साहित्य में उठाने गिराने का खेल

अगर हम देखें, तो नहीं पढ़ना या कम पढ़ना एक बड़ी समस्या के तौर पर साहित्य में उपस्थित हो गया है. समस्या तब और बड़ी हो जाती है, जब कम पढ़ा और बड़ा बयान दिया जाता है. फेसबुक पर इन दिनों मंटो और राजकमल चौधरी को लेकर इसी तरह की एक बहस चलाने की कोशिश की जा रही है. किसी भी लेखक के बारे में यह कह देना बहुत आसान होता है कि फलां का मूल्यांकन होना अभी शेष है. राजकमल चौधरी हिंदी के बड़े लेखक हैं, लेकिन क्या यह जरूरी है कि उनके बड़प्पन को उछालने के लिए मंटो को छोटा साबित करें. सवाल तो यह भी उठता है कि क्या फेसबुक पर बीस पंक्तियों की कैजुअल टिप्पणी से राजकमल चौधरी की रचनात्मकता स्थापित हो जाएगी? क्या नामवर सिंह को कठघरे में खड़ा करके राजकमल चौधरी का मूल्यांकन हो जाएगा?

पिछले दिनों एक छोटे से साहित्यिक जमावड़े में बात ‘नई वाली हिंदी’ से शुरू हुई, जिसमें उन कृतियों पर लंबी बात हुई, फिर अन्य प्रकाशनों से प्रकाशित होनेवाले छोटे-छोटे उपन्यासों पर चर्चा चल निकली. वहां से होते-होते साहित्य के तथाकथित मुख्यधारा के लेखन पर बात होने लगी. सबके अपने-अपने विचार थे, ज्यादातर के कृतियों पर कम लेखकों पर ज्यादा. बातों से ऐसा लग रहा था कि अब साहित्य से जुड़े ज्यादातर लोग किसी भी लेखक पर अपनी राय एकाध कहानी या एक उपन्यास पढ़कर बना रहे हैं.

राय भी ऐसी कि या तो एकदम से खारिज या एकदम से प्रेमचंद से तुलना. उस दिन वहां हो रही बातचीत से एक बात समझ में आई कि हिंदी में आलोचना पर इन दिनों क्यों इतने सवाल उठ रहे हैं. क्यों फेसबुक पर होनेवाली साहित्यिक चर्चाओं में हर कोई आलोचना पर प्रश्नवाण चलाता नजर आता है. आलोचना को कठघरे में खड़ा करनेवाले ज्यादातर लोग अपने मन की नहीं होते देख उत्तेजित हो जाते हैं और उसी उत्तेजना में पहले आलोचक और फिर आलोचना विधा को ही खारिज करने के उपक्रम में जुट जाते हैं. राजकमल प्रकाशन के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम ने उस दिन बहुत महत्वपूर्ण बात कही जिसको रेखांकित किया जाना चाहिए.

निरुपम ने कहा कि ‘आज लोग पढ़ते ही नहीं हैं, अपनी साहित्यिक विरासत के बारे में जानने की कोशिश ही नहीं करते हैं. खुद या उनके मित्र जो कर देते हैं, उसको वो सबसे महत्वपूर्ण मान लेते हैं. इस वजह से इस तरह के बयान आते हैं कि साहित्य में पहली बार, साहित्य में ऐतिहासिक काम आदि आदि.’ सत्यानंद निरुपम की बात में एक वाक्य मैं भी जोड़ना चाहता हूं कि आज के ज्यादातर लेखक खासतौर पर नए और युवा लेखक अज्ञानता के अपने ढिंढ़ोरे को सार्वजनिक रूप से पीटते भी हैं. यह चिंता की बात है. साहित्य से जुड़े लोगों में पढ़ने की प्रवृत्ति का घोर ह्रास हुआ है. गूगल बाबा का भी इसमें योगदान है. अब हर हाथ में मोबाइल और उसमें इंटरनेट कनेक्शन की वजह से गूगल पर साहित्य के बारे में उपलब्ध जानकारी तक पहुंचना आसान हो गया है.

लेकिन आलोचना के मैदान में उतरने के लिए या किसी कृति पर टिप्पणी करने के लिए गूगल पर्याप्त आधार नहीं दे पाता है. गूगलीय ज्ञान के आधार पर फेसबुक पर जिस तरह का साहित्यिक विमर्श होता है, वह हास्यास्पद होता है. फेसबुक पर चलनेवाले इस गूगलीय साहित्यिक विमर्श को हास्यास्पद कहकर छोड़ा नहीं जाना चाहिए. खासकर तब, जब साहित्य की अपेक्षाकृत नई पीढ़ी इसका शिकार हो रही है. यह बेहद चिंता की बात है. चिंता इस वजह से कि यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है. कई लेखक तो अज्ञानता में हिंदी में नई विधा की शुरुआत आदि की बात तक करने लग जाते हैं, जो उनकी नासमझी की ओर इशारा करता है.

अब अगर हम चिंतनीय प्रवृत्ति के बढ़ने के कारणों की पड़ताल करते हैं, तो दो-तीन बातें समझ में आती हैं. पहली तो ये कि फेसबुक पर लेखकों ने अपनी-अपनी बस्ती बसा और बना ली है. इस बस्ती में रहनेवाले लेखक या साहित्यिक रुचि के मित्रगण एक दूसरे की तारीफ में प्राणपन से लग जाते हैं. यहां तक तो ठीक था कि मित्र की तारीफ करें, लेकिन तारीफ के लिए बेहद उदार शब्दावली का उपयोग टिप्पणी करनेवाले से ज्यादा कृतिकार को नुकसान पहुंचा देता है. अब अगर किसी की कृति की तुलना प्रेमचंद से या मंटो से होने लगे और उसका कोई आधार या तर्क प्रस्तुत ना किया जाए तो उसको गंभीरता से नहीं लिया जाता है, बल्कि उसका मजाक ही बनता है. फेसबुक पर तारीफ करनेवाले बस्तीबद्ध लेखक आलोचना की शब्दावली का भी इस्तेमाल करने लगते हैं और तर्क नहीं दे पाते, तो फिर वो तारीफ नहीं ढिढ़ोरा की तरह बजता हुआ प्रतीत होता है.

अगर हम देखें, तो नहीं पढ़ना या कम पढ़ना एक बड़ी समस्या के तौर पर साहित्य में उपस्थित हो गया है. समस्या तब और बड़ी हो जाती है, जब कम पढ़ा और बड़ा बयान दिया जाता है. फेसबुक पर इन दिनों मंटो और राजकमल चौधरी को लेकर इसी तरह की एक बहस चलाने की कोशिश की जा रही है. किसी भी लेखक के बारे में यह कह देना बहुत आसान होता है कि फलां का मूल्यांकन होना अभी शेष है. राजकमल चौधरी हिंदी के बड़े लेखक हैं, लेकिन क्या यह जरूरी है कि उनके बड़प्पन को उछालने के लिए मंटो को छोटा साबित करें.

सवाल तो यह भी उठता है कि क्या फेसबुक पर बीस पंक्तियों की कैजुअल टिप्पणी से राजकमल चौधरी की रचनात्मकता स्थापित हो जाएगी? क्या नामवर सिंह को कठघरे में खड़ा करके राजकमल चौधरी का मूल्यांकन हो जाएगा? राजकमल चौधरी की रचनात्मकता को अगर नई पीढ़ी के सामने लाना है, तो पूर्व की गलतियों को रेखांकित करते हुए छाती कूटने से बेहतर है कि आप उनके लेखन पर गंभीरता से लिखें और नए पाठकों को उसके बारे में बताएं. फेसबुकिया टिप्पणी और पूर्व की गलतियों को रेखांकित करते हुए सिर्फ चंद लाइक्स और कुछ तारीफ भरी टिप्पणी मिलेगी, जिससे राजकमल का महत्व किसी भी तरह से रेखांकित नहीं होगा.

पहले यह काम कुछ आलोचक करते थे, जो आलोचना के नाम पर लेखकों को उठाने गिराने का खेल खेलते थे. किसी को साहित्य से दाखिल खारिज करने की सुपारी लेते थे. एक खास विचारधारा के आलोचक सिंडिकेट की तरह काम करते थे, जो अपने विरोधियों को साहित्य की दुनिया से बाहर कर देने के लिए तमाम तरह के दंद-फंद करते थे. हर दौर में ऐसे कुछ आलोचक हुए, लेकिन हर दौर में वैसे भी आलोचक हुए जिन्होंने बहुत गंभीरता के साथ आलोचना कर्म और आलोचक धर्म का निर्वाह किया. कुछ वर्षों पूर्व विजय मोहन सिंह का एक इंटरव्यू याद आ रहा है, जिसमें उन्होंने उपन्यास ‘राग दरबारी’ को लेकर कहा था कि- ‘राग दरबारी तो घटिया उपन्यास है.

मैं उसे हिंदी के 50 उपन्यासों की सूची में भी नहीं रखूंगा. पता नहीं ‘राग दरबारी’ कहां से आ जाता है? वह तीन कौड़ी का उपन्यास है. हरिशंकर परसाईं की तमाम चीजें ‘राग दरबारी से ज्यादा अच्छी हैं. वह व्यंग्य बोध भी श्रीलाल शुक्ल में नहीं है, जो परसाईं में है. उनके पासंग के बराबर नहीं हैं श्रीलाल शुक्ल और उनकी सारी रचनाएं.’ लेकिन अपने इस इंटरव्यू में विजय मोहन सिंह ये नहीं बता पाए थे कि ‘राग दरबारी’ क्यों और कैसे घटिया और तीन कौड़ी का उपन्यास है. विजय मोहन सिंह ने अपने उसी इंटरव्यू में बाबा नागार्जुन की तुलना भी काका हाथरसी से कर दी थी. दंभ के साथ ये भी कहा था कि चूंकि केदार जी को ये बात बुरी लगी थी, इसलिए उन्होंने वो टिप्पणी वापस ले ली थी.

‘राग दरबारी’ को खारिज तो गोपाल राय जी ने भी किया था, जब उन्होंने लिखा था- व्यंग्य के लिए कथा का उपयोग लाभदायक होता है, पर उसके लिए उपन्यास का ढांचा भारी पड़ता है. उपन्यास में व्यंग्य का उपयोग उसके प्रभाव को धारदार बनाता है, पर पूरे उपन्यास को व्यंग्य के ढांचे में फिट करना रचनाशीलता के लिए घातक होता है. व्यंग्यकार की सीमा यह होती है कि वह चित्रणीय विषय के साथ अपने को एकाकार नहीं कर पाता है. वह सृष्टा से अधिक

आलोचक बन जाता है. सृष्टा अपने विषय से अनुभूति के स्तर पर जुड़ा होता है, जबकि व्यंग्यकार जिस वस्तु पर व्यंग्य करता है, उसके प्रति निर्मम होता है. गोपाल राय ने अपनी स्थापना के समर्थन में एक आधार प्रस्तुत किया था, तर्क दिए थे. सहमति-असहमति अलग चीज है. दोनों तरह के आलोचक हर दौर मे रहे हैं. लेकिन जिस तरह से विजय मोहन सिंह ने राग दरबारी को घटिया बताया या जिस तरह से राजकमल चौधरी को लेकर दूसरे साहित्यकारों पर कीचड़ उछाले जा रहे हैं या जिस तरह से नई वाली हिंदी के लेखकों को खारिज किया जा रहा है, वो गंभीर चिंतन की मांग करता है.

किसी के भी लेखन को खारिज करना बहुत आसान है, लेकिन तर्कों के साथ खारिज करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि उसके लिए आपको अपने अध्ययन का दायरा बढ़ाना पड़ता है, अपने पूर्वाग्रह को अलग रखकर वस्तुनिष्ठता के साथ बात करनी होती है. क्या इसके लिए हिंदी साहित्य के फेसबुक वीर तैयार हैं? अगर ऐसा हो सकता है तो साहित्य का भी भला होगा और लेखकों का भी. भला इस तरह से कि टिप्पणीकारों की साख बढ़ेगी और सकारात्मक विमर्श की राह खुलेगी, जिससे हिंदी साहित्य समृद्ध होगा.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *