कश्मीर: ताकत नहीं सियासी पहल चाहिए

जम्मू-कश्मीर समस्या को ले कर कुछ रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सेना और अन्य सिक्योरिटी फोर्सेज तीस वर्ष के दौरान जो कुछ कर सकते थे, वो कर चुके. अब हालात को सामान्य करने के लिए यहां एक पॉलिटिकल प्रॉसेस शुरू करने की आवश्यकता है. इस तरह की राय रखने वाले रक्षा विशेषज्ञों में भारतीय सेना के पूर्व चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ जनरल वेद प्रकाश मलिक भी शामिल हैं. जनरल मलिक ने पिछले वर्ष पच्चीस अगस्त को पूना में एक कॉलेज में आयोजित समारोह के अवसर पर एक साक्षात्कार में कहा था कि विवादों को सियासी सतह पर हल करना होगा. ये सही नहीं है कि सारा बोझ सेना और सीआरपीएफ के कंधों पर डाला जाए. अगर यह समझा जा रहा है कि सेना कश्मीर के मसले को अकेले हल कर देगी तो ऐसा हरगिज नहीं होने वाला है. एक सियासी हल ही आखिरी हल हो सकता है.

भारत के पूर्व सेना प्रमुख, जिन्होंने अपनी सर्विस का एक बड़ा समय जम्मू-कश्मीर में गुजारा है, उनके मशवरे के बाद किसी दूसरे रक्षा विशेषज्ञ के मशवरे की कोई जरूरत नहीं है. हालांकि, गत दो वर्षों के दौरान रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल बीएस हुड्‌डा और रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हरचरन सिंह पनाग ने भी कश्मीर को सियासी तौर पर हल करने की जरूरत पर जोर दिया है. ये दोनों सैन्य अधिकारी जम्मू-कश्मीर में तैनात रहे हैं और यहां के हालात से बखूबी वाकिफ हैं. ये दोनों सैन्य अधिकारी सेना के नॉर्दन कमांड के प्रमुखों की हैसियत से रिटायर हो चुके हैं. इसके अलावा भी कई अहम लोग कश्मीर को सियासी तौर पर हल करने की जरूरत पर जोर दे चुके हैं. जम्मू-कश्मीर पुलिस के चीफ शेषपाल वेद ने इसी वर्ष 12 अप्रैल को ट्‌वीटर पर कश्मीर के हालात से संबंधित कई अहम सवालों के जवाब दिए. एक सवाल के जवाब में पुलिस प्रमुख ने कहा कि मैं व्यक्तिगत तौर पर महसूस करता हूं कि बंदूक कोई हल नहीं है. सभी पक्षों, यहां तक कि  हमारे पड़ोसी पाकिस्तान के पास भी एक ही रास्ता है कि सब मिलकर बैठें और बात करें और कश्मीर मसले को हल करें. बंदूक कोई हल नहीं और हिंसा कोई हल नहीं है. ये तो वो अहम हस्तियां हैं, जो तीन दशकों से जम्मू-कश्मीर में मिलिटेंसी के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ रहे थे. जहां तक राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों का संबंध है, वो तो शुरू से ही कश्मीर मसले को वार्ता के द्वारा हल करने की सलाह देती आई है.

आर्टिकल 370 वोट बटोरने का हथियार

यही कारण है कि भाजपा नेता आए दिन जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 को खत्म करने की बातें करते रहते हैं. आर्टिकल 370 को खत्म करके जम्मू-कश्मीर को भारत में एकीकृत करने का वादा भाजपा के घोषणापत्र में शामिल है. लेकिन हकिकत यह है कि भाजपा ने आर्टिकल 370 को खत्म करने के लिए अभी तक कोई व्यवहारिक कदम नहीं उठाया है. भाजपा की तरफ से पीडीपी से समर्थन वापस लेने के केवल 48 घंटे बाद ही एक वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्‌वीटर पर लिखा कि आर्टिकल 370 को लोकसभा की मंजूरी के बगैर एक राष्ट्रपति आदेश से खत्म किया जा सकता है. इसके एक दिन बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने भी एक बयान जारी किया. इसमें उन्होंने आर्टिकल 370 को खत्म करने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि इसी की वजह से जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी तत्व पैदा होते है. 25 जून को भाजपा महासचिव अनिल जैन ने जम्मू में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि भाजपा आर्टिकल 370 को खत्म करने के अपने वादे पर कायम है.

खत्म होगा आर्टिकल 370!

हालांकि जम्मू कश्मीर में राजनीति विश्लेषकों को विश्वास है कि भाजपा की आर्टिकल 370 को खत्म करने की बात महज जुबानी जमा खर्च है. व्यवहारिक तौर पर इसे खत्म करने का न पार्टी का कोई इरादा है और न ही ये रिस्क लेने के लिए पार्टी तैयार है. कश्मीर यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर नूर बाबा ने इस संदर्भ में चौथी दुनिया से बात करते हुए कहा कि मुझे यकीन है कि भाजपा आर्टिकल 370 को खत्म करने का नारा महज देश भर में वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल कर रही है. जिस तरह भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने वोटरों के साथ दूसरे ढेर सारे वादे किए हैं, उसी तरह ये वादा भी किया है. इसके बावजूद, कुछ हलकों में ये आशंका है कि भाजपा अगला चुनाव जीतने के लिए आर्टिकल 370 को व्यवहारिक तौर पर खत्म करने का कदम उठा सकती है. इन दिनों ये अफवाहें गरम हैं कि भाजपा पहले इसे खत्म करने के लिए  राष्ट्रपति आदेश जारी करवा देगी. उसके बाद लोकसभा में उसे बहुमत से मंजूरी दे देगी और संविधान में संशोधन करके इस कानून को खत्म कर देगी. ऐसा हुआ तो उसके क्या नतीजे होंगे, आने वाला समय ही बताएगा.

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