बेतिया, जिसने चाहा उसी ने क़ब्ज़ा ली नगर परिषद की ज़मीन

bettiahशहर के रिहायसी इलाकों से लेकर अन्य भू-भागों में फैली बेतिया नगर परिषद की जमीन खिसकती जा रही है. इन बेशकीमती जमीनों को पर न सिर्फ दबंग कब्जा कर रहे हैं, बल्कि इसकी खरीद-बिक्री का भी खेल धड़ल्ले से हो रहा है. हालात तो यह हो गया है कि नगर परिषद की भूमि पर कई मोहल्ले तक बस गए हैं. वार्ड न. 29 के अंतर्गत बड़ा रमना मैदान अनाथालय के दक्षिणी भाग में नगर परिषद के एक बड़े भू-भाग को पूर्ण रूप से अतिक्रमित कर दमादुआ टोला नाम का एक पूरा मोहल्ला ही बस गया है. इसी प्रकार वार्ड न.4 घूसुकपूर के नगर परिषद खाता- 229 खेसरा- 619 के लगभग एक एकड़ भू-खंड पर कब्जा कर 20 से अधिक पक्के मकान बन गए हैं.

इस जमीन पर कभी नगर परिषद का जिबहखाना हुआ करता था. वर्तमान में इसी जमीन के एक हिस्से में सुलभ शौचालय तथा सामुदायिक भवन है. इससे सटे नगर परिषद द्वारा बनाई गईं आठ दुकानों पर भी अमिक्रमणकारियों ने कब्जा जमा लिया है. नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी मनोज कुमार पवन ने बताया कि उक्त दुकानों का टेंडर के जरिए आवंटन करना था, जो अब तक नहीं किया जा सका है, इसके कारण नगर परिषद के राजस्व की भी क्षति हो रही है. पार्षद व नगर परिषद के राजस्व समिति के सदस्य संजय कुमार सिंह उर्फ छोटे सिंह ने बताया कि बेतिया नगर परिषद की 80 फीसदी जमीन पर लोगों ने अवैध कब्जा कर लिया है.

इस अतिक्रमित भूमि के 30 फीसदी हिस्से पर तो पक्के भवन तक बन गए हैं. थाना रोड में यतीमखाना के सामने मवेशी फाटक की जमीन पर नगर परिषद ने 9 दुकानों का निर्माण कराया था, लेकिन इन दुकानों का भी डाक नहीं हुआ और लोग इसपर भी कब्जा कर अपनी-अपनी दुकानें चला रहें हैं.  इन दुकानों से भी एक पैसा नगर परिषद को नहीं मिलता. हाट सरैया, खिरियाघाट में सड़क के किनारे नगर परिषद के 6 कट्‌ठा के तालाब की अच्छी खासी कीमत वाली भूमि भी पूरी तरह अतिक्रमित हो चुकी है. करगहियां वार्ड न. 27 की नगर परिषद की खाता सं- 356 खेसरा-553-4 की दो बिगहा जमीन को लेकर तो जाली कागज बनाकर कई दावेदार कोर्ट तक पहुंच गए हैं.

बेतिया नगर पालिका की स्थापना के समय बेतिया राज द्वारा इसे करीब 100 एकड़ जमीन मुहैया कराई गई थी. उस समय कचरा ढोने के लिए प्रयुक्त हो रहे बैलों के चारा-पानी, घारी आदि से लेकर शहर के चारों कोने पर मल संग्रह करने तक के लिए पर्याप्त भूमि नगर परिषद को मिली थी. मैला ढोने की प्रथा जैसे ही समाप्त हुई, मल संग्रह स्थल की कीमती भूमि पर माफियाओं की नजर पड़ी और उन्होंने इसे भी नहीं बख्शा. तीन लालटेन चौक, कंजर टोली, किशुनबाग आदि कई बड़े मोहल्लों का बड़ा हिस्सा इस जमीन पर आबाद है.

ऐसा नहीं है कि अपनी जमीनों को बचाने के प्रयास में नगर परिषद पाक-साफ है. जमीन कब्जे के मामले में वहां निर्माण होने के बाद ही नगर परिषद सक्रिय होता है. फिर निर्माण से पहले उदासीन रहे कतिपय पार्षदों व नप कर्मियों द्वारा उछल-कूद मचाया जाता है. जबकि कब्जे की हकीकत यह है कि बगैर मिली-भगत के यह संभव ही नहीं है. पुलिस की उदासीनता या माफियाओं के साथ तालमेल अतिक्रमण को और बढ़ावा दे रहा है. वार्ड न. 4 करगहियां में नगर परिषद ने 3 एकड़ भूमि को ठेके पर दिया था. 62 हजार रुपए वार्षिक दर से खेती के लिए ठेके पर ली गई उस जमीन पर जब ठेकेदार पहुंचा, तो उसे वहां जाने से रोक दिया गया.

नगर परिषद द्वारा जारी किया गया कागज दिखाने पर भी उसे उस जमीन पर नहीं जाने दिया गया, उल्टा थानेदार ने ठेकेदार इमराम मियां को ही डांट फटकार दिया. नगर परिषद की सभापति गरिमा सिकारिया ने इस मामले को गंभीरता से लिया. एसपी जयंतकांत से मिलकर उन्होंने एक आवेदन के माध्यम से थानाध्यक्ष की शिकायत की, जिसके बाद एसपी ने इस मामले में आवश्यक कार्रवाई का आदेश दिया. हालांकि ऐसे दर्जनों आवेदन पूर्व में नगर परिषद द्वारा दिए जा चुके हैं, लेकिन उन जमीनों पर निर्माण हो गया और मुकदमा भी नहीं हुआ. सरकारी जमीन को बेचकर लाखों कमाने वालों में कई ऐसे चेहरे भी हैं, जो अब सफेदपोश हो चुके हैं.

सर्वे तक ठहर जाता है अमिक्रमण हटाओ अभियान

ऐसा नहीं है कि अतिक्रमण को लेकर सभापति या कतिपय पार्षद गंभीर नहीं होते. लेकिन अतिक्रमण हटाओ अभियान शहर के मुख्य सड़कों के किनारे छोटे-छोटे दुकानों को उजाड़ने तक सीमित रह जाता है. जहां अवैध रूप से दर्जनों पक्के मकान बन चुके हैं, वहां अब तक नगर परिषद का बुल्डोजर नहीं पहुंच पाया है. इसे लेकर आवाज उठाने पर अतिक्रमित भूमि के सर्वे का आदेश दिया जाता है. उस सर्वे में भी अतिक्रमणकारियों के चिन्हित होने की प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि धीरे-धीरे यह अभियान ही ठंडे बस्ते में चला जाता है. अतिक्रमण के कारण अब नगर परिषद के पास जमीन की किल्लत हो गई है. जमीन के अभाव में नगर परिषद की कई महत्वपूर्ण योजनाएं धूल फांक रही हैं, जिसमें नगर के चार स्थानों पर प्रस्तावित वेंडिग जोन प्रमुख है.

दुर्गाबाग, हजारी आदि स्थान इसके लिए चिन्हित हुए थे, परंतु भूमि के अभाव में इस योजना को धरातल नहीं मिल रहा है. इसी प्रकार, जमीन की कमी के कारण कई वार्डो में न तो सामुदायिक शौचालय बन पा रहे हैं और न ही गरीबों को आवासीय सुविधा मिल पा रही है. बेतिया नगर परिषद की सभापति गरिमा सिकारिया का कहना है कि भू-माफियाओं पर अगर शुरू से ही पुलिस व नगर परिषद प्रशासन सख्त रहते, तो यह नौबत नहीं आती. अब हम इस समस्या को लेकर सजग हैं और अतिक्रमित भूमि को वापस पाने के लिए प्रयास जारी है. इसे लेकर जिला प्रशासन से बातचीत हुई है. अब अवैध कब्जेदारों को हटाने के लिए नगर परिषद को प्रशासन द्वारा पुलिस बल मुहैया कराया जाएगा, साथ ही नगर परिषद की तरफ से दी गई तहरीर पर मुकदमा दर्ज कराने पर भी त्वरित कार्रवाई होगी.

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