पीडीपी न घर की रही और न घाट की

पीडीपी-भाजपा के तीन वर्षीय कार्यकाल में घाटी में मानवाधिकार का जमकर उल्लंघन हुआ. इसमें जुलाई 2016 के बाद बढ़ोतरी देखने को मिली, जब मिलिटेंट कमांडर बुरहान वानी दक्षिणी कश्मीर के एक गांव में झड़प के दौरान मारा गया. इस घटना के बाद घाटी में आंदोलन शुरू हो गया था. सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गनों का आजादी के साथ इस्तेमाल किया, जिसके कारण सैकड़ों नौजवान आंशिक रूप से या पूरी तरह से आंखों की रौशनी खो बैठे.

pdpएक मार्च 2015 को जब जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भाजपा ने गठबंधन सरकार बनाई, तो मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने दो विभिन्न विचारधारा वाले दलों के इस गठबंधन को साउथ पोल और नॉर्थ पोल का संगम करार दिया था. हालांकि कुछ विश्लेषकों ने उसी समय कहा था कि ध्रुवों को मिलाने की यह कोशिश तबाही मचा देगी. तीन साल से थोड़ा ज्यादा समय गुजरा, भाजपा ने एकाएक पीडीपी से समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी. हैरानी की बात यह है कि आखिरी पल तक मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उनकी पार्टी के उच्च पदाधिकारियों को इस बात की भनक तक नहीं लगी कि सहयोगी दल अचानक उनका साथ छोड़ देगा.

18 जून की शाम को ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर की भाजपा टीम को बैठक के लिए नई दिल्ली तलब किया था. तभी से ये अफवाहें फैलनी शुरू हो गई थीं कि भाजपा सरकार से अपना समर्थन वापस ले सकती है. लेकिन ये सब अचानक होगा, इसका किसी को अंदाजा नहीं था. हद तो यह है कि भाजपा ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को औपचारिक तौर पर भी अपने फैसले से अवगत कराने की जरूरत नहीं समझी. पीडीपी के अधिकांश मंत्री 19 जून की दोपहर श्रीनगर सिविल सेक्रेटेरियट में अपने कार्यालय में बैठे थे, तभी राजभवन से मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को फोन आया और उन्हें बताया गया कि गवर्नर साहब उन्हें याद कर रहे हैं. दरअसल, भाजपा ने तब तक राज्यपाल को अपने इरादे से लिखित तौर पर सूचित कर दिया था.

हकीकत पता चलने पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के पास अपना इस्तीफा पेश करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. लिहाजा, उन्होंने ऐसा ही किया. अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंपने के बाद महबूबा ने पार्टी नेताओं की आपातकालीन बैठक बुलाई और उसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए उन्होंने हुकूमत खत्म होने की अधिकारिक खबर दी. उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं और उनके लहजे में पहले जैसा विश्वास नहीं था. बेख्याली में उन्होंने कई ऐसे जुमले भी कहे, जो उन्हें सरकार गिरने के बाद शायद नहीं कहना चाहिए था. मसलन, उन्होंने कहा कि कश्मीर में ताकत का इस्तेमाल नहीं चलेगा, यानि सैन्य बलों द्वारा कश्मीरियों को नहीं दबाया जा सकता. हालांकि खुद महबूबा मुफ्ती ने अपने तीन वर्षीय कार्यकाल में जनता को सिर्फ और सिर्फ ताकत के जरिए दबाने की ही कोशिश की है.

बहरहाल, सरकार गिर गई और राज्य में राज्यपाल शासन लागू हो गया. अगले चुनाव कब होंगे इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यहां के हालात इस कदर खराब हैं कि पीडीपी-भाजपा सरकार दो साल में अनंतनाग लोकसभा सीट का उपचुनाव भी नहीं करा सकी. यह सीट महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हुई थी. वैसे भी जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन कोई नई बात नहीं है. गत चार दशकों के दौरान यहां आठ बार राज्यपाल शासन लागू हुआ है. 1990 में जब यहां मिलिटेंसी शुरू हुई, तो राज्य में राज्यपाल शासन लागू कर दिया गया उसके बाद छह वर्ष तक केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने में असफल रही. संभव है कि इस बार भी राज्य में लंबे समय तक राज्यपाल शासन कायम रहेगा.

अप्राकृतिक गठबंधन

2014 के विधानसभा चुनाव में पीडीपी सबसे बड़े दल के तौर पर सामने आई थी. उसे विधानसभा की 87 सीटों में से 28 सीटें मिली थीं, वहीं भाजपा को 25, नेशनल कॉन्फ्रेंस को 15 और कांग्रेस को 12 सीटें मिलीं. बाकी सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों और अन्य छोटे दलों के हिस्से में गईं. पीडीपी और भाजपा ने सरकार बनाने में कई महीनों का समय लगा दिया था. दोनों दलों ने एजेंडा-ऑफ-एलायंस के नाम से एक दस्तावेज भी तैयार किया. हालांकि सरकार बनने के चंद दिनों बाद ही पीडीपी के संस्थापक नेताओं में से एक, मुजफ्फर हुसैन बेग ने खुलेआम यह स्वीकार किया कि एजेंडा-ऑफ-एलाइंस नामक दस्तावेज की हैसियत महज कागज के एक टुकड़े जैसी है. बाद के हालात में उनकी वह बात सही साबित हुई, क्योंकि इस दस्तावेज में शामिल एक बात पर भी अमल नहीं किया गया.

भाजपा शुरू से ही जिद पर अड़ी रही और पीडीपी महज सत्ता में जमे रहने के लिए भाजपा की जिद बर्दाश्त करती रही. एजेंडा-ऑफ-एलायंस में दोनों पार्टियों ने तय किया था कि केंद्र सरकार को कश्मीर का मसला हल करने के लिए बातचीत का सिलसिला शुरू कराने पर राजी किया जाएगा और ये बातचीत सिर्फ हुर्रियत से नहीं, बल्कि पाकिस्तान से भी होगी. नेशनल हाइड्रो पावर कॉरपोरेशन (एनएचपीसी) और राज्य के अन्य पावर प्रोजेक्ट्‌स में  जम्मू-कश्मीर को स्वामित्व दिलाने सहित कैदियों को रिहा करने की बात भी एजेंडा-ऑफ-एलायंस में थी.

सरकार बनने के बाद पहले ही हफ्ते में जब मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने आईजी को तलब कर, जेल में कैद हुर्रियत नेता मुशर्रफ आलम को रिहा करने के निर्देश दिए और उसपर अमल भी हुआ, तो भाजपा ने उधम मचा दिया था. मुफ्ती को इस कदर दबाव में लाया गया कि मुशर्रफ आलम को दोबारा गिरफ्तार करना पड़ा. इसके कुछ दिन बाद, मुख्यमंत्री ने तमाम मंत्रियों और नौकरशाहों के लिए आदेश जारी किया कि वे तिरंगा के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के झंडे को भी अपने कार्यालयों और गाड़ियों पर लगा कर रखें, तो इसपर भी भाजपा ने बवाल खड़ा कर दिया और मुफ्ती को 24 घंटे के अंदर यह फैसला वापस लेना पड़ा था.

इसके बाद तो भाजपा ने पीडीपी को जनता की नजरों में जलील करने का कोई मौका नहीं छोड़ा और पीडीपी सत्ता को बचाए रखने के लिए जहर की घूंट पीती रही. बीते तीन वर्षों के दौरान न हुर्रियत से बात हुई, न पाकिस्तान से, न पावर प्रोजेक्ट वापस मिले और न ही कैदियों की रिहाई अमल में लाई गई. दोनों पार्टियों के दरम्यान तयशुदा एजेंडा-ऑफ-एलायंस की धज्जियां उड़ा दी गईं.

मानवाधिकार का लगातार उल्लंघन

पीडीपी-भाजपा के तीन वर्षीय कार्यकाल में घाटी में मानवाधिकार का जमकर उल्लंघन हुआ. इसमें जुलाई 2016 के बाद बढ़ोतरी देखने को मिली, जब मिलिटेंट कमांडर बुरहान वानी दक्षिणी कश्मीर के एक गांव में झड़प के दौरान मारा गया. इस घटना के बाद घाटी में आंदोलन शुरू हो गया था. सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गनों का आजादी के साथ इस्तेमाल किया, जिसके कारण सैकड़ों नौजवान आंशिक रूप से या पूरी तरह से आंखों की रौशनी खो बैठे. गत दो वर्षों के दौरान, सैकड़ों नौजवान सुरक्षाबलों के हाथों मारे जा चुके हैं.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकाल में जब घाटी के किसी इलाके में सुरक्षाबलों के हाथों कोई नागरिक मारा जाता था, तो विपक्ष के नेता के रूप में महबूबा मुफ्ती उस समय बवाल खड़ा करती नजर आती थीं. लेकिन अपनी सत्ता के दौरान कई बार खुले शब्दों में हत्याओं का जायज ठहराती नजर आईं. गत दो वर्षों के दौरान घाटी में मानवाधिकार के लगातार उल्लंघन से पीडीपी की लोकप्रियता का ग्राफ काफी हद तक गिर गया. अगर सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर लेती, तो शायद पीडीपी को कुछ अच्छे काम करने और जनता में अपनी साख बहाल करने का मौका मिल जाता लेकिन अचानक सरकार छिन जाने की वजह से ये पार्टी न घर की रही और न घाट की.

राज्यपाल शासन लागू

अगर किसी दूसरे राज्य में लोकतांत्रिक सरकार अचानक खत्म हो जाए और वहां संवैधानिक संकट पैदा हो जाए तो राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है, लेकिन ऐसी स्थिति में जम्मू-कश्मीर में राज्य के अपने संविधान के सेक्शन-192 के तहत राज्यपाल शासन लागू होता है. लेकिन इसकी मंजूरी राष्ट्रपति देते हैं. ऐसे तो राज्यपाल शासन की अवधि छह महीने होती है, लेकिन उसमें विस्तार किया जा सकता है. 1990 में जब कश्मीर में मिलिटेंसी शुरू होने के साथ ही राज्यपाल शासन लागू हुआ, तो वो लगातार छह साल से अधिक समय तक जारी रहा था. राज्य में पहली बार 1977 में राज्यपाल शासन लागू हुआ था. तब से अब तक राज्य में आठ बार राज्यपाल शासन लागू हो चुका है. एनएन वोहरा गत दस वर्षों से जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल हैं.

सिर्फ इन दस वर्षों में ही अब तक चार बार राज्य में राज्यपाल शासन लागू हुआ है. अब देखना यह है कि नए चुनाव जल्दी हो पाएंगे या नहीं. फिलहाल घाटी में चुनाव के लिए माहौल उपयुक्त नहीं है. मुफ्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद जब महबूबा मुफ्ती ने अपनी संसदीय सीट से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री का पद संभाला था, तो उस समय भी यही कहा जा रहा था कि खाली हुई अनंतनाग लोकसभा सीट पर सरकार जल्द उपचुनाव कराएगी, लेकिन दो वर्ष बाद भी अब तक चुनाव नहीं हुआ. इस स्थिति को देखकर यह विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता कि जम्मू-कश्मीर में कब तक विधानसभा चुनाव होंगे. संभव है कि राज्य में राज्यपाल शासन एक-दो साल तक जारी रहे.

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