सरकार का न्यू मीडिया कमांड रूम, सरकार लोगों को राष्ट्रवाद सिखाएगी या जासूसी करेगी

command-roomसोशल मीडिया के इस युग में वर्चुअल वर्ल्ड का प्रभाव क्या होता है, इसे समझना हो तो राजनीतिक दलों की सोशल मीडिया पर मौजूदगी और सोशल मीडिया को ले कर पैदा हो रही रूचि को देख कर समझा जा सकता है. अब तो हालत ये है कि भारत जैसे देश में भी चुनाव प्रचार सोशल मीडिया के जरिए होने लगा है. ऐसे में, सोशल मीडिया पर नजर रखने के लिए केंद्र सरकार एक न्यू मीडिया कमांड रूम बनाने जा रही है.

इस न्यू मीडिया कमांड रूम (सोशल मीडिया कम्युनिकेशन हब) के माध्यम से सरकार सोशल मीडिया पर राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने और देश विरोधी सामग्री पर नजर रखने का काम करेगी. ये काम सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत होगा. इसके लिए मंत्रालय के अधीन आने वाली संस्था बेसिल ने बकायदा एक विज्ञापन भी जारी किया. इसमें कहा गया है कि उसे एक कंपनी की तलाश है, जिसके पास एक एनालिटिकल सॉफ्टवेयर और कम से कम 20 प्रोफेशनल लोगों की टीम हो.

यह टीम एक न्यू मीडिया कमांड रूम बनाएगी और फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, लिंक्डइन आदि पर पोस्ट की जाने वाली सामग्री पर नजर रखेगी और इसकी रिपोर्ट बना कर डेली बेसिस पर सरकार को देगी. ये न्यू मीडिया कमांड रूम खास कर ऐसी सामग्री पर भी ध्यान देगी, जो देश हित में नहीं होगी. अब ये अलग सवाल है कि किस सामग्री को देश हित में माना जाएगा और किसे नहीं. सरकार के मुताबिक, इससे देश में एक सकारात्मक वातावरण बनाया जा सकेगा और जनता के बीच राष्ट्रवाद की भावना को प्रोत्साहित किया जा सकेगा.

अब इसका अगर विश्लेषण किया जाए तो ये कहा जा सकता है कि सरकार अब आधिकारिक तौर पर किसी भी सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा लिखे जाने वाले पोस्ट की जांच कर सकती है. हालांकि, इसके बाद सरकार क्या करेगी, इसे ले कर सरकार का कहना है कि सोशल मीडिया पर की जा रही पोस्ट का विश्लेषण कर राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाली सामग्री परोसी जाएगी, ताकि यूजर्स के मन में अगर कोई गलत भावना हो तो वो दूर हो सके. बेसिल ने इसके लिए 25 अप्रैल 2018 को बकायदा एक टेंडर भी निकाला और अब तक टेंडर की प्रक्रिया खत्म भी हो चुकी होगी. इस काम के लिए किस कंपनी का चयन हुआ है और क्या ये काम आधिकारिक तौर पर शुरू हो चुका है, इसकी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं कराई गई है.

बेसिल द्वारा जारी टेंडर के मुताबिक, न्यू मीडिया कमांड रूम सोशल मीडिया पर मौजूद यूजर्स की 360 डिग्री प्रोफाइल, रीयल टाइम मॉनिटरिंग आदि का काम करेगा. इसके तहत यूजर्स के राजनीतिक रूझान का भी पता लगाया जा सकता है और संभवत: उस रूझान को प्रभावित करने के लिए न्यू मीडिया कमांड रूम अपने तौर पर कंटेंट भी पेश कर सकता है, जैसाकि अभी फेसबुक-कैंब्रिज एनालिटिका प्रकरण हुआ था, कुछ उसी तर्ज पर. सवाल है कि इस तरह के काम का मकसद क्या हो सकता है. जाहिर है, इसका सीधा मकसद ये हो सकता है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के जरिए सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों, नीतियों को ले कर सोशल मीडिया पर क्या प्रतिक्रिया आ रही है, इसकी जांच की जाए.

वैसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की इस योजना का विरोध भी शुरू हो गया है. इसे ले कर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल डेवलपमेंट विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर निकिता सूद ने इसे मास सर्विलांस टूल यानी व्यापक निगरानी तंत्र करार दिया है. उनके मुताबिक, राष्ट्रवाद को सरकार या सत्तारूढ़ दल के साथ सहमति के तौर पर देखा जाएगा और विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर इसके गंभीर असर हो सकते है. गौरतलब है कि रूस और चीन जैसे देशों में पहले से यह प्रणाली मौजूद है.

इन देशों में इस तरह की प्रणाली के सहारे नागरिकों की सोशल मीडिया पर मौजूदगी पर नजर रखी जाती है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस अहम खबर को भारतीय मीडिया में (एक-दो महत्वपूर्ण वेबसाइट) जगह ही नहीं मिली. वैसे इस मामले को ले कर तृणमूल कांग्रेस की एमपी मोहुआ मित्रा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है. लेकिन छुट्टी की वजह से अभी कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई नहीं की है. लेकिन, छुट्टी के बाद इस मामले में कोर्ट में सुनवाई भी संभव है.

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