विक्रम कुंवर के बाद बबलू देव ने भी जदयू से नाता तोड़ा, राजद से सवर्णों के इस प्यार का मतलब क्या है?

आगामी लोकसभा चुनाव में मोतिहारी से बबलू देव को राजद प्रत्याशी बनाये जाने के कयास तेज हैं. हालांकि, 2014  में लालू परिवार के खासमखास बिनोद श्रीवास्तव राजद के प्रत्याशी थे. भाजपा के राधामोहन सिंह को हराकर सांसद रह चुके पूर्व केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री अखिलेेश सिंह को भी लोक सभा उम्मीदवार का दावेदार माना जा रहा हैं. अखिलेश सिंह अभी कांग्रेस से राज्य सभा सदस्य चुने गये हैं. अपने नागरिक अभिनंदन सहित दो अवसर पर मोतिहारी में उनके साथ पुत्र के आने के बाद पार्टी नेताओं का मानना है कि मोतिहारी से वे अपने पुत्र को कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर दावेदार के रूप में पेश कर सकते हैं. लेकिन, अभी कुछ भी तय नहीं है. लेकिन इन कयासों के बाद से बबलू देव और अखिलेश सिंह के बीच दूरियां बढ़ गई है.

rjdजदयू और नीतीश कुमार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही है. एनडीए गठबंधन में जहां भाजपा के साथ संबंधों में खटास की चर्चा है वहीं पार्टी के भीतर भी बिखराव हो रहा है. उपचुनाव की हार के बाद, पार्टी के भीतर और बाहर से विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं. दूसरी ओर, एक-एक करके जद  (यू) के कई दिग्गज दूसरी पार्टियों में जाते दिख रहे है. गौर करने वाली बात यह है कि जदयू नेताओं का पलायन भाजपा की ओर नहीं, बल्कि राजद की ओर हो रहा है. अभी हाल में हीं जदयू को छोड़ कर राजद का दामन सरफराज आलम ने थाम लिया था.

वहीं अब पूर्वी चम्पारण के केसरिया विधान सभा क्षेत्र से विधायक रह चुके राजेश रौशन उर्फ बबलू देव ने भी जदयू को बाय-बाय कर दिया. पटना स्थित राजद कार्यालय परिसर में प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामचंद्र पूर्वे की उपस्थिति में बबलू देव ने राजद में वापसी की. डॉ. पूर्वे ने बबलू देव को माला पहना कर पार्टी में स्वागत किया. इस अवसर पर राजद प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामचंद्र पूर्वे ने कहा कि लालू प्रसाद के हाथों में जादू की छड़ी है, तभी अम्बेडकर व ब्रह्मर्षि समाज के लोेग एक घाट पर पानी पी रहे हैं. बबलू देव ने कहा कि कि नीतीश कुमार ने जब से बीजेपी का दामन थाम लिया, उसके बाद से जदयू में रहने का कोई मतलब नहीं है. नीतीश कुमार ने सांप्रदायिक शक्तियों से हाथ मिला लिया है.

इससे ठीक इसके दो दिन पहले, सीवान में पूर्व मंत्री विक्रम कुंवर ने जद (यू) से किनारा करते हुए राजद का दामन थाम लिया था. सीवान के पूूर्व सांसद एवं जेल में बंंद शहाबुद्दीन के विक्रम कुंवर कभी खासमखास माने जाते थे. वे राजपूत जाति से आते हैं. वहीं बबलू देव भूमिहार जाति से हैं और उत्तर बिहार में मजबूत पकड़ रखने वाले माने जाते हैं. इन दोनों का जदयू से किनारा करना पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

इधर बबलू देव के राजद में शामिल होने पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता संजय टाइगर ने कहा कि राजद तो अपराधियों की पार्टी है. उनके ज्यादातर विधायक और नेताओं पर कई केस दर्ज हैं. ऐसे में एक और अपराधिक छवि के नेता का राजद में शामिल होना कोई नयी बात नहीं है. ज्ञात हो कि बबलू देव दबंग छवि के माने जाते हैं और उनपर कई अपराधिक मामले भी चल रहे हैं. नीतीश कुमार की समता पार्टी से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले बबलू देव पहली बार सन 2000 में पार्टी के टिकट पर मधुबन विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़े, लेेकिन उनकी हार हो गई थी. उसके बाद वे 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद के टिकट पर चुनाव लड़ें और केसरिया से जीत हासिल की. बबलू देव को 2015 के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिली, जिससे वे बेहद खफा हुए और जद (यू) का दामन थाम लिया था.

प्रदेश स्तर पर बबलू देव के राजद में शामिल होने का क्या फायदा या नुकसान होगा, यह तो अभी नहीं कहा जा सकता है लेकिन, मोतिहारी की राजनीति पर इसका प्रभाव पड़ना लाजिमी है. आगामी लोेकसभा चुनाव में मोतिहारी से बबलू देव को राजद प्रत्याशी बनाये जाने के कयास तेज हैं. हालांकि, 2014  में लालू परिवार के खासमखास बिनोद श्रीवास्तव राजद के प्रत्याशी थे. भाजपा के राधामोहन सिंह को हराकर सांसद रह चुके पूर्व केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री अखिलेेश सिंह को भी लोक सभा उम्मीदवार का दावेदार माना जा रहा हैं.

अखिलेश सिंह अभी कांग्रेस से राज्य सभा सदस्य चुने गये हैं. अपने नागरिक अभिनंदन सहित दो अवसर पर मोतिहारी में उनके साथ पुत्र के आने के बाद पार्टी नेताओं का मानना है कि मोतिहारी से वे अपने पुत्र को कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर दावेदार के रूप में पेश कर सकते हैं. लेकिन, अभी कुछ भी तय नहीं है. लेकिन इन कयासों के बाद से बबलू देव और अखिलेश सिंह के बीच दूरियां बढ़ गई है.

बहरहाल, विक्रम कुंवर और बबलू देव को पार्टी में शामिल कर राजद ने भविष्य की राजनीति का संकेत दे दिया है कि वह सामाजिक दायरे का विस्तार चाहता है. परंपरागत फार्मूले से अलग तेजस्वी ने आबादी के हिसाब से सबको प्रतिनिधित्व देने का पहले ही एलान कर दिया है. महागठबंधन सरकार के बिखरने के साथ ही राजद ने दायरे का विस्तार शुरू कर दिया था. तेजस्वी की इस रणनीति को दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता नवल किशोर प्रगतिशील राजनीति मानते हैं. उनके अनुसार इसे जातीय चश्मे से नहीं देखना चाहिए.