भैय्यू जी महाराज, आत्महत्या या हत्या!

रविवार, सोमवार और मंगलवार, इन तीन दिनों के भीतर छिपी हुई है, राष्ट्र संत कहे जाने वाले देश के प्रसिद्ध संत भैय्यू जी महाराज की आत्महत्या या हत्या की कहानी…

bhayyu-ji-maharajभैय्यू जी महाराज को जानने वाला कोई भी उनका परिचित या  शिष्य इसे आत्महत्या नहीं मानता. यह रहस्य सामने आना चाहिए और इसके लिए आवश्यक है कि उनके निधन के समय जितने भी लोग सिल्वर स्प्रिंग में मौजूद थे उन सबका नार्को टेस्ट होना चाहिए. बिना नार्को टेस्ट के यह रहस्य ही रह जाएगा कि उनकी हत्या हुई थी या उन्होंने आत्महत्या की थी. 

भैय्यू जी महाराज कम उम्र में ही देश में एक बड़ा नाम हो गए थे. इतना बड़ा नाम कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए जब नरेंद्र मोदी ने एक दिन का उपवास किया था, तो उस उपवास को तुड़वाने के लिए भैय्यू जी महाराज को निमंत्रण दिया गया था. उस समय सारे देश ने देखा कि किस तरह यह राष्ट्र संत नरेंद्र मोदी का उपवास तुड़वा रहा है. अन्ना हजारे जब दिल्ली में अपना मशहूर आंदोलन कर रहे थे, तो उनके आमरण अनशन को तुड़वाने के लिए भी तत्कालीन सरकार ने भैय्यू जी महाराज पर आग्रहपूर्ण दबाव डाला था. अन्ना हजारे के साथ बातचीत कर एक सहमति पत्र तैयार करने का काम भी भैय्यू जी महाराज को सौंपा गया था. भैय्यू जी महाराज का सम्बन्ध लगभग हर राजनीतिक पार्टी के लोगों से था.

उनके यहां प्रतिदिन सामान्य और गरीब लोगों से लेकर राजनेताओं तक का आना-जाना लगा रहता था. उनके यहां संघ प्रमुख मोहन भागवत ठहरते थे. उद्धव ठाकरे भी आते थे. केंद्र सरकार के तमाम मंत्री उनके पास जाते थे, जिनमें नितिन गडकरी प्रमुख थे. महाराष्ट्र के सभी मंत्री उनके यहां जाते थे. मुख्यमंत्री के रूप में चाहे देवेन्द्र फडणवीस हों, विलासराव देशमुख या अशोक चव्हाण, सभी का उनके यहां आना-जाना रहा. जो भी राजनीति में थोड़ा आगे बढ़ा, वो भैय्यू जी महाराज के यहां जरूर जाता था. लेकिन भैय्यू जी महाराज स्वयं राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे. उन्होंने जनसेवा के इतने काम किए हैं, जिसकी पूरी जानकारी भी अभी तक लोगों के पास नहीं पहुंची है.

भैय्यू जी की छवि खराब करने की कोशिश

भैय्यू जी महाराज गृहस्थ संत थे. इधर, उनके निधन के बाद अखाड़ा परिषद कह रही है कि भैय्यू जी महाराज संत ही नहीं थे. भैय्यू जी महाराज की हत्या या आत्महत्या के बाद उनकी छवि खराब करने का काम तेजी के साथ शुरू हो गया है. भैय्यू जी महाराज के साथ क्या हुआ यह जानने या बताने के बजाय तरह-तरह की कहानियां लोगों के बीच परोसी गईं और यह काम भैय्यू जी महाराज के परिवार वालों ने ही किया. सबसे पहले उन्होंने भैय्यू जी महाराज की छवि पर हमला करने की कोशिश की. इसके बाद, जिसे जैसा सूझा उसने भैय्यू जी महाराज को लेकर वैसी कहानी गढ़ी और उसे अखबारों और टेलीविजन तक पहुंचा दिया.

भैय्यू जी महाराज के देहावसान के बाद से अब तक, उन्हें जानने वाले या खासकर उनसे सलाह लेने वाले लोग यह नहीं मानते कि भैय्यू जी महाराज आत्महत्या कर सकते हैं. कुछ दबी जुबान में और कुछ लोग साफ लफ्जों में कह रहे हैं कि भैय्यू जी महाराज की मौत की गहन जांच होनी चाहिए कि आखिर उनके साथ हुआ क्या? या तनाव इतना ज्यादा कैसे बढ़ गया कि उन्हें खुद को गोली मारनी पड़ी. क्या भैय्यू जी महाराज सचमुच तनाव में थे? क्या वे कर्ज में थे? क्या भैय्यू जी महाराज का ट्रस्ट दिवालिया हो चला था? ये सभी उनके तनाव की वजह बताए जा रहे हैं, लेकिन इन सवालों पर बात करने से पहले हम रविवार, सोमवार और मंगलवार की घटनाओं का जायजा लेते हैं.

भैय्यू जी महाराज रविवार को इंदौर में अपने निवास स्थान से पुणे जाने के निकले. भैय्यू जी महाराज के दो निवास स्थान थे, एक उनका अपना पुस्तैनी घर जहां उनकी बीमार मां रहती हैं और जहां उनके पिताजी का देहांत हुआ था और दूसरा घर उन्होंने सिल्वर स्प्रिंग में लिया था, जहां वेे रहते थे और लोगों से मिलते थे. चूंकि यह जगह शहर से दूर है, इसलिए उनके भक्तों को लाने के लिए आश्रम से एक बस लगातार सिल्वर स्प्रिंग में आती थी और भक्तों को लेकर वापस लौटती थी.

उस बस को इतने चक्कर लगाने पड़ते थे कि जब तक भैय्यू जी महाराज यहां रहते थे, भीड़ भरी रहती थी. लेकिन रविवार, सोमवार और मंगलवार के लिए भैय्यू जी महाराज ने किसी से भी मिलने का कार्यक्रम नहीं रखा था. वे रविवार सुबह पुणे के लिए निकले. दरअसल, वे पुणे इसलिए जा रहे थे, क्योंकि उनकी बेटी कुहू वहां रहती है. पत्नी की मृत्यु के बाद भैय्यू जी महाराज ने कुहू के लालन-पालन और उसके समग्र विकास के लिए उसे इंदौर के तनाव से दूर पुणे में रखना ठीक समझा. वे अब कुहू को लंदन भेजना चाहते थे, ताकि वो यहां के झंझटों से मुक्त होकर अपनी जिंदगी और अपने व्यक्तित्व को सकारात्मक रूप दे सके.

रेस्टोरेंट में मुला़कात

भैय्यू जी महाराज पुणे के रास्ते में इंदौर से लगभग 50 किलोमीटर दूर सेंधवा पहुंचे ही थे कि उनके फोन की घंटी लगातार बजने लगी. उन्हें उनकी वर्तमान पत्नी डॉ. आयुषी शर्मा ने पुणे जाने से मना किया था और अब वे कोई जरूरी बातचीत करने के लिए भैय्यू जी महाराज को फौरन वापस बुला रही थीं. भैय्यू जी महाराज ने डॉ. आयुषी से कहा कि मैं पुणे से लौटकर आता हूं, लेकिन पत्नी ने इतना दबाव डाला कि भैय्यू जी महाराज को सेंधवा से वापस इंदौर लौटना पड़ा. भैय्यू जी महाराज इंदौर लौटकर सिल्वर स्प्रिंग नहीं गए और न ही अपने पुराने घर गए, वे एक रेस्टोरेंट में गए, शायद डॉ. आयुषी उनसे वहीं मिलना चाहती थीं. चूंकि भैय्यू जी महाराज बहुत मशहूर चेहरा थे, इसलिए जब वे इंदौर के उस रेस्टोरेंट में पहुंचे, तो उनके लिए रेस्टोरेंट के मालिक ने जगह खाली कर दी.

रेस्टोरेंट के मालिक ने भी भांप लिया कि भैय्यू जी की मुस्कुराहट उतनी स्वाभाविक नहीं थी, वे तनाव और थोड़े गुस्से और क्षोभ में थे. भैय्यू जी महाराज जब भी कभी कहीं के लिए निकलते, तो वापस नहीं लौटते थे. उनका विश्वास था कि जब भी आप निकलें, पूरी तैयारी के साथ निकलें, अगर आप वापस आते हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी यात्रा में कोई बड़ा विघ्न आने वाला है. शायद इसीलिए भैय्यू जी महाराज लौटना नहीं चाह रहे थे, पर उनकी पत्नी ने दबाव डालकर उन्हें वापस बुलाया. उनके उस रेस्टोरेंट में पहुंचने के कुछ समय बाद डॉ आयुषी वहां पहुंचीं और जानकारी के मुताबिक, दोनों के बीच करीब चालीस मिनट से एक घंटे तक बातचीत हुई. उसके बाद, भैय्यू जी महाराज पुणे जाने के बजाय सिल्वर स्प्रिंग लौट आए.

ससुराल वालों का प्रभाव

सिल्वर स्प्रिंग में आकर वे अपने कमरे में चले गए और खामोश हो गए. किसी को पता नहीं था कि भैय्यू जी महाराज सिल्वर स्प्रिंग में हैं, इसलिए वहां सिर्फ उनके घर वाले थे, कोई मिलने वाला नहीं था. मैं स्पष्ट कर दूं कि उनके घर वालों से मेरा मतलब उनकी पत्नी और पत्नी के घर वालों से है. भैय्यू जी महाराज जिस घर में रहते थे, उसके ठीक सामने वाले घर में उनके ससुराल वाले रहते थे. इसके लिए भैय्यू जी महाराज की पत्नी ने उनपर दबाव डालकर, वो घर किराए पर लिया और उसमें अपनी मां, बहन, भाई आदि को रखवा दिया. इन सभी का पूरा नियंत्रण भैय्यू जी महाराज के सिल्वर स्प्रिंग वाले घर पर था.

पिछले छह महीनों में हालत यह हो गई थी कि पत्नी या ससुराल वालों की अनुमति के बिना भैय्यू जी महाराज अपने सेवादार या अपने साथ काम करने वालों से भी नहीं मिल सकते थे. रविवार का पूरा दिन किसी बहस में बीता. इसके गवाह सिर्फ घर के सेवक थे, जिन्हें सेवादार कहते हैं. सोमवार का दिन भी भैय्यू जी महाराज ने इसी तरह काटा. लेकिन शायद उन्होंने फोन के जरिए अपनी बेटी से कहा कि तुम इंदौर चली आओ. उनकी बेटी मंगलवार को इंदौर आने के लिए पुणे से निकली, उसे इंदौर लगभग एक या दो बजे पहुंचना था. ये मंगलवार की सुबह थी.

मंगलवार को भैय्यू जी महाराज के कुछ नजदीकी लोग सिल्वर स्प्रिंग में थे. नीचे सिर्फ तीन सेवादार थे और कुछ लोग भी नीचे बैठे थे, लेकिन उन्हें ऊपर जाने की अनुमती डॉ. आयुषी और उनके घरवालों ने नहीं दी. उनमें से एक व्यक्ति भैय्यू जी महाराज के पास ऊपर गया. भैय्यू जी महाराज अपनी बेटी के कमरे में बैठे हुए थे, वो व्यक्ति उनके पास लगभग चालीस मिनट रहा, फिर उससे नीचे जाने के लिए कहा गया. वो नीचे आकर बैठ गया. उसके बाद, लगभग बारह से साढ़े बारह बजे के बीच भैय्यू जी महाराज ने खुद को गोली मार ली. यह कहना है भैय्यू जी महाराज के घरवालों का. भैय्यू जी महाराज ने एक सुसाइड नोट लिखा, जिसके बारे में बताया गया कि उन्होंने आत्महत्या से पहले यह लिखा था.

घरवालों के अनुसार, भैय्यू जी महाराज ने जब एक घंटे तक कोई हरकत नहीं की और नीचे नहीं आए, तो घरवालों ने दरवाजे पर दस्तक दी, दरवाजा अंदर से बंद था. उसके बाद दरवाजा तोड़ा गया और अंदर वे अंदर गए तो देखा कि वे पलंग पर लेटे हुए थे और पूरे कमरे में खून ही खून था. यहां कई सवाल खड़े होते हैं. उस घर में सेवादार थे, उनकी पत्नी थीं. तथाकथित आत्महत्या से पहले उनकी आखिरी बातचीत पत्नी से हुई थी. भैय्यू जी महाराज हर 15-20 मिनट में पानी मांगते थे, फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि उन्होंने पानी न मांगा हो और इसे लेकर किसी को कोई चिंता भी नहीं हो. जो व्यक्ति लगातार लोगों के बीच रहता हो, वो एक घंटे तक खामोश अकेला रहे और फिर कहा जाय कि एक घंटे बाद हमने दरवाजा तोड़ा तो भैय्यू जी महाराज बिस्तर पर गिरे दिखे और पूरे कमरे में खून ही खून था.

घरवालों की भूमिका संदिग्ध

दरवाजा टूटने के 15 मिनट बाद विनायक वहां पहुंचे और भैय्यू जी महाराज सिल्वर स्प्रिंग से बॉम्बे हॉस्पीटल के लिए ले जाए गए. सिल्वर स्प्रिंग और बॉम्बे हॉस्पीटल के बीच करीब 20 किलोमीटर लंबा फासला है. लेकिन भैय्यू जी महाराज तो उस गोली के साथ ही अपना शरीर छोड़ चुके थे, जो या तो उन्हें मारी गई थी या उन्होंने खुद मार ली थी. यहां एक रहस्य और है. भैय्यू जी महाराज के अंतरंग जितने लोगों से हमारी टीम ने पूछताछ की, उससे एक नई बात पता चली कि भैय्यू जी महाराज कभी अपना कमरा बंद नहीं करते थे. आजतक उनकी आदत ही नहीं रही कमरा बंद करने की.

वे अपनी बेटी के कमरे में थे, जो एक से दो बजे के बीच उनसे मिलने के लिए इंदौर पहुंचने वाली थी. भैय्यू जी महाराज की मौत के बाद, उनकी तथा बेटी कुहू के बारे में सारी कहानियां उनके ससुराल वालों के हवाले से सामने आईं. अब सवाल यह उठता है कि क्या इन सबकी जांच हो रही है कि कमरा तोड़ा गया या नहीं तोड़ा गया या गोली किसने चलाई? क्या भैय्यू जी महाराज के या किसी और के हाथ में रिवॉल्वर थी और भैय्यू जी महाराज ने कहा कि आपलोग जो मुझसे करवाना चाहते हो, उससे अच्छा है, आप ही गोली मार दो और उसने गोली चला दी हो? सरकार चाहती है कि इसे आत्महत्या कहकर मामले को खत्म कर दिया जाए.

एक और रहस्य है. भैय्यू जी महाराज का अंतिम संस्कार अगले दिन हो गया. लगभग दस हजार लोग उस अंतिम संस्कार में शामिल हुए और उसके अगले ही दिन भैय्यू जी महाराज की स्मृति में प्रार्थना सभा हुई. इसमें न तो किसी भजन गायक ने प्रार्थना कही, न ही श्रद्धांजलि दी और न ही स्मृति सभा हुई. एक रिकॉर्ड प्लेयर बजाकर पांच बजे शुरू हुई प्रार्थना सभा छह बजे खत्म हो गई. सबकुछ आखिर इतनी जल्दी-जल्दी क्यों?

मानवीय संवेदना का विद्रुप चेहरा

मानवीय संवेदना का एक विद्रुप चेहरा भैय्यू जी महाराज के देहांत के बाद दिखाई दिया. उनकी सलाह के लिए, उनकी कृपा के लिए उनके यहां आकर महिमामंडित होने वाले राजनेताओं और बड़ी फिल्मी हस्तियों में से कोई भी भैय्यू जी महाराज की मृत्यु के बाद उनके यहां संवेदना प्रकट करने नहीं पहुंचा. हालांकि 14 तारीख की रात में नौ बजे कैलाश विजयवर्गीय उनके घर गए. कई और लोग भी आए-गए होंगे, लेकिन कोई बड़ा नाम भैय्यू जी महाराज को श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचा. अब ये परिस्थितियां कह रही हैं कि भैय्यू जी महाराज के आसपास जितने लोग थे, उन्होंने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि जो भैय्यू जी महाराज लगातार लोगों से घिरे रहते थे और जो हर 15-20 मिनट के बाद पानी पीते थे, वे कहां हैं और क्या कर रहे हैं.

अखबारों में जो कहानियां छपीं वो सभी भैय्यू जी महाराज के ससुराल वालों के हवाले से थीं. उन कहानियों में यह भी कहा गया कि ‘भैय्यू जी महाराज की पत्नी उनकी दुबली-पतली 17 साल की बेटी कुहू से आतंकित रहती थीं कि कहीं कुहू उनका कुछ अहित न कर दे. इसी डर से उन्होंने सिल्वर स्प्रिंग में भैय्यू जी महाराज के घर के सामने के मकान को किराए पर लेकर अपने घर वालों को वहां रखा था.’ यह अजीब कहानी है. कुहू को तो भैय्यू जी महाराज पारिवारिक कलह की वजह से लंदन भेज देना चाहते थे. अब कुहू को ही विलेन बनाने की कोशिश जिन लोगों ने की उन लोगों ने कभी भैय्यू जी महाराज से स्नेह किया ही नहीं.

दूसरी शादी और कलह की शुरुआत

दरअसल, लगभग सवा साल पहले भैय्यू जी महाराज ने दूसरी शादी की. उन्होंने दूसरी शादी का कारण अपने नजदीकी व्यक्तियों को यह बताया कि मेरी बेटी की देखभाल कोई लड़की ही अच्छी तरह कर सकती है. वो दूसरी शादी कुहू के लिए ही थी लेकिन वो कुहू के ही जीवन का जंजाल बन गई. कुहू एक बार इंदौर आईं, तो उन्होंने देखा कि पूरे घर से उनकी मां की तस्वीरें गायब हैं और उनका सामान हटा दिया गया है. इसपर कुहू ने कड़ी आपत्ती जताई. उस आपत्ति के बाद ही भैय्यू जी महाराज की नई पत्नी डॉ. आयुषी और कुहू के बीच एक द्वंद्व शुरू हो गया. नौकरी तलाश करने के लिए इंदौर आई सामान्य घर की एक लड़की, जब इतने बड़े व्यक्तित्व के नजदीक पहुंचती है और उसे उससे शादी की संभावना नजर आती है, तो स्थितियां कैसे बदलती हैं, शायद भैय्यू जी महाराज का जीवन इसका उदाहरण है.

भैय्यू जी महाराज पर लगातार दबाव डाला जाने लगा कि वे अपनी सारी संपत्ति का उत्तराधिकारी अपनी पत्नी को बनाएं और उनकी पत्नी को यह लगा कि जितना आदर सम्मान वो भैय्यू जी महाराज को देती हैं, उतना ही आदर सम्मान वे उन्हें भी दें. दरअसल, भैय्यू जी महाराज की दूसरी पत्नी आयुषी शर्मा वो डॉक्टर हैं, जो एक एक्सिडेंट के बाद भैय्यू जी महाराज की देखभाल करने वालों में शामिल थीं और उन्हें एक्सरसाइज कराती थीं. बाद में दोनों की शादी हुई. डॉ आयुषी भैय्यू जी महाराज की उन सारी संपत्तियों को लेकर भ्रम और आशंका में थीं, जिनके बारे में लोग अंदाजा लगाते थे कि ये पांच सौ करोड़ की हैं, हजार करोड़ की हैं या दो हजार करोड़ की.

भैय्यू जी महाराज की जन सेवा

भैय्यू जी महाराज ने अपनी पैतृक संपत्ति में से कुछ जमीनें बेचकर समाज सेवा में भी लगाई थी. उन्होंने अपराधी वृत्ति वाले पारदी समाज के बच्चों के लिखने-पढ़ने के लिए हॉस्टल और स्कूल की व्यवस्था की थी. उन्होंने बहुत सारी वेश्याओं के बच्चों के पढ़ने-लिखने की व्यवस्था की और उनके पिता की जगह अपना नाम लिखवाया. देवदासियों को उनके नारकीय जीवन से निकालने की भी उन्होंने लगातार कोशिशें की, जिसके कारण उनपर दो बार जानलेवा हमला भी हुआ. एकबार उनके पास आए कुछ किसानों ने कहा था कि वे आत्महत्या करने को मजबूर हैं, तो भैय्यू जी महाराज का जवाब था कि आत्महत्या क्यों करोगे, अच्छे से जीवन जीओ, तुम्हें जो जरूरत होगी मैं मदद करूंगा. उसके बाद उन्होंने किसानों के लिए मुफ्त खाद और बीज की व्यवस्था की.

किसानों को पानी रखने के लिए उन्होंने पानी की टंकियां मुफ्त बंटवाईं. आदिवासी इलाकों में आदिवासियों के बच्चों के लिए उन्होंने स्कूल खोला, बच्चों को स्कॉलरशिप दी. जो भी पैसा उन्हें मिला, उसमें अपना पैसा मिलाकर अपनी पारिवारिक संपत्ति से भैय्यू जी महाराज ने गरीबों के लिए काम किया. सरकारों की वादाखिलाफी से वे बहुत दुखी रहते थे. बलात्कार के बाद मार दी गई मराठा लड़की के परिवार की भैय्यू जी महाराज ने हर तरह से सहायता की, जिसे सरकार ने भूला दिया. पूरे महाराष्ट्र में उस लड़की के समर्थन में लाखों लोगों का जुलूस निकला था, मुख्यमंत्री ने उसके लिए काफी वादे किए थे, उसके भाई को नौकरी देने की बात कही गई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

सरकार की इस वादाखिलाफी का भैय्यू जी महाराज को दुख था. इस मामले के आरोपी पकड़े गए थे, उन पर मुकदमा चला लेकिन सरकार ने मुकदमे की ठीक से पैरवी नहीं की, इसका भी दुख भैय्यू जी महाराज को था. भैय्यू जी महाराज अपने पैसों और संसाधनों से उस परिवार की मदद करते थे. उस परिवार को भैय्यू जी महाराज के पास कई बार देखा गया. ऐसे लोगों का आश्रय सिर्फ भैय्यू जी महाराज ही होते थे.

भैय्यू जी महाराज के सार्वजनिक कामों को अब कैसे संचालित किया जाएगा, यह किसी को नहीं पता. विनायक पिछले 15 साल से भी ज्यादा समय से भैय्यू जी महाराज के संपर्क में था. वो भैय्यू जी महाराज का अत्यंत विश्वासपात्र था. भैय्यू जी महाराज अपनी बेटी की जरूरतों को पूरा करने के लिए और उसकी देखभाल के लिए विनायक पर भरोसा करते थे. विनायक ने भैय्यू जी महाराज के पिता की जी-जान से सेवा की और अब वो उनकी मां की भी जी जान से सेवा कर रहा है. भैय्यू जी महाराज अपनी मां से बहुत स्नेह करते थे. उनकी मां बीमार हैं, वे बिस्तर पर हैं.

सुसाइड नोट पर सवाल

एक सवाल भैय्यू जी महाराज के सुसाइड नोट पर भी खड़ा होता है. सुसाइड नोट में कुहू का कोई जिक्र नहीं है, जिसे वे जी-जान से चाहते थे. आश्चर्य की बात है कि जो बेटी एक से दो बजे के बीच इंदौर आकर उनसे मिलने वाली थी, उस बेटी का उन्हें ख्याल नहीं आया और उन्होंने आत्महत्या कर ली. भैय्यू जी महाराज अपनी मां के भी बेहद करीब थे, लेकिन उनके सुसाइड नोट में मां का भी कहीं कोई जिक्र नहीं है. भैय्यू जी महाराज अपनी चार महीने की बेटी को भी बहुत प्यार करते थे. उसका नाम उन्होंने धारा रखा था. 10, 11 और 12 जून उनके जीवन की आखिरी तारीख हैं.

10 तारीख से दो दिन पहले आठ जून को उन्होंने अपनी पत्नी डॉ. आयुषी का जन्मदिन मनाया था. भैय्यू जी महाराज में इतनी शक्ति थी कि वे अंदर से चाहे जितने उद्वेलित रहे हों, लेकिन वे अपने चेहरे पर उसकी छाया भी नहीं आने देते थे. भैय्यू जी महाराज के जिस पारिवारिक तनाव की चर्चा होती है, वह सिर्फ इसे लेकर था कि 48 साल के शख्स का उत्तराधिकारी उनकी पत्नी बने या उनकी बेटी. यह भी सबकी समझ से बाहर है कि 48 साल की उम्र के व्यक्ति की संपत्ति के बंटवारे की बात कहां से शुरू हो गई. भैय्यू जी महाराज अगर लंबे समय से तनाव में चल रहे होते, तो शिवनेरी के रिनोवेशन पर जो उन्होंने करीब एक करोड़ रुपए खर्च किए, वो नहीं करते. उन्होंने अपनी मृत्यु से लगभग एक महीने पहले बीएमडब्ल्यू कार बुक कराई थी, जिसके लिए 23 लाख रुपए का भुगतान हो चुका था. अब चारों तरफ यह कहानी चल रही है कि भैय्यू जी महाराज इतने परेशान थे कि इस कार को बेचने के लिए उन्होंने लोगों को जिम्मेवारी सौंपी थी.

एक अफवाह चल रही है कि भैय्यू जी महाराज कर्ज के बोझ से दब गए थे, जिसकी वजह से वे तनाव में रहते थे. अगर इसमें सच्चाई होती, तो उनके सद्गुरु दत्त परमार्थ ट्रस्ट पर कर्ज होता, लेकिन उनके इस ट्रस्ट पर कोई कर्ज नहीं है. ट्रस्ट ने इस साल भी 28 लाख रुपए खर्च कर महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में जल संरक्षण का काम कराया है. वे अगर तनाव में होते तो बेटी को विदेश में सेटल करने की योजना नहीं बनाते. पत्नी और बेटी के बीच आए तनावों में वे बेटी को समझा रहे थे, लेकिन पत्नी को नहीं समझा पा रहे थे और इसीलिए उन्होंने अपनी बेटी को विदेश भेजने का फैसला किया था.

रहस्य से पर्दा उठना ज़रूरी

भैय्यू जी महाराज के काम करने का तरीका बहुत सुंदर होता था. वे जब भी कोई काम शुरू करते, तो अपने साथियों को, चाहे उन्हें सेवादार कहें या उनके सपनों को पूरा करने वाली टीम, उन्हें पूरा खाका तैयार करने का निर्देश देते थे. अगर भैय्यू जी इतने ज्यादा तनाव में होते, तो अपनी वसीयत अवश्य बनाते और अपनी प्यारी बेटी कुहू और पत्नी के लिए सुसाइड नोट में अवश्य कुछ लिखते, लेकिन इनके बारे में एक एक शब्द भी नहीं लिखना समझ में नहीं आता है. भैय्यू जी महाराज किस तरह के षडयंत्र, विश्वासघात और मांगों के शिकार हुए, यह शायद कभी भी सामने नहीं आ पाएगा, क्योंकि सरकार इस मामले की पूर्ण रूप से जांच कराने में रुचि नहीं रखती. उसने पहले दिन से इसे आत्महत्या की नजर से देखा.

लेकिन इसे लेकर इतने सवाल हैं कि भैय्यू जी महाराज को जानने वाला कोई भी उनका परिचित या शिष्य इसे आत्महत्या नहीं मानता. यह रहस्य सामने आना चाहिए और इसके लिए आवश्यक है कि उनके निधन के समय जितने भी लोग सिल्वर स्प्रिंग में मौजूद थे उनका नार्को टेस्ट होना चाहिए. बिना नार्को टेस्ट के यह रहस्य ही रह जाएगा कि उनकी हत्या हुई थी या उन्होंने आत्महत्या की थी. हमारे देश से खोजी पत्रकारिता खत्म हो चुकी है. पुलिस की जांच कैसी होती है, यह हमें पता ही है. भैय्यू जी महाराज का महज 48 साल की उम्र में दुनिया से चले जाना या उन्हें दुनिया से भेज देना हमारे समय का सबसे दुखद अध्याय है. हमें आशा करनी चाहिए कि सरकार इस मामले में सीबीआई जांच करेगी.

भैय्यू जी महाराज की मौत के अगले दिन अखबारों में और टेलीविजन चैनलों में यह कहानी प्रमुखता से दिखाई गई कि भैय्यू जी महाराज रविवार को एक रेस्टोरेंट में एक रहस्यमय महिला से मिले थे. वो महिला कौन थी, इसे लेकर सवाल उठाए गए. ऐसा लगा जैसे इस खबर के जरिए भैय्यू जी महाराज और उनकी महिला मित्रों के बीच की कोई चटकदार कहानी लोगों को बताई जा रही है. रेस्टोरेंट में मिलने वाली महिला उनकी पत्नी डॉ आयुषी थीं, जो पुणे के रास्ते से भैय्यू जी महाराज को बुलाकर उस रेस्टोरेंट में मिली थीं.

अब सवाल यह उठता है कि मीडिया में ऐसी कहानी आने के बाद डॉ. आयुषी ने सामने आकर क्यों नहीं बताया कि जिस रहस्यमय महिला की बात की जा रही है, वो वे ही थीं. वे नहीं चाहती थीं कि भैय्यू जी महाराज अपनी बेटी से मिलें. इसलिए उन्होंने दबाव डालकर भैय्यू जी महाराज को सेंधवा से वापस आने के लिए मजबूर किया और भैय्यू जी महाराज का यह विश्वास सही साबित हुआ कि यात्रा पर निकलने के बाद अगर हम वापस आते हैं, तो फिर कुछ न कुछ ऐसा होगा, जो नहीं होना चाहिए. भैय्यू जी महाराज के साथ भी वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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