लंबी बीमारी के बाद नहीं रहे कवि गोपाल दास नीरज, यह थी आखिरी इच्छा

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हिंदी के प्रख्यात कवि गोपाल दास नीरज का लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को 93 साल की उम्र निधन हो गया. उन्हें मंगलवार को आगरा के अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था. तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल लाया गया था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली. वे आगरा अपनी बेटी से मिलने पहुंचे थे. हालांकि उनकी तबीयत लंबे समय से खराब चल रही थी.

ज्योतिष, अंकशास्त्र और आयुर्वेद का अच्छा ज्ञान रखने वाले गीतकार गोपाल दास नीरज अक्सर बातचीत में कहते थे कि उनकी आखिरी इच्छा यही है कि उनके प्राण कविता पढ़ते हुए मंच पर ही निकलें. यही कारण था कि श्रृंगारिक गीतों के अलावा उनकी कविता में जीवन के प्रति नश्वरता का भाव भी देखने को मिलता है.

1990 के बाद से नीरज के काव्य में एक नई चीज यह देखने को मिली कि उसमें दार्शनिक भाव शामिल होना शुरू हो गया. वे कहते थे कि ‘कोई चला तो किसलिए नजर डबडबा गई, श्रृंगार क्यों सहम गया, बहार क्यों लजा गई, न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ, बस इतनी सिर्फ बात है, किसी की आंख खुल गई, किसी को नींद आ गई’. इसके अलावा अन्य रचनाओं में भी यही नजरिया प्रदर्शित होने लगा.

गोपाल दास नीरज की प्रमुख कविताएं

संघर्ष (1944), अन्तर्ध्वनि (1946), विभावरी (1948), प्राणगीत (1951), दर्द दिया है (1956), बादर बरस गयो (1957), मुक्तकी (1958),दो गीत (1958), नीरज की पाती (1958), नदी किनारे (1963), कारवाँ गुजर गया (1964), फिर दीप जलेगा (1970),तुम्हारे लिये (1972), नीरज की गीतिकाएँ (1987) उनकी प्रमुख कविताएं है.

नीरज के बारे में सबसे बड़ी बात यह है कि वह जितने नामचीन हिन्दी कविता के मंचों पर थे, उन्हें उतनी ही शोहरत और मोहब्बत उर्दू शायरी के मंचों पर भी हासिल थी.

वे हिन्दी साहित्यकार के साथ-साथ शिक्षक, एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फिल्मों के गीत लेखक भी थे. वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले  पद्मश्री पुरस्कार से, उसके बाद पद्म भूषण से. यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला.

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