करुणानिधि के बाद, तमिल राजनीति में बड़े बदलाव की संभावनाएं सीमित

karunanidhiगत 7 अगस्त को एम करुणानिधि के निधन के बाद सही मायनों में तमिलनाडु की राजनीति से एक युग का समापन हो गया है. क्योंकि पिछले पांच दशकों से तमिलनाडु की राजनीति पर जिन दो द्रविड़ पार्टियों का दबदबा रहा है, उनकी पहली पंक्ति के दो आखिरी महारथी केवल दो वर्ष के अन्तराल में दुनिया से रुखसत हो गए. इसमें कोई शक नहीं कि तमिलनाडु में आज भी इन दोनों नेताओं की पार्टियां, डीएमके और एआईडीएमके  का दबदबा बरक़रार है.

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 5 दिसम्बर 2016 को जे जयललिता के निधन के बाद उनकी पार्टी में चल रही वर्चस्व की लड़ाई की तरह अब करुणानिधि के बाद डीएमके  के भीतर भी कुछ वैसा ही देखने को मिलेगा? क्या इन दोनों नेताओं के निधन से पैदा स्थिति में कांग्रेस, भजपा या हाल में राजनीति में पदार्पण करने वाले तमिल सिनेमा के दो महानायक कमल हसन और रजनीकांत अपने लिए कोई रास्ता निकाल पाएंगे?

जहां तक डीएमके में आपसी खींचातानी का सवाल है तो यदि डीएमके  के इतिहास पर नज़र डाली जाए तो यह पता चलेगा कि यहां इस तरह की खींचातानी कोई नई बात नहीं है. इसी अंदरूनी कलह की वजह से एमजी रामचन्द्रन ने 17 अक्टूबर 1972 को अपनी नई पार्टी एआईएडीएमके बनाई थी. यदि आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो करुणानिधि ने पार्टी पर अपनी गिरफ्त कभी ढीली नहीं होने दी. इसके बावजूद पार्टी हालिया कुछ वर्षों के दौरान आंतरिक कलह में गिरफ्तार रही. इसे लेकर वे काफी क्षुुब्ध थे. लिहाज़ा, 2013 में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि पार्टी में एकता की कमी कोई नई बात नहीं है और डीएमके ने इस तरह के कई अड़चनों का सामना कामयाबी के साथ किया है. वे खास तौर पर अपने पैतृक क्षेत्र तिरुवरुर में पार्टी के अंतर्कलह से काफी नाराज़ थे और पार्टी के मामले में गतिरोध पैदा करने वालों को उन्होंने गद्दार जैसे शब्द से मुखातिब किया था.

दरअसल, उस अंदरूनी कलह की वजह करुणानिधि द्वारा 3 जनवरी 2013 को अपने तीसरे पुत्र एमके स्टालिन को अपना उत्तराधिकारी बनाए जाने का इशारा देना था. इस बात की औपचारिक पुष्टि उन्होंने अक्टूबर 2016 में एक तमिल मैगज़ीन को दिए अपने इंटरव्यू में की थी. उस इंटरव्यू में उन्होंने साफ़ साफ़ कहा था कि उनके बाद स्टालिन ही पार्टी की कमान संभालेंगे. ज़ाहिर है यह चीज़ करुणानिधि के दूसरे पुत्र और केंद्रीय मंत्री एमके अलागिरी को अच्छी नहीं लगी और उनके और स्टालिन के बीच मतभेद खुल कर सामने आ गए. वर्ष 2014 में पहले उन्हें पार्टी से निलंबित किया गया और बाद में निष्कासित कर दिया गया था. हालांकि अलागिरी यह सफाई देते रहे कि उनके और स्टालिन के मतभेद नीतियों को लेकर थे, उत्तराधिकार के कारण नहीं.

अब करुणानिधि के निधन के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि एक बार फिर डीएमके में उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हो सकती है. लेकिन जानकारों का कहना है कि 28 जुलाई को करुणानिधि के अस्पताल में भर्ती होने और 7 अगस्त को उनके निधन तक अलागिरी समेत पूरा परिवार एक साथ था. जानकर सूत्रों के हवाले से छपी ख़बरों के मुताबिक इस बीच दोनों युद्धरत भाइयों के बीच खुली बातचीत हुई और उत्तराधिकार का मामला सुलझा लिया गया है. करुणानिधि के निधन के  बाद शोक में डूबे स्टालिन, अलागिरी, एमके कनिमोझी और ए राजा की अखबारों में छपी तस्वीर से यह सन्देश देने की कोशिश की गई कि परिवार में सब कुछ ठीक है.

बहरहाल, अभी यह कहना कि डीएमके के प्रथम परिवार में सुलह सफाई हो गई है, सब कुछ ठीक हो गया है, थोड़ी जल्दबाजी होगी. क्योंकि प्रदेश की राजनीति में भाजपा अपनी पैठ बनाने में जी जान से जुटी हुई है. इसकी रणनीति फ़िलहाल यह है कि किसी तरह से यहां की दो बड़ी पार्टियों में अंदरूनी मतभेद को हवा दी जाए और उनके बिखरे हुए जनधार को समेट कर अपने लिए ज़मीन तैयार की जाए. उसे अपनी इस कोशिश में कामयाबी भी मिलती दिखी, जब जयललिता के निधन के बाद एआईडीएमके के उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हुई. उस लड़ाई में कई भद्दे मोड़ भी आए.

उनमें से एक था गवर्नर द्वारा शशिकला को शपथ दिलाने में देरी, ताकि उनके मुकदमे का फ़ैसला आ जाए. बाद में शशिकला को सजा हो गई. उसके बाद पार्टी पहले दो हिस्सों में बंटी और फिर एक हुई. शशिकला को पार्टी से निष्कासित भी किया गया, लेकिन फिर भी जयललिता के उत्तराधिकार का फैसला नहीं हो पाया. क्योंकि जनता ने शशिकला को नाकारा नहीं. जयललिता के निधन से खाली हुए आरके नगर विधान सभा क्षेत्र के उपचुनाव में शशिकला के उम्मीदवार दिनाकरण चुनाव जीत गए. भाजपा को भी राज्य में अपनी शक्ति का अंदाज़ा हो गया. इस उपचुनाव में उसके उम्मीदवार को नोटा से भी कम वोट मिले.

उधर भाजपा और कांग्रेस से इतर दो और नए खिलाड़ी कमल हासन और रजनीकांत लंगोट कस अखाड़े में उतरने को तैयार हैं. भाजपा की नज़र रजनीकांत पर भी है. रजनीकांत ने अभी तक अपने सारे दावं नहीं चले हैं. कमल हासन ने अपनी पार्टी का ऐलान कर दिया है. तमिल सिनेमा के इन दोनों महानायकों के मैदान में आने के बाद यह बहस तेज़ हो गई थी कि क्या जयललिता और करुणानिधि की मौत से उत्पन्न स्थिति और एआईडीएमके एवं एआईएडीएमके की अंदरूनी कलह की पृष्ठभूमि में तमिल फिल्म जगत के लिए फिर से नई संभावनाओं की कोई खिड़की खुलती है? इस सवाल का जवाब आसान भी है और मुश्किल भी.

आसान इसलिए हैं कि तमाम अंदरूनी कलह के बावजूद डीएमके और एआईएडीएमके राज्य के सियासी अखाड़े के मुख्य खिलाडी हैं. हालांकि एआईडीएमके में नेतृव का फैसला अभी तक जनता ने नहीं किया है, लेकिन डीएमके के साथ वैसा नहीं है. डीएमके में स्टालिन लगभग स्थापित हो चुके हैं. करुणानिधि के अंतिम संस्कार में जुटी भीड़ ने यह से साबित कर दिया है कि उनके समर्थक उनके द्वारा चुने गए उत्तराधिकारी को इतनी आसानी से नहीं भुला सकते. जहां तक कमल हसन और रजनीकांत के राजनीतिक भविष्य का सवाल है, तो फिलहाल उनके लिए कोई जगह बनती नहीं दिख रही है. वहीं भाजपा को भी राज्य में अपनी स्थित मज़बूत करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है.

ऐसा इसलिए है, क्योंकि तमिलनाडु में आज भी पिछड़ी जातियों से जुड़े द्रविड़ आंदोलन का प्रभाव मंद नहीं पड़ा है. लिहाज़ा यहां निकट भविष्य में कोई दूसरी पार्टी डीएमके या एआईडीएमके को अपदस्थ करने की स्थिति में नज़र नहीं आ रही है. हां, यदि कमल हासन, रजनीकांत और विजयकान्त एक गठबंधन बना लेते हैं (जिसकी संभावना अभी कम दिख रही है) तो शायद वे राज्य के स्थापित दलों के लिए कोई बड़ी चुनौती पेश कर सकें.

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