कौन थी सहमत खान… जो तिरंगे की खातिर कुरबान हो गई

नई दिल्ली (प्रवीण कुमार): फ़िल्म राजी की कहानी रिटायर्ड नेवी ऑफिसर हरिंदर सिक्का के नॉवेल कॉलिंग सहमत पर आधारित है. इस नॉवेल में एक कश्मीरी लड़की की असल कहानी बयां की गई है. नॉवेल में इस लड़की का नाम सहमत खान है. अब आप सोचेंगे ये सहमत कौन है, वो इतनी महत्वपूर्ण क्यों है और उसकी कहानी पर फ़िल्म क्यों बनाई गई है?
दरअसल, हरिदंर सिक्का की नॉवेल कॉलिंग सहमत की लीड किरदार सहमत खान एक जासूस है. लेकिन यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि एक रियल लाइफ़ स्टोरी है, जिसकी पहचान गोपनीय रखी गई है. यहां तक कि उस लड़की का असली नाम क्या है, यह भी आज तक किसी को नहीं पता है. सहमत खान एक काल्पनिक नाम है जिसे हरिंदर सिंह ने अपनी नॉवेल कॉलिंग सहमत में रखा था. जिस महिला जासूस की जिंदगी पर यह नॉवेल आधारित है, उसने हरिंदर सिंह सिक्का से एक वादा लिया था कि उसके जीते-जी यह किताब प्रकाशित नहीं होगी और यह वादा हरिंदर ने बखूबी निभाया. इस महिला जासूस ने पाकिस्तान में दुश्मनों के बीच रहते हुए भारत को बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराई थी. वो उन चंद सीक्रेट एजेंट्‌स में से एक है, जो पाकिस्तान में जासूसी करने के बाद भारत लौट पाई थी.

दरअसल, 1971 में हुए इंडिया-पाकिस्तान युद्ध से पहले सेना को एक ऐसे जासूस की ज़रूरत पड़ गई थी, जो पाकिस्तान में रह कर पाकिस्तानी सेना की हर हरकत पर नज़र रख सके. इसके लिए एक कश्मीरी बिज़नेसमैन अपनी बेटी सहमत (काल्पनिक नाम) को मनाने में कामयाब हो गए. मगर सहमत खान ने कभी भी जासूसी करने के बारे में सोचा नहीं था. कश्मीर की वो युवा लड़की, जिस समय कॉलेज की पढ़ाई कर रही थी, उसी दौरान उसके पिता ने उसे जासूस बनने के लिए कहा. उसे जासूसी का मतलब तक नहीं मालूम था, लेकिन फिर भी वो अपने पिता और देश की ख़ातिर यह करने को तैयार हो गई. उसके बाद जो उसके लिए सबसे दिलेरी का काम था, वो था- अपने वतन की ख़ातिर पाकिस्तानी आर्मी ऑफ़िसर से शादी करना. वो उससे निक़ाह करती है और फिर वहीं से ख़ुफिया तरीके से भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना की बहुत सी गोपनीय और अहम जानकारियां देती है. उन्हीं की वजह से उस दौरान बहुत सी ज़िन्दगियां बचाई जा सकी थीं.

सहमत ने पहले एक बेटी, फिर एक पत्नी और इन सबसे ऊपर उठते हुए एक जासूस का किरदार रियल लाइफ़ में बहुत ही उम्दा तरीके से निभाया. जब वो पाकिस्तान से वापस आई, तो वो प्रग्नेंट थी. उसनेे एक लड़के को जन्म दिया, जिसने आगे चलकर अपनी मां के जैसे ही भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा की. लेकिन अब ये दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं.
इस नॉवेल को लिखने की प्रेरणा हरिंदर सिक्का को तब मिली, जब वो कारगिल युद्ध के बारे में रिसर्च के दौरान सहमत के बेटे से मिले थे. उनके बेटे ने ही अपनी मां की देशभक्ति की नायाब मिसाल से उनको रूबरू कराया था. इसके बाद सिक्का सहमत से मिलने पंजाब के मलेरकोटला पहुंचे, जहां वो रहती थीं. उन्हें देखकर ख़ुद नेवी ऑफ़िसर रह चुके सिक्का भी यक़ीन नहीं कर पाए कि वो जासूसी कर सकती हैं. यह जानकर उनकी आंखें नम हो गईं कि उस औरत ने ये सबकुछ इसलिए किया ताकि वो शान से अपने घर की छत पर तिरंगा फहरा सके.

 

 

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