यह ट्रंप शैली की तानाशाही है

trumpकुछ समय से हम इस बात पर जोर दे रहे हैं कि शासन करने के डोनाल्ड ट्रंप के तरीके  का वर्णन कैसे किया जाए. कुछ ने इसे तानाशाही, कुलीनतंत्र, धर्मतंत्र बताया. हाल ही में हमारे सामने यह तथ्य आया कि ट्रंप की अनूठी शैली और व्यक्तित्व की वजह से कोई भी मौजूदा शब्द इसे पूरी तरह से या सटीक रूप से चित्रित नहीं कर सकता है. इसलिए, हमने इसे ट्रंप शैली की एक अनोखी (ट्रंप डायवर्ट ऑटोक्रेसी) शब्द दिया है, ताकि यह ट्रंप की विशिष्ट शैली को चित्रित कर सके.

यह डायवर्ट ऑटोक्रेसी संयुक्त राज्य अमेरिका पर एक हमला है. डायवर्ट-ऑटोक्रेसी एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें: एक व्यक्ति अपने आप को सभी शक्तियों के स्रोत के रूप में दूसरों को आकर्षित करता है, लेकिन जब वह आकर्षण प्रतिकूल होता है तो खुद को उस स्थिति से हटा देता है. उसके निर्णय, तथ्यों और आंकड़ों की जगह आवेग और खुद की मान्यता द्वारा निर्देशित होते हैं. इसमें भविष्य और अतीत की सभी समस्याओं के लिए पूर्ववर्तियों पर दोष लगाया जाता है. विषय को बदलने का हथियार झूठ होता है. वफादारी की मांग की जाती है, लेकिन बदले में कुछ भी नहीं दिया जाता है.

नागरिकों को जानबूझकर समर्थकों और विरोधियों में विभाजित किया जाता हैं. बहुतों को सेवा देने के लिए बुलाया जाता है, लेकिन कुछ ही को बहुत लंबे समय तक रहने के लिए कहा जाता है. जो बात आज बोलता है, उससे कल या कुछ ही घंटों के भीतर पलट जाता है. सरकार अपने निर्दिष्ट मिशन को पूरा करने के लिए सरकारी एजेंसियों की क्षमता को कम या समाप्त कर सकती है. अमेरिकियों को साथ लाने के लिए एक पुल बनाने की जगह एक दीवार बनाना प्राथमिकता होती है. अमेरिका फर्स्ट, वैश्विक नेतृत्व से अमेरिका की वापसी का संकेत देने वाला नारा है.

एक डायवर्ट-ऑटेक्रेसी संगठनात्मक सिद्धांत के  विपरीत है. अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध अकादमिक और व्यापार विशेषज्ञ हेनरी मिंट्‌जबर्ग का मानना है कि पांच तरह के संगठन हैं: उद्यमी संगठन; मशीन संगठन (नौकरशाही); पेशेवर संगठन; विभागीय (विविध संगठन) और अभिनव संगठन (प्रशासन). हरबर्ट साइमन, नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री और एक राजनीतिक वैज्ञानिक ने, प्रशासनिक संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रियाओं पर एक शानदार किताब, एडमिनिस्ट्रेटिव विहैवियर लिखी हैं.

इनमें से कौन सा संगठनात्मक प्रकार डायवर्ट-ऑटोक्रेसी के सबसे करीबी दिखता है? इनमें से कोई भी नहीं.

डायवर्ट-ऑटोक्रेसी का मूल अ-संगठन (डिस-ऑर्गेनाइजेशन) है. किसी के साथ परामर्श किए बगैर, विचारों को अक्सर कम शब्दों में ट्वीट के जरिए परोसा जाता है. फिर, प्रभावित यूनिट या व्यक्ति इसे तर्कसंगत बनाने, निर्णय लेने और ट्रंप के साथ धुन मिलाने में जुट जाते हैं. डायवर्ट-ऑटोक्रेसी उस ब्लैक होल की तरह है, जो सबकुछ अपने भीतर खींच लेता है. कोई इससे बचता नहीं.

डायवर्ट-ऑटोक्रेसी लोकतंत्र के भी विपरीत है. यह जानबूझकर भी हो सकता है, क्योंकि डायवर्ट-ऑटोक्रेसी का लीडर सरकार और इसकी शाखाओं को चन्द प्रभावशाली लोगों के संगठन के रूप में देखता है.

ऐसा लीडर वाशिंगटन डीसी को दलदल में फंसा हुआ समझता है, जिसे उससे बाहर निकाला जाना चाहिए. नतीजतन, वह उन संस्थानों का उपहास उड़ाता है, जो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार होते हैं. इससे भी आगे जा कर वह अमेरिकी लोकतंत्र की आधारशिला, मुक्त प्रेस पर भी गलत तरीके  से हमला करता है.

ट्रंप डायवर्ट-ऑटोक्रेसी का दूसरा साल है. इस अल्पावधि में, देश और उसके नागरिकों के लिए इसका एक ही अर्थ है. अराजकता जारी है. जैसाकि अराजकता सिद्धांत में होता है, अराजकता के तत्काल परिणाम अप्रत्याशित होते हैं. व्यवस्था और अव्यवस्था के संगम ने कई आश्चर्य पैदा किए हैं. वर्तमान स्थिति और कोहेन, कॉमे और सीरिया जैसी घटनाओं को देखते हुए, आगे ऐसी घटनाओं की और भी उम्मीद की जा सकती है.

प्रश्न यह है कि ट्रंप डायवर्ट-ऑटोक्रेसी का हमारे देश (यूएसए) के लिए दीर्घ अवधि में क्या अर्थ है?

आशावादी रूप से, कोई यह कह सकता है कि यह भी गुजर जाएगा. अफसोस की बात है कि ऐसा नहीं है. इसके दूरगामी प्रभाव होंगे. इसके कारण अमेरिका की हालत नाजुक होती जा रही है.

ट्रंप के ट्विटर के 35 से 40 फीसदी अमेरिकी फॉलोअर्स उनकी देश और दुनिया पर उनके विचारों से सौ फीसदी सहमत हैं. उन्होंने सरकारी, संस्थागत और राजनीतिक बातों पर संदेह करना शुरू कर दिया है और आक्रमकता बढ़ गई है. अगर उनका कोई आदर्श वाक्य होता, तो यही होता कि हम सिर्फ ट्रंप में विश्वास करते हैं (इन ट्रंप वी ट्रस्ट).

डायवर्ट-ऑटोक्रेसी ने उन लोगों के बीच भी उल्टी प्रतिक्रिया उत्पन्न की है, जो ट्रंप की धारणाओं और प्रथाओं को अस्वीकार करते हैं. इसने राजनीतिक उम्मीदवारी, राजनीतिक, जनता की रैली, महिलाओं, उपनगरीय आबादी आदि को संगठित किया है. यह लोगों के सड़कों और मतदान बूथों पर ले जाने का कारण बन गया है. अगर उनका कोई आदर्श वाक्य होता तो यह होता, डंप ट्रंप.

दोनों पक्षों के पास जुनून है और धारणा है कि वे ही सही हैं. इसने नागरिक के रूप में हमारे बीच विभाजन को चौड़ा कर दिया है. क्या वह विभाजन थम सकता है? हम मानते हैं कि ऐसा हो सकता है.

लेकिन, इसमें समय लगेगा. अलग-अलग विचारों वाले नागरिकों को साथ आ कर कॉमन गुड की तलाश करनी होगी. बिल क्लिटंन सरकार के पूर्व श्रम सचिव रॉबर्ट रीच वर्तमान में बर्कले में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं. उन्होंने द कॉमन गुड नामक एक नई पुस्तक लिखी हैं.

रीच की पुस्तक की समीक्षा करते हुए माइकल जे सैंडेल कहते हैं कि रीच ने कॉमन गुड को परिभाषित किया है, जिसमें हमारे उन साझा मूल्यों के बारे में बताया गया है, जो हमें एक समाज में एक दूसरे के साथ बांधता है. इसमें बताया गया है कि वह क्या चीज है, जो हमें एक अमेरिकन के तौर पर बांधता है. उनका तर्क है कि हम जन्म या जातीयता नहीं, बल्कि मौलिक आदर्शों और सिद्धांतों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता, कानून और लोकतांत्रिक संस्थानों के प्रति सम्मान, मतभेदों को ले कर सहिष्णुता और समान राजनीतिक अधिकारों और समान अवसरों पर विश्वास, ही हमें एक साथ लाती हैं.

रीच जो कहते हैं, वह हमारे लिए एक कॉमन सेंस का निर्माण करता है और यह कॉमन ग्राउंड का आधार होना चाहिए. वाशिंगटन डीसी के वर्तमान जहरीले माहौल को देखते हुए, हम ऐसी चर्चाओं या कॉमन ग्राउंड के लिए जगह मिलने की अपेक्षा नहीं करते हैं.

इसके बजाए, इस देश के समुदायों के कॉमन गुड के लिए जमीनी नागरिक आन्दोलन की आवश्यकता है. यह आदर्शवादी प्रतीत हो सकता है. लेकिन यह याद रखना चाहिए कि देश की स्थापना से ले कर अब तक, नागरिक आंदोलनों ने ही महत्वपूर्ण बदलाव लाए हैं. डायवर्ट ऑटोक्रेसी और हमारे लोकतंत्र पर इसके हानिकारक प्रभाव को बदला जाना चाहिए. जब नागरिक कॉमन गुड को पहचान लेंगे और उन मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए आवाज उठाएंगे, जो हमें विभाजित करने की जगह एकजुट करते हैं, तो परिवर्तन शुरू हो जाएगा. यह लोगों की आवाज़ की जीत होगी. यह डायवर्ट ऑटोक्रेसी पर कॉमन गुड की जीत होगी.

–(लेखक एक उद्यमी और समाजसेवी हैं और अमेरिका में रहते हैं.)