‘चौथी दुनिया’ में खबर छपने के बाद बौखलाया सिडबी प्रबंधन, मुस्त़फा जी! सिडबी को सुधारिए…

‘चौथी दुनिया’ में प्रकाशित खबर तथ्यों पर आधारित है. खबर के प्रकाशन के पीछे दुर्भावना या पूर्वाग्रह जैसे शब्द का इस्तेमाल आपत्तिजनक है. सिडबी प्रबंधन ईमानदार होता तो लखनऊ दफ्तर में अखबार भेजे जाने पर 28 गार्डों को बर्खास्त नहीं किया जाता और न ही अनगिनत अधिकारियों के खिलाफ नोटिस जारी की जाती. सिडबी संगठन क्या लोकतांत्रिक मूल्यों से अलग है कि वहां अखबार नहीं भेजा जा सकता?

sidbiसिडबी का खंडन : ‘चौथी दुनिया’ के 04-10 जून 2018 के संस्करण में सिडबी पर प्रकाशित समाचार आधारहीन और नितांत दुर्भावनापूर्ण है. मामले की तह तक गए बिना, तथ्यों को ताक पर रखकर न्यूज छापा गया है. समाचार से ऐसा प्रतीत होता है कि सिडबी में घटित होने वाली प्रत्येक घटना अध्यक्ष द्वारा निर्णीत होती है. जबकि मौजूदा व्यवस्था के तहत, सभी कार्यपालक शक्तियां उप प्रबंध निदेशकों के स्तर पर समाप्त हो जाती हैं. बोर्ड या समितियों के अध्यक्ष के रूप में नियत कार्य के अलावा, अध्यक्ष में किसी भी प्रकार की कार्यपालक शक्तियां निहित नहीं हैं.

‘चौथी दुनिया’ का मंडनः ‘चौथी दुनिया’ में प्रकाशित खबर तथ्यों पर आधारित है. खबर के प्रकाशन के पीछे दुर्भावना या पूर्वाग्रह जैसे शब्द का इस्तेमाल आपत्तिजनक है. सिडबी प्रबंधन ईमानदार होता तो लखनऊ दफ्तर में अखबार भेजे जाने पर 28 गार्डों को बर्खास्त नहीं किया जाता और न ही अनगिनत अधिकारियों के खिलाफ नोटिस जारी की जाती. सिडबी संगठन क्या लोकतांत्रिक मूल्यों से अलग है कि वहां अखबार नहीं भेजा जा सकता? ‘चौथी दुनिया’ के सर्कुलेशन स्टाफ ने बाकायदा लॉग इंट्री करने के बाद रिसेप्शन काउंटर पर अखबार रखा था. खबर से बौखलाए सिडबी प्रबंधन को इतनी भी समझ नहीं रही कि इसमें सुरक्षा गार्डों का कोई अपराध नहीं है.

खंडन के जरिए सिडबी एक और आश्चर्यजनक सूचना दे रहा है कि सिडबी के अध्यक्ष के पास कोई एक्जेक्यूटिव पावर नहीं है. यह एक नई खबर है. सिडबी की स्वीकारोक्ति है कि सिडबी के अध्यक्ष के पास कार्यपालक शक्तियां नहीं हैं. कार्यपालक मदों और मुद्दों पर उनसे कोई चर्चा भी नहीं की जाती और ‘सभी कार्यपालक शक्तियां उप प्रबंध निदेशकों के स्तर पर समाप्त हो जाती हैं.’ यह चालाकी भरी स्वीकारोक्ति हैरान करने वाली है. अगर सिडबी के अध्यक्ष का कोई काम ही नहीं है, तो फिर इस पद का औचित्य क्या है और उस पर बैठे अधिकारी पर सरकार का इतना धन क्यों बर्बाद होता है! असलियत यह है कि दैनंदिन के फैसले चेयरमैन ही लेते हैं और नीतिगत फैसलों में भी चेयरमैन ही प्रभावी रहते हैं.

सिडबी का खंडन : 1- आपने उल्लेख किया है कि सिडबी दिवालिया हो रहा है. यह तथ्यों से परे है. वर्तमान अध्यक्ष के कार्यभार संभालने के साथ ही संस्थान में कई रूपांतरकारी परिवर्तन हुए हैं. यह संस्था के वित्तीय आंकड़ों में परिलक्षित है. सिडबी में किए गए संरचनात्मक पुनर्विन्यास के सकारात्मक परिणाम 2017-18 के दौरान सिडबी की वित्तीय स्थिति में दिखाई दे रहे हैं.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 1- सिडबी प्रबंधन ने खंडन तो जारी कर दिया, पर शीर्ष अधिकारियों ने खबर ठीक से पढ़ी नहीं.  प्रकाशित रिपोर्ट में सिडबी के ‘दिवालिया’ होने के बारे में कहीं नहीं लिखा गया. खबर में  ‘दिवालिया’ शब्द का इस्तेमाल अन्य प्रसंग में किया गया है. खबर में यह लिखा है कि सिडबी के अध्यक्ष संस्था को रसातल में पहुंचाने में लगे हैं. हमने सिडबी के वित्तीय आंकड़ों की बहुत सावधानीपूर्वक छानबीन और समीक्षा की है. सिडबी का लाभ, जो पहले से ही 1120 करोड़ था, उसे 1429 करोड़ के स्तर पर पहुंचाना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है. मोहम्मद मुस्तफा के सिडबी के सीएमडी का कार्यभार संभालने के बाद यदि कोई रूपांतरकारी बदलाव आया हो तो उसका ब्यौरा हमें भेजें, हम उसे छापेंगे. इस ब्यौरे के साथ यह भी भेजें कि मोहम्मद मुस्तफा ने स्टाफ मदों में क्या-क्या कटौतियां कीं और मानव संसाधन ढांचे में क्या उलटफेर किए, जिससे समस्त सिडबी स्टाफ सकते में हैं.

सिडबी का खंडनः 2- पिछले वर्ष की तुलना में बैंक की कुल आस्तियों में 37 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई. इस प्रकार वर्ष 2017-18 में तुलनपत्र का आकार एक लाख करोड़ का पड़ाव पार कर गया. इससे यह सुनिश्चित हुआ कि सिडबी ने अपनी संपूर्ण अवधि में उच्चतम आय और लाभ (1429 करोड़) हासिल किया. आस्ति और आय सम्बन्धी यह वृद्धि वित्तवर्ष 2018 की तीसरी तिमाही तक नहीं थी. प्रथम दो तिमाहियों में अग्रिम की संवृद्धि नकारात्मक रही, जबकि पिछली दो तिमाहियों के दौरान यह संवृद्धि क्रमशः 20 प्रतिशत और 16 प्रतिशत के साथ बढ़ी. वर्ष 2018 में सिडबी के कार्यनिष्पादन की महत्ता इससे पता चलती है कि पूर्ववर्ती चार साल में आय और लाभ में गिरावट थी.

‘चौथी दुनिया’ का मंडनः 2- बैलेंस शीट में कुछ मदों में सकारात्मक प्रविष्टी का दर्ज होना यह स्पष्ट नहीं करता कि कारोबार आयोजना, नवोन्मेषण, नए एवं आवश्यकता आधारित उत्पाद निर्माण, उत्पादों की मार्केटिंग, पहुंच एवं विस्तार और वित्त आपूर्ति जैसे सभी मदों में सिडबी वृद्धि कर रहा है. आर्थिक मद के साथ सेवा मद उतना ही जरूरी है, क्योंकि सिडबी सेवा क्षेत्र की वित्तीय संस्था है. उसे अपनी सेवा-गुणवत्ता बढ़ानी चाहिए, सिडबी ने अपने खंडन में इस आयाम से बचने की कोशिश की है. सिडबी को भारतीय रिजर्व बैंक, विश्व बैंक, भारत सरकार, जर्मनी के केएफडब्लू बैंक, इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (आईएफएडी), ब्रिटेन के डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआईडी) समेत कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से आर्थिक और योजनागत मदद मिलती है. लिहाजा, राष्ट्रीय स्तर के फैलाव के साथ 28 वर्षों बाद भी सिडबी के बैलेंस शीट का एक लाख करोड़ पार करना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. सिडबी यह भी कहता है कि आस्ति और आय की वृद्धि वर्ष 2018 की तीसरी तिमाही तक नहीं थी. प्रथम दो तिमाही में अग्रिम में वृद्धि नकारात्मक थी. पूर्ववर्ती चार साल में आय और लाभ में गिरावट थी.

बैलेंस शीट बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना और एनपीए को कम करके दिखाना बच्चों का खेल हो गया है. सिडबी का कारोबार, आस्ति आकार और बैलेंस शीट वृद्धि का मुख्य स्रोत अप्रत्यक्ष वित्त (पुनर्वित्त), बैंकों, राज्य वित्तीय निगमों, नॉन बैंकिंग फिनांस कपनीज़ को दिया जाने वाला शार्ट-टर्म लोन है. सिडबी का 85 फीसदी से अधिक कारोबार अप्रत्यक्ष वित्त से होता है. इसमें सिडबी अपना कौन सा ‘इनिशिएटिव’ लेकर मैदान मार रहा है! विभिन्न बैंक, राज्य वित्तीय निगम और एनबीएफसी जैसी संस्थाएं खुद मेहनत करके देशभर के कारोबारियों को ऋण देती हैं. सिडबी उन संस्थाओं को वही राशि पुनर्वित्त में बदल कर दे देता है. इसमें अपनी पीठ ठोकने जैसी क्या बात हो गई! 85 हजार या 90 हजार करोड़ रुपए का बैलेंस शीट दिखाकर सिडबी का अकड़ना हास्यास्पद है. सिडबी प्रबंधन को यह याद दिलाते चलें कि अप्रत्यक्ष ऋण ‘पुल-प्रोडक्ट’ है, यानि बैंकों को जब नकद की जरूरत होती है, तो वे खुद सिडबी के पास आते हैं. इसमें सिडबी की मेहनत नहीं होती.

चिंता का विषय यह है कि सिडबी ने अपनी मेहनत से कोई भी ‘पुश-प्रोडक्ट’ नहीं बनाया, न डिजाइन किया और न सूक्ष्म-लघु-मध्यम क्षेत्र की आवश्यकता के अनुसार उत्पाद बनाकर क्लस्टर या क्षेत्रवार माइक्रो स्मॉल मीडियम इंटरप्राइजेज़ (एमएसएमई) तंत्र (इकोसिस्टम) में वर्षों से चले आ रहे अंतर को पाटने में कोई भूमिका अदा की.

सिडबी का खंडन : 3- पोर्टफोलियो में विस्तार के साथ ही गुणवत्ता में सुधार पर भी ध्यान दिया गया. 2017 में सिडबी का कुल एनपीए अनुपात 1.2 प्रतिशत से घटकर वित्त वर्ष 2018 में 0.94 प्रतिशत हो गया, जो बेहतर आस्ति प्रबंध दर्शाता है.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 3- सिडबी का बैलेंस शीट यह भी बताता है कि उसका नॉन परफॉर्मिंग असेट (एनपीए) वित्तीय वर्ष 2017 के स्तर 823.28 करोड़ से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2018 में 902.42 करोड़ हो गया. यानि, सालभर में सिडबी का एनपीए 79.14 करोड़ बढ़ गया. इस पर दावा है कि सिडबी का सकल एनपीए वित्त वर्ष 2017 में 1.20 प्रतिशत से घटकर वित्तीय वर्ष 2018 में 0.94 प्रतिशत हो गया. सिडबी बड़ी चतुराई से अपने बैलेंस शीट का आकार बढ़ा कर ऐसा कह रहा है, जबकि तथ्य यही है कि सिडबी का सकल एनपीए लगातार बढ़ रहा है.

सिडबी का खंडन : 4- सिडबी ने कई विशिष्ट गैर-वित्तीय कदम भी उठाए हैं. एमएसई सेंटिमेंट सूचकांक ‘क्रिसिडेक्स’ और ‘एमएसएमई पल्स’ शुरू किया, जो एमएसएमई से सम्बन्धित वित्त-व्यवस्था के पूरे दायरे को सोद्देश्यपूर्ण बनाता है.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 4- सिडबी द्वारा दिखाए जा रहे प्रयास दिखावा हैं. जिन दूरदराज के छोटे और मझोले औद्योगिक क्षेत्र मसलन, मुरादाबाद, भदोही, जौनपुर, शाहगंज, मिर्जापुर, बलरामपुर, बहराइच, मेरठ, मथुरा, शाहगंज, गाजीपुर, गोरखपुर, फिरोजाबाद, लखीमपुर, पीलीभीत, बरेली, रामपुर की चर्चा की गई है, इन इलाकों में लोगों को सिडबी की योजनाओं से क्या लाभ मिला? सिडबी ने उन्हें कौन सा स्वरोजगार दिया? लघु उद्योगों को बचाने के लिए लोगों को सिडबी से छोटे-छोटे ऋण का लाभ क्या मिला? इसे बताने के बजाय सिडबी प्रबंधन शब्दों की बाजीगरी दिखा रहा है.

सिडबी का खंडन : 5- सिडबी ने ‘उद्यमी-मित्र’ पोर्टल के जरिए वित्तीय मध्यवर्तियों और एमएसएमई उद्यमों को एक मंच पर लाने का काम किया. सिडबी ने देश के असेवित और अल्प-सेवित क्षेत्रों में एमएसएमई तक ऋण की पहुंच सुगम बनाने के लिए मई 2018 में सीएससी ई-गवर्नेंस लिमिटेड के साथ करार किया है.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 5- सिडबी उद्यमी-मित्र जैसे हाईटेक वेबसाइटों और सूचना प्रौद्योगिकी की ‘हाई-फाई’ शब्दावलियां प्रयोग कर रहा है. सिडबी उन उद्यमियों को जिंदा रखने के लिए स्थापित हुआ था, जो दूर-दराज के ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में स्वरोजगारी या ग्रामीण-कुटीर उद्योग चलाते हैं, जिन्हें हाईटेक ‘हाई-फाई’ बातें समझ में नहीं आतीं. सिडबी जमीनी सच्चाई से दूर वेबसाइट पर ‘हिट्स’ और ‘लाइक्स’ दिखा-दिखा कर नेताओं की तरह सूक्ष्म, मझोले और लघु उद्योगों की किस्मत चमकाने का भ्रम फैलाता है. सिडबी प्रबंधन ने मई 2018 में सीएससी ई-गवर्नेंस लिमिटेड के साथ करार की बात की है. करार हुए अभी एक-डेढ महीने ही हुए हैं, उसे उपलब्धि दिखाना अनुचित है.

सिडबी का खंडन : 6- सिडबी का दायित्व लघु और सूक्ष्म उद्यमों पर ध्यान केंद्रित करना है. तथापि, सिडबी राज्य स्तरीय संस्थाओं के लिए पूरक का भी कार्य करता है. जहां बड़े उद्यमों में ऋण की संवृद्धि अल्प या नगण्य रही, वहीं सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों में दो अंकों की संवृद्धि दर्ज हुई. यह यूपी में भी उसी प्रमुखता से विद्यमान है. सिडबी ने वित्तीय समावेशन कार्यक्रम सक्रिय करने की दृष्टि से उच्च-प्रभाव क्षमता वाली प्रौद्योगिकी के पोषण हेतु आईआईएम में केंद्र शुरू किया है. यूपी में सिडबी ने ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय साक्षरता अभियान, उद्यमिता विकास कार्यक्रम, सूक्ष्म उद्यम संवर्द्धन जैसे कार्यक्रम जारी रखे हैं.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 6- सिडबी का मुख्यालय इस इरादे से बनाया गया था कि देश की अर्थव्यवस्था में 15 प्रतिशत से अधिक योगदान देने वाले यूपी के सूक्ष्म, मझोले और लघु उद्योग मरें नहीं. लेकिन असलियत में क्या हुआ? इस पर सिडबी ने चुप्पी साध ली. ‘चौथी दुनिया’ में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि भदोही, वाराणसी, जौनपुर, सुल्तानपुर के कालीन उद्योग के बुनकर, अलीगढ़ के ताला, मिश्रधातु मूर्ति और जिंक एवं अल्युमीनियम डाइ कास्टिंग उद्योगों के मजदूर, आगरा के जूता एवं चमड़ा आधारित उद्योगों के मजदूर और उनके मालिक बर्बादी की हालत में पहुंच गए. सिडबी ने इस दिशा में कोई काम किया होता, तो क्या ऐसी हालत हुई होती? अगर सिडबी ने इनकी भलाई के लिए व्यवहारिक नीति बनाई होती और वास्तविक काम किया होता, तो क्या यूपी के उद्योग-धंधे बंद हुए होते? बड़ा सवाल है कि क्या सिडबी ने देश और उत्तर प्रदेश के सूक्ष्म, मझोले और लघु उद्योगों का जमीनी जायजा लेने के लिए कोई केंद्रित वित्तीय एवं औद्योगिक सर्वेक्षण (एमएसएमई) कराया? इस सवाल का सही जवाब है कि सिडबी ने ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं कराया है.

सिडबी का खंडन : 7- खबर में मनमाने स्थानांतरण का उल्लेख है. वास्तविकता यह है कि तैनाती की अवधि और स्थान के आधार पर नियम-सम्मत स्थानांतरण किए गए हैं. मुकेश पांडेय का स्थानांतरण पिछले कई वर्षों से उनके परिसर संविभाग में बने रहने के कारण किया गया. खबर में जिक्र है कि वे फ्लैटों की बिक्री से असहमत थे, पर वास्तविकता यह है कि उन्होंने ही फ्लैटों की बिक्री का प्रस्ताव रखा था, जिसे बोर्ड ने पास किया. सिडबी खाली पड़े फ्लैटों पर करोड़ों रुपए अपव्यय करता रहा है. राजीव सूद का स्थानांतरण सतर्कता संवर्ग में उनके तीन वर्षों से तैनात रहने के कारण किया गया.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 7- सिडबी में अधिकारियों का स्थानांतरण मनमाने तरीके से होता है. छानबीन में यह तथ्य सामने आया कि मुकेश पांडेय ने सिडबी के फ्लैटों की बिक्री का विरोध किया, तो उनका तबादला कर दिया गया. जबकि सिडबी कहता है कि पांडेय ने ही फ्लैटों की बिक्री का प्रस्ताव रखा था. मुकेश पांडेय जैसे सामान्य स्तर के अधिकारी फ्लैट्स बेच देने का प्रस्ताव रखते हैं और पूरा सिडबी बोर्ड उस प्रस्ताव के आगे नतमस्तक हो जाता है. सिडबी का यह तर्क एक चुटकुले जैसा है. सिडबी कहता है कि राजीव सूद तीन साल से सतर्कता संवर्ग में तैनात थे, इसलिए उनका तबादला नियमानुसार हुआ है.

जबकि सिडबी के मानव संसाधन संवर्ग में महाप्रबंधक संदीप वर्मा पिछले सात साल से अधिक समय से एक ही जगह तैनात हैं. उनका तबादला क्यों नहीं हुआ? उसी विभाग में कई प्रबंधक और दूसरे संवेदनशील महकमों में कई अधिकारी वर्षों से टिके हैं, लेकिन उनका तबादला नहीं होता. प्रशासन संवर्ग के उप महाप्रबंधक आशू तिवारी पांच साल से अधिक समय से स्थापित हैं. फिर भी सिडबी का यह कहना कि स्थानांतरण प्रणाली पारदर्शी है, मजाक नहीं तो क्या है! सिडबी में तरक्की का समान अवसर देने के संवैधानिक प्रावधान को ताक पर रख कर विशेषज्ञ अधिकारियों के स्केल-प्रमोशन में भीषण भेदभाव किया जा रहा है. सिडबी के विशेषज्ञ अधिकारियों की पूरी फेहरिस्त ‘चौथी दुनिया’ के पास है, जिन्हें पिछले 21 साल और 10 साल से तरक्की नहीं दी गई.

सिडबी का खंडन : 8- विभिन्न राज्यों में सिडबी के कई कार्यालय बंद किए जाने की खबर सच्चाई से कोसों दूर है. यह संस्था के लिए अपेक्षित बेहतर स्थिति की दृष्टि से किया गया एक युक्तिसंगत प्रयास था. प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय का व्यवसाय संविभाग 500 करोड़ से कम नहीं होना चाहिए. लिहाजा, यह तय किया गया कि 15 के स्थान पर केवल 9 क्षेत्रीय कार्यालय ही रखे जाएं. व्यय को कम करने के लिए ऐसा किया गया, क्योंकि वर्तमान में सिडबी सौ रुपए के अर्जन हेतु 114 रुपए खर्च करता है.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 8- सिडबी एक तरफ कहता है कि विभिन्न राज्यों में कार्यालय बंद किए जाने की खबर सच्चाई से कोसों दूर है. फिर मान भी लेता है कि यह निर्णय संस्था की बेहतरी के लिए किया गया था. ऐसे विरोधाभासी जवाब देने वाला सिडबी प्रबंधन कहता है कि क्षेत्रीय कार्यालय का व्यवसाय 500 करोड़ से कम होने के कारण कोलकाता और मुम्बई क्षेत्रीय कार्यालय बंद किए गए, पर यह नहीं बताता कि व्यवसाय क्यों कम हुआ? दूसरे सभी बैंकों के क्षेत्रीय कार्यालय कोलकाता और मुम्बई में हैं, लेकिन सिडबी ने इसका व्यवसायिक महत्व नहीं समझा.

सिडबी का खंडन : 9- सिडबी एक राष्ट्रीय संस्थान है, जिसका मुख्यालय लखनऊ में है, पर पिछले वर्षों में इसके कई महत्वपूर्ण काम-काज मुम्बई ले जाए गए. लखनऊ में उन विभागों को पुनर्स्थापित कर सिडबी के प्रधान कार्यालय का गौरव वापस लाने के लिए राज्य सरकार द्वारा वित्त मंत्रालय और वित्त मंत्री को विभिन्न अभिवेदन भेजे गए, लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई. सिडबी का काम लखनऊ, दिल्ली और मुम्बई से होता है और सीएमडी सहित वरिष्ठ कार्यपालक इन सभी केंद्रों की यात्रा करते रहते हैं.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 9- सिडबी खुद यह स्वीकार करता है कि मुख्यालय तो लखनऊ में है, पर मुम्बई को क्रमशः व्यवहारिक मुख्यालय बना दिया गया. शीर्ष अधिकारियों का आकर्षण मुम्बई और दिल्ली होने के सच को कबूल करने के बजाय सिडबी इसका ठीकरा केंद्र और पूर्व प्रबंधन पर फोड़ रहा है.

सिडबी का खंडन :10- सिडबी ने जनवरी-मई 2018 में धोखाधड़ी सम्बन्धी 17 मामले घोषित किए. न्यूज-आइटम से ऐसा प्रतीत होता है कि ये घटनाएं जनवरी-मई 2018 के दौरान घटित हुईं, जबकि धोखाधड़ी के मामले पुराने हैं.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 10- सिडबी यह मानता है कि जनवरी-मई 2018 के दौरान धोखाधड़ी के 17 मामले घोषित हुए. यह सर्वविदित है कि धोखाधड़ी के मामले कुछ अंतराल के बाद ही घोषित होते हैं. प्रकाशित खबर खास तौर पर सिडबी के ओखला ब्रांच में हुई धोखाधड़ी को रेखांकित करती है. इस मामले की अज्ञात के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज कराई गई? ओखला शाखा को बंद कर उसे दिल्ली शाखा में क्यों मिला दिया गया? सिडबी किसे बचाने की कोशिश कर रहा है? सिडबी ने इस बारे में कुछ नहीं कहा.

सिडबी का खंडन : 11- मुंबई में किराए पर फ्लैट के लिए जारी त्रुटिपूर्ण विज्ञापन के संबंध में कहना है कि टाइपिंग की गलती के कारण ‘रेज़िडेंशियल’ के बजाय ‘प्रेज़िडेंशियल’ छप गया. जिसे बाद में सुधार दिया गया. इसकी जांच शुरू कर दी गई है. इसके मूल में एक अतिथि-गृह किराए पर लेकर होटल में ठहरने से सम्बन्धित भारी खर्चों को कम करने का उद्देश्य निहित है. इस प्रकार के निर्णय बिल्कुल जूनियर स्तर पर किए जाते हैं.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 11- सिडबी का कहना है कि मुम्बई में आवास के लिए 22 मई 2018 को जारी विज्ञापन में टाइपिंग की भूल के कारण ‘रेज़िडेंशियल’ की जगह ‘प्रेसिडेंशियल’ छप गया था. टाइपिंग-मिस्टेक के लिए ‘चौथी दुनिया’ जिम्मेदार नहीं है. ‘चौथी दुनिया’ ने सिडबी की प्रबंधकीय अराजकताओं को रेखांकित किया है. सिडबी ने कहा कि टाइपिंग-त्रुटी मामले की जांच की जा रही है. फिर जांच के पहले ही जूनियर अफसर प्रशांत सामल्ला को सस्पेंड क्यों किया गया और महाप्रबंधक राजेश डी. काले को कारण बताओ नोटिस थमा कर स्थानांतरित क्यों कर दिया गया? क्या इस भूल के लिए काले और सामल्ला अकेले जिम्मेदार थे? सिडबी में विभिन्न स्तर पर ‘क्रॉस-चेक’ की कोई व्यवस्था है या नहीं? अगर है तो केवल दो अधिकारी क्यों हलाल किए गए? सिडबी ने यह नहीं बताया कि बांद्रा सी-फेस, बैंड स्टैंड, कार्टर रोड जैसे बेशकीमती इलाके में चार बेडरूम का फ्लैट लेने की आपाधापी क्यों है और उसका आर्थिक बोझ सिडबी के बैलेंस शीट पर पड़ेगा कि नहीं? सिडबी के पास स्तरीय फ्लैट्स की कतार है, लेकिन 30 से 50 लाख रुपए सालाना के किराए पर सी-फेसिंग फ्लैट लेने के लिए कुतर्क गढ़े जा रहे हैं और ढिठाई से कहा जा रहा है, यह निर्णय बिल्कुल जूनियर स्तर पर किए जाते हैं.

सिडबी का खंडन : 12- समाचार में उल्लेख है कि नई दिल्ली के अंतरिक्ष भवन में सिडबी अध्यक्ष के कक्ष का किराया तीन लाख रुपए है. सच यह है कि किराया दो लाख रुपए प्रतिमाह है. हमने वीडियोकॉन टावर स्थित बड़ा परिसर खाली कर दिया है, जिसमें 22 लाख रुपए खर्च हो रहे थे. उसके स्थान पर दुकान के आकार वाले दो कार्यालय-स्थान के उपयोग का निर्णय किया है.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 12– ‘अंतरिक्ष भवन’ में चेयरमैन के लिए तीन लाख रुपए महीने के किराए पर अलग से चैम्बर लिए जाने पर सिडबी कहता है कि किराया तीन लाख नहीं, दो लाख रुपए प्रतिमाह है. इसके लिए 22 लाख रुपए के किराए वाले ‘वीडियोकॉन टावर’ के बड़े हिस्से को खाली कर कम किराया वाले ‘दुकान’ की शेप के कमरों में कार्यालय चलाया जा रहा है. सिडबी के आम कर्मचारियों की अहमियत क्या है, इससे स्पष्ट है. जिस चेयरमैन को कोई ‘एक्जेक्यूटिव-पावर’ नहीं है, उसके लिए लखनऊ, दिल्ली और मुम्बई में अलग-अलग आलीशान चैम्बर बनाने का क्या तुक है?

सिडबी का खंडन : 13- बैंक ने रखरखाव के अपव्यय से बचने के लिए वर्षों से खाली पड़े फ्लैटों के निपटान का निर्णय पूर्व में ही किया था. विज्ञापन के माध्यम से प्रतिस्पर्धी नीलामी द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत फ्लैटों की बिक्री का प्रस्ताव किया गया है. औने-पौने दाम पर फ्लैटों की बिक्री का उल्लेख करना अनुचित है.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 13- कोई भी बैंक अपनी संपत्ति और आस्तियों की हिफाजत करता है. मुनाफा कमाने वाले बैंक आस्तियां खरीदते हैं, न कि बेचते हैं. फिर सिडबी अपने फ्लैट्स बेचने पर क्यों आमादा है? खासकर वे फ्लैट्स भी जो मार्च 2018 तक बड़े और क्षेत्रीय कार्यालयों के कारण भरे रहते थे? सिडबी का यह कहना सरासर गलत है कि जिन फ्लैट्स में कोई नहीं रहता केवल उसे बेचा जा रहा है. सिडबी के पास इसका भी जवाब नहीं है कि ‘प्रॉपर्टी’ बाजार जब मंदी की हालत में हो, ऐसे समय फ्लैट्स बेच कर सिडबी को घाटे में क्यों डाला गया?

सिडबी का खंडन : 14- समाचार में उल्लिखित है कि मुंबई में माटुंगा स्थित कतिपय फ्लैट खाली पड़े हैं और अधिकारी किराए के परिसरों में रह रहे हैं. वर्तमान में माटुंगा में कोई भी फ्लैट खाली नहीं है.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 14- खबर में यह कहीं नहीं लिखा है कि माटुंगा में सिडबी के कतिपय फ्लैट्स खाली हैं. खबर में लिखा है कि माटुंगा में चेयरमैन के लिए बना फ्लैट खाली हैं. अगर वह खाली नहीं है, तो सिडबी ने क्यों नहीं बताया कि उस फ्लैट में कौन रहता है? चैयरमैन हाजी अली के पॉश इलाके में किराए के आलीशान फ्लैट में क्यों रहते हैं? चेयरमैन के आवास के किराए पर 15 से 20 लाख रुपए क्यों खर्च हो रहे हैं? सिडबी के निवर्तमान चेयरमैन डॉ. छत्रपति शिवाजी माटुंगा स्थित रहेजा-मैजेस्टिक अपार्टमेंट के आठवें तल पर रहते थे. फिर मौजूदा चेयरमैन ने वहां रहना क्यों नहीं पसंद किया?

सिडबी का खंडन : 15 – सिडबी के एक वरिष्ठ अधिकारी की पुत्री वंदिता श्रीवास्तव की नियुक्ति के सम्बन्ध में तथ्य यह है कि भर्ती के मामलों में बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का विधिवत रूप से अनुसरण करते हुए उनकी भर्ती की गई थी.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 15– सिडबी के मुख्य महाप्रबंधक उमाशंकर लाल की बिटिया वंदिता श्रीवास्तव वर्ष 2014 के बैंक नियुक्ति बोर्ड की सिडबी के लिए आयोजित लिखित परीक्षा में पास नहीं हुई थीं. इकोनॉमिस्ट के पद पर उनकी नियुक्ति बाद में की गई. जब वे इतनी ही योग्य थीं, तो दो साल तक उनसे पद-निर्धारित काम नहीं लेकर पत्रों, परिपत्रों और अंदरूनी पत्राचार ‘डिस्पैच’ करने और बुलेटिन-बोर्ड जारी कराने का काम क्यों लिया जाता रहा? सिडबी के शीर्ष अधिकारियों के ‘टैलेंटेड’ बच्चे सिडबी में नौकरी के लिए चुन लिए जाते हैं, लेकिन निचले स्तर के अधिकारियों-कर्मचारियों के ‘बोगस’ बच्चे सिडबी की नौकरी में नहीं चुने जाते.कर्मचारियों के प्रति सिडबी के शीर्ष अधिकारियों के बेजा रवैये की ही बानगी है, सिडबी के दफ्तर में ‘चौथी दुनिया’ की प्रतियां रखे जाने के ‘जुर्म’ में 28 गार्डों की बर्खास्तगी और कई अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ ‘शो-कॉज़’ नोटिस जारी किया जाना.

यह उसी मुख्य महाप्रबंधक उमाशंकर लाल की करतूत है, जो बैक-डोर से अपनी बिटिया की सिडबी में नियुक्ति कराता है और रिटायरमेंट के बाद भी सलाहकार का पद पुरस्कार में पा जाता है. सामान्य कर्मचारियों के प्रति सिडबी प्रबंधन का रवैया बेजा और असंवैधानिक है. आप सिडबी के वर्ष 2018 के लाभ-हानि वित्तीय परिणाम गौर से देखें तो पाएंगे कि सिडबी का ‘अन्य’ खर्च 2017 के 126 करोड़ की तुलना में बढ़कर 2018 में 131 करोड़ हो गया. जबकि स्टाफ पर होने वाला खर्च 2017 के 407 करोड़ से घटकर 2018 में 379 करोड़ पर आ गया. साफ है कि कर्मचारियों की सुविधा के 28 करोड़ काट कर शीर्ष अधिकारियों ने उसे अपनी ‘रईसी’ में जोड़ दिया.

सिडबी का खंडन : 16- मुख्य अर्थशास्त्री के अनुमोदित पद पर नियुक्ति के लिए अब पुनः इसका विज्ञापन दिया गया है.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 16- आश्चर्य है कि सिडबी में जहां एक इकोनॉमिस्ट हो वहां चीफ इकोनॉमिस्ट की नियुक्ति का उपक्रम हो रहा है. सिडबी ने दशकों पहले इकोनोमिस्ट कैडर खत्म कर दिया, फिर अब क्यों उसी कैडर को जिंदा किया जा रहा है? इस मद में सलाना 60 लाख रुपए फूंकने की जरूरत क्यों आ पड़ी? इसका बोझ सिडबी के बैलेंस शीट पर पड़ेगा कि नहीं? सवाल यह भी है कि सिडबी में जब मुख्य महाप्रबंधक आरकेदास, महाप्रबंधक एसपी सिंह, उप महाप्रबंधक पीके नाथ जैसे कई अन्य अधिकारी ‘इकोनॉमिस्ट कैडर’ में दक्षतापूर्वक काम कर चुके हों, तो इनसे बाहरी काम क्यों लिया जा रहा है और चीफ इकोनॉमिस्ट की बेमानी नियुक्ति क्यों की जा रही है? सिडबी यह क्यों नहीं बताता कि बैंक ऑफ इंडिया के राजीव सिंह को डेढ़ करोड़ रुपए के अनुबंध पर किस काम के लिए सिडबी में नियुक्त किया गया है?

सिडबी का खंडन : 17- सामान्य और विशिष्ट संवर्ग के विलय के सम्बन्ध में कहना है कि यह बैंकिंग प्रथा के अनुकूल है और इसे स्वैच्छिक रूप से अपनाने के लिए प्रस्तावित किया गया था.

‘चौथी दुनिया’ का मंडन : 17- सिडबी ने बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ अधिकारियों के साथ कैसा बेजा सलूक किया, यह सामने है. विशेषज्ञ अधिकारियों के लिए गैर-संवैधानिक ‘मर्जर-पॉलिसी’ लाकर इस घटियापन पर मुहर लगा दी. इस योजना का सिडबी के अधिकांश विशेषज्ञ अधिकारियों ने विरोध किया, लेकिन प्रबंधन ने एक नहीं सुनी. ‘मर्जर-पॉलिसी’ इतनी ही व्यवहारिक थी तो उसके खिलाफ मुकदमा क्यों दर्ज हुआ? कोर्ट में मामला दर्ज होने पर सिडबी ‘आउट ऑफ कोर्ट सेट्लमेंट’ के लिए क्यों घुटने टेक देता है? डी. घोष बनाम सिडबी मामले में कोर्ट के बाहर सेट्लमेंट करते हुए उन्हें तरक्की क्यों दी गई और पीडी सारस्वत बनाम सिडबी मामले में भी सिडबी ने कोर्ट से बाहर सेट्लमेंट क्यों किया? लब्बोलुबाव यही है कि कुतर्कों का सहारा लेने के बजाय सिडबी को अपनी खामियां और प्रबंधकीय अराजकता दूर करनी चाहिए.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन
शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...

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