भाजपा अपनी राह भटक गई है

narendra-modiअब यह स्पष्ट है कि अगले साल 2019 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की कठिनाई बढ़ गई है. इसके कई संकेत हैं. लेकिन अब तो प्रधानमंत्री की भाषा में, उनके आचरण से स्पष्ट होता है कि वह बिल्कुल बौखला गए है और ऐसा लग रहा है कि बात हाथ से जा रही है. पहले कश्मीर को ही लीजिए. कश्मीर संवेदनशील विषय है. मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ भाजपा ने जो सरकार बनाई थी, वही गलत कदम था. लेकिन यह पार्टी के हित में था. क्योंकि सरकार बन रही है, 10-15 मंत्री बन जाएंगे और पैसे बनाएंगे. कश्मीर, नागालैंड, अरुणाचल, मिजोरम बॉर्डर स्टेट है. कश्मीर एक अलग सवाल है.

वहां पर पॉलिटिक्स खेलने में लक्ष्मण रेखा खींच देनी चाहिए. एक हद तक पॉलिटिक्स खेलनी चाहिए और बाद में अपना हाथ खींच लेना चाहिए. यह बात किसे समझाया जाए? कांग्रेस समझती थी. कांग्रेस एक हद के बाहर नहीं गई. 1964 में  एक बार चली गई थी.  इसका परिणाम आज तक भुगत रहे हैं. इसके बाद, फारूक अब्दुल्ला कांग्रेस के खिलाफ जाकर मुख्यमंत्री बन गए. इंदिरा गांधी को बर्दाश्त नहीं हुआ. आज कश्मीर की जो समस्या है, वह उसके बाद पैदा हुई है. अब ये लोग (भाजपा वाले) समझते नहीं हैं. इंदिरा गांधी की गलती से तो आप सीख लो या खुद गलती करके सीखोगे.

भाजपा एक बात को ले कर क्लियर है कि आर्टिकल 370 हटाने से ही कश्मीर का विलय भारत में होगा, तभी समस्या का समाधान होगा. एक तरफ, पीडीपी 370 हटाने के पक्ष में नहीं है. पीडीपी चाहती है कि पाकिस्तान से बातचीत हो और ऐसा हल निकले, जिससे भारत और पाकिस्तान दोनों खुश हो. ऐसी विचारधारा वाली पार्टी के साथ भाजपा को सरकार बनाने की जरूरत क्या थी? मुफ्ती साहब का इंतकाल हो गया. मुफ्ती साहब के जनाजे में दो हजार आदमी नहीं थे. मुफ्ती साहब समझते थे कि शेख अब्दुल्ला के बाद सबसे बड़े नेता वही वो हैं. लेकिन ये भ्रम टूट गया. महबूबा मुफ्ती को भी जनता की आकांक्षा समझ लेनी चाहिए थी. उन्होंने भाजपा के साथ सरकार बना ली.

भाजपा ने महबूबा सरकार से समर्थन वापस ले लिया. फिर राज्यपाल शासन लगा. पिछले 12 महीने से दिख रहा था कि गवर्नर रूल ही इस सरकार से अच्छा विकल्प होगा. हालांकि गवर्नर रूल जनतंत्र में अच्छा नहीं होता है. लेकिन एक अलग स्थिति है वहां. अब खबर आ रही है कि भाजपा कश्मीर में सरकार बनाने की जुगत में है. जैसे तोड़-फोड़ कर गोवा, मणिपुर में किया. यही काम कांग्रेस करती रही है बाबा आदम के जमाने से. जैसे इंदिरा गांधी ने गलती की, फारूक अब्दुल्ला सरकार के लोग को तोड़ कर दूसरे की सरकार बना दी. अब भाजपा चाहती है कि पीडीपी को तोड़ कर सरकार बना लिया जाए. वो कौन एमएलए है जो पीडीपी छोड़कर भाजपा ज्वाइन करेंगे. पब्लिक में मुंह दिखाने लायक रहेंगे?

अभी भी मेरी सलाह है मोदी जी को. आप पार्टी वालों को मना कर दीजिए कि ऐसी मूर्खता न करें. यह देश को बिल्कुल नुकसान पहुंचाने वाली बात है. अगर आप सरकार बना भी लेंगे तो कश्मीर समस्या का हल निकालना और मुश्किल हो जाएगा. मुझे तो ताज्जुब होने लगा है कि तीन-चार साल में मोदी जी ने किस तरह की राजनीतिक जहनियत का निर्माण किया है. पैसा, विज्ञापन, अखबार, गाली गलौज, झूठ-सच. यह सब ठीक नहीं है. भाजपा किस बात के लिए कांग्रेस मुक्त भारत चाहती थी.

मोदी जी के साफ किया कि कांग्रेस मुक्त से मेरा मतलब पार्टी से नहीं है, हम कांग्रेस कल्चर से मुक्ति चाहते है. लेकिन, भाजपा जो कर रही है उससे तो लगता है कि भाजपा कांग्रेस से बहुत आगे जा रही है. बहुत सोच कर संविधान बना था. जवाहरलाल नेहरू हों, चाहे सरदार पटेल हों, चाहे बाबा साहेब अंबेडकर हों, उन्होंने जो संविधान बनाया था, उसका भी सम्मान नहीं हो रहा है. कोई आदमी जीते कुछ सोच कर और पैसा लेकर दूसरी तरफ चला जाए, मंत्री बन जाए. अब तो गंभीरता से  सोचना पड़ेगा कि एंटी डिफेक्शन एक्ट से भी आगे कुछ हो सकता है क्या? हालांकि मेरी राय ये है कि इस एक्ट से नुकसान हुआ है.

बिडंबना यह है कि मोदी जी ने 2013 से मई 2014 तक क्या-क्या कहा था और अब कहां पहुंच गए. इस बात का जवाब नहीं है. एक भी परफॉरमेंस नहीं है और मोदी जी की व्यक्तित्व में जो कमजोरी है कि वे वास्तविकता से इंकार करते हैं. वो कभी वास्तविकता को मानने को तैयार नहीं होते. ये कहने को तैयार नहीं है कि हां भाई मैंने सौ काम कहे थे, 40-50 काम हुआ. लेकिन, काम हुआ 40 है और बोलेंगे कि सौ पूरा हो गया, आपको दिख नहीं रहा. अभी मोदी जी जयपुर गए थे, कुर्सियां खाली थी. वसुंधरा राजे की सरकार काफी अलोकप्रिय है वहां. वहां मोदी जी कह रहे हैं कि आप लोगों को तो पता है कि पहले की सरकारों ने क्या किया, साठ साल में कितना विकास हुआ है. जनता हंस रही होगी. जितनी आपकी विश्वसनीयता बाकी है उसेे तो बचाइए. देश के प्रधानमंत्री हैं आप. देश के प्रधानमंत्री को ऐसी बात नहीं करनी चाहिए, जो सुनते ही लगे कि गलत बात है.

अभी सरकार ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है. इसके पीछे भी राजनीति है. चुनाव का समय है. जिस राज्य में जो फसल उगती है, उसका दाम बढ़ा कर फायदा उठाने की कोशिश. सरकार का किसानों की वास्तविक समस्या से कोई ताल्लुक नहीं है. आज किसान गुस्से में हैं. मध्यप्रदेश में किसानों की समस्या को ले कर शिवराज सिंह चौहान कुछ भी बोलते रहते हैं. मध्यप्रदेश के किसानों ने तय कर लिया है कि भाजपा को वोट नहीं देंगे. भाजपा बोलती रहे कि कमलनाथ, ज्योतिरादित्य में झगड़ा है. आरएसएस को ले कर मुझे ताज्जुब है. 90 साल पुरानी संस्था है. क्या उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि हिन्दू-सनातन धर्म को नष्ट कर देंगे मोदी जी. कोई गाय लेकर जा रहा है तो बिना जाने-समझे आदमी को मार देंगे और बोलेंगे कि गाय काटने के लिए लेकर जा रहा था.

कहां रह रहे हैं हमलोग. हालात बहुत खराब हो गए हैं. इंदिरा गांधी ने अपनी तानाशाही चलाई 19 महीने. वो समझ गई कि ये कितना खतरनाक है. उसे वापस ले लिया. चुनाव करवाया, हार गईं, विपक्ष में बैठी, तीन साल बाद वापस आ गई सत्ता में. उनसे सीखिए कुछ. पूर्णविराम दुनिया का अंतिम नहीं है, हिन्दुस्तान के लोकतंत्र का अंत नहीं है. वह एक पड़ाव है, पांच साल में एक पड़ाव आता है, लेकिन अगर आपकी चाहेंगे कि  येन-केन-प्रकारेण जीतना ही है, तो यह गलत है. उसके लिए भाजपा जो कर रही है, मैं नहीं समझता हूं कि इससे भाजपा अपनी गरिमा बढ़ा रही हैं. भाजपा अपना रास्ता भूल गई है. जहां से चले थे, मैं समझता हूं, गुमराह हो गई है. जीपीएस की जरूरत है भाजपा को. वापस ट्रैक पर आइए.

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *