किसानों के साथ हो रही सत्ताई-धोखाधड़ी के खिलाफ जूझने की तैयारी, अब संसद घेरेंगे किसान

farmers‘किसानों की आय दोगुनी कर देंगे’… ऐसा बोल-बोल कर केंद्र सरकार और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपने ही जाल में फंस गई है. अब तक स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग करने वाले किसानों ने किसानों की न्यूनतम आय घोषित करने की मांग शुरू कर दी है. किसानों का कहना है कि जब किसानों की आय ही घोषित नहीं है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी देखा-देखी अन्य नेता यह कैसे कहते फिरते हैं कि वे किसानों की आय दोगुनी कर देंगे? देशभर के किसान नवम्बर महीने में जब संसद घेरेंगे तब प्रधानमंत्री से पूछेंगे कि किसानों की आय कितनी है? इसके बाद ही उसका दोगुना या तिगुना होना तय हो सकता है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर ठगे गए किसान 2019 चुनाव के पहले केंद्र सरकार से दो-दो हाथ कर लेना चाहते हैं. न्यूनतम आय के निर्धारण की मांग के साथ-साथ किसानों के लिए संसदीय और विधानसभा सीटें आरक्षित किए जाने की मांग भी शामिल है. किसान मानते हैं कि उनके वोट से जीत कर संसद पहुंचने वाले सांसद या विधानसभाओं में पहुंचने वाले विधायक सदन में किसान-हित की आवाज नहीं उठाते. लिहाजा, किसानों का अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद और विधानसभाओं में जाना चाहिए. अनुसूचित जाति, जनजाति और शिक्षक समुदाय की तरह किसानों की सीटें भी आरक्षित होनी चाहिए.

दरअसल, केंद्र सरकार की बेजा बयानबाजियों और प्रदेश सरकार के बेजा निर्णयों के कारण खास तौर पर उत्तर प्रदेश के किसान बौखला उठे हैं. सिंचाई के लिए इस्तेमाल आने वाले मोटर पंपों पर पड़ोसी राज्य हरियाणा में बिजली का शुल्क अत्यंत कम है और पंजाब में मुफ्त है, बिहार में सब्सिडी है, तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी भारी रियायत है, ऐसे में यूपी सरकार बिजली का दर बढ़ाती चली जा रही है. एक हॉर्स पावर की मोटर पर बिजली शुल्क दो सौ रुपए है. सिंचाई के लिए किसानों को कम से कम पांच हॉर्स पावर की मोटर लगानी पड़ती है, लिहाजा किसानों का बिजली बिल भारी बोझ की तरह उनके सिर पर आ पड़ा है.

किसानों के प्रति संजीदगी का प्रदर्शन करने वाली भाजपा सरकार में बिजली दर और बढ़ा दी गई है. किसानों का बकाया बिजली बिल वसूलने के लिए अलग से थाने निर्धारित कर दिए गए हैं, जो किसानों से पैसे वसूलते हैं और भुगतान में देरी होने पर एफआईआर दर्ज कर किसानों को गिरफ्तार कर लेते हैं. दूसरी तरफ चीनी मिलों पर गन्ना किसानों के जो करोड़ों रुपए बकाया हैं, उसके भुगतान को लेकर सरकार सरासर झूठ बोलती है और चीनी मिलों के मालिक किसानों के गन्ने पर अपनी समृद्धि की फसल काट रहे हैं.

हर बार पेराई सत्र में सरकार झूठ परोसती है कि गन्ना बकाये का भुगतान हो रहा है. आंशिक भुगतान को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है और सियासी फायदा उठाने की कोशिश की जाती है. स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश में केवल सरकारी चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का चार हजार 176 करोड़ रुपए बकाया हैं. प्राइवेट चीनी मिलों पर किसानों का बकाया 11 हजार पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक है. विडंबना यह है कि गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान करने के लिए केंद्र सरकार ने चीनी मिलों के लिए जो 85 सौ करोड़ रुपए मंजूर किए, उसमें तीन हजार करोड़ रुपए अवमुक्त (रिलीज) भी हो गए, लेकिन किसानों के बकाये का भुगतान नहीं किया गया. यह रेखांकित करने वाला तथ्य है कि चीनी मिलों को केंद्र सरकार से मिलने वाला राहत पैकेज ब्याज मुक्त होता है.

लेकिन किसानों का कर्ज या बिजली बिल का बकाया ब्याज सहित वसूला जाता है. किसानों से वसूली बर्बर तरीके से की जा रही है. किसानों के कर्ज का बकाया तहसील में सार्वजनिक नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दिया जाता है. जबकि उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के बकाये का ब्यौरा गोपनीय रखा जाता है. किसान पूछते हैं कि यह किस तरह का न्यायिक संतुलन है? पूंजीपति और उद्योगपति भी बैंक से कर्ज लेते हैं और किसान भी बैंक से ही कर्ज लेते हैं. पूंजीपतियों का कर्ज विशाल होता है, जबकि किसानों का कर्ज अत्यंत लघु होता है.

फिर ऐसा भेदभाव क्यों? कर्ज बकाया होने पर किसानों को तहसील के लॉकअप में बंद कर प्रताड़ित और अपमानित किया जाता है. जबकि बड़े बकायेदार पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के साथ ऐसा नहीं होता, बल्कि उन्हें विदेश भाग जाने का मौका दिया जाता है. किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष शिवाजी राय कहते हैं कि देश के सामने अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि बड़ा कर्जखोर कौन है? किसान या उद्योगपति? किसानों को भी यह प्रतीत होना चाहिए कि सरकार उनकी भी है, सरकार केवल पूंजीपतियों और उद्योगपतियों का हित देखने के लिए नहीं है. देश के तकरीबन सारे उद्योगपतियों का मुनाफा लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि किसान लगातार बदहाल होता चला जा रहा है, ऐसा क्यों?

केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार और सत्ताधारी पार्टी लगातार कहती रहती है कि किसानों की आय दोगुनी की जाएगी. शिवाजी राय पूछते हैं कि क्या सरकार बताएगी कि किसान की आधिकारिक न्यूनतम आय क्या है? फिर आय दोगुनी करने की दोगली बात क्यों करती है? जब किसानों की आय ही सुनिश्चित नहीं है तो सरकार या पार्टी उसे दोगुनी कैैसे कर देगी? सरकार पहले यह तो बताए कि किसानों की आय दरअसल है कितनी? किसान अर्से से 22,500 रुपए प्रति परिवार आय सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं. लेकिन सरकार इस पर कोई ध्यान ही नहीं देती.

केंद्र सरकार क्या केंवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए है? प्रदेश सरकार क्या केवल राज्य कर्मचारियों के लिए है? सरकार क्या केवल सांसदों और विधायकों की सुख-सुविधा देखने के लिए है? क्या उन्हें महज इसलिए वोट दिया जाता है कि वे अपने लिए मौज का इंतजाम करते रहें और आम नागरिक मरता रहे? केंद्र सरकार का यह नैतिक दायित्व है कि किसान परिवारों के लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित हो और प्रत्येक महीने उसका भुगतान किसान परिवार के खाते में चला जाए. किसानों की फसल पर पूंजीपति धनाढ्य होता चला जा रहा है. किसानों की फसल पर सरकार बीपीएल और अंत्योदय योजनाओं में मुफ्त राशन बांट कर वाह-वाही लूटती है और किसानों को उसका श्रेय (अर्थ के रूप में) देने के बजाय बोझ लादती जाती है.

सरकार जब कारपोरेट और उद्योगपति घरानों को अपने उत्पाद की कीमत तय करने के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करती तो किसानों को उनके उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार क्यों नहीं देती? किसानों पर अत्याचार क्यों? अगर सरकार किसानों को उनके उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार नहीं दे सकती तो उसका उत्पाद पूरा का पूरा खरीद ले. किसानों का सम्पूर्ण उत्पाद सरकार खरीदे और उसके विपणन की व्यवस्था करे, तभी देश का किसान तनावमुक्त होकर देश को भोजन दे पाएगा.

नेता, नौकरशाह, पूंजीपति, धन्ना सेठ और दलालों से लेकर आम नौकरीपेशा और सड़क पर जीवन घसीटता आम आदमी सब वही रोटी-दाल और सब्जी खाते हैं, जिसे किसान उपजाता है. फिर किसानों को सम्मानजनक हैसीयत क्यों नहीं दी जाती? बीपीएल के नाम पर न्यूनतम सांकेतिक मूल्य पर बांटा जाने वाला अनाज हो या अंत्योदय के नाम पर मुफ्त में बांटा जाने वाला अनाज, परोक्ष रूप से उसकी कीमत किसानों से ही वसूली जा रही है. किसानों की सब्सिडी रोकी जा रही है और पूंजीपतियों के लिए सरकार का खजाना खुला हुआ है. प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सब उनकी खुशामद कर रहे हैं. देश को राजनीतिक लोग चला रहे हैं या पूंजीपति? देश के लोगों को यही प्रतीत हो रहा है.

इन्हीं मसलों पर देशभर के किसान गंभीरता से विचार कर रहे हैं. 14 जून को दिल्ली के गांधी प्रतिष्ठान में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की बैठक हुई थी. इस बैठक में देशभर के दो सौ से अधिक किसान नेता शरीक हुए. बैठक में तय हुआ कि किसानों की सम्पूर्ण कर्ज माफी, सुब्रमण्यम समिति की सिफारिशों के सी-2 फार्मूले के मुताबिक किसानों की लागत का मूल्य निर्धारण करने और किसानों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने की मांग को लेकर 30 नवम्बर को देशभर के किसान संसद घेरेंगे. उसके पहले व्यापक तौर पर किसानों से बातचीत करने और तैयारी करने का सिलसिला शुरू कर दिया गया है.

उत्तर प्रदेश के बागपत के नगवां कुटी में पिछले दिनों किसानों की बैठक हुई. किसान पंचायत के रूप में हुई बैठक में 10 हजार से अधिक किसान त्वरित सूचना पर जुटे. स्थानीय लोग कहते हैं कि 20 साल के बाद उन्होंने एक साथ इतने किसानों का सम्मेलन देखा. जबकि इस सभा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महज तीन-चार जिले शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत और मेरठ के किसान पहुंचे थे. बैठक में शामिल किसान नेताओं में किसान अधिकार समन्वय मंच के संयोजक नरेंद्र राणा, भारतीय किसान संगठन के अध्यक्ष ठाकुर पूरन सिंह, किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष शिवाजी राय, किसान नेता गुलाम मोहम्मद जौला, महेश सिंह समेत कई किसान नेता शामिल थे.

इस बैठक के बाद किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल लखनऊ आकर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा से मिला. किसानों ने सरकार द्वारा बढ़ाए गए बिजली दर को वापस लेने की मांग की, लेकिन सरकार ने कोई भी सकारात्मक रुख नहीं दिखाया और वार्ता असफल रही. इसके बाद प्रदेश के किसानों ने सरकार से सीधे-सीधे भिड़ने का मन बना लिया है. 17 सितम्बर को बागपत के भड़ल गांव में किसानों की विशाल पंचायत बुलाई जा रही है, जिसमें यह रणनीति तय की जाएगी कि किसान बिजली बिल का बहिष्कार-आंदोलन शुरू कर जेल भरो आंदोलन के लिए तैयार रहें. किसान संगठनों की मांग है कि प्रदेश सरकार किसानों को बिजली और पानी मुफ्त में दे. ट्रैक्टर समेत अन्य कृषि उपकरणों पर लगने वाला टैक्स हटाए. खाद की कीमत कम करे और पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के बजाय किसानों को ही बीज पैदा करने की आर्थिक-सहूलियत प्रदान करे.

किसान यह भी मांग कर रहे हैं कि संसद और विधानसभाओं में वर्गीय प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लागू हो. जिस तरह अनुसूचित जाति जनजाति के लिए संसदीय और विधानसभा क्षेत्र आरक्षित होते हैं, उसी तरह किसानों के लिए भी लोकसभा और विधानसभा सीटें आरक्षित होनी चाहिए. विधान परिषदों के लिए जिस तरह शिक्षकों के लिए सीटें आरक्षित हैं, उसी तरह किसानों के लिए भी होनी चाहिए, ताकि किसान अपनी बात संसद और विधानसभाओं में रख सकें. संवर्गीय प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लागू होने पर केवल किसान क्या, पत्रकार, मजदूर और अन्य संवर्ग के लोग भी अपनी आवाज विधायी तौर पर उठा सकेंगे. अगर ऐसा नहीं होता है, तो फिर लोकतंत्र और मतदान का कोई औचित्य नहीं रह जाता.

किसान नेता शिवाजी राय कहते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों के साथ धोखा है. किसानों के पास कोई ऐसा मंच नहीं, जहां से वे पूरे देश को इस धोखे के बारे में बता सकें. किसानों की पीड़ा यह भी है कि देश का मीडिया भी किसानों की बात सही तरीके से नहीं उठाता. स्वामीनाथन कमेटी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की प्रक्रिया में पूर्ण लागत यानि सी-2 फार्मूले को आधार बनाने की सिफारिश करती है, लेकिन केंद्र सरकार आंशिक लागत के फार्मूले (2+एफएल) को आधार बनाकर मनमाने तरीके से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय कर देती है.

स्वामीनाथन आयोग ने सी-2 फार्मूले के तहत कृषि उत्पादन में इस्तेमाल आने वाले उपकरणों का खर्च, ऋण पर लगने वाला ब्याज, जमीन का किराया, किसान परिवार की मजदूरी, खाद, बीज, सिंचाई, बिजली, वाहन किराया समेत सम्पूर्ण लागत जोड़कर एमएसपी तय करने की सिफारिश कर रखी है. लेकिन केंद्र सरकार ने इसे नहीं माना. केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य में 14 खाद्यानों को शामिल किया गया है, जिसमें धान, ज्वार, हाइब्रिड बाजरा, रागी, मक्का, अरहर, मूंग, ऊड़द, मूंगफली, सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन, तिल, नाइजर सीड और कपास है.

केंद्र ने धान की उपज के लिए आंशिक लागत 1166 रुपए प्रति क्विंटल तय कर 1750 रुपए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया. जबकि सी-2 फार्मूले से धान की फसल पर लागत 1560 तय होती और उसमें 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य 2340 रुपए होता. किसान नेता कहते हैं कि सरकार मात्र छह प्रतिशत किसानों का फसली उत्पाद खरीदती है. वह भी किसानों से न खरीदकर बड़े व्यापारियों और बिचौलियों के माध्यम से खरीदा जाता है. इसमें व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है. इससे किसान समर्थन मूल्य से काफी कम दर पर क्षेत्रीय व्यापारियों या बिचौलियों को अपना माल बेचने पर विवश हो जाता है. सरकार के क्रय केंद्र घपलेबाजी का केंद्र बने रहते हैं. सरकार द्वारा बनाए गए नियम और कटौती की आधा दर्जन शर्तें किसानों के उत्पीड़न का जरिया बनती हैं और किसान अपना उत्पाद मंडी में लाकर फंस जाता है. आखिरकार किसान बिचौलियों और दलालों की शर्तों पर माल बेच कर चला जाता है.

गन्ना बक़ाये पर सरकार परोस रही झूठ, किसानों के हाथ में ठूंठ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा बार-बार सार्वजनिक मंचों से भी गन्ना बकाये के भुगतान को लेकर भ्रामक वक्तव्य जारी करने से नहीं हिचकते. जैसा ऊपर बताया कि चीनी मिलों पर प्रदेश के गन्ना किसानों का करीब 16 हजार (15,676) करोड़ रुपए बकाया है. राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी कहते हैं कि इस वर्ष 18 मई तक निजी और सरकारी चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 13,367 करोड़ रुपए बकाया था. बकाये की यह राशि बढ़ कर 16 हजार करोड़ पर पहुंच गई.

अभी पिछले ही दिनों गन्ना बेल्ट सहारनपुर में चीनी मिलों द्वारा बकाये के भुगतान में की जा रही हीलाहवाली के खिलाफ किसानों की नाराजगी देख कर प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा. सहारनपुर के कमिश्नर सीपी त्रिपाठी ने बकाया भुगतान पर चीनी मिलों की हठधर्मिता देखते हुए 16 चीनी मिलों के खिलाफ नोटिस जारी कर भुगतान करने की हिदायत दी है. बकाये के भुगतान में शासन-प्रशासन की रुचि इससे ही जाहिर होती है कि सहारनपुर की 16 चीनी मिलों के खिलाफ पहली बार नोटिस जारी हुई है.

अकेले सहारनपुर की चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 1766 करोड़ बकाया है. इसमें 1670 करोड़ रुपए मूल और 96 करोड़ रुपए ब्याज के हैं. देवबंद, खतौली और टिकौला चीनी मिलों पर बकाया कुल बकाये का 80 प्रतिशत से ऊपर है. सहारनपुर मंडल की 17 में से नौ चीनी मिलों पर सौ करोड़ रुपए से अधिक बकाया है. बुढ़ाना चीनी मिल पर सबसे अधिक बकाया 217 करोड़ रुपए का है. बकायेदारों में सरकारी कोऑपरेटिव चीनी मिल नानौता और सरसावां मिल भी शामिल हैं. बकाये का जिलेवार ब्यौरा देखें तो आपको सत्ता अलमबरदारों के झूठ का पोर-पोर दिखाई पड़ेगा.

सहारनपुर जिले की छह चीनी मिलों पर 534 करोड़ रुपए बकाया हैं. मुजफ्फरनगर की आठ चीनी मिलों पर 772 करोड़ रुपए बकाया हैं. शामली की तीन चीनी मिलों पर 461 करोड़ से ज्यादा का बकाया है. देवबंद चीनी मिल पर 95 करोड़ बकाया, गांगनौली चीनी मिल पर 158 करोड़ बकाया, शेरमऊ चीनी मिल पर 83 करोड़ बकाया, गागलहेड़ी चीनी मिल पर 27 करोड़ बकाया, नानौता कोऑपरेटिव चीनी मिल पर 114 करोड़ बकाया और सरसावां कोऑपरेटिव चीनी मिल पर 56 करोड़ रुपए बकाया हैं.

इसी तरह खतौली चीनी मिल पर 144 करोड़ का बकाया, तितावी चीनी मिल पर 140 करोड़ का बकाया, बुढ़ाना चीनी मिल पर 217 करोड़ का बकाया, मंसूरपुर चीनी मिल पर 110 करोड़ का बकाया, टिकौला चीनी मिल पर 27 करोड़ का बकाया, खाईखेड़ी चीनी मिल पर 76 करोड़ का बकाया, रोहाना चीनी मिल पर 24 करोड़ का बकाया, मोरना कोऑपरेटिव चीनी मिल पर 34 करोड़ का बकाया, शामली चीनी मिल पर 187 करोड़ का बकाया, ऊन चीनी मिल पर 117 करोड़ का बकाया और खुद प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा के विधानसभा क्षेत्र स्थित थानाभवन चीनी मिल पर 157 करोड़ का बकाया लंबित है. किसान कहते हैं कि गन्ना मंत्री अपने विधानसभा क्षेत्र की चीनी मिल से बकाये का भुगतान नहीं करा पा रहे, तो फिर वे बड़े-बड़े बोल क्यों ‘फेंकते’ रहते हैं!

चीनी मिलों पर गन्ना किसानों के बकाये के भुगतान का कमोबेश यही हाल पूरे उत्तर प्रदेश में है. मुरादाबाद में भी गन्ना भुगतान नहीं होने के कारण किसानों का गुस्सा अब उफान ले रहा है. जिले के गन्ना किसान भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं. इस सिलसिले में पिछले दिनों किसानों की बैठक में गन्ना भुगतान में अप्रत्याशित देरी का मुद्दा जोरदारी से उठा. ब्लॉक अध्यक्ष काले सिंह ने कहा कि एक तरफ गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान नहीं हो रहा और दूसरी तरफ किसानों को खसरा खतौनी के नाम पर परेशान किया जा रहा है. इन किसानों ने तय किया है कि वे 23 सितम्बर को पैदल ही दिल्ली के लिए कूच करेंगे.

उधर संभल जिले में भी गन्ना बकाये का मामला भीषण गर्म हो रहा है. किसानों का उग्र तेवर देखते हुए वहां भी जिला प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा. संभल के जिलाधिकारी ने चीनी मिलों को बकाये का भुगतान करने को कहा है. चीनी मिलों पर गन्ना किसानों के बकाये का ब्यौरा देते हुए प्रशासन ने बताया कि मझावली वीनस चीनी मिल पर 96.16 करोड़ रुपए बकाया हैं. हालांकि प्रशासन ने यह भी कहा कि इसमें 57.26 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया है. बताया गया कि असमोली शुगर मिल पर 509.40 करोड़ के बकाये में से 396.19 करोड़ का भुगतान कर दिया गया है. अब उस पर 113.21 करोड़ रुपए बकाया हैं. इसी तरह रजपुरा शुगर मिल ने 432.58 करोड़ के बकाये में से 342.11 करोड़ भुगतान किया है, अब उस पर 90.47 करोड़ रुपए बकाया हैं.

एक तो भुगतान नहीं दूसरे शिकंजे में कसने की तैयारी

एक तरफ उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बकाये का भुगतान नहीं हो रहा, दूसरी तरफ राज्य सरकार गन्ना किसानों से घोषणा-पत्र दाखिल करने का दबाव बना रही है. जो किसान सरकार की तरफ से निर्धारित प्रपत्र पर घोषणा-पत्र दाखिल नहीं करेंगे, उनका गन्ना चीनी मिलों द्वारा नहीं खरीदा जाएगा. गन्ना किसानों को अपने शिकंजे में कसने के लिए सरकार ने घोषणा-पत्र का फितूर निकाला है. सरकार ने ऐलान किया है कि जिन गन्ना किसानों ने निर्धारित प्रारूप में घोषणा पत्र भरकर प्रस्तुत नहीं किया है, उन किसानों का सट्‌टा संचालित नहीं होगा और पेराई सत्र 2018-19 में उन्हें गन्ना आपूर्ति की इजाजत नहीं दी जाएगी. इसके अलावा गन्ना किसानों को अपने खेत की खतौनी के दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे. किसानों को घोषणा पत्र के साथ खतौनी के दस्तावेज, आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, बैंक पासबुक की फोटो कॉपी भी जमा करनी होगी, तभी उनका गन्ना खरीदा जाएगा.

नेता-रचित भ्रांति में उलझ गई हरित-क्रांति के जनक की रिपोर्ट

सत्ता में आने के पहले भारतीय जनता पार्टी किसानों के लिए स्वमीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने के वादे करती रही, लेकिन सत्ता पर आरूढ़ होते ही भाजपा नेताओं ने तीव्र गति से अपना रंग बदल दिया. अब भाजपा स्वामीनाथ आयोग के नाम से ही बिदकती है. किसानों के लिए जो न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की गई वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के विपरीत है. आप यह जानते हैं कि देश में हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले डॉ. एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में वर्ष 2004 के नवम्बर महीने में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था. आयोग ने अक्टूबर 2006 में अपनी रिपोर्ट दे दी. लेकिन इसे अब तक किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया. स्वामीनाथन आयोग ने किसानों की हालत सुधारने से लेकर कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई सिफारिशें की थीं. सरकार यह दावा करती है कि आयोग की कई सिफारिशें लागू कर दी गईं, लेकिन यह अर्धसत्य है.

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है, 1. फसल उत्पादन की कीमत से 50 प्रतिशत ज्यादा दाम किसानों को मिले. 2. किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दाम में मुहैया कराए जाएं. 3. गांवों में किसानों की मदद के लिए ‘विलेज नॉलेज सेंटर’ यानि ज्ञान चौपाल बनाए जाएं. 4. महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएं. 5. किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके. 6. अतिरिक्त और इस्तेमाल नहीं होने वाली जमीन के टुकड़ों का वितरण किया जाए. 7. खेतिहर जमीन और वनभूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए कारपोरेट घरानों को कतई न दिया जाए. 8. फसल बीमा की सुविधा पूरे देश में हर फसल के लिए मिले. 9. खेती के लिए कर्ज की व्यवस्था हर गरीब और जरूरतमंद किसान तक पहुंचे. 10. सरकार की मदद से किसानों को दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज दर कम करके चार प्रतिशत किया जाए. 11. कर्ज की वसूली में राहत, प्राकृतिक आपदा या संकट से जूझ रहे इलाकों में ब्याज से राहत सामान्य हालत बहाल होने तक जारी रहे. 12. लगातार प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में किसान को मदद पहुंचाने के लिए ‘एग्रीकल्चर रिस्क फंड’ का गठन किया जाए.

आज़ादी के 71 साल बाद निर्णायक शक्ल लेने लगा है किसान आंदोलन

वर्ष 2017 से 2018 के बीच देश के लोगों ने किसान आंदोलन को भाषाई और सीमाई बॉर्डर पार कर देशव्यापी शक्ल लेते हुए देखा है. आजादी के बाद से लेकर अब तक कई प्रमुख और कई क्षेत्रीय स्तर के किसान आंदोलन हुए, लेकिन राजनीति ने इन किसान आंदोलनों को निर्णायक शक्ल तक नहीं पहुंचने दिया. किसान आंदोलनों से जुड़े नेताओं को प्रलोभन के जरिए स्खलित किया और किसान आंदोलनों को फेल कराने का काम किया.

आप याद करें पिछले साल 13 मार्च 2017 को तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर मंतर पर आंदोलन शुरू किया था. तमिलनाडु के किसानों का वह आंदोलन तकरीबन 40 दिन चला और 23 अप्रैल 2017 को खत्म हुआ. इसके बाद एक जून 2017 से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसानों ने आंदोलन शुरू किया. मध्य प्रदेश के किसानों का आंदोलन नियोजित हिंसा की भेंट चढ़ा और पांच किसानों की मौत हुई और सैकड़ों वाहन आग के हवाले कर दिए गए. हिंसा की चपेट में आकर बिखर गया मध्य प्रदेश का किसान आंदोलन सियासी षडयंत्रों का शिकार बना. राजनीतिक दलों ने एक दूसरे पर आरोप लगाए, लेकिन यथार्थ यही है कि किसानों के आंदोलन को हिंसक रूप देने के लिए असामाजिक और अराजक तत्वों का सहारा लिया गया. राजस्थान में भी किसानों का आंदोलन असरकारक रहा, लेकिन महाराष्ट्र और राजस्थान दोनों राज्यों के किसान आंदोलन व्यापक परिणाम हासिल करने के बजाय क्षेत्रीय हित पर संतोष कर समाप्त हो गए. किसानों की मूलभूत समस्या वहीं की वहीं रह गई.

इस वर्ष एक से 10 जून तक 130 किसान संगठनों ने विभिन्न शहरों में सांकेतिक आंदोलन चलाया और कृषि उत्पाद खास तौर पर फल, सब्जियां और दूध आदि की पूर्ति बंद रखी. देश के 30 विभिन्न नेशनल हाईवे पर किसानों के धरना प्रदर्शन से भी देशभर में संदेश गया. मध्य प्रदेश के 10 स्थानों पर किसानों का क्रमिक धरना प्रदर्शन आयोजित होता रहा. महाराष्ट्र के आठ, हरियाणा के चार, राजस्थान के तीन,कर्नाटक के दो, केरल और जम्मू कश्मीर के एकएक स्थान पर किसानों ने अपना डेरा जमाया. इस आंदोलन का रेखांकित करने वाला पहलू जम्मू-कश्मीर के किसानों का आंदोलन में साथ आना है.

किसानों की इस एकजुटता से जागरूकता भी बनी है. इसी का नतीजा है कि हर एक घंटे में दर्ज होने वाली एक किसान की आत्महत्या कम होने लगी है. हालांकि उसका श्रेय लेने के लिए सत्ताधारी दल अवांछित हरकतों से लेकर बयान तक जारी करते रहे. एकजुटता और आंदोलन से देशभर के किसानों में यह जागरूकता प्रगाढ़ हुई है कि सत्ता सियासतदानों के साथ मिल कर कारपोरेट घराने किसानों को खेती छोड़ देने के लिए विवश करने का षडयंत्र कर रहे हैं. कारपोरेट घराने किसानों की खेती पर कब्जा करना चाहते हैं. लिहाजा, किसानों को अब यह बात समझ में आ रही है कि उन्हें अपना मूल काम किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना है. जबकि इसके पहले किसान खेती छोड़ कर दूसरा धंधा अपनाने का मन बना रहे थे.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट के किसानों ने तो कृषि कार्य छोड़ कर दूसरे प्रदेशों में दिहाड़ी मजदूर तक बनना मंजूर कर लिया. जागरूकता के कारण देश के 60 से अधिक किसान संगठनों का किसान एकता मंच शक्ल में आया और एक बार फिर आंदोलनों का दौर शुरू हुआ. भट्‌टा परसौल, बेतुल, मंदसौर के आंदोलन भले ही समय के पहले बिखर गए, लेकिन इन आंदोलनों ने व्यापक पैमाने पर किसानों को एकजुट होने का संदेश दिया.

किसानों के आंदोलन को एकजुट शक्ल में आता देख कर आर्थिक विश्लेषक कहते हैं कि भारत का बाजार ग्रामीण केंद्रित होने वाला है, इसीलिए कारपोरेट घराने किसी भी कीमत पर किसानों को आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होने देना चाहते. किसान आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होगा तो भविष्य में ग्रामीण सेक्टर में विकसित होने वाले कृषि आधारित मझोले, लघु और सूक्ष्म उद्योग-धंधों पर किसानों का मालिकाना हक नहीं हो पाएगा और उस ग्रामीण बाजार को भी कारपोरेट घराने ही कंट्रोल कर पाएंगे.

इस षडयंत्र में सत्ता भी कारपोरेट घरानों का ही साथ दे रही है, क्योंकि राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए पैसा भी कारपोरेट घरानों से ही मिलता है. देश के 650 जिलों में से 500 जिलों के बाजार ग्रामीण आधारित हैं. कारपोरेट घराने इस बाजार पर अपना नियंत्रण चाहते हैं. देश में अनाज का उत्पादन करीब तीन सौ मिलियन टन है और करीब ढाई सौ मिलियन टन अन्य फसलों का उत्पादन है. दूध का उत्पादन 150 मिलियन टन है, जो देश की अर्थव्यवस्था को 30 से 40 लाख करोड़ का व्यापार देता है. अगर किसान एकजुट हुए, तो इतने बड़े ग्राम्य आधारित बाजार का नियंत्रक किसान समुदाय ही होगा. लड़ाई का मूल बिंदु यहां है.

आम लोग भी समझ रहे हैं किसानों की मूलभूत समस्याएं

दो वर्षों में घनीभूत हुए किसान आंदोलनों ने किसानों की मूलभूत समस्याओं के बारे में देश के आम लोगों को जानने समझने का मौका दिया है. किसानों की इन समस्याओं को पिछले 71 साल से सियासतदानों ने दबा-छुपा कर रखा और उस पर राजनीति की रोटियां सेंकते रहे. आजादी के सात दशक बाद भी देश में खेतों के बंटवारे का कोई संतुलित नियम नहीं बनाया गया. आज भी देश में कृषि भूमि के मालिकाना हक को लेकर होने वाले विवाद सबसे अधिक हैं. असमान भूमि वितरण के खिलाफ किसान आवाज उठाते रहे हैं, लेकिन सरकारें साहूकारों और सामंतों के पक्ष में ही खड़ी रही हैं. जमीनों का बड़ा हिस्सा बड़े धनपतियों, नेता और नौकरशाहों के रूप में नव-सामंतों, दलालों और साहूकारों के पास है. भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े फार्म हाउस हैं, जहां कृषक मजदूर काम करते हैं. छोटे और मझोले किसानों की दुर्दशा है. फसल अच्छी नहीं हुई, तो बर्बाद हुए, मौसम की मार हुई तो मारे गए और कर्ज डूबा तो फांसी लगा ली.

छोटे रकबे में फसल उगाने की जद्दोजहद करने के बाद भी किसानों को उनकी फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिलता. यह इस कृषि प्रधान देश का ‘कैंसर’ है, जिसे नेताओं ने पाल कर रखा है. सरकार हर फसल के मौसम में किसानों का अनाज खरीदने की घोषणा करती है, क्रय केंद्र खोलती है और उन क्रय केंद्रों में नौकरशाह, कर्मचारी और दलाल मिल कर भ्रष्टाचार की दुकान खोल लेते हैं. किसानों का अनाज क्वालिटी के आधार पर रिजेक्ट कर देने का डर दिखा कर मनमानी कीमत पर खरीदा जाता है और उसी अनाज से भ्रष्टाचारी अपना धन साम्राज्य खड़ा करते हैं. किसान औने-पौने दाम पर अपना माल बेच कर घर लौट जाता है. गेहूं और धान की सरकारी खरीद में भीषण घोटाला होता है, लेकिन वह सरकार को नहीं दिखता. आलू, टमाटर और दूसरी सब्जियों को लेकर भी किसान मरता रहा है. आपने अभी देखा ही कैसे किसानों ने अपना आलू टमाटर सड़क पर फेंक दिया.

उत्तर प्रदेश का अलीगढ़ से लेकर फर्रुखाबाद तक का पूरा बेल्ट आलू उत्पादन के लिए न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है. लेकिन किसानों को आलू की लागत का मूल्य भी नहीं मिल पाता. बाजार में आलतू-फालतू दाम पर आलू बेच कर किसान को लौटना पड़ता है या सड़क पर आलू फेंक कर किसान घर लौट जाता है. आजादी के 71 साल बाद भी सरकार ने आलू के भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की और कोल्ड स्टोरेज में आलू रखने के लिए व्यापारी मनमाना किराया वसूल करते हैं. किसान इतना दबाव में आ जाता है कि वह कोल्ड स्टोरेज में ही अपना आलू छोड़ देता है. गन्ना किसानों की स्थिति के बारे में आपने ऊपर जाना ही. धन्ना सेठों की चीनी मिलों पर किसानों के अरबों रुपए बकाया हैं, लेकिन सरकार को झूठ बोलने से ही फुर्सत नहीं.

यह भी अजीब विडंबना है कि फसल किसान बोते हैं, लेकिन बीज पैदा करने का अधिकार कारपोरेट और व्यापारिक घरानों के पास है. बीज उत्पादन के लिए सरकार सारी सुविधाएं व्यापारिक घरानों को ही देती है. यही सुविधा किसानों को मिले तो किसान अपने लिए बीज का उत्पादन खुद करने लगें. किसानों को बाजार से महंगा बीज खरीदना पड़ता है. किसान लगातार यह मांग कर रहे हैं कि बीज पैदा करने का अधिकार और सुविधाएं उन्हें दी जाएं, लेकिन सरकार ऐसा क्यों करे? बीजों की वितरण व्यवस्था भी ठीक नहीं है. बीज महंगा होने के बावजूद अच्छी क्वालिटी का नहीं होता, जिसका असर कृषि उत्पाद पर पड़ता है.

उच्च स्तरीय बीज और हाइब्रीड बीज के नाम पर किसानों को खूब ठगा भी जाता है. किसानों का दुर्भाग्य ही है कि आजादी के सात दशक बाद भी देश में सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं हो पाई है. किसान खुद अपना मोटर पंप लगा कर सिंचाई करते हैं, तो सरकार बिजली शुल्क बढ़ा कर इन्हें लूटती है और उत्पीड़न करती है. किसान बारिश के भरोसे ही खेती करता है. केवल उत्तर प्रदेश ही क्या, देश के तमाम दूसरे राज्यों में भी सिंचाई व्यवस्था पर सरकारों का कोई ध्यान नहीं है. नहरें, रजबहे सब सूख गए हैं. नहरें रजबहे मलबों से पट गए, लेकिन सफाई नहीं हुई. कागज पर सफाई हो जाती है और सरकारी धन मंत्री से लेकर अफसर और कर्मचारी के जेबाय नमः हो जाता है. पंजाब और हरियाणा ही ऐसा राज्य है, जहां सिंचाई व्यवस्था पर सरकारों ने ध्यान दिया.

फसलों को बाजार तक पहुंचाने की भारी दिक्कत का सामना किसानों को हर फसली मौसम के बाद करना पड़ता है. कृषि उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने के लिए समुचित ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था आज तक नहीं की गई. किसान खुद अपना प्रोडक्ट किसी तरह ऊंचा किराया देकर बाजार तक लाता है और वहां उसे अपने उत्पाद की उचित कीमत नहीं मिल पाती. जल्दी खराब होने वाले कृषि उत्पादों को लेकर किसान और मार खाते हैं. किसानों के लिए आफत यह है कि एक बार किसी तरह अनाज या सब्जियां बाजार तक पहुंचा दीं, तो वापस नहीं लाई जा सकतीं. इससे पार पाने के लिए किसान हर बार अपना माल औने-पौने दाम पर बेच कर वापस लौट आता है.

बाजार में किसानों के रुकने के लिए कहीं भी कोई विश्रामगृह आज तक नहीं बनाया गया. किसानों पर हावी साहूकारी और महाजनी की समानान्तर व्यवस्था खून चूसने का काम कर रही है. इसमें बैंक भी नव-साहूकार के रूप में आ गए हैं और प्रशासन की मदद से वे किसानों पर जुल्म ढा रहे हैं. महंगे बीज, महंगी खाद, महंगी सिचाई और महंगी तकनीकी जरूरतों ने किसान को कर्जखोर बना कर रख दिया है. कर्ज देने में बैंक किसानों से घूस वसूलते हैं तो सूदखोर, साहूकार और महाजन किसानों से ऊंचा ब्याज वसूलते हैं. किसानों की बेतहाशा हुई आत्महत्याओं की मूल वजह यही है.

पर किसानों के रहनुमा भी उतने ही बड़े ‘अपराधी’…

देश में किसानों की दुर्दशा के लिए किसानों के रहनुमा भी कम दोषी नहीं रहे हैं. बिना नाम छापे आप समझ लेंगे कि इस देश में कौन कौन से स्वनामधन्य नेता सियासत की दुकान में किसानों के मसले बेच-बेच कर प्रभावशाली, समृद्धशाली, बलशाली और भूशाली होते गए. किसानों के रहनुमा बनने वाले लोग बड़े-बड़े नेता और मंत्री बने, लेकिन ‘बड़ा’ बनने के बाद उन नेताओं ने किसानों के मसले छोटे कर दिए. आप सुनते और बोलते हैं कि नक्सली संगठनों के नेता (कमांडर) कैसे धनाढ्य होते गए. उनके बच्चे पश्चिमी देशों में आलीशान स्कूल-कॉलेजों में पढ़ते हैं या बेहतरीन नौकरी करते हैं. कश्मीर के अलगाववादी नेताओं का भी यही हाल है.

किसानों के रहनुमा नेताओं की लंबी जमात को भी आप उन्हीं नक्सलियों और अलगाववादियों की फेहरिस्त में शामिल कर सकते हैं. आंदोलनों के फेल होने की सबसे बड़ी वजह यही है. आप झांक कर देखें, तो किसानों के रहनुमा नेताओं की आज की समृद्धियां उनकी चारित्रिक-दुष्यात्रा की कहानियां कहती मिलेंगी. इनकी हजारों एकड़ जमीनें और करोड़ों-अरबों रुपए की आर्थिक औकात यह बताने के लिए काफी है कि इस देश में किसान एकजुट क्यों नहीं हो पाए, किसानों की समस्या का समाधान आज तक क्यों नहीं निकला और किसान आंदोलन आज तक फेल क्यों होते रहे..!

किसानों से बर्बर वसूली, नेताओं पर अरबों बक़ाया

किसानों के बिजली बिल या ऋण के बकाये की मामूली रकम की वसूली गैर मामूली और अमानवीय तरीके से होती है. जबकि नेताओं पर बिजली बिल के अरबों रुपए बकाया है, लेकिन उसकी वसूली नहीं होती. सत्ता का यही दोगला चरित्र भारतीय लोकतंत्र की कठोर सच्चाई है. आप हैरत करेंगे कि उत्तर प्रदेश के मंत्रियों और विधायकों पर 10 हजार करोड़ रुपए का बिजली बिल बाकी है. इसके अलावा नेताओं के आरामगाहों यानि वीआईपी गेस्ट हाउस पर भी दो करोड़ 65 लाख रुपए का बिजली बिल बकाया है. और तो और विधानसभा में मंत्रियों विधायकों को आचार विचार की सीख देने वाले विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित पर भी 12 लाख 64 हजार का बिजली बिल बकाया है.

बिजली बिल बकाये का ब्यौरा देखेंगे तो आपको सियासत की असलियत का एहसास होगा. बहुखंडी मंत्री आवास पर एक करोड़ 47 लाख, प्रदेश के खेल मंत्री चेतन चौहान पर 17 लाख 72 हजार, खुद बिजली मंत्री श्रीकांत शर्मा पर 6 लाख 51 हजार, कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही पर 9 लाख 28 हजार, उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या पर 10 लाख 80 हजार, शहरी विकास मंत्री सुरेश खन्ना पर 9 लाख 20 हजार, औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना पर 7 लाख 83 हजार और वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल पर करीब 9 लाख रुपए का बिजली का बिल बाकी है. कर्मचारियों का आरोप है कि निजीकरण पूंजीपतियों को फयदा पहुंचाने के लिए हो रहा है. प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा जब यह कहते हैं कि बिजली विभाग 72 हजार करोड़ के घाटे में है, तो खुद पर उंगली उठाने का नैतिक साहस नहीं कर पाते.

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क्या सरकार बताएगी कि किसान की आधिकारिक न्यूनतम आय क्या है? फिर आय दोगुनी करने की दोगली बात क्यों करती है? जब किसानों की आय ही सुनिश्चित नहीं है तो सरकार या पार्टी उसे दोगुनी कैसे कर देगी? सरकार पहले यह तो बताए कि किसानों की आय दरअसल है कितनी?

-शिवाजी राय, अध्यक्ष, किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...

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