BOX OFFICE : बुरी तरह पिटी फन्ने खां, मुल्क और कारवां का रहा ये हाल

नई दिल्ली (प्रवीण कुमार) फन्ने खां – वैसे फिल्म फन्ने खां काफी अच्छे विषय पर बनाई गई फिल्म कही जा सकती है, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फन्ने खां ज्यादा समय तक टिक नई पाई. फिल्म पहले सप्ताह में ही फ्लॉप हो चुकी थी. मल्टीस्टारर फिल्म होने की वजह से फिल्म का बजट थोड़ा ज्यादा हो गया है. बताया जा रहा है कि इस फिल्म का बजट 40 करोड़ था. फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर बहुत धीमी शुरुआत भी की. नतीजा यह हुआ कि फिल्म ठीक से दो सप्ताह भी नहीं चल पाई और बॉक्स ऑफिस पर लाईफ टाइम लगभग महज 10.50 करोड़ का कारोबार किया. कहना गलत भी नहीं होगी कि फिल्म अपनी लागत तक वसूल नहीं कर पाएगी. जो फिल्म निर्माताओं के लिए घाटे का सौदा साबित हुई. जबकि फिल्म को भारत में लगभग 1200 से ज्यादा सिनेमाघरों में लगाया गया था लेकिन फिल्म इतनी बुरी तरह पिटेगी यह किसी को उम्मीद नहीं थी.
फिल्म की कहानी भी उम्मीदों, सपनों और रिश्तों के बीच बुनी गई है फन्ने खां की कहानी. यह एक ऐसे पिता की कहानी है, जो अपनी बेटी को भारत का अगला सिंगिंग सेंसेशन बनाने और उसे एक बड़ा मंच देने के लिए किसी भी हद तक जाता है. फिल्म में अनिल कपूर मो. रफी तो नहीं बन पाते, लेकिन अपनी बेटी को लता मंगेशकर बनाने के सपने जरूर देखते हैं. सुपरस्टार बनने का ख्वाब देखने वाला प्रशांत शर्मा (अनिल कपूर) जो कि अपने दोस्तों के बीच फन्ने खां के नाम से ज्यादा चर्चित है, अपने सपने को पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत करता है. वह बॉलीवुड एक्टर शम्मी कपूर की पूजा तक करता नजर आता है और ऐसा लगता है कि जैसे वह सिर्फ सुपरस्टारडम के अपने सपने को पूरा करने के लिए ही जिंदा है. हालांकि, वह अपने इस ख्वाब को पूरा नहीं कर पाता और उसकी उम्मीदें अपनी नवजात बच्ची से बंध जाती हैं. यहां तक कि वह उसका नाम भी लता (पीहू सैंड) ही रखता है. लता बड़ी होती है और वह न केवल अच्छा गाती है, बल्कि डांस भी अच्छा करती है. हालांकि, प्लस साइज़ होने की वजह से वह स्टेज पर लगातार बॉडी शेमिंग की शिकार भी होती है.
कुल मिलाकर, फन्ने खां एक म्यूज़िकल ड्रामा फिल्म है, जिसमें सितारे अपनी आवाज का जादू बिखेरते दिखते हैं. यह फिल्म दिखाती है कि कैसे पैरंट्स अपने सपनों को अपने बच्चों के जरिए सच कर दिखाना चाहते हैं.

मुल्क- फिल्म मुल्क धर्म और सामाजिक धारणाओं की पड़ताल करने वाली एक शानदार फिल्म कही जा सकती है. इसे देखने के बाद कई अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर भी आपको मिल जाएंगे. लेखक-निर्देशक अनुभव सिन्हा की मुल्क में वकील बनी तापसी का एक डायलॉग कोर्ट में बेहतरीन लगता है जब वे आतंकवाद के शक में आरोपी बनाए गए मुसलमान चरित्र मुराद अली मोहम्मद का रोल निभाने वाले ऋृषि कपूर से पूछती हैं- एक आम देश प्रेमी कैसे फर्क करेगा कि दाढ़ी वाले अली मोहम्मद में और दाढ़ी वाले उस टेरेरिस्ट में, कैसे साबित करेंगे आप कि आप एक अच्छे मुसलमान हैं?
लेखक-निर्देशक अनुभव सिन्हा फिल्म के सच्चे हीरो साबित होते हैं. यह भी सोचने वाली बात है कि मुल्क इतनी अच्छी फिल्म होने के बावजूद फिल्म को औसत से ही काम चलाना पड़ा. हांलाकि दर्शकों ने फिल्म को जरूर पसंद किया. खासतौर पर तापसी पन्नू और ऋृषि कपूर का अभिनय देखने लायक है. लेकिन सिनेमाघरों में यह ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी. फिल्म का बजट लगभग 18 करोड़ था. फिल्म निर्माताओं के लिए अच्छी बात यह रही कि मुल्क ने कम से कम अपना बजट निकाल लिया. फिल्म ने लाईफ टाइम 20.51 करोड़ तक का कारोबार किया.

इसमें कोई शक नहीं कि लेखक-निर्देशक अनुभव सिन्हा की मुल्क आज के दौर की सबसे ज्यादा जरूरी फिल्म बन पड़ी है. अनुभव सिन्हा ने फिल्म में हम (हिंदू) और वो (मुसलमान) के बीच के विभाजन की ओर ध्यान आकर्षित करके आज के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर करारा प्रहार किया है.

कारवां- इरफान खान पिछले कुछ समय से न्यूरोएंड्रोक्राइन ट्‌यूमर बीमारी से पीड़ित हैं. ऐसे में उनकी फिल्म कारवां का बॉक्स ऑफिस पर रिलीज होना उनके फैन्स के लिए किसी सरप्राइज से कम नहीं है. इरफान खान की यह फिल्म 3 अगस्त को मुल्क और फन्ने खां के साथ रिलीज हुई. इरफान की इस फिल्म को देशभर के 900+ सिनेमाघरों में रिलीज किया गया. फिल्म का बजट 20 करोड़ था और फिल्म ने लाईफ टाइम भारत में लगभग 19 करोड़ तक का कारोबार किया. हांलाकि फिल्म ने वर्ल्डवाइड 26 करोड़ का कारोबार किया और फिल्म औसत रही और इससे साफ होता है कि फिल्म दर्शकों को काफी पसंद भी आई.
फिल्म की कहानी भी एक अच्छे विषय पर आधारित है. अविनाश (दलकीर), एक हैरान-परेशान इंसान है और उसके पिता से उसका अजीब सा रिश्ता है. वह अपने सपने पूरे न होने का जिम्मेदार उन्हीं को ठहराता है. फिर अचानक उसके पिता की मौत हो जाती है और इसके बाद सब बदल जाता है. पिता के अचानक मरने की खबर से अविनाश और उसका दोस्त शौकत (इरफान) बेंगलुरू से कोच्चि आ जाते हैं. इस यात्रा के दौरान उन्हें अपनी जिंदगी के बारे में सोचने का टाइम मिलता है. ‘खो जाना कभी-कभी अपने आप को पाने का सबसे अच्छा तरीका होता है.’ कारवां की यही कहानी है. हर सफर उस तरह खत्म नहीं होता जैसा आपने सोचा होता है. फिल्म भी काफी हद तक इसी तर्ज पर है. फिल्म कारवां में अगर कुछ जबरदस्त है तो वह है, दलकीर और इरफान की बेहतरीन एक्टिंग.