमजोर पड़ना, गठिया और कैंसर जैसे रोग दस्तक दे रहे हैं. भारत में प्रतिवर्ष कम से कम 1,25,000 लोगों की मृत्यु कुपोषण एवं जल-जनित रोगों के कारण होती है. आलम यह है कि देश में हर साल तीन प्रतिशत आबादी बीमारियों पर होने वाले खर्च के कारण गरीबी रेखा के नीचे चली जाती है.

यूएसएड की रिपोर्ट को मानें, तो 2020 तक भारत जल संकट वाला राष्ट्र बन जाएगा. रिपोर्ट की मानें, तो देश के शहरी गरीब सबसे ज्यादा पेयजल की समस्या से जूझ रहे हैं. यहां तकरीबन 17 फीसदी आबादी गंदी बस्तियों में रहती है. उनमें पानी की उपलब्धता बेहद कम है. वहां न जलापूर्ति के कनेक्शन हैं और न ही उन बस्तियों में रहने वालों को टैंकरों के जरिए जो पानी दिया जाता है, वह पीने योग्य है. कुव्यवस्था का आलम यह है कि शहरों में पेयजलापूर्ति के लिए सरकारी तंत्र पूरी तरह विफल हो रहा है. उसके पास उचित शुल्क पर पानी उपलब्ध कराने की कोई योजना ही नहीं है. देश के 1.4 करोड़ शहरी परिवारों के पास पीने के पानी का कोई सीधा माध्यम नहीं है और केवल 47 फीसदी शहरी घरों में ही पीने के पानी के कनेक्शन हैं. विडम्बना यह भी है कि उसके बाद भी स्थानीय निकाय उन्हें पानी दे पाने की स्थिति में नहीं है.

आंकड़ों के मुताबिक, देश के 4041 शहरों में से 2613 शहरों में लोग गंदी बस्तियों में रहते हैं. यह कुल आबादी का 17 फीसदी है. शहरों के बेतरतीब विकास, अस्थाई रोजगार और गांवों से हो रहे पलायन के कारण गंदी बस्तियों की तादाद बेतहाशा बढ़ रही है. यह कड़वी सच्चाई है कि गंदी बस्तियों में रहने वाली तकरीबन 46 फीसदी आबादी को ही पीने का पानी मिल पाता है. जबकि अन्य क्षेत्रों में रहनेवाली आबादी में तकरीबन 58 फीसदी लोगों को पीने का पानी नसीब हो पाता है. विडंबना यह है कि सरकारी दावों में 24 घंटे पानी की आपूर्ति की बात की जाती है, जबकि हकीकत यह है कि जलापूर्ति में 69 से 74 फीसदी की कमी देखी जा सकती है. जहां पानी की आपूर्ति होती भी है, उसका औसत 24 घंटे में मात्र तीन घंटे ही है, जो नियमित नहीं है. प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घटकर 135 लीटर से अब केवल 67 लीटर ही रह गई है.

केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय भी यह स्वीकार करता है कि देश के 21 राज्यों के 153 से ज्यादा जिले आर्सेनिक युक्त पानी की समस्या से जूझ रहे हैं. इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, असम, मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. पानी में आर्सेनिक के चलते पंजाब के अमृतसर, तरनतारन, कपूरथला, रोपड़, मानसा, फरीदकोट, मोगा और मालवा के इलाके में लोग कैंसर के सबसे ज्यादा शिकार हैं. पानी में घुला कॉपर महिलाओं का लीवर खराब कर रहा है. केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, देश के नौ राज्यों की 13,958 बस्तियों का भूजल प्रदूषित है और अत्याधिक उर्वरकों के इस्तेमाल ने तस्वीर बिगाड़ने में प्रमुख भूमिका निभायी है. जिन राज्यों में ज्यादातर लोग गंदा और जहरीला पानी पीने को विवश हैं, उनमें पश्चिम बंगाल, असम और राजस्थान सबसे ऊपर हैं.

देश में पानी की गुणवत्ता को लेकर एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली (आईएमआईएस) ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं. राजस्थान में 77 लाख से ज्यादा लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं और इससे होने वाली बीमारियों से जूझ रहे हैं. राजस्थान के बड़े हिस्से में पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट और दूसरे लवण हैं. इनमें 41 लाख लोग फ्लोराइड युक्त, 28 लाख से ज्यादा लोग लवणयुक्त और आठ लाख से ज्यादा लोग नाइट्रेट युक्त पानी पी रहे हैं. असम के हालात तो और गंभीर हैं, जहां 17 लाख लोगों को आर्सेनिक घुला पानी पीना पड़ रहा है. पश्चिम बंगाल में करीब पौने दो करोड़ लोगों को इस तरह का जहरीला पानी मिल रहा है.

देशभर में ऐसा दूषित जल पीने वालों का आंकड़ा 47 करोड़ के पार है. पीने के पानी में नाइट्रेट की बढ़ी हुई मात्रा के कारण देश के तकरीबन 23 करोड़ से ज्यादा लोगों पर पेट के कैंसर, स्नायु तंत्र, आंत्रशोथ व दिल की बीमारी की तलवार लटक रही है. नाइट्रेट का जहर बच्चों में बेबी सिंड्रोम जैसी मृत्युकारी बीमारी को जन्म दे सकता है. पानी में आर्सेनिक की मात्रा डब्ल्यूएचओ के मानकों से कहीं ज्यादा है. इससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा है. देश के 23.9 फीसदी लोग आर्सेनिक मिला पानी पीने को विवश हैं. 19 फीसदी लोग खतरनाक स्तर तक आर्सेनिक की मौजूदगी वाला पानी पी रहे हैं.

देश आज पीने के पानी और साफ पानी की जिस समस्या से जूझ रहा है, उसकी जड़ें जल प्रबंधन में हमारी घोर नाकामी देखी जा सकती हैं. दो समस्याएं हैं. एक, पानी नहीं है और दूसरी यह कि जहां पानी है वह पीने लायक नहीं है. बारिश के पानी को संग्रहीत और संरक्षित करने का कोई ठोस तंत्र हम आज तक विकसित नहीं कर पाए हैं, जबकि आज भी यह परंपरा का हिस्सा माना जाता है. पेयजल के मसले पर कितनी ही योजनाएं-परियोजनाएं बनीं, लेकिन जल संकट से मुक्ति नहीं मिली. यह इस बात का प्रमाण है कि इन योजनाओं पर ठोस तरीके से अमल नहीं हुआ.

हालांकि केंद्र सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना के तहत राज्य सरकारों को पानी की गुणवत्ता सुधारने के लिए तकनीकी और आर्थिक मदद मुहैया करा रही है. लेकिन ये काम बहुत मंथर गति से हो रहे हैं, जबकि समस्या काफी तेजी से बढ़ रही है. यह जगजाहिर है कि एक किलो चीनी के निर्माण में 2000 लीटर पानी खर्च होता है, साथ ही गन्ना, धान, केला, अंगूर और प्याज जैसी अधिक पानी वाली फसलों ने स्थिति को और बिगाड़ा है. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के सॉयल और वॉटर इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफेसर एके जैन बताते हैं, ‘पंजाब जैसे राज्य में हर साल लगभग 50 सेंटीमीटर जल स्तर नीचे जा रहा है. किसान ट्‌यूबवेल से पानी निकाल तो रहे हैं, मगर जमीन के अंदर भी अब बहुत कम मात्रा में ही पानी मिल रहा है.

पंजाब के कुछ क्षेत्रों में तो 40 मीटर यानि लगभग 150 फीट तक पानी नीचे चला गया है. किसानों को सिंचाई के लिए बिजली मुफ्त दिए जाने जैसी योजनाओं से भी किसान अंधाधुंध पानी का दोहन कर रहे हैं. अगर ऐसी ही स्थिति रही, तो अगले दो दशकों में पानी का जमीनी स्तर इतना नीचे हो जाएगा कि हमें पानी के लिए हमें बहुत ज्यादा हॉर्स पावर की मशीन की जरूरत पड़ेगी. राजस्थान के बीकानेर इलाके में तो जल स्तर 1000 से 1500 फीट है, यानि किसान पाताल से पानी निकालते हैं. यहां पर एक ट्यूबवेल लगवाने का खर्च 10 से 20 लाख रुपए तक है, जैसे जैसे जमीन का पानी नीचे उतरता जाएगा, किसानों का खर्च बढ़ता जाएगा और खेती करना मुश्किल होता जाएगा.

भू-जल दूषित होने का सबसे बड़ा कारण कारखानों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले अपशिष्टों का जमीन के भीतर रिसाव है. समय-समय पर सर्वोच्च अदालत ने इन औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्टों के बहाव पर रोक लगाने के लिए राज्यों को सख्त निर्देश भी दे रखे हैं, लेकिन कुछ को छोड़ दें, तो ज्यादातर जगहों पर ये बेअसर ही साबित हुए हैं. ग्रामीण इलाकों में संकट ज्यादा गंभीर है. केवल हैंडपंप लगा देना काफी नहीं है, पानी पीने लायक भी हो, यह सुनिश्चित करना भी सरकारों की जिम्मेदारी है.

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