मगहर को निगल जाना चाहते हैं भाजपा के अजगर, मोदी मुहर लगाने आए थे

modiप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब मगहर गए तो आम लोगों, अखबार वालों और समाचार चैनल वालों का एक ही सवाल पूरी रफ्तार से उछल रहा था कि मोदी के कबीर प्रेम की राजनीति क्या है! कुछ मीडिया वालों ने तो राग-दरबारी में लिख भी दिया कि मोदी ने सियासत में सबको पीछे छोड़ दिया, कबीर के नाम पर दलितों और पिछड़ों को जोड़ लिया… वगैरह, वगैरह. लेकिन यह सब काल्पनिक आकाश पर पतंग उड़ाने जैसा है. नरेंद्र मोदी की सांसदी के कार्यकाल का यह आखिरी साल है.

मोदी बनारस के सांसद हैं, जहां संत कबीर का जन्मस्थल लहरतारा है और उस स्थान पर विश्व प्रसिद्ध कबीर चौरा है. मोदी अपने पूरे कार्यकाल में एक बार भी न तो संत कबीर के लहरतारा प्राकट्य-स्थल पर गए और न कभी कबीर चौरा ‘मूल गादी’ की तरफ झांका. यह नरेंद्र मोदी के कबीर प्रेम की असलियत है. कबीर के निर्वाण स्थल मगहर जाने के पीछे भी मोदी का कोई कबीर प्रेम नहीं है, बल्कि इसके पीछे भाजपाई-विस्तारवाद का वह घातक तत्व है जो किसी भी स्थापना को अपने साम्राज्य के अधीन करने के लिए कुलबुलाता रहता है. मगहर को भाजपा के अजगर निगल जाना चाहते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मगहर को चबा जाने के भाजपाई घात पर मुहर लगाने आए थे. मगहर में कबीर निर्वाण स्थली के लिए अलग से पांच सौ एकड़ जमीन औरंगजेब ने कबीर चौरा मूल गादी कोदी थी. यह जमीन कुछ भाजपाइयों को पच नहीं रही है. भाजपाइयों को यह समझ में नहीं आता कि कबीर ही एक ऐसा संत हुआ जिसने दोनों धर्मों की रेखा मिटा दी थी. जितने हिंदू कबीर को मानते हैं उतने ही मुसलमान कबीर को श्रद्धा देते हैं. मठ की अकूत सम्पत्ति पर भी भाजपा के मगरमच्छों की निगाह गड़ी हुई है. वे मगहर के साथ-साथ सहजनवां के बलुआ मंझरिया आश्रम और कृषि फार्म पर भी कब्जा करने का कुचक्र रच रहे हैं.

बात सुनने में थोड़ी कड़वी लगती है, लेकिन मगहर को लेकर जिस तरह का अमर्यादित और निकृष्ट माहौल सृजित किया गया, उसे सुनेंगे तब लगेगा कि खबर में जिस भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है वह काफी नर्म और मर्यादित है. मगहर मठ पर कब्जा करने के उपक्रम में लगे भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी काफी दिनों से मगहर में मोदी का कार्यक्रम आयोजित कराने पर लगे थे. कबीर पीठ और पीठाधीश के प्रति भाजपा सांसद जिन अमर्यादित और अनैतिक शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह संत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को क्या समझ में नहीं आ रहा? एक संत के शासन में दूसरे संत के प्रति बदसलूकी भाजपा का असली चरित्र है.

मोदी का मगहर कार्यक्रम देख कर जनता को लगा होगा कि यह आयोजन उत्तर प्रदेश सरकार के सौजन्य से हुआ, लेकिन वास्तविकता यह है कि कार्यक्रम की खिचड़ी पहले से कहीं और पक रही थी. इस खिचड़ी का स्वाद उन्हें भी समझ में आया जो प्रधानमंत्री की मगहर-सभा में मौजूद थे और भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी को मोदी की तरफ से मिल रही अतिरिक्त और अवांछित तरजीह को गौर से देख रहे थे. सोची समझी रणनीति के तहत ही मगहर मठ के मुख्य नियंत्रक कबीर चौरा मूल गद्दी पीठाधीश संत विवेकदास आचार्य को इस कार्यक्रम से अलग रखा गया और सांसद ने उनके प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल किया.

देशभर के कबीर मठ कानूनन कबीर चौरा वाराणसी मूल गद्दी (मूल-गादी) के तहत आते हैं. कबीर चौरा के मुख्य महंत संत विवेकदास आचार्य हैं. कार्यक्रम के बारे में उन्हें औपचारिक सूचना तक नहीं भेजी गई. कबीर चौरा की तरफ से नियुक्त मगहर मठ के प्रबंधक विचारदास की भक्ति कबीर चौरा के बजाय भाजपा सांसद के प्रति है. मठ की सम्पत्ति को जालसाजी करके बेचने और जमीनें अपने नाम कराने के अपराध में विचारदास अभी हाल ही जेल काट कर आए हैं. विडंबना देखिए कि उसी विचारदास के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संत कबीर की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हर्षित हो रहे थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मगहर में आयोजित गैरकानूनी कार्यक्रम में शरीक होने आए थे और मगहर में चल रही गैरकानूनी गतिविधियों पर मुहर लगाने का अलोकतांत्रिक कृत्य कर रहे थे. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का यह कैसा संचार-तंत्र है, जिसने घोर विवादों में घिरे धार्मिक स्थल पर पीएम या सीएम को आने से नहीं रोका या आने से पहले उन्हें आगाह नहीं किया? आप किसी गलतफहमी में न रहें… प्रधानमंत्री कार्यालय को अभिसूचनाएं देने वाली इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) और मुख्यमंत्री कार्यालय को अभिसूचनाएं मुहैया कराने वाली लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू), दोनों ने ही अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी की थी. आईबी ने पीएम ऑफिस को और एलआईयू ने सीएम ऑफिस को इस बारे में पहले ही सारी सूचनाएं दे दी थीं.

इन विभागों के अधिकारी कहते हैं, ‘हम लोगों का काम इत्तिला करना और आगाह करना है, यह काम हम लोगों ने बखूबी किया. हमारी सूचनाएं वे मानें या न मानें, यह उनका अधिकार क्षेत्र है.’ आप समझ रहे हैं न, ऑपरेशन-मगहर भाजपाइयों के लिए कितना जरूरी था! हैरत की बात यह है कि कबीर चौरा मूल गद्दी के मुख्य महंत संत विवेक दास आचार्य ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पहले ही पत्र लिख कर मगहर और सहजनवां के कबीर मठों पर कब्जे के कुत्सित प्रयासों की विस्तार से जानकारी दे रखी थी. योगी मुख्यमंत्री ने संत महंत के पत्र को कोई सम्मान नहीं दिया और वही करते रहे जो भाजपाई-बिसात पर तय होता गया. आईबी को यह सूचना थी कि भाजपा सांसद के गुर्गों ने मगहर मठ के अंदर कब्जा जमा लिया है और मठ के दो कमरों में सांसद के गुर्गे बैठते हैं.

उन कमरों में कबीर की फोटो के बजाय मोदी की तस्वीर लगी थी, जिसे विवेकदास ने हटवा दिया था. भाजपा सांसद को इस बात का इतना गुस्सा था कि उनके गुर्गों ने कबीर चौरा मठ के मुख्य महंत विवेकदास की ही तस्वीर फेंक दी और उसे पैरों से कुचला. प्रधानमंत्री के आने के हफ्ताभर पहले भाजपाइयों ने मठ के दोनों कमरों से अपने सामान हटा लिए. कबीर मठ और आश्रम राजनीतिक आग्रह, पूर्वाग्रह और दुराग्रह से अलग माने जाते हैं. कबीर मठों में राजनीतिक गतिविधियां पूरी तरह वर्जित हैं. लेकिन भाजपा कबीर मठों को भी राजनीति का अड्‌डा बनाने पर आमादा है.

जैसा आपको ऊपर भी बताया कि मगहर कबीर मठ का विवाद खुफिया एजेंसियों से लेकर पुलिस और नागरिक प्रशासन की पूरी जानकारी में है, इसके बावजूद जिला प्रशासन ने ऐसे विवादास्पद कार्यक्रम में आने से प्रधानमंत्री को नहीं रोका. उल्टा, गोरखपुर के कमिश्नर अनिल कुमार और वाराणसी के कमिश्नर दीपक अग्रवाल महंत विवेकदास से इस मामले को तूल न देने का आग्रह करते रहे. कबीर चौरा वाराणसी ‘मूल गादी’ के पीठाधीश संत विवेकदास आचार्य ने ‘चौथी दुनिया’ से कहा कि भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी मगहर कबीर मठ के प्रबंधक को मिला कर मठ और वहां की सम्पत्ति पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहा है.

भाजपा ने कबीर आस्था के केंद्र को राजनीति का अखाड़ा बना कर रख दिया है. सांसद ने अवैध रूप से मगहर कबीर मठ में अपना ऑफिस बनाया और वह कबीर मठ के कामकाज में हस्तक्षेप कर रहा है. विचारदास और रामसेवक दास भाजपा सांसद के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं. रामसेवक दास सहजनवा के बलुआ मंझरिया आश्रम का केयरटेकर था. विवेकदास कहते हैं, ‘मैंने इस मामले में पीएम और सीएम दोनों से हस्तक्षेप करने की गुजारिश की थी, लेकिन दोनों ने मेरी मांग पर कोई ध्यान ही नहीं दिया.’ विवेकदास ने बताया कि उनके पहले के महंत गंगाशरण दास ने विचारदास को मगह, बलुआ, सारनाथ और नालंदा का प्रबंध देखने के लिए नियुक्त किया था.

जब वाराणसी के जिलाधिकारी ने मठों की सम्पत्तियों का ब्यौरा मांगा. तब जानकारी हासिल हुई कि विचारदास ने मठ की अनुमति और जानकारी के बगैर संस्था की कई बेशकीमती जमीनें बेच डालीं. इस पर विचारदास को मठ से हटा दिया गया. कबीर चौरा के मुख्य महंत हो चुके संत विवेकदास ने मुकदमा दर्ज कराया और क्रमशः गिरफ्तारी हुई. मूल गादी ने संत राम प्रसाद दास को मगहर मठ की देखरेख के लिए नियुक्त किया.

भाजपा सांसद को मूल-गादी का निर्णय नागवार लगा और उसने अपने गुर्गों और निष्कासित प्रबंधक विचारदास के साथ मिल कर मगहर मठ को अड्‌डा बना लिया. संत कबीर नगर का जिला प्रशासन भी सांसद के अवैध कृत्य में साथ है. विवेकदास कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संत कबीर की जयंती ही मनानी थी, तो उन्हें मगहर के स्थान पर वाराणसी आना चाहिए था, क्योंकि संत कबीर का प्राकट्य स्थल काशी के लहरतारा में है. मगहर तो उनका निर्वाण स्थल है.

मगहर निर्वाण स्थल पर कबीर का प्राकट्य उत्सव मनाना संत कबीर का अपमान और समस्त कबीर परंपरा और संस्कृति की धज्जियां उड़ाना है. विवेकदास आश्चर्य से कहते हैं, ‘परिनिर्वाण स्थल पर प्राकट्य उत्सव कैसे मनाया जा सकता है?’ विवेकदास ने कहा कि संत कबीर नगर के सांसद शरद त्रिपाठी ने प्रधानमंत्री को अंधेरे में रख कर मगहर बुलाया और भांडा न फूटे इसके लिए कार्यक्रम के बारे में उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई.

मोदी सरकार ने लटका रखी हैं कबीर जन्मस्थल विकास की पांच परियोजनाएं षडयंत्र के मंच से संत कबीर के प्रति आस्था के राजनीतिक बोल बोलने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने कबीर की जन्मस्थली वाराणसी कबीर चौरा के विकास की पांच परियोजनाएं रोक रखी हैं. विवेकदास ने इस बारे में मोदी को लंबा पत्र लिख कर कबीर चौरा के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्व की जानकारी दी थी और यह भी बताया था कि मठ की देशभर में फैली अकूत सम्पत्ति की हिफाजत जरूरी है, इसलिए उसका इस तरह से विकास किया जाए कि वह सार्वजनिक आस्था की अभिव्यक्ति का केंद्र बने और उस पर कब्जा करने का कोई साहस नहीं कर पाए. जब भाजपा के लोग ही मठ की सम्पत्ति पर कब्जा करने की कोशिश में लगे हों तो विवेकदास के पत्र को मोदी क्यों संज्ञान में लें!

कबीर की धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने और श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए कबीर जन्मस्थल के विकास की परियोजना की फाइल देखने की भी वाराणसी के सांसद को फुर्सत नहीं है, लेकिन भाजपा के ‘ऑपरेशन-मगहर’ पर मुहर लगाने के लिए मोदी के पास टाइम ही टाइम था. मगहर में संत कबीर अकादमी का शिलान्यास, कबीर की समाधि पर श्रद्धांजलि और आस्था के बड़े-बड़े बेमानी बोल, सब ‘ऑपरेशन-मगहर’ का ही पूर्व नियोजित प्रहसन था.

इस प्रहसन में मगहर मठ पर कब्जा अभियान के मुख्य पात्र भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी, मुख्य उपकरण महेश शर्मा, शिवप्रताप शुक्ल और सुविधा-प्रदाता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काफी अहम रोल निभाया. योगी ने मगहर-मंच से खूब भाषण झाड़ा, लेकिन सामने बैठी जनता को यह नहीं बताया कि कबीर पंथ की मुख्य पीठ कबीर चौरा ने उन्हें 20 दिसम्बर 2017 को पत्र लिख कर कबीर मठ की तरफ से वाराणसी में बनाए जा रहे ‘मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पीटल’ के शिलान्यास कार्यक्रम में शरीक होने का आग्रह किया था.

लेकिन गोरखधाम पीठ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कबीर पीठ के पीठाधीश्वर का आमंत्रण ठुकरा दिया और इसके लिए एक औपचारिक शब्द लिख कर खेद भी नहीं जताया. शिलान्यास में शरीक होने के लिए योगी को कार्यक्रम से दो महीने पहले ही सूचित और आमंत्रित कर दिया गया था. 24 फरवरी 2018 को वाराणसी में हुए शिलान्यास कार्यक्रम में देशभर के प्रमुख साधु-संत और पीठाधीश जुटे, लेकिन विडंबना है कि योगी को इसके लिए फुर्सत नहीं मिली. यही भाजपाइयों के कबीर-प्रेम की कठोर असलियत है.

‘संत कबीर के नाम पर एनजीओ बना कर धंधा करते हैं भाजपा सांसद’

शहीदों का अपमान करने वाले, निरर्थक जुमले उछालने वाले, आरोपों और विवादों में घिरे लोग मोदी को बहुत पसंद आते हैं. मगहर-मंच पर सांसद शरद त्रिपाठी से हाथ मिला-मिला कर और उनके साथ हाथ हिला-हिला कर मोदी गदगदायमान हो रहे थे. ये वही सांसद हैं जिन्होंने कश्मीर के ऊरी सेक्टर में शहीद हुए जवान गणेश शंकर यादव के परिवार के समक्ष ही लोगों से शहीद के परिवार की मदद के नाम पर चंदा वसूलना शुरू कर दिया था. उस समय शहीद का पार्थिव शरीर भी वहीं रखा था. सांसद का कृत्य देख कर शहीद की विधवा श्रीमती गुड़िया यादव और अन्य परिजनों ने सांसद को ऐसा करने से रोका और उन्हें कहा कि यह शहीद का परिवार है, भिखमंगों का नहीं. स्थानीय लोग भी विरोध में उतर पड़े तो सांसद और उसके गुर्गे चंदे में वसूली रकम के साथ ही भाग खड़े हुए.

‘ऑपरेशन-मगहर’ के प्रणेता भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के पुत्र हैं. विधानसभा चुनाव के समय भाजपा की नेता उर्मिला त्रिपाठी ने पिता-पुत्र दोनों पर गोरखपुर और बस्ती मंडल में टिकटों के वितरण में रिश्वत लेने का आरोप लगाया था. महिला नेता ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर कहा था कि सांसद शरद त्रिपाठी और उनके पिता रमापति राम त्रिपाठी का काम टिकट के जरिए पैसा कमाने का है. चुनाव आते ही पिता-पुत्र टिकट के खेल में जुट जाते हैं, चुनाव समिति में जगह बना लेते हैं और पैसे बटोरते हैं. महिला नेता ने उसी समय यह खुलासा भी किया था कि शरद त्रिपाठी संत कबीर के नाम पर एनजीओ बनाकर धन कमाने का धंधा कर रहे हैं. उन्हीं दिनों खलीलाबाद सीट से गंगा सिंह सैंथवार की जगह जय चौबे को टिकट दिए जाने पर भी सांसद शरद त्रिपाठी पर पैसा लेकर टिकट बेचने का आरोप लगा था और सांसद का पुतला भी फूंका गया था.

भाजपाइयों की मदद से सहजनवा कबीर मठ पर ‘नटवरलाल’ का क़ब्ज़ा

भाजपाइयों की मदद से गोरखपुर जिले के सहजनवा स्थित बलुआ मंझरिया कबीर आश्रम और कृषि फार्म पर कब्जा जमाए बैठा रामसेवक दास ‘नटवरलाल’ है. उसकी जालसाजियों और फरेब के बारे में पुलिस को भी पता है और प्रधानमंत्री को भी. इस बीच में शासन-तंत्र का जो भी पुर्जा आता है, उसे ‘नटवरलाल’ के किस्से पता हैं, लेकिन वह भाजपा का करीबी है और भाजपा के आयोजनों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेता है, इसलिए शासन-तंत्र उस पर हाथ नहीं डालता. लोग बताते हैं कि ‘नटवरलाल’ भाजपाइयों की मदद से ग्राम प्रधान भी बन गया है. कागजातों में कहीं वह विचारदास को अपना पिता बताता है तो कहीं जगलाल को अपना पिता बना लेता है. कहीं-कहीं वह सुमिरनदास को भी अपना पिता बताता है. वह अपना नाम कहीं रामसेवक लिखता है तो कहीं दिलीप कुमार. भाजपाइयों की मदद से वह विकास खंड पाली के बवंडरा ग्राम पंचायत (65) से प्रधानी का चुनाव भी जीत गया. पंचायत चुनाव में दिए गए दस्तावेजों में रामसेवक ने अपने पिता का नाम विचारदास बता रखा है. चुनाव आयोग को भी इस फर्जीवाड़े की जानकारी दी गई, लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनता कौन है!

लुच्चे-लफंगों का ही क़ब्ज़ा है मठ-मंदिरों पर

केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर के मठों और मंदिरों पर लुच्चे-लफंगों, अपराधियों, गुंडों और नेता की शक्ल वाले भूमाफियाओं का कब्जा है. इसमें यूपी बिहार अव्वल है. राजस्थान मध्यप्रदेश की बारी उसके बाद आती है. मठों और मंदिरों पर कब्जा जमाए बैठे अपराधियों पर चोरी डकैती हत्या बलात्कार तक के मुकदमे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन उन्हें नहीं छूता. यूपी में बड़े मठों की तादाद करीब 10 हजार है. अयोध्या, काशी, मथुरा-वृंदावन में मठों-मंदिरों की संख्या सबसे अधिक है. भाजपाई राजनीति के प्रमुख केंद्र अयोध्या के आधे मठ भीषण विवाद में घिरे हैं. इस विवाद में अनगिनत हत्याएं और हिंसक घटनाएं हो चुकी हैं.

अयोध्या के बावरी छावनी, हनुमान गढ़ी, बारी स्थान, मणिराम छावनी, लक्ष्मण किला, चुरबुजी स्थान, जानकी घाट, हरिधाम पीठ जैसे प्रसिद्ध मंदिरों में विवाद कुछ अधिक ही गहरा है. इन मठों का सम्पत्ति-साम्राज्य यूपी के अलावा बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात तक फैला हुआ है. पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि अयोध्या के मठों पर सबसे ज्यादा कब्जा बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपराधियों का है, जिन्हें नेताओं का संरक्षण प्राप्त है. फैजाबाद अदालत में 90 प्रतिशत दीवानी मामले अयोध्या के हैं और अधिकतर मामले महंती और सम्पत्ति पर कब्जे को लेकर हैं. अयोध्या का लगभग हर मठ, मंदिर और साधु किसी न किसी कानूनी विवाद में फंसा है.

कबीर मठों की हालत तो और बुरी है. उत्तर प्रदेश और बिहार के कई प्रमुख कबीर मठ अवैध कब्जे में हैं. अजीबोगरीब यह भी है कि कबीर चौरा मूल-गादी की तरफ से नियुक्त किए जाने वाले महंत ही कुछ समय बाद स्थानीय नेताओं और भूमाफियाओं के साथ मिलीभगत करके अपना असली रंग दिखाने लगते हैं. मायावती के कार्यकाल में कबीर चौरा पर ही कब्जा करने की हथियारबंद कोशिश की गई थी, इसमें प्रशासन की भी मिलीभगत थी, लेकिन मुख्य महंत विवेकदास की दृढ़ता और कबीर पंथी साधुओं की एकजुटता के कारण कब्जा नहीं हो पाया. कब्जा करने में नाकाम रहने पर बसपाइयों ने कबीर जन्मस्थली को तोड़ कर बस्ती वालों के लिए शौचालय बनाने की कोशिश की, लेकिन उसे भी स्थानीय लोगों और साधुओं का भारी विरोध झेलना पड़ा.

कबीर जन्मस्थली के मुख्य द्वार पर कृषि विभाग और विधानसभा (रकबा-255) के नाम से कुछ जमीन है. बसपा सरकार के कार्यकाल में कुछ लोगों ने इस जमीन पर कब्जा कर लिया था. बाद में कब्जा हटाकर चारदीवारी बनवाई गई और कबीर स्तंभ का निर्माण कराया गया. भूमाफिया इस चारदीवारी और स्तंभ को तोड़ कर जमीन पर कब्जा करने की कोशिश में लगे रहते हैं. कबीर चौरा के मुख्य महंत संत विवेकदास आचार्य यह मानते हैं कि कबीर मठों के प्रबंधकों (प्रतिनिधि महंतों) के चयन में सतर्कता नहीं बरते जाने के कारण मठों पर कब्जा करने की घटनाएं बढ़ गईं. अब कबीर मठों को उन्हीं हाथों में सौंपे जाने का समय आ गया है जो स्वभाव से साधु हों और अध्ययन के साथ-साथ संत कबीर के प्रति उनका वैचारिक सैद्धांतिक लगाव भी हो.

बिहार में भी कबीर मठों पर अवैध कब्जे का यही हाल है. मुजफ्फरपुर में तुर्की का कबीर मठ अवैध कब्जे में है. तुर्की मठ की गोपालगंज और मधुबनी की सिसवार शाखा पर भी कब्जा है. मुजफ्फरपुर शहर के ब्रह्मपुरा इलाके में स्थित कबीर मठ अवैध कब्जे में है. पटना के फतुहा और धनरुआ के कबीर मठ काफी लंबे अर्से से अवैध कब्जे के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. शिवहर के कबीर मठ पर एक कद्दावर महिला नेता का अवैध कब्जा है.

जालसाज़ी में जेल की हवा खा चुके ‘संत’ से खुशी-़खुशी मिले मोदी

मगहर मठ पर आधिपत्य चाह रहे भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी और मगहर मठ के विवादास्पद प्रबंधक विचारदास पूरे कार्यक्रम के दरम्यान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ दिखते रहे. लोगों में चर्चा भी खूब हुई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मगहर मठ को विवादों में लाने वाले ‘संत’ विचारदास से किस तरह अंतरंगता से मिल रहे हैं. वाराणसी पुलिस ने विचारदास को जून 2016 में गिरफ्तार किया था. मूलगादी की तरफ से वर्ष 2012 में ही विचारदास के खिलाफ जालसाजी और धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कराया गया था. विचारदास पर मगहर कबीर चौरा की जमीनों के स्वामित्व में हेराफेरी करने, मठ की करोड़ों की जमीन फर्जी तरीके से ट्रस्ट बनाकर अपने नाम करने और उसे बेच डालने जैसे गंभीर आरोप हैं.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन
शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...

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