राग ईमानदारी के बीच बढ़ता भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार के खिला़फ सरकार की प्रतिबद्धता पर जनता को संदेह, राग ईमानदारी के बीच बढ़ता भ्रष्टाचार

corruptionप्रधानमंत्री बनने के बाद अगस्त 2014 में जम्मू-कश्मीर दौरे पर गए नरेंद्र मोदी ने भाषण देते हुए कहा था- ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा. इससे पहले और बाद में भी कई अवसरों पर प्रधानमंत्री ने खुद को चौकीदार बताया. भ्रष्टाचार पर वार को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताने वाले प्रधानमंत्री मोदी की इस बात पर व्यापक चर्चा हुई और इसके जरिए जनता में भी यह उम्मीद घर कर गई कि घूसखोरी और भ्रष्टाचार शायद अब बीते दिनों की बात बन जाय.

लेकिन अफसोस कि प्रधानमंत्री के इस दावे के करीब चार साल बाद भी हालात जस के तस हैं. अव्वल तो यह कि रोजर्मरा के कामकाज में दफ्तरों के बाबूओं की घूसखोरी से आजीज लोगों में भी अब निराशा घर करने लगी है. हाल का एक अध्ययन बताता है कि लोक सेवाओं में भ्रष्टाचार कम करने की मोदी सरकार की प्रतिबद्धता के पक्ष में लोगों की धारणा 2018 में घटकर 31 फीसदी रह गई हैं, जो 2017 में 41 फीसदी थी.

एनजीओ सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) ने देश में भ्रष्टाचार की स्थिति को लेकर पिछले दिनों एक सर्वेक्षण किया. इंडिया करप्शन स्टडी नाम से किए गए इस सर्वेक्षण में 13 राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, दिल्ली, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के 200 से अधिक ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के दो हजार से अधिक लोग शामिल हुए. सीएमएस 2005 से ही लगातार देश में भ्रष्टाचार की स्थिति को लेकर रिपोर्ट जारी करता आ रहा है. 18 मई को जारी, इस सर्वेक्षण की 12वें दौर की रिपोर्ट भ्रष्टाचार को लेकर देश की गंभीर स्थिति पेश करती है.

यह रिपोर्ट खुलासा करती है कि पिछले एक साल के दौरान 13 राज्यों में 11 जन सेवाओं के लिए लोगों को 2800 करोड़ रुपए रिश्वत के तौर पर देने पड़े हैं. इस सर्वेक्षण के अनुसार, 75 फीसदी परिवार मानते हैं कि पिछले एक साल के दौरान या तो भ्रष्टाचार बढ़ा है या यह पिछले साल के बराबर ही है. वहीं 27 फीसदी परिवारों ने यह माना है कि पिछले एक साल के दौरान उन्हें सरकारी विभागों में मामूली काम के लिए भी रिश्वत देनी पड़ी. परिवहन, पुलिस, आवास, भूमि अभिलेख, स्वास्थ्य और अस्पताल सेवाएं इस सर्वेक्षण में सार्वजनिक सेवाओं के सबसे भ्रष्ट अंग के रूप में सामने आई हैं.

इनमें भ्रष्टाचार के मामले में परिवहन और पुलिस को स्तर पर बताया गया है. 21 फीसदी परिवारों ने कहा है कि परिवहन विभाग में काम के लिए उन्हें रिश्वत देनी पड़ी, जबकि 20 फीसदी परिवारों ने पुलिस महकमे में घूस मांगे जाने की बात कही है, वहीं भू-राजस्व और लैंड रिकॉर्ड विभाग में 16 फीसदी परिवारों से घूस की मांग की गई. 7 फीसदी परिवारों ने आधार कार्ड के लिए, तो वहीं 3 फीसदी परिवारों ने वोटर आईडी कार्ड के लिए भी रिश्वत देने की बात कबूली है. इस सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि बैंक से लोन लेने में औसतन एक परिवार को 5250 रुपए घूस देनी पड़ती है.

इस अध्ययन के अनुसार, लोकायुक्तया लोकपालों के खाली पदों को भरने में मोदी सरकार की असमर्थता और हाल के दिनों में सामने आए बैंकों से जुड़े भ्रष्टाचार को लोग सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रतिबद्धता को कमजोर करने के कारकों के तौर पर देखते हैं. आंध्र प्रदेश में 67 फीसदी तो वहीं तमिलनाडु में 52 फीसदी लोगों का मानना है कि भ्रष्टाचार रोकने को लेकर केंद्र की मोदी सरकार की प्रतिबद्ध शून्य है. वहीं, बिहार के मामले में यह औसत 50 फीसदी और दिल्ली में 44 फीसदी रहा. जिन राज्यों के लोगों को भ्रष्टाचार को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता पर संदेह है, उनमें से कई राज्य ऐसे हैं, जहां भारतीय जनता पार्टी की ही सरकार है.

महाराष्ट्र के 52 फीसदी लोगों का मानना है कि भ्रष्टाचार कम करने या खत्म करने के लिए मोदी सरकार ईमानदार प्रयास नहीं कर रही. अन्य भाजपा शाषित राज्यों की बात करें, तो मध्य प्रदेश के 50 फीसदी और गुजरात के 46 फीसदी लोग मानते हैं कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मोदी सरकार प्रतिबद्ध नहीं है. इस अध्ययन के निष्कर्ष में बताया गया है कि महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोग सक्रिय हैं और आवाज उठाते रहते हैं, जबकि आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के लोगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रियता काफी कम है.

यह सर्वेक्षण भले ही पिछले साल की तुलना में इस साल भ्रष्टाचार के मामलों में बढ़ोतरी का संकेत देता है, लेकिन इसमें यह भी बताया गया है कि 2005 की यूपीए सरकार की तुलना में सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार को लेकर लोगों की धारणा में गिरावट आई है. इस सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि सार्वजनिक सेवाओं का लाभ हासिल करने से लेकर भ्रष्टाचार के सभी मामलों में 2005 की तुलना में 2018 में करीब 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है.

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