झारखंड : क्या आदिवासियों को मना पाए अमित शाह!

आदिवासी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के बाद शाह ने चुनावी नैया पार लगाने के लिए टिप्स भी दिये. उन्होंने कहा कि 2014 के चुनाव से भी ज्यादा सीटें लानी है. उन्होंने कार्यकर्ताओं से सोशल मीडिया के द्वारा लोेगों को जोड़ने की बात कही. साथ ही बूथ स्तर पर पांच-पांच कार्यकर्त्ताओं को स्मार्ट फोन देकर अपने क्षेत्र के लोेगों को जोड़ने का प्रशिक्षण दे. पार्टी अध्यक्ष ने सवालिया लहजे में कार्यकर्ताओं से पूछा कि क्या कोड़ा को समर्थन देने वाली पार्टियां भाजपा से आंखें मिला सकती है.

jharkhandझारखंड भाजपा में उत्पन्न अन्तर्कलह को पाटने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह रांची आए थे. इस बार शाह का व्यवहार कुछ अलग-अलग सा दिखा. पार्टी अध्यक्ष का पूरा फोकस आदिवासी नेताओं को पार्टी से जोड़े रखने का था. पार्टी नेताओं को नसीहत दी और कहा कि सभी 14 लोेकसभा सीटों पर जीतने के लिए जरुरी है कि पार्टी के नेताओं के बीच उत्पन्न मनभेद दूर हो, नहीं तो मतदाताओं के बीच गलत संदेश जायेगा और इसका सीधा असर लोेकसभा एवं विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा. पार्टी अध्यक्ष ने पहली बार रघुवर दास से नाराज चल रहे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुण्डा एवं केंद्रीय मंत्री कड़िया मुंडा को अहमियत दी और दोनों ही नेताओं को मंच पर अपने दायें-बायें बिठाकर पार्टी कार्यकर्त्ताओं को एक संदेश देने का काम किया. दोनों नेताओं का कद बढ़ा देख मुख्यमंत्री रघुवर दास के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई.

उनकी बैचेनी साफ दिख रही थी, पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इस दौरे में यह सीख सभी पार्टी नेताओं को जरूर दी कि दिल मिले न मिले हाथ मिलाते रहिए, ताकि जनता के बीच यह संदेश जाय कि पार्टी संगठन चट्टान की तरह मजबूत है. शाह को यह अहसास है कि संगठन में अन्तर्कलह चरम पर है और अधिकांश आदिवासी विधायकों सहित कार्यकर्त्ता मुख्यमंत्री के व्यवहार की वजह से नाराज हैं. पार्टी कार्यकर्त्ताओं एवं अधिकांश जिलाध्यक्षों ने अपनी पीड़ा राष्ट्रीय अध्यक्ष को बताया और यह कहा कि मुख्यमंत्री उनलोेगों को हमेशा उपेक्षित दृष्टि से देखते हैं. मुख्यमंत्री का व्यवहार एक जनप्रतिनिधि का न होकर तानाशाह की तरह है.

पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा भी यह सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि पार्टी और सरकार के बीच समन्वय में कमी के कारण राज्य में विभिन्न मुद्दों को लेकर पार्टी की फजीहत हो रही है. कई मुद्दों पर भारी विरोध के कारण सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है. इससे पार्टी की छवि खराब हुई और विपक्षी नेताओं को इसका लाभ मिला. पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सासंद कड़िया मुंडा भी इस तरह की बातें कई बार दुहरा चुके हैं कि मुख्यमंत्री रघुवर दास महत्वपूर्ण मुद्दों पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सलाह नहीं लेेते हैं. सीएनटी एसपीटी एक्ट में संशोेधन रघुवर सरकार की बड़ी गलती थी, जिसके कारण पूरे राज्य में भाजपा के विरोध में आंदोलन खड़ा हुआ और आखिरकार रघुवर दास को पीछे हटना पड़ा.

फर्ज़ी भाजपा सदस्य

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लोकसभा चुनाव को देखते हुए संगठन में उत्पन्न अंतर्कलह को पाटने तो जरूर आए, पर वह इसमें कितना सफल हुए यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा. शाह ने पार्टी नेताओं की जमकर क्लास भी ली. इससे पूर्व के प्रवास में उन्होंने बूथ स्तर पर कार्यकर्त्ताओं को जोड़ने की सलाह दी थी. प्रदेश नेताओं ने वाहवाही लूटने के लिए 45 लाख लोेगों को पार्टी सदस्य बनाने का दावा किया था, पर जब इसकी जमीनी स्तर पर खोज हुई तो 22 लाख फर्जी सदस्य निकले. इस पर शाह ने प्रदेश नेताओं को जमकर फटकार लगाई.

मुंडा बनाम दास

इससे पूर्व जब अमित शाह रांची आए थे तो अर्जुन मुंडा को उस समय खास अहमियत पार्टी नेताओं ने नहीं दी थी, पर इस बार शाह ने मुंडा की जमकर तारीफ की और पीठ थपथपाई. रघुवर दास की सरकार बनने के बाद जब भी उपलब्धियों की बातें होती थी, तो मुंडा कार्यकाल को कभी याद नहीं किया गया. पर इस बार अमित शाह ने मंच से यह कहा कि अर्जुन मुंडा की सरकार ने विकास का जो रोडमैप बनाया था, उसे रघुवर सरकार ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बढ़ाने का काम किया है. यह कहकर पार्टी अध्यक्ष ने आदिवासी समाज की शिकायतें बहुत हद तक दूर करने की कोशिश की. आदिवासी वर्ग उत्साहित हुआ और भाजपा के साथ जुड़ता दिखा.

शाह की यह यात्रा उन नकारात्मक भावनाओं को कुचलने में सफल हुई, जिससे पार्टी को नुकसान हो रहा था. आदिवासी और गैर आदिवासियों के बीच की दूरियां बढ़ती ही जा रही थी. पत्थलगड़ी और भू-अधिग्रहण बिल का नाम लिए बगैर उन्होंने आदिवासी समाज को बरगलाने वाली ताकतों से बचकर रहने की सीख दी और इस सीख को आगे बढ़ाते दिखे कड़िया मुंडा, जिन्होंने पत्थलगड़ी परम्परा को सिरे से खारिज कर दिया.

आदिवासियों की चौपाल

झारखंड भाजपा की राजनीति में रघुवर दास के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेेते ही भाजपा में अन्तर्कलह चरम पर पहुंच गया था. रघुवर दास एवं अर्जुन मुंडा में छत्तीस का रिश्ता है. अधिकांश आदिवासी विधायक एवं नेताओं की नाराजगी साफ झलक रही थी. इसीलिए पहली बार अमित शाह ने आदिवासियों की चौपाल लगवाई और लगभग दस हजार आदिवासियों के साथ सीधा संवाद किया.

इसके बाद आदिवासी समाज में एक नया संदेश गया और इसी बहाने आदिवासियों का दिल जीत उन्हें उत्साहित करने का काम शाह कर गए. इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि अर्जुन मुंडा और कड़िया मुंडा का जनाधार इस राज्य में हैं और आदिवासी मतदाताओं के साथ ही कुर्मी मतों पर इन नेताओं की जबरदस्त पकड़ है. झारखंड में लगभग 65 फीसदी मतदाता इसी समुदाय से है.

आदिवासी नेताओं एवं कार्यकर्त्ताओं में उत्साह भरने के बाद शाह ने चुनावी नैया पार लगाने के लिए टिप्स भी दिए. उन्होंने कहा कि 2014 के चुनाव से भी ज्यादा सीटें लानी है. उन्होंने कार्यकर्त्ताओं से सोशल मीडिया के द्वारा लोेगों को जोड़ने की बात कही. साथ ही बूथ स्तर पर पांच-पांच कार्यकर्त्ताओं को स्मार्ट फोन देकर अपने क्षेत्र के लोेगों को जोड़ने का प्रशिक्षण दे.

पार्टी अध्यक्ष ने सवालिया लहजे में कार्यकर्त्ताओं से पूछा कि क्या कोड़ा को समर्थन देने वाली पार्टियां भाजपा से आंखें मिला सकती है. अमित शाह की इस यात्रा ने आदिवासी समाज को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई. आदिवासियों का भाजपा से मोहभंग होता जा रहा था. इस बार जनजातीय समुदाय में विश्वास पैदा करने की कोशिश की, वहीं पूर्व में संगठन को दिए टास्क का हिसाब लेने के क्रम में आदिवासियों में उत्साह भरने का काम किया.

वैसे अब चुनाव परिणाम ही बताएगा कि आदिवासी समाज अमित शाह से कितना प्रभावित हुआ. अर्जुन मुंडा एवं कड़िया मुंडा सरीखे नेताओं का दिल रघुवर दास की नीतियों से कितना मिल पाया. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि रघुवर की तानाशााही रवैये एवं व्यवहार के कारण आदिवासी समाज भाजपा के साथ नहीं आ सकता, क्योंकि रघुवर ने आदिवासियों के अहित में ही सीएनटी एवं एसपीटी एक्ट संशोेधन एवं भूमि अधिग्रहण जैसे विधेयक लाकर आदिवासियों को नाराज करने का ही काम किया है.

आदिवासियों को ठगने आए थे अमित शाह : झामुमो

झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दावा किया है कि अमित शाह आदिवासियों को ठगने की मंशा से आए थे और आधारहीन दावे कर रहे थे. झामुमो के महासचिव सह प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा कि अमित शाह जनजातीय समुदाय से असलियत छिपा रहे हैं. पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा आदि के संबंध में गिनाई जा रही उपलब्धियां आधारहीन है और इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है. उन्हें बताना चाहिए कि जनजातीय समुदाय के खिलाफ हो रहे काम पर उनकी क्या राय है और पिछड़े क्षेत्रों के विकास को लेकर जारी होने वाले फंड में कटौती क्यों की गई? भाजपा संविधान की पांचवीं अनुसूची पर क्या सोचती है और उसके अनुपालन को लेकर कितनी प्रतिबद्ध है? बीआरजीएफ की राशि के आवंटन में उदासीनता क्यों है?

आदिवासियों को जागीर न समझे भाजपा : कांग्रेस

झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डॉ अजय कुमार ने आरोप लगाया है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का झारखंड दौरा सरकारी दौरा था. सत्ताधारी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष से उम्मीदें थी कि ज्वलंत समस्याओं के समाधान पर बात करेंगे, लेेकिन ऐसा हो नहीं सका. उन्होंने एक बार फिर आदिवासियों को ठगने और दिग्भ्रमित करने का काम किया है. भाजपा आदिवासियों को जागीर समझने की भूल ना करे. सत्ता में आने के बाद आदिवासियों और मूलवासियों के खिलाफ लगातार रघुवर सरकार ने निर्णय लिए हैं. आदिवासी आक्रोश को ठंडा करने के लिए यह दौरा किया गया.

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