इस देश की आशा थे अटल बिहारी वाजपेयी

atal jiअटल जी पिछले कई वर्षों से स्थितप्रज्ञ की अवस्था में थे. वे न बोलते थे न सुनते थे, बस उन्होंने जो जिया है, जो पाया है, जो करना चाहा और जो अधूरा रह गया शायद उसके बारे में अपने अंतर्मन में सोचते रहते होंगे. स्थितप्रज्ञ ऐसी अवस्था होती है, जिसमें व्यक्ति पूर्णतया बाहृय जगत से कट जाता है, अपने को अलग कर लेता है और अपने अंतर्जगत में ही विचरित होता रहता है. ये अवस्था उन्होंने पांच साल पहले अंगीकार की, या आठ साल पहले या दस साल पहले, इसे लेकर मतभेद हो सकता है, पर वे पिछले 13 सालों से निश्चित रूप से स्थितप्रज्ञ की अवस्था में थे.

लोग उनके पास जाते थे, अपनी बात कहते थे, उन्हें समझाने की कोशिश करते थे, पर वे अपनी कुर्सी पर बैठे शून्य में निहारते रहते थे. कभी सामने टेलीविजन चल रहा होता था, तो टेलीविजन की ओर ही देखते रहते थे. जब उनके पास प्रधानमंत्री या गृहमंत्री जैसे लोग जाते थे, तब शायद उनकी कुर्सी का मुंह उनकी तरफ मोड़ दिया जाता था. लेकिन वे उन्हें भी वैसे ही देखते रहते थे, जैसे शून्य में कोई व्यक्ति शून्य का अर्थ समझने की कोशिश कर रहा हो. उनके लिए भीड़ का अर्थ, दल का अर्थ, पार्टी का अर्थ या फिर परिवार का अर्थ समाप्त हो गया था. वे थे भी और नहीं भी थे. वे सच्चे साधु की तरह स्थितप्रज्ञ अवस्था में थे.

वे क्या सोच रहे होंगे, क्या समझ रहे होंगे, कोई नहीं जान पाएगा. शायद उन्होंने ये अवस्था इसलिए स्वीकार की होगी क्योंकि उन्होंने जिन्हें बनाया, जिन्हें तराशा, जिन्हें नए समाज के दिशा-निर्देशक के रूप में माना, उनमें से ज्यादातर लोग उनकी आशाओं पर खरे नहीं उतरे. वे जिस तरह का व्यक्तित्व चाहते थे, वैसे लोग आज न उनकी पार्टी में बचे हैं, न उनके जानने पहचानने वालों में बचे हैं और न ही देश में बचे हैं. एक सच्चे मानवता प्रेमी के लिए इससे बड़ा आंतरिक झटका और क्या हो सकता है. शायद अंतर्मन में वे इन स्थितियों से लड़ने का रास्ता तलाश रहे होंगे और जब वो रास्ता उन्हें नहीं मिला होगा, तो वे खामोश हो गए होंगे.

उस खामोशी में भी उनकी शक्तिशाली इतनी बढ़ गई होगी कि उनसे मिलने आने वालों के मन में घुसकर वे उसके समस्त विचारों को जान लेते होंगे. अधिकांश आने वाले अंतर्मन को पढ़कर उन्हें अगर अच्छा लगता होगा, तो शायद वे वापस आने की कोशिश भी करते. लेकिन जब उन्हें लगा होगा कि उनसे मिलने आने वाला हर कोई एक क्षणिक और नकली आदर का भाव देकर जा रहा है, उसके मन में कुछ और चल रहा है, कुछ और अपेक्षाएं पल रही हैं और वो उनके सामने सज्जन पुरुष बनने का अभिनय कर रहा है, तब शायद वे अपने अंतर्मन में और ज्यादा दुखी हो जाते होंगे. इसकारण शायद उनके अंदर वो बीज ही अंकुरित नहीं हुआ और वो आशा ही संचारित नहीं हुई, जो उन्हें इस विश्व में वापस लाने की प्रेरणा देती.

अटल जी ने बहुतों को बनाया, अपने लिए प्रतिमान निर्धारित किए, अपने लिए मूल्यों का निर्माण किया, खुद उसपर चले और अपने साथियों को उसपर चलते देखना चाहते थे. लेकिन जैसा अक्सर इस विश्व में होता है कि जो आपका सबसे नजदीकी साथी होता है या आपके जो प्रिय शिष्य होते हैं, वे ही आपकी बातों को आगे नहीं बढ़ा पाते, वे ही आपके आदर्शों पर कायम नहीं रह पाते और वे ही आपके मानवीय मूल्यों को नहीं समझ पाते.

ऐसा किसके साथ नहीं हुआ. ऐसा भगवान महावीर के साथ हुआ, भगवान बुद्ध के साथ हुआ, महात्मा गांधी के साथ हुआ, जयप्रकाश नारायण के साथ हुआ, तो फिर ये अटल बिहारी वाजपेयी के साथ क्यों नहीं होता. अटल बिहारी वाजपेयी ज्यादा भावुक व्यक्ति थे, जो लोगों की बुराइयों को दूर करने में और लोगों को सही रास्ते पर ले जाने में अपना संपूर्ण कौशल लगाने की क्षमता रखते थे. लेकिन जब उन्हें ऐसा लगा कि कोई उस रास्ते पर चल ही नहीं सकता है, तो उन्हें कितना दुख हुआ होगा इसका अंदाजा सिर्फ भावुक मन के व्यक्ति ही लगा सकते हैं. राजनीति में पड़े हुए निष्ठुर, निर्मम और क्रूर राजनीतिज्ञ कभी उस दर्द और तकलीफ को समझ ही नहीं सकते.

अटल जी भारत की राजनीति में आई बहुत सारी कुरीतियों और दुष्प्रभावों को अपने जीवन में ही देख चुके थे. वे जब स्थितप्रज्ञ अवस्था में नहीं गए थे, उसके पहले भी उनका विरोध करने की इच्छा शक्ति समाप्त कर चुके थे. शायद इसलिए कि उन्होंने भारत का भविष्य देख लिया था कि भारत का असली भविष्य कुछ और है और भारत का नकली भविष्य दूसरा है. उन्हें भारतीय जनमानस के भीतर चल रहे बदलाव का भी अहसास हो गया होगा.

उन्हें आम जनमानस में गिरते हुए मानवीय मूल्यों का भी अवश्य अहसास हुआ होगा. अटल जी ने अपने जीवन में जिन मानकों की स्थापना की, जिन सम्भावनाओं को देखा या जिन सफल हुईं सम्भावनाओं का उदाहरण कई बार देखा, वो सब उनकी स्थितप्रज्ञता से पहले व्यर्थ होती नजर आईं होंगी. अटल जी को कितना दुख हुआ होगा, कोई नहीं समझ सकता. यह शायद सिर्फ अटल जी ही समझ सकते थे. इसीलिए अटल जी खामोश हो गए और स्थितप्रज्ञ की अवस्था में चले गए. उन्होंने इस बाहृय जगत से नाता तोड़ अपने अंतर्मन को ही अपने रहने, खाने, घूमने, बात करने का आशियाना बना लिया.

अगर कहीं ईश्वर रहा होगा, तो स्थितप्रज्ञता की अवस्था में जाने के बाद अटल जी ईश्वर को ही अपनी कविताएं सुनाते होंगे, ईश्वर से ही संवाद करते होंगे, वाद-विवाद करते होंगे. शायद वे ईश्वर को भी कायल करते होंगे कि उसने ऐसा संसार किस उद्देश्य से बनाया, जिसमें भाई-भाई का दुश्मन है, पड़ोसी-पड़ोसी का दुश्मन है और सत्य, अहिंसा, मानवता, भाईचारे जैसे शब्द अपना अर्थ समाप्त कर सिर्फ शब्द के रूप में शब्दकोष में रह गए हैं. मेरा पूरा विश्वास है कि अटल जी ईश्वर से अवश्य लड़ाई लड़ते होंगे और स्थितप्रज्ञता की अवस्था में उन महापुरुषों से भी लड़ते होंगे, जिनका हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार पुनर्जन्म नहीं हुआ होगा और वे किसी एक जगह जिसे स्वर्ग कहते हैं, वहां पर होंगे.

किसी भी धर्म के बड़े लोग या किसी भी धर्म के पुण्यात्मा यहां पर जातियों और धर्मों में बंटे हैं, पर वहां स्थितप्रज्ञता की अवस्था में अटल जी ने सभी को खिलखिलाते हुए आपस में अपनी सफलताओं और असफलताओं को लेकर बातचीत करते हुए अवश्य देखा होगा. अटल जी उन सबको मानवीय जीवन के अंतर्विरोध के बिन्दुओं को समझाते हुए, अपने मन के उस दुख को भुलाने की कोशिश करते होंगे, जो दुख उन्होंने स्थितप्रज्ञता से पहले देखा होगा. अटल जी स्थितप्रज्ञता से पहले भी सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के नहीं थे. भारतीय जनता पार्टी उन्हें अपना मानती थी, क्योंकि उन्हें उनके नाम का फायदा मिलता था. अटल जी दरअसल देश के आदमी थे.

अटल जी दरअसल इंसानियत के प्रतिरूप थे. अटल जी दरअसल प्यार और मोहब्बत के जीते-जागते उदाहरण थे. अटल जी इस देश की आशा थे, जिन्होंने उन सबमें विश्वास पैदा किया, जिनमें आपस में एकसाथ विश्वास पैदा करना कभी बहुत मुश्किल लगता था. इसीलिए आज अटल जी को कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक लोग आंसू बहाते हुए याद कर रहे हैं. शारीरिक रूप से वे हमारे बीच भले न हों, पर मुझे उनकी स्थितप्रज्ञता की स्थिति याद आ रही है, जब वे न हंसे, न रोए, न बोले, न मुस्कुराए, न अपना दुख व्यक्त किया, न अपना दर्द दिखाया और न अपने आंसू दिखाए. सारा दर्द पीते हुए स्थितप्रज्ञता की अवस्था में, इस नश्वर संसार में रहते हुए भी वे अनश्वर जगत के वासी हो गए थे. ऐसे अटल बिहारी वाजपेयी को पूरा देश हमेशा याद करेगा.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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