बैंक अमित शाह का, पैसा किसका!

8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नोटबंदी की घोषणा कर रहे थे, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि आने वाले कुछ महीनों में उन्हें किन मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा? अपने ही पैसे के लिए उन्हें अपनी जान भी देनी पड़ेगी. किसानों को अपनी नकदी फसल औने-पौने दामों में बेचनी पड़ेगी. मजदूरों को काम से हाथ धोना पड़ेगा. न्यूज़ चैनलों पर कलाधन गंगा में बहते दिखाया जाएगा. लोग शायद ये सब कष्ट भले भूल जाए, लेकिन नोटबंदी का जिन्न बार-बार बोतल से बाहर आ ही जाता है.

इस बार ये जिन्न 22 जून को गुजरात में प्रकट हुआ. दरअसल, एक आरटीआई से मालूम हुआ कि अमित शाह और भाजपा नेताओं से संबध रखने वाले गुजरात के सहकारी बैंकों में 3118 करोड़ रुपए की पुरानी करेंसी के नोट नोटबंदी के समय जमा हुए, यानी नए नोट से बदले गए. अमित शाह जिस अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक के निदेशक हैं, उसमें नोटबंदी के दौरान सिर्फ पांच दिनों में लगभग 750 करोड़ रूपये के नोट जमा किए गए, जबकि राजकोट जिला सहकारी बैंक, जिसके चेयरमैन गुजरात सरकार के मंत्री जयेशभाई विट्ठलभाई रदाड़िया हैं, में 693 करोड़ रूपये के पुराने नोट जमा हुए. कांग्रेस ने इसे एक बड़ा घोटाला करार दिया. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि नोटबंदी दरअसल गलत तरीके  से हासिल काले पैसे को सफ़ेद करने के लिए की गई थी. गौरतलब है कि धांधली की आशंका में 14 नवम्बर 2016 को देश के सभी जिला सहकारी बैंकों पर पुराने नोट लेने पर पाबंदी लगा दी गई थी. हैरान करने वाली बात यह थी कि गुजरात स्टेट     को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड में इस दौरान 1.11 करोड़ रूपये ही जमा हुए, जिससे धांधली का संदेह और गहरा हो जाता है.

बहरहाल, नाबार्ड, जहां से आरटीआई के जरिए यह आंकड़े हासिल किए गए थे, ने सफाई दी कि अहमदाबाद सहकारिता बैंक में जो पैसे जमा किए गए थे, वह बैंक की क्षमता और केवाईसी मानकों के आधार पर किए गए थे. नाबार्ड का कहना है अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक के कुल 17 लाख खतों में से केवल 1.60 लाख खातों में ही नोट बदले गए थे. नाबार्ड की ओर से यह भी कहा गया कि अमित शाह जिस बैंक के निदेशक हैं, उस बैंक से अधिक महाराष्ट्र और केरल के सहकारी बैंकों में रद्द हुए नोट जमा हुए थे. लेकिन, नाबार्ड के इस दावे को कई एक्सपट्‌र्स ने ख़ारिज कर दिया है. शक की गुंजाइश इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि गुजरात स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक की क्षमता इन दो बैंकों से अधिक है. इसके बावजूद इन दोनों बैंकों में जमा हुए तकरीबन 1400 करोड़ के मुकाबले गुजरात स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक में सिर्फ 1.11 करोड़ रूपये मूल्य के रद्द नोट ही जमा हो पाए. सवाल यह है कि जब सरकार जनधन खातों में जमा पैसों की जांच और कार्रवाई की बात कर रही थी, तो फिर इन खातों में जमा पैसों की जांच करवाने में क्या हर्ज है.

पैसा सुरक्षित खबर गायब

जो दूसरी हैरान करने वाली बात है, वो है मीडिया द्वारा इस खबर की कवरेज. आरटीआई द्वारा हासिल जानकारियों पर आधारित न्यूज एजेंसी एएनआई की इस खबर को कई बड़े मीडिया हाउस के वेबसाइट पर लगाया गया. लेकिन कुछ घंटों बाद ही उन खबरों को वहां से हटा लिया गया. इन वेबसाइटस में न्यूज़18, फर्स्टपोस्ट, टाइम्स नाउ और न्यू इंडियन एक्सप्रेस जैसी वेबसाइट्‌स के नाम शामिल हैं. इन वेबसाइट्‌स ने यह नहीं बताया कि आखिर उन्होंने इस खबर को क्यों हटाया? क्या खबर गलत थी, आरटीआई से निकली जानकारी गलत थी या फिर कोई दबाव था? जाहिर है, ये स्थिति देश में मुख्यधारा की मीडिया की नंगी और भद्दी तस्वीर पेश करती है.

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