प.चम्पारण के दस्युओं के खत्म होने की कहानी

दस्युओं का आतंक इतना था कि इलाके में दिन और रात का फर्क मिट गया. खौफ का आलम ऐसा कि एक फरमान पर पैसा दस्युओं को मिल जाता था. प.चम्पारण जिला ही नहीं, बल्कि सीमा से सटे नेपाल व यूपी के कुछ इलाकों में भी उनका ऐसा ही दबदबा था. लोगों के बीच वह ‘तिवारी’ नाम से कुख्यात था. उसका असली नाम वासुदेव यादव था और पेशा अपहरण, डकैती, हत्या, फिरौती आदि थी. वासुदेव इस जिले के ठकराहां प्रखंड के सेमरवारी पंचायत का निवासी है.

उसने डकैती की शुरुआत 70 के दशक में ही कर दी थी. बाद में वह अपहरण पर ज्यादा जोर देने लगा. गंडक के दियारा में उसका ठिकाना था. पुलिस की गोलियों की बौछार के बीच उसके बच निकलने की कला में वह माहिर था. उसका सबसे प्रिय हथियार 30 स्प्रिंग ऑटोमैटिक राइफल था, जिसे वह हमेशा अपने पास रखता था. 80 के दशक तक वह कई  डकैत गिरोहों का सरगना बन गया था. 90 के दशक तक वासुदेव यादव के पास उन अपहृत लोगों को अपने पास रखने लगा था, जिसका अपहरण उसके सदस्य कर तो लेते थे, लेकिन उन पार्टियों को ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रख कर फिरौती की रकम वसूल पाना मुश्किल होता था. ऐसे अपहृतों के परिजनों से वासुदेव यादव फिरौती वसूलता था.

वासुदेव यादव ने अपराध के बल पर सैकड़ों एकड़ जमीन व अकूत संपत्ति अर्जित कर ली थी. 2005 में बिहार में जब शासन बदला, तब डकैतों के सामने सरेंडर करो या मरो- ये ही दो विकल्प बचे थे. अगस्त 2006 में वासुदेव ने बगहा के तत्कालीन एसपी विकास वैभव के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था. फिलवक्त वह बगहा जेल में 75 वर्ष की उम्र में अपने किए अपराध की सजा भुगत रहा है. उसके दो लड़के हैं. बड़ा लड़का रामाधार यादव ठकराहां प्रखंड के सेमरवारी पंचायत का मुखिया है. दूसरा छोटे यादव प्रखंड प्रमुख रहा था, लेकिन अब वह बगहा में ही निजी व्यवसाय कर रहा है. प.चम्पारण के डीआईजी लालमोहन प्रसाद ने कहा कि वासुदेव के जिले में सबसे ज्यादा अपराध बगहा पुलिस क्षेत्र में था. अब लोग बेखौफ होकर रात में भी धनहा ठकराहां क्षेत्र में कृषि व अन्य धंधे कर रहे हैं.

राजनेताओं की दस्युओं पर सरपरस्ती ने अपराध को फलने फूलने के साथ एक नई राह भी दिखाई. जिले के एक तत्कालीन कद्दावर कांग्रेसी नेता ने अपने विधानसभा चुनाव में क्षेत्र के कुख्यात अपराधी गिरोह लक्षण यादव गिरोह से गठजोड़ किया. चुनाव जीतने के बाद उक्त नेता ने अपने क्षेत्र में शांति बनी रहे और अपराधी गिरोह भी लहलहाते रहें कि नीति ने जिले में ‘लेवी’ वसूलने के नए तरीके को इजाद किया. नेता जी ने अपने भाषण में कहा कि अपराधी लोग केहू के तंग ना करें, सक्षम लोगों से मांग-चांग कर खाएं. बस क्या था, अपराधियों ने शुरू में गांव के खाते-पीते व ट्रैक्टर आदि रखने वाले किसानों पर लेवी लगा पैसा वसूलना शुरू कर दिया. लेवी नहीं देने वालों के खेत-खलिहान जला दिए जाने लगे.

90 के दशक आते-आते अपराधियों की समानांतर सरकार चलने लगी. बेतिया न्यायालय के वरीय अधिवक्ता सरयुग प्रसाद ने जब लेवी देने से इनकार किया तो कुख्यात लक्षण-भागड़ गिरोह ने उनके गांव से दिन दहाड़े उन्हें अगवा कर लिया. तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश पीएन सिंह ने इस अपहरण कांड की सुनवाई करते हुए सरकार को जिले की भयावह स्थिति से अवगत कराया. उन्होंने लिखा कि इस जिले की विधि व्यवस्था बद से बदतर हो गई है. दस्यु गिरोहों का आतंक इतना ज्यादा है कि यह जिला ‘मिनी चंबल’ के रूप में तब्दील हो गया है. एसपी के रूप में अभयानंद की पदस्थापना हुई. उनकी सक्रियता से जनता को कुछ वक्त के लिए तो राहत मिली, परंतु सत्ता का राजनीतिक हस्तक्षेप उनकी कामयाबी पर कोहरा लगाने लगा. अपराधी फिर से उत्पात करने लगे. यहां तक कि शहर के किसान परिवार के एक प्रमुख व्यवसायी का अपहरण कर लिया गया. इस अपहरण में लाखों रुपयों की डील हुई.

लौरिया में राजीव गांधी का आगमन हुआ. मंच पर विराजमान क्षेत्र के विधायक विश्वमोहन शर्मा ने मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के मना करने के बावजूद जिले में दस्युओं के आतंक से त्रस्त जनता के दुखों को पुरजोर तरीके से अपने भाषण में परोसा. नतीजा यह हुआ कि यहां डकैतों के सफाए के लिए ब्लैक पैंथर अभियान चलाया गया. शिवमूर्ति राय, ज्योति कुमार, रणधीर वर्मा जैसे एक दर्जन अधिकारियों के नेतृत्व में पुलिस बल डकैतों पर कहर ढाने लगे. चम्पारण रेंज में पुलिस की एक अलग डीआईजी यूनिट बैठी. इसकी कमान रामचन्द्र खां ने संभाली. मुठभेड़ के दौरान कई कुख्यात रूदल यादव, अलाउद्दीन मियां, राम जतन नूमिया, व्यास, रब्ब मियां, पत्थर सिंह चौहान आदि ढेर हो गए. दस्युओं में पहली बार भय व दहशत का माहौल देखा गया. सरकार ने जिले में 22 सक्रिय दस्यु गिरोहों की सूची जारी की. पुलिस की आक्रामक कार्रवाई को देख कर कई दस्यु सीधे जेल जाकर अपने को सुरक्षित महसूस किए. वहीं दस्यु सतन यादव ने आत्मसमर्पण करने में अपनी भलाई समझी.

1990 में बिहार में सत्ता बदलने के साथ ही यहां की स्थिति में भी परिवर्तन आया. अभियान कुंद होने लगा. जिले के प्रमुख चर्चित व्यवसायी सीताराम रजगढ़िया को दिन दहाड़े उनके घर से उठाकर अपराधी सिवान ले गए. करोड़ों रुपए की फिरौती वसूलने के बाद उन्हें मुक्त किया गया. बताया जाता है कि फिरौती की पटकथा पटना में ही एक प्रमुख राजनेता के यहां रची गई थी. क्षेत्र में दस्युओं के हथियार फिर से लहराने लगे. अब इनमें राजनीतिक सत्ता की भूख भी जगने लगी. शुरू में पंचायत के चुनाव में दस्यु लालू यादव, बासुदेव यादव, भागड़ यादव, हरिहर यादव, वंशी यादव, पृथ्वी यादव, रमाकांत यादव, रामभजु यादव जैसे दर्जनों कुख्यातों के सगे संबंधी मुखिया, सरपंच, जिला परिषद सदस्य चुने गए. खासकर दियारा के इलाके से आने वाले करीब 90 फीसदी पंचायत प्रतिनिधियों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर इन कुख्यातों से साठगांठ रहा. कल तक दूसरों की मदद कर विधायक व अन्य संस्थानों के प्रतिनिधि बनाने वाले ये कुख्यात अब अपने खून पर विश्वास करने लगे.

इसके साथ ही शहरी संपतियों को अर्जित करने की ललक जगी. जिला मुख्यालय से नजदीक ठिकाना होने के कारण दस्यु सरगना भागड़ यादव ने सर्वाधिक लाभ उठाया. कई पुलिस अधिकारियों से उसके सीधे संबंध थे, जिसके कारण आमजनों को प्रशासन से भी राहत की उम्मीद नहीं थी. दस्यु भागड़ यादव के दबदबे का आलम यह था कि उसने अपने अनपढ़ भाई सतन यादव को नौतन विधान सभा से 1995 में निर्दलीय विधायक बना कर पूरे जिले में अपना परचम लहरा दिया. इसके बाद उसने अपने पुत्र अमर यादव को जिला परिषद अध्यक्ष की कुर्सी पर भी बैठा दिया.

वहीं अपनी पतोहू रेणु देवी को बैरिया का प्रमुख बना दिया. बेतिया नगर परिषद के चुनाव में भी भागड़ यादव ने अपने अग्रज दस्यु लक्षण यादव के पुत्र इंद्रजीत यादव को जमादार टोला वार्ड 2 से पार्षद बनवा दिया. इस दौर में भागड़ यादव को देख बासुदेव यादव ने भी अपने पुत्र को बसपा से टिकट दिलवाकर धनहा विधान सभा में भेजने का प्रयास किया. परंतु परिणाम उसके पक्ष में नहीं आए. दस्यु रामभज्जु ने तो जेल में रहकर नामांकन दाखिल किया, लेकिन उसे भी कामयाबी नहीं मिली. परतु जिले की राजनीति में भी दस्युओं की तूती बोलने लगी. ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर जिला मुख्यालय में इनके गुर्गों का रौब अब सरकारी अधिकारियों पर भी दिखने लगा. दस्युओं की समानांतर सरकार जिले में ‘रन’ करने लगी.

2005 में राज्य में सरकार बदलने का असर जिले में जबर्दस्त दिखा. यहां तेज तर्रार पुलिस अधिकारियों को पदस्थापित किया गया. रत्न संजय, एमआर नायक, आरके मल्लिक, विकास वैभव, वीएस मीना, केएस अनुपम बगैर किसी राजनीतिक या अन्य तरह के प्रभाव में आए बगैर अपराधियों पर सीधे निशाना साधते रहे. हाल यह हुआ कि कुख्यात वंशी यादव, लालू यादव, पृथ्वी यादव, लक्षण चौधरी, डोमा, हरि यादव आदि ढेर हो गए. वंशी यादव के भाई वीरझन यादव ने भी पुलिस के समक्ष सरेंडर किया. पुलिस की घेराबंदी इस तरह बढ़ी कि जिले में सामानांतर सरकार चलाने वाले 50 हजार का ईनामी डकैत भागड़ यादव भी दियारा में भागते-भागते बेदम हो गया.

इसी बीच भागड़ यादव उत्तर  प्रदेश में जौनपुर के चिकित्सक मधेशिया का अपहरण कर 20 लाख रुपए वसूलने में कामयाब हो गया. लेकिन अब उसने अपने को असुरक्षित महसूस कर एसपी केएस अनुपम से संवाद साधा और उदयपुर के घने जंगल में अपने सहयोगी सोखा यादव, लखी बीन आदि के साथ आत्मसमर्पण कर दिया. 5 मई 2008 को आत्मसमर्पण के दौरान बड़ा मंच बनाया गया. हजारों-हजार ग्रामीण इस डकैत को देखने के लिए उमड़ पड़े. मंच पर भागड़ ने पहुंचते ही हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया. भागड़ जिंदाबाद के नारे और तालियों की गड़गड़ाहट से सभा स्थल गूंज उठा. भागड़ यादव ने अपने संबोधन में कहा कि पिछले तीन दशक में उससे जो भी गलती हुई होगी, उसे माफ करेंगे. अब मेरे पूरे परिवार की सुरक्षा की जिम्मेवारी एसपी पर है.

लेकिन जेल जाकर फिर से परिवार के साथ जीवन बसर करने की उसकी तमन्ना पूरी नहीं हो सकी. बेतिया मंडकारा में ही उसे वर्ष 2009 में हार्ट अटैक हुआ. उसे एमजेके अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसने अंतिम सांस लिया. अब उसकी सम्पति को लेकर उसके भाई-भतीजे और पुत्र आदि के बीच जंग छिड़ चुका है. इसके अग्रज पूर्व विधायक सतन यादव की असमय मौत हो गई. हालांकि उसकी पतोहू रेणु देवी जिला परिषद उपाध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान है. लेकिन आपसी पारिवारिक कलह का क्या अंजाम होगा, यह देखना अभी बाकी है.

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