मणिपुर: इनर लाइन परमिट, ब्रिटिश प्रथा में भाजपा का भरोसा

inner-lineमणिपुर में पिछले चार सालों से विवाद में रहा इनर लाइन परमिट बिल एक बार फिर चर्चा में है. 28 जून को राज्य की भाजपा सरकार ने इस विवादित बिल का एक नया प्रारूप तैयार कर राज्य के पहाड़ और घाटी के जन प्रतिनिधियों के सामने रखा. 20 जुलाई से शुरू हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार यह बिल पेश करेगी. पास हो जाने के बाद यह बिल मणिपुर पीपुल एक्ट- 2018 के नाम से जाना जाएगा. इस बिल के अनुसार, मणिपुर को राज्य का दर्जा (21 जनवरी, 1972) मिलने से पहले यहां रह रहे लोगों को ही राज्य का नागरिक माना जाएगा.

बिल लागू होने के बाद डीएम या संबंधित अधिकारी को चीफ रजिस्ट्रेशन ऑथोरिटी बनाकर बाहर से आए लोगों के पंजीकरण का काम किया जाएगा. बिल लागू होने के बाद, बाहरी लोगों के लिए मणिपुर आने पर संबंधित रजिस्ट्रेशन ऑथोरिटी में रजिस्टर कराना आवश्यक हो जाएगा और उनके लिए यहां रहने की समय सीमा अधिकतम छह महीने होगी.

हालांकि आवश्यकतानुसार समय-समय पर नजदीकी रजिस्ट्रेशन सेंटर के जरिए इस समयावधि को बढ़ाया जा सकेगा. अगर रजिस्ट्रेशन सेंटर पर इसकी परमिट नहीं मिलती है, तो चीफ रजिस्ट्रेशन ऑथोरिटी इस बारे में शिकायत दर्ज कर सकेगा. अगर राज्य से बाहर का कोई व्यक्ति बिना रजिस्ट्रेशन के यहां रहते हुए पाया जाता है, तो उसे फौरन वापस भेज दिया जाएगा. साथ में स्थानीय मकान मालिकों को भी किराए पर रह रहे बाहरी लोगों के बारे में हर 15 दिन में चीफ रजिस्ट्रेशन ऑथोरिटी को रिपोर्ट देना होगा. अगर मकान मालिकों ने ऐसा नहीं किया, तो उनके ऊपर पांच से दस हजार रुपए का जुर्माना लगेगा. केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सरकारी संस्थाओं या कानूनी रूप से स्वीकार्य स्थानीय संस्थाओं में कार्यरत लोगों पर इस बिल का कोई प्रावधान लागू नहीं होगा.

बिल ड्राफ्टिंग कमिटी के कन्वेनर थोंगाम विश्वजीत सिंह ने इसके बारे में कहा है कि हमने इस नया बिल का प्रारूप जनता के सामने रखा है. जन प्रतिनिधियों को इसे देखने और समझने का समय चाहिए. इसे हम पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में चल रहे इनर लाइन परमिट की तरह पेश कर राज्य में लागू कराना चाहते हैं. इस बिल के माध्यम से मणिपुर में बाहर से आए लोगों को सरकार से परमिट लेना आवश्यक हो जाएगा. यह प्रथा ब्रिटिश राज के दौरान स्वदेशी संस्कृतियों की रक्षा करने के लिए शुरू हुई थी.

गौरतलब है कि 31 अगस्त 2015 को राज्य सरकार ने विधानसभा द्वारा तीन विधेयक-मणिपुर जन संरक्षण विधेयक-2015, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार (सातवां संशोधन) विधेयक-2015 और मणिपुर दुकान एवं प्रतिष्ठान (दूसरा संशोधन) विधेयक-2015 पारित किया गया था. मणिपुर दो हिस्सों में बंटा हुआ है. हिल एरिया (पहाड़ी) और वैली (घाटी). पहाड़ी क्षेत्र के लोग इन तीन बिलों में से एक, मणिपुर भू-राजस्व एवं भूमि सुधार बिल का विरोध कर रहे थे.

उनका विरोध प्रदर्शन सड़कों तक आया. प्रदर्शन रोकने के लिए एकबार पुलिस द्वारा चलाई गई गोली में नौ लोगों की मौत भी हुई थी. इन लोगों का कहना है कि यह बिल उनकी जमीन और हक का विरोध करता है. इन आदिवासियों को डर है कि इस नए कानून के आने के बाद पहाड़ी क्षेत्र में गैर-आदिवासी बसने लगेंगे, जबकि वहां जमीन खरीदने पर अबतक पाबंदी है. दूसरी तरफ, इनर लाइन परमिट सिस्टम गैर-आदिवासी बहुसंख्यक मितई समुदाय की मांग है. मितई समुदाय ने ज्वॉइंट कमिटी ऑन इनर लाइन परमिट सिस्टम (जेसीआईएलपीएस) स्थापित कर इसकी मांग शुरू की थी.

यह संगठन 30 सामाजिक संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है. घाटी में रह रहे मितई समुदाय के लोगों का तर्क है कि जनसंख्या का सारा दबाव उनकी जमीन पर है. उनके अनुसार, घाटी में संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र में जमीन खरीदने पर मनाही है. मणिपुर को भौगोलिक रूप से समझें, तो चूराचांदपुर, चांदेल, उख्रुल, सेनापति और तमेंगलोंग जिले पहाड़ी क्षेत्र में आते हैं, जबकि थौबाल, बिष्णुपुर, इंफाल ईस्ट और इंफाल वेस्ट जिले घाटी में आते हैं. यहां मितई समुदाय का दबदबा है. क्षेत्रफल के हिसाब से मणिपुर का 10 फीसदी हिस्सा घाटी का है. राज्य की 60 प्रतिशत जनता घाटी में रहती है. इस कारण मितई समुदाय पहाड़ी क्षेत्र में जमीन दिए जाने की मांग करता है.

राज्य विधानसभा ने मई 2016 में इन तीनों विधेयकों को केंद्र सरकार को भेजा था. हालांकि उस समय तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इनर लाइन परिमट वाले विधेयक को खारिज कर दोबारा विचार करने के लिए मणिपुर विधानसभा को भेजा दिया था. तब से अबतक ये तीनों बिल दबा कर रखे हुए थे. लेकिन इन्हें पारित करने की मांग समय-समय पर मितई समुदाय के लोग करते रहे हैं. उन्होंने इसके लिए अपना आंदोलन तेज करने की भी धमकी दी थी.

उसके बाद, मार्च 2017 में स्थानीय भाजपा सरकार ने इनर लाइन परमिट बिल की दिशा में कदम बढ़ाते हुए, इसे लेकर एक नई कमिटी बनाई, जो  पिछले एक साल से लगातार इसपर काम कर रही थी. भाजपा सरकार द्वारा तैयार किए गए इस नए प्रारूप को लेकर लोगों का मानना है कि यह मसौदा अच्छा है, लेकिन अभी कुछ और बिंदुओं पर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है. उनमें से एक बिंदु है- कौन हैं मणिपुरी? नए मसौदे के अनुसार 21 जनवरी 1972 के पहले से राज्य में रह रहे लोगों को मणिपुरी माना जाएगा. लेकिन इस बात को वहां के लोग मानने से इंकार कर रहे हैं.

उनका कहना है कि यह भारत के संविधान के अनुसार नहीं है. उन्होंने इसपर फैसला लेने के लिए अभी और चिंतन-मनन करने की बात कही है. गौर करने वाली बात यह भी है कि 2017 में पहाड़ के जन प्रतिनिधियों और राज्य सरकार के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत वे इनर लाइन परमिट के खिलाफ आंदोलन खत्म करने पर राजी हो गए थे. उस समय सरकार ने एक ऐसा नया बिल बनाने का वादा किया था, जो पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की मांग पूरी करता हो और उनके हक का ख्याल रखे.

कुल मिलाकर, मणिपुर की यह समस्या भावनात्मक और जटिल है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस समस्या को सुलझाने में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि इस विधेयक के कारण राज्य कई महीनों तक अशांत रहा है और इसे लेकर हुए आंदोलनों में कई लोगों की जान जा चुकी है. राज्य की भाजपा सरकार ने इस बार फिर नया प्रारूप तैयार कर लोगों की इच्छा का सम्मान किया है, लेकिन अब भी सभी लोग इसे लेकर सहमत नहीं हैं. सच्चाई यही है कि पहाड़ी क्षेत्र और घाटी के लोगों के लिए यह संभव ही नहीं है कि वे इस मामले को अपने स्तर पर सुलझा सकें. केंद्र सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप कर एक कमेटी का गठन करना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि मणिपुर के लिए बेहतर क्या है.

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