कश्मीर समस्या का समाधान, ताक़त नहीं सियासी पहल

जनरल मलिक ने पिछले वर्ष पच्चीस अगस्त को पूना में एक कॉलेज में आयोजित समारोह के अवसर पर एक साक्षात्कार में कहा था कि विवादों को सियासी सतह पर हल करना होगा. ये सही नहीं है कि सारा बोझ सेना और सीआरपीएफ के कंधों पर डाला जाए. अगर यह समझा जा रहा है कि सेना कश्मीर के मसले को अकेले हल कर देगी तो ऐसा हरगिज नहीं होने वाला है. एक सियासी हल ही आखिरी हल हो सकता है.

kashmirजम्मू-कश्मीर में भाजपा ने पीडीपी से समर्थन वापस लेकर सरकार गिराने के बाद ये संकेत दिया है कि आने वाले समय में कश्मीर में जारी मिलिटेंसी और अलगाववादियों के खिलाफ ताकत का भरपूर इस्तेमाल किया जाएगा. राज्य में राज्यपाल शासन लागू होने के बाद, सेना प्रमुख ने भी अपने बयान में मिलिटेंसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू करने की बात कही है. राज्यपाल शासन के लागू होने के फौरन बाद, सरकार ने 21 मिलिटेंटों की एक सूची जारी कर दी है, जिन्हें मोस्ट वांटेड करार दिया गया है.

सख्ती से निपटेगी सेना

सेना की 15वीं कोर के लेफ्टिनेंट जनरल अनिल कुमार भट्‌ट ने गत दिनों कश्मीर के बारामुला में पत्रकारों के साथ बात करते हुए कहा कि घाटी में इस समय 275-300 मिलिटेंट सक्रिय हैं, जबकि सीमा के उस पार लगभग 30 मिलिटेंट घाटी में घुसपैठ के लिए तैयार बैठे हैं. उधर सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू होने के तुरंत बाद अपने बयान में कहा कि सेना अब मिलिटेंटों से सख्ती से निपटेगी. उल्लेखनीय है कि भाजपा ने पीडीपी से समर्थन वापस लेकर सरकार गिराने के बाद कहा कि पीडीपी एंटी इंसर्जेंसी कार्रवाईयों में सहयोग नहीं दे रही थी और घाटी में स्थिति बहुत खराब हो गई थी. अर्थात, भाजपा ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि इस हालात की जिम्मेदारी केवल पीडीपी पर है और यह भी कि भाजपा मिलिटेंटों और अलगाववादियों से निपटना जानती है.

एनएसजी का ऑपरेशन

केन्द्र सरकार ने नेशनल स्न्यिोरिटी गार्ड (एनएसजी) को राज्य में एंटी इंसर्जेंसी फौजी ऑपरेशन में हिस्सा लेने के लिए भेज दिया है. इनका इस्तेमाल घनी आबादी वाले इलाकों में मिलिटेंटों के खिलाफ किया जाएगा, ताकि वो सिर्फ उसी मकान पर धावा बोलकर मिलिटेंटों के खिलाफ कार्रवाई करें और उसके नतीजे में मकानों को कोई नुकसान न पहुंचे और न ही अधिक खून-खराबा हो. यह पहली बार है कि एनएसजी को कश्मीर में एंटी इंसर्जेंसी ऑपरेशन में औपचारिक रूप से शामिल किया गया है. हालांकि, राज्य में पहले ही पांच लाख से अधिक सेना मौजूद हैं और पैरा मिलिट्री फोर्सेज के अलावा सेंट्रल आर्म्ड फोर्सेज, जैसे बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और सीआईएसएफ शामिल हैं. लेकिन एक कड़वी हकीकत यह है कि तीस वर्ष के लंबे समय के बावजूद घाटी में आज भी मिलिटेंसी तीव्रता के साथ जारी है.

सियासी हल ही आखिरी हल

कुछ रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सेना और अन्य सिक्योरिटी फोर्सेज तीस वर्ष के दौरान जो कुछ कर सकते थे, वो कर चुके. अब हालात को सामान्य करने के लिए यहां एक पॉलिटिकल प्रॉसेस शुरू करने की आवश्यकता है. इस तरह की राय रखने वाले रक्षा विशेषज्ञों में भारतीय सेना के पूर्व चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ जनरल वेद प्रकाश मलिक भी शामिल हैं. जनरल मलिक ने पिछले वर्ष पच्चीस अगस्त को पूना में एक कॉलेज में आयोजित समारोह के अवसर पर एक साक्षात्कार में कहा था कि विवादों को सियासी सतह पर हल करना होगा. ये सही नहीं है कि सारा बोझ सेना और सीआरपीएफ के कंधों पर डाला जाए.

अगर यह समझा जा रहा है कि सेना कश्मीर के मसले को अकेले हल कर देगी तो ऐसा हरगिज नहीं होने वाला है. एक सियासी हल ही आखिरी हल हो सकता है. भारत के पूर्व सेना प्रमुख, जिन्होंने अपनी सर्विस का एक बड़ा समय जम्मू-कश्मीर में गुजारा है, उनके मशवरे के बाद किसी दूसरे रक्षा विशेषज्ञ के मशवरे की कोई जरूरत नहीं है. हालांकि, गत दो वर्षों के दौरान रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल बीएस हुड्‌डा और रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हरचरन सिंह पनाग ने भी कश्मीर को सियासी तौर पर हल करने की जरूरत पर जोर दिया है.

ये दोनों सैन्य अधिकारी जम्मू-कश्मीर में तैनात रहे हैं और यहां के हालात से बखूबी वाकिफ हैं. ये दोनों सैन्य अधिकारी सेना के नॉर्दन कमांड के प्रमुखों की हैसियत से रिटायर हो चुके हैं. इसके अलावा भी कई अहम लोग कश्मीर को सियासी तौर पर हल करने की जरूरत पर जोर दे चुके हैं. जम्मू-कश्मीर पुलिस के चीफ शेषपाल वेद ने इसी वर्ष 12 अप्रैल को ट्‌वीटर पर कश्मीर के हालात से संबंधित कई अहम सवालों के जवाब दिए. एक सवाल के जवाब में पुलिस प्रमुख ने कहा कि मैं व्यक्तिगत तौर पर महसूस करता हूं कि बंदूक कोई हल नहीं है. सभी पक्षों, यहां तक कि  हमारे पड़ोसी पाकिस्तान के पास भी एक ही रास्ता है कि सब मिलकर बैठें और बात करें और कश्मीर मसले को हल करें.

बंदूक कोई हल नहीं और हिंसा कोई हल नहीं है. ये तो वो अहम हस्तियां हैं, जो तीन दशकों से जम्मू-कश्मीर में मिलिटेंसी के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ रहे थे. जहां तक राजनीतिक और सामाजिक हस्तियों का संबंध है, वो तो शुरू से ही कश्मीर मसले को वार्ता के द्वारा हल करने की सलाह देती आई है. जाहिर है, केन्द्र की भाजपा सरकार इन मशवरों पर अमल नहीं करना चाहती है. ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार को विश्वास है कि सिर्फ ताकत से वो कश्मीर में जारी भारत विरोध आन्दोलन को कुचल सकती है, खत्म कर सकती है या इसे काबू कर सकती है. अगर ऐसा होता तो मोदी सरकार अपने चार वर्ष के कार्यकाल में ये काम कर चुकी होती. असल बात यह है कि भाजपा कश्मीर के संदर्भ में सख्त पॉलिसी दर्शाते हुए देशभर के अपने वोटरों को ये मैसेज देना चाहती है कि वो कितने देशभक्त हैं. भाजपा यह बताना चाहती है कि वह भारत के खिलाफ उठने वाले हर आवाज को भरपूर तरीके से दबा देगी और दबा रही है.

आर्टिकल 370 वोट बटोरने का हथियार

यही कारण है कि भाजपा नेता आए दिन जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 को खत्म करने की बातें करते रहते हैं. आर्टिकल 370 को खत्म करके जम्मू-कश्मीर को भारत में एकीकृत करने का वादा भाजपा के घोषणापत्र में शामिल है. लेकिन हकिकत यह है कि भाजपा ने आर्टिकल 370 को खत्म करने के लिए अभी तक कोई व्यवहारिक कदम नहीं उठाया है. भाजपा की तरफ से पीडीपी से समर्थन वापस लेने के केवल 48 घंटे बाद ही एक वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्‌वीटर पर लिखा कि आर्टिकल 370 को लोकसभा की मंजूरी के बगैर एक राष्ट्रपति आदेश से खत्म किया जा सकता है. इसके एक दिन बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने भी एक बयान जारी किया. इसमें उन्होंने आर्टिकल 370 को खत्म करने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि इसी की वजह से जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी तत्व पैदा होते है. 25 जून को भाजपा महासचिव अनिल जैन ने जम्मू में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि भाजपा आर्टिकल 370 को खत्म करने के अपने वादे पर कायम है.

़खत्म होगा आर्टिकल 370! 

हालांकि जम्मू कश्मीर में राजनीति विश्लेषकों को विश्वास है कि भाजपा की आर्टिकल 370 को खत्म करने की बात महज जुबानी जमा खर्च है. व्यवहारिक तौर पर इसे खत्म करने का न पार्टी का कोई इरादा है और न ही ये रिस्क लेने के लिए पार्टी तैयार है. कश्मीर यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर नूर बाबा ने इस संदर्भ में चौथी दुनिया से बात करते हुए कहा कि मुझे यकीन है कि भाजपा आर्टिकल 370 को खत्म करने का नारा महज देश भर में वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल कर रही है. जिस तरह भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने वोटरों के साथ दूसरे ढेर सारे वादे किए हैं, उसी तरह ये वादा भी किया है.

इसके बावजूद, कुछ हलकों में ये आशंका है कि भाजपा अगला चुनाव जीतने के लिए आर्टिकल 370 को व्यवहारिक तौर पर खत्म करने का कदम उठा सकती है. इन दिनों ये अफवाहें गरम हैं कि भाजपा पहले इसे खत्म करने के लिए  राष्ट्रपति आदेश जारी करवा देगी. उसके बाद लोकसभा में उसे बहुमत से मंजूरी दे देगी और संविधान में संशोधन करके इस कानून को खत्म कर देगी. ऐसा हुआ तो उसके क्या नतीजे होंगे, आने वाला समय ही बताएगा. लेकिन यह तय है कि इस समय भाजपा सरकार एक तरफ ताकत के भरपूर इस्तेमाल से कश्मीर में उठने वाली आवाजों को दबाना चाहती है और मिलिटेंसी को सैन्य बल से खत्म करना चाहती है और उसके साथ ही आर्टिकल 370 को खत्म करना चाहती है. क्या भाजपा ऐसा करने में कामयाब होगी? यह बहुत बड़ा सवाल है, जिसका जवाब फिलहाल कोई नहीं दे सकता.

लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि अगर मोदी सरकार वाकई जम्मू-कश्मीर में मिलिटेंसी और अलगाववादी राजनीतिक आन्दोलन को पूरी तरह कुचलने और आर्टिकल 370 खत्म करने में कामयाब हो जाती है तो इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी को अपने वोटरों के साथ किया गया दूसरा कोई भी वादा पूरा करने की जरूरत नहीं होगी. बल्कि सिर्फइस कदम से भाजपा लंबे समय तक भारत पर राज कर सकती है. लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, यानी फौजी ताकत के बल पर कश्मीर के हालात ठीक नहीं हुए और आर्टिकल 370 पर भी भाजपा सिर्फ बातें ही करती रही, तो यकीनन उसे कश्मीर समस्या का हल निकालने के लिए एक पॉलिटिकल प्रॉसेस शुरू करना होगा.

क्योंकि किसी देश का लगातार तीस वर्षों तक एक सशस्त्र संघर्ष में लगे रहना कोई तर्कसंगत काम नहीं है. लाखों सैनिकों पर खर्च भी करना होता है. इसके लिए देश के टैक्स देने वालों का रोजाना करोड़ों रुपए खर्च भी हो रहा है. ये स्थिति देश की आर्थिक स्थिति के लिए भी लाभदायक साबित नहीं हो सकता. ऐसे में, मोदी सरकार के लिए बस सिर्फ दो रास्ते हैं. या तो वह गुस्से और ताकत से कुछ करके दिखाएं या फिर शांति सियासी पहल से इस मसले का स्थायी समाधान निकाले.

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